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'''२. दूसरा तप लोकमत परिष्कार''' : शिक्षा सर्वजन समाज के लिए होती है। सर्वजन का प्रबोधन करना, शिक्षा के नये प्रतिमान को समाज से स्वीकृति दिलवाना, लोकजीवन में विद्यमान रूढि, कर्मकांड, अन्धश्रद्धा को परिष्कृत करना भी शिक्षा का कार्य है । अतः लोकमत परिष्कार या लोक शिक्षा, यह दूसरा चरण होगा।  
 
'''२. दूसरा तप लोकमत परिष्कार''' : शिक्षा सर्वजन समाज के लिए होती है। सर्वजन का प्रबोधन करना, शिक्षा के नये प्रतिमान को समाज से स्वीकृति दिलवाना, लोकजीवन में विद्यमान रूढि, कर्मकांड, अन्धश्रद्धा को परिष्कृत करना भी शिक्षा का कार्य है । अतः लोकमत परिष्कार या लोक शिक्षा, यह दूसरा चरण होगा।  
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'''३. तीसरा तप परिवार शिक्षा''' : शिक्षा व्यक्ति के जन्म पूर्व से शुरू हो जाती है। उस समय शिक्षा देनेवाले माता-पिता होते हैं । इसलिए माता को प्रथम गुरु कहा गया है । परिवार में संस्कार होते हैं, चरित्र निर्माण होता है । परिवार कुल परम्परा, कौशल परम्परा, व्यवसाय परम्परा तथा वंशपरंपरा का वाहक होता है । अतः परिवार शिक्षा यह तीसरा चरण है।  
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'''३. तीसरा तप परिवार शिक्षा''' : शिक्षा व्यक्ति के जन्म पूर्व से आरम्भ हो जाती है। उस समय शिक्षा देनेवाले माता-पिता होते हैं । इसलिए माता को प्रथम गुरु कहा गया है । परिवार में संस्कार होते हैं, चरित्र निर्माण होता है । परिवार कुल परम्परा, कौशल परम्परा, व्यवसाय परम्परा तथा वंशपरंपरा का वाहक होता है । अतः परिवार शिक्षा यह तीसरा चरण है।  
    
'''४. चौथा तप शिक्षक निर्माण''' : देश की भावी पीढ़ी के निर्माण के लिए समर्थ शिक्षकों की आवश्यकता रहती है। जब तक दायित्वबोधयुक्त और ज्ञान सम्पन्न शिक्षक नहीं होते तब तक भारतीय शिक्षा देनेवाले विद्याकेन्द्र नहीं चल सकते । इसलिए सुयोग्य शिक्षक निर्माण करना, यह योजना का चौथा चरण है।  
 
'''४. चौथा तप शिक्षक निर्माण''' : देश की भावी पीढ़ी के निर्माण के लिए समर्थ शिक्षकों की आवश्यकता रहती है। जब तक दायित्वबोधयुक्त और ज्ञान सम्पन्न शिक्षक नहीं होते तब तक भारतीय शिक्षा देनेवाले विद्याकेन्द्र नहीं चल सकते । इसलिए सुयोग्य शिक्षक निर्माण करना, यह योजना का चौथा चरण है।  

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