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९.१.३ गुरूॠण / ॠषिॠण  
 
९.१.३ गुरूॠण / ॠषिॠण  
 
गुरू या ॠषि का अर्थ है जिन जिन लोगों से हम कुछ भी सीखे है या जिन से हमने ज्ञान प्राप्त किया है वे सब । गर्भ में हमारी जीवात्मा प्रवेश करती है तब से लेकर हमारी मृत्यूतक अन्यों से हम कुछ ना कुछ सीखते ही रहते है । इस अर्थ से ये सब, जिनसे हमने कुछ सीखा होगा हमारे गुरू है । इन के हमरे उपर महति उपकार है । मै मनुष्य की वाणी में बात करता हूं तो इन के सिखाने से, मै मनुष्य की तरह दो पप्ररोंपर चल सकत हूं तो इन के सीखाने के कारण । मै अपनी भावनाएं, इच्चाएं, आकांक्षाएं स्पष्ट रूप में व यक्त कर सकता हूं तो इन के सिखाने के कारण । संक्षेप में मैने मेरे माता-पिता, पडोसी, रिश्तेदार, पहचान के या अंजान ऐसे अनगिनत लोगों से अनगिनत उपकार लिये है । इन उपकारों का बोझ मै इसी जन्म में कम नही करता तो अगले जन्म में मेरी अधोगति हो जाती है । इसलिये इन के ॠण से मुझे उतराई होना होगा । ऐसी भावना सदैव मन में रखना और इन के ॠण से उतराई होने के प्रयास करना मेरे लिये आवश्यक कर्म है । इस कर्म की सतत अनुभूति ही गुरूॠण की भावना है ।  
 
गुरू या ॠषि का अर्थ है जिन जिन लोगों से हम कुछ भी सीखे है या जिन से हमने ज्ञान प्राप्त किया है वे सब । गर्भ में हमारी जीवात्मा प्रवेश करती है तब से लेकर हमारी मृत्यूतक अन्यों से हम कुछ ना कुछ सीखते ही रहते है । इस अर्थ से ये सब, जिनसे हमने कुछ सीखा होगा हमारे गुरू है । इन के हमरे उपर महति उपकार है । मै मनुष्य की वाणी में बात करता हूं तो इन के सिखाने से, मै मनुष्य की तरह दो पप्ररोंपर चल सकत हूं तो इन के सीखाने के कारण । मै अपनी भावनाएं, इच्चाएं, आकांक्षाएं स्पष्ट रूप में व यक्त कर सकता हूं तो इन के सिखाने के कारण । संक्षेप में मैने मेरे माता-पिता, पडोसी, रिश्तेदार, पहचान के या अंजान ऐसे अनगिनत लोगों से अनगिनत उपकार लिये है । इन उपकारों का बोझ मै इसी जन्म में कम नही करता तो अगले जन्म में मेरी अधोगति हो जाती है । इसलिये इन के ॠण से मुझे उतराई होना होगा । ऐसी भावना सदैव मन में रखना और इन के ॠण से उतराई होने के प्रयास करना मेरे लिये आवश्यक कर्म है । इस कर्म की सतत अनुभूति ही गुरूॠण की भावना है ।  
गुरूॠण से उॠण होने का अर्थ है मेरा व्यवहार ऐसा रहे की समाज के सभी लोगों को लगे की इस के अनुसार मेरा व्यवहार होना चाहिये । मुझ से विभिन्न प्रकार से विभिन्न लोग परोक्षा या अपरोक्ष मार्गदर्शन लेते  
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गुरूॠण से उॠण होने का अर्थ है मेरा व्यवहार ऐसा रहे की समाज के सभी लोगों को लगे की इस के अनुसार मेरा व्यवहार होना चाहिये । मुझ से विभिन्न प्रकार से विभिन्न लोग परोक्षा या अपरोक्ष मार्गदर्शन लेते रहें । यह तब ही संभव होता है जब मै औरों से प्राप्त ज्ञान को परिष्कृत कर अपने तप-स्वाधाय से उसे बढ़ाकर, अधिक श्रेष्ठ बनाकर अपने व्यवहार में लाने का प्रयास करूं ।  
  रहें । यह तब ही संभव होता है जब मै औरों से प्राप्त ज्ञान को परिष्कृत कर अपने तप-स्वाधाय से उसे बढ़ाकर, अधिक श्रेष्ठ बनाकर अपने व्यवहार में लाने का प्रयास करूं ।  
      
९.१.४ समाजॠण / नृॠण  
 
९.१.४ समाजॠण / नृॠण  
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