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सृष्टि परमात्मा का विश्वरूप है, अंगांगी सम्बन्ध, समग्रता की
सृष्टि परमात्मा का विश्वरूप है, अंगांगी सम्बन्ध, समग्रता की
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आवश्यकता, सृष्टि का समग्र स्वरूप, चिज्जडग्रन्थि, मनुष्य का
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आवश्यकता, सृष्टि का समग्र स्वरूप, चिज्जड़ग्रन्थि, मनुष्य का
दायित्व, अनुप्रश्न
दायित्व, अनुप्रश्न
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उसने वास किया । जो आश्रयरूप है या नहीं है, जिसका
उसने वास किया । जो आश्रयरूप है या नहीं है, जिसका
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वर्णन किया जाता है या नहीं किया जाता है, जो जड़ है या
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वर्णन किया जाता है या नहीं किया जाता है, जो जड़़ है या
चेतन है, जो सत्य है या अनृत अर्थात् असत्य है । ये सारे
चेतन है, जो सत्य है या अनृत अर्थात् असत्य है । ये सारे
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और प्रकृति ऐसी तीन इकाइयाँ हुईं । पुरुष चेतन तत्त्व है,
और प्रकृति ऐसी तीन इकाइयाँ हुईं । पुरुष चेतन तत्त्व है,
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प्रकृति जड़ तत्त्व है और परमात्मा जड़ और चेतन दोनों से
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प्रकृति जड़़ तत्त्व है और परमात्मा जड़़ और चेतन दोनों से
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we : १ तत्त्वचिन्तन
we : १ तत्त्वचिन्तन
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परे है । वह जड़ भी है, चेतन भी है । अथवा जड़ भी नहीं
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परे है । वह जड़़ भी है, चेतन भी है । अथवा जड़़ भी नहीं
है, चेतन भी नहीं है। “नहीं है' कहने से 'है' कहना
है, चेतन भी नहीं है। “नहीं है' कहने से 'है' कहना
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अधिक युक्तिसंगत है क्योंकि जो नहीं है उसमें से 'है' कैसे
अधिक युक्तिसंगत है क्योंकि जो नहीं है उसमें से 'है' कैसे
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उत्पन्न होगा ? इसलिये परमात्मा जड़ भी है और चेतन भी
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उत्पन्न होगा ? इसलिये परमात्मा जड़़ भी है और चेतन भी
है।
है।
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प्रकृति सक्रिय हैं । दोनों मिलकर सृष्टि के रूप में विकसित
प्रकृति सक्रिय हैं । दोनों मिलकर सृष्टि के रूप में विकसित
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होते हैं । दोनों के मिलन को चिज्जडग्रन्थि अर्थात् चेतन
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होते हैं । दोनों के मिलन को चिज्जड़ग्रन्थि अर्थात् चेतन
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और जड़ की गाँठ कहते हैं । यह गाँठ ऐसी है कि अब
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और जड़़ की गाँठ कहते हैं । यह गाँठ ऐसी है कि अब
दोनों को एकदूसरे से अलग पहचाना नहीं जाता है । जहाँ
दोनों को एकदूसरे से अलग पहचाना नहीं जाता है । जहाँ
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भी हो दोनों साथ में रहते हैं । यह चेतन और जड़ का आदि
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भी हो दोनों साथ में रहते हैं । यह चेतन और जड़़ का आदि
ग्रन्थन है जहाँ से सृष्टि रचना प्रारम्भ होती है ।
ग्रन्थन है जहाँ से सृष्टि रचना प्रारम्भ होती है ।
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oft. rai. at. 23/28
oft. rai. at. 23/28
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चेतन और जड़ के संयोग से अब प्रकृति में परिवर्तन
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चेतन और जड़़ के संयोग से अब प्रकृति में परिवर्तन
प्रारम्भ होता है । इस अनन्त वैविध्यपूर्ण सृष्टि के मूल रूप
प्रारम्भ होता है । इस अनन्त वैविध्यपूर्ण सृष्टि के मूल रूप