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पर्व २ : विद्यार्थी, शिक्षक, विद्यालय, परिवार
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३. परीक्षा में अंक प्राप्त करने हेतु रटना, लिखना, याद करना ही अध्ययन है ऐसा विद्यार्थियों का मानस माता-पिता और शिक्षकों के कारण बनता है । वे ही उन्हें ऐसी बातें समझाते हैं । अध्ययन की अत्यन्त यांत्रिक पद्धति रुचि, कल्पनाशक्ति, सूृजनशीलता आदि का नाश कर देती है । इसके चलते विद्यार्थियों में ज्ञान, ज्ञान की पवित्रता, विद्या की देवी सरस्वती, विद्या का लक्ष्य आदि बातें कभी आती ही नहीं है । ज्ञान के आनन्द का अनुभव ही उन्हें होता नहीं है । शिक्षित लोगों के समाज के प्रति, देश के प्रति कोई कर्तव्य होते हैं ऐसा उन्हें सिखाया ही नहीं जाता । परिणाम स्वरूप अपने ही लाभ का, अपने ही अधिकार का मानस बनता जाता है ।
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परीक्षा में अंक प्राप्त करने हेतु रटना, लिखना, याद
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४. बचपन से विद्यार्थियों को स्पर्धा में उतारा जाता है, दूसरों के साथ तुलना करना, दूसरों से आगे निकलना, दूसरों को पीछे रखना, आगे नहीं बढ़ने देना उनके मानस में दृढ़ होता जाता है । स्पर्धा के इस युग में टिकना है तो संघर्ष करना पड़ेगा, जीतना ही पड़ेगा यह बात मानस में दृढ़ होती जाती है । परिणामस्वरूप विद्यार्थी एकदूसरे को पढ़ाई में सहायता नहीं करते, अपनी सामग्री एकदूसरे को नहीं देते, तेजस्वी विद्यार्थी की कापी या पुस्तक गायब कर देते हैं ताकि वह पढ़ाई न कर सके, येन केन प्रकारेण परीक्षा में अंक प्राप्त करना आदि बातें उनके लिये सहज बन जाती हैं ।
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करना ही अध्ययन है ऐसा विद्यार्थियों का मानस
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स्पर्धा और संघर्ष विकास के लिये प्रेरक तत्त्व है ऐसा आधुनिक मनोविज्ञान कहने लगा है, स्पर्धा और पुरस्कार रखो तो पुरस्कार की लालच में लोग अच्छी बातें सीखेंगे ऐसा कहा जाता है परन्तु स्पर्धा में भाग लेने वालों का लक्ष्य पुरस्कार होता है, विषय के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता । उदाहरण के लिये गीता के श्लोकों की या देशभक्ति के गीतों की स्पर्धा होगी तो भाग लेने वालों को पुरस्कार दीखता है गीता या देशभक्ति नहीं । योग की, संगीत की, कला की प्रतियोगिताओं में महत्त्व संगीत, योग या कला का नहीं, पुरस्कार का होता है ।
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माता-पिता और शिक्षकों के कारण बनता है । वे ही
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५. कला के, योग या व्यायाम के या अध्ययन के प्रदर्शन में तामझाम और दिखावे का महत्त्व अधिक होता है, उसका शैक्षिक पक्ष कम महत्वपूर्ण होता है । एक विद्यालय के रंगमंच कार्यक्रम में भगवदूगीता के श्लोकों के गायन की प्रस्तुति की गई । रथ बहुत बढ़िया था, कृष्ण और अर्जुन की वेशभूषा बहुत सुन्दर थी, पीछे महाभारत के युद्ध के दृश्य वाला पर्दा था, मंच की प्रकाशन्यवस्था उत्तम थी परन्तु जैसे ही अर्जुन और कृष्णने श्लोक गाना शुरू किया तो ध्यान में आया कि न तो उच्चारण शुद्ध था न अनुष्टुप छंद का गायन सही था । यह किस बात का संकेत है ? हमें मूल विषय की नहीं, आसपास की बातों की ही परवाह अधिक है । आज के धारावाहिक और फिल्मों में प्रकाश, ध्वनि, रंगभूषा, फोटोग्राफी उत्तम होते हैं, परन्तु अभिनय अच्छा नहीं होता वैसा ही विद्यालयों में होता है । विद्यालयों से शुरू होकर सारी प्रजा का मानस ऐसा विपरीत बन जाता है । ज्ञान के क्षेत्र की यह दुर्गति है। समाज विपरीतज्ञानी और अनीतिमान बनता है ।
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उन्हें ऐसी बातें समझाते हैं । अध्ययन की अत्यन्त
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यांत्रिक पद्धति रुचि, कल्पनाशक्ति, सूृजनशीलता
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आदि का नाश कर देती है । इसके चलते विद्यार्थियों
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में ज्ञान, ज्ञान की पवित्रता, विद्या की देवी सरस्वती,
