Changes

Jump to navigation Jump to search
m
Line 188: Line 188:  
गुरूॠण से उॠण होने का अर्थ है मेरा व्यवहार ऐसा रहे की समाज के सभी लोगों को लगे की इस के अनुसार मेरा व्यवहार होना चाहिये । मुझ से विभिन्न प्रकार से विभिन्न लोग परोक्षा या अपरोक्ष मार्गदर्शन लेते  
 
गुरूॠण से उॠण होने का अर्थ है मेरा व्यवहार ऐसा रहे की समाज के सभी लोगों को लगे की इस के अनुसार मेरा व्यवहार होना चाहिये । मुझ से विभिन्न प्रकार से विभिन्न लोग परोक्षा या अपरोक्ष मार्गदर्शन लेते  
 
   रहें । यह तब ही संभव होता है जब मै औरों से प्राप्त ज्ञान को परिष्कृत कर अपने तप-स्वाधाय से उसे बढ़ाकर, अधिक श्रेष्ठ बनाकर अपने व्यवहार में लाने का प्रयास करूं ।  
 
   रहें । यह तब ही संभव होता है जब मै औरों से प्राप्त ज्ञान को परिष्कृत कर अपने तप-स्वाधाय से उसे बढ़ाकर, अधिक श्रेष्ठ बनाकर अपने व्यवहार में लाने का प्रयास करूं ।  
 +
 
९.१.४ समाजॠण / नृॠण  
 
९.१.४ समाजॠण / नृॠण  
मनुष्य और पशू में बहुत अंतर होता है । पशू सामान्य ताप्ररपर व्यक्तिगत जीवन ही जीते है । समुदाय में रहनेवाले हाथीजप्रसे पशू भी सुविधा के लिये समूह में रहते है । किन्तु उन का व्यवहार व्यक्तिगत ही होता है । मानव की बात भिन्न है । मानव बिना समाज के जी नही सकता । इसीलिये मानव को सामाजिक जीव कहा जाता है । मनुष्य की इच्छाएं अमर्याद होतीं है । इन इच्छाओं के अनुरूप मानव की आवश्यकताएं भी अनगिनत होतीं है । इन सब आवश्यकताओं की पूर्ति अकेले मानव के बस की बात नही है । इसे समाज की मदद लेनी ही पडती है । इस मदद के कारण मनुष्य समाज का ॠणी बन जाता है । और जब ॠणी बन जाता है तो उॠण होना भी उस की एक आवश्यकता है ।  
+
 
समाज के ॠण से मुक्ति केवल अपना काम ठीक ढंग से करने से नही होती । वह तो करना ही चाहिये । किन्तु साथ में ही समाज के उन्नयन के लिये ज्ञानदान, समयदान और धनदान करना भी आवश्यक बात है । इन के बिना मनुष्य की अधोगति सुनिश्चित ही माननी चाहिये । जनहित के काम करने से, उन में योगदान देने से ही इस ॠण से उॠण हो सकते है ।
+
मनुष्य और पशू में बहुत अंतर होता है । पशू सामान्य ताप्ररपर व्यक्तिगत जीवन ही जीते है । समुदाय में रहनेवाले हाथीजप्रसे पशू भी सुविधा के लिये समूह में रहते है । किन्तु उन का व्यवहार व्यक्तिगत ही होता है । मानव की बात भिन्न है । मानव बिना समाज के जी नही सकता । इसीलिये मानव को सामाजिक जीव कहा जाता है । मनुष्य की इच्छाएं अमर्याद होतीं है । इन इच्छाओं के अनुरूप मानव की आवश्यकताएं भी अनगिनत होतीं है । इन सब आवश्यकताओं की पूर्ति अकेले मानव के बस की बात नही है । इसे समाज की मदद लेनी ही पडती है । इस मदद के कारण मनुष्य समाज का ॠणी बन जाता है । और जब ॠणी बन जाता है तो उॠण होना भी उस की एक आवश्यकता है ।  
 +
 
 +
समाज के ॠण से मुक्ति केवल अपना काम ठीक ढंग से करने से नही होती । वह तो करना ही चाहिये । किन्तु साथ में ही समाज के उन्नयन के लिये ज्ञानदान, समयदान और धनदान करना भी आवश्यक बात है । इन के बिना मनुष्य की अधोगति सुनिश्चित ही माननी चाहिये । जनहित के काम करने से, उन में योगदान देने से ही इस ॠण से उॠण हो सकते है ।
 +
 
 
९.१.५ देवॠण  
 
९.१.५ देवॠण  
 
देव शब्द दिव धातु से बना है। दिव से तात्पर्य है दिव्यता से। सृष्टी में ऐसे देवता हैं, जिनके बिना सृष्टी चल नहीं सकती। वायु, अग्नि, पृथ्वी, वरुण, इंद्र आदि ये देवता हैं। वेदों में इन्हें देवता कहा गया है। जिनमें विराट शक्ति है और जो अपनी शक्तियों को मुक्तता से बांटते रहते हैं।  
 
देव शब्द दिव धातु से बना है। दिव से तात्पर्य है दिव्यता से। सृष्टी में ऐसे देवता हैं, जिनके बिना सृष्टी चल नहीं सकती। वायु, अग्नि, पृथ्वी, वरुण, इंद्र आदि ये देवता हैं। वेदों में इन्हें देवता कहा गया है। जिनमें विराट शक्ति है और जो अपनी शक्तियों को मुक्तता से बांटते रहते हैं।  
890

edits

Navigation menu