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विद्या का लक्ष्य आदि बातें कभी आती ही नहीं है ।
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ज्ञान के आनन्द का अनुभव ही उन्हें होता नहीं है ।
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शिक्षित लोगों के समाज के प्रति, देश के प्रति कोई
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कर्तव्य होते हैं ऐसा उन्हें सिखाया ही नहीं जाता ।
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परिणाम स्वरूप अपने ही लाभ का, अपने ही
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अधिकार का मानस बनता जाता है ।
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बचपन से विद्यार्थियों को स्पर्धा में उतारा जाता है,
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दूसरों के साथ तुलना करना, दूसरों से आगे निकलना,
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दूसरों को पीछे रखना, आगे नहीं बढ़ने देना उनके
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मानस में दृढ़ होता जाता है । स्पर्धा के इस युग में
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टिकना है तो संघर्ष करना पड़ेगा, जीतना ही पड़ेगा यह
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बात मानस में दृढ़ होती जाती है । परिणामस्वरूप
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विद्यार्थी एकदूसरे को पढ़ाई में सहायता नहीं करते,
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अपनी सामग्री एकदूसरे को नहीं देते, तेजस्वी विद्यार्थी
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की कापी या पुस्तक गायब कर देते हैं ताकि वह पढ़ाई
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न कर सके, येन केन प्रकारेण परीक्षा में अंक प्राप्त
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करना आदि बातें उनके लिये सहज बन जाती हैं ।
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स्पर्धा और संघर्ष विकास के लिये प्रेरक तत्त्व है
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ऐसा आधुनिक मनोविज्ञान कहने लगा है, स्पर्धा और
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पुरस्कार रखो तो पुरस्कार की लालच में लोग अच्छी
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बातें सीखेंगे ऐसा कहा जाता है परन्तु स्पर्धा में भाग
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लेने वालों का लक्ष्य पुरस्कार होता है, विषय के
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साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता । उदाहरण के लिये
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गीता के श्लोकों की या देशभक्ति के गीतों की स्पर्धा
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होगी तो भाग लेने वालों को पुरस्कार दीखता है
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गीता या देशभक्ति नहीं । योग की, संगीत की, कला
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की प्रतियोगिताओं में महत्त्व संगीत, योग या कला
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का नहीं, पुरस्कार का होता है ।
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कला के, योग या व्यायाम के या
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अध्ययन के प्रदर्शन में तामझाम और दिखावे का
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महत्त्व अधिक होता है, उसका शैक्षिक पक्ष कम
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महत्वपूर्ण होता है । एक विद्यालय के रंगमंच कार्यक्रम
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में भगवदूगीता के श्लोकों के गायन की प्रस्तुति की
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गई । रथ बहुत बढ़िया था, कृष्ण और अर्जुन की
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वेशभूषा बहुत सुन्दर थी, पीछे महाभारत के युद्ध के
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दृश्य वाला पर्दा था, मंच की प्रकाशन्यवस्था उत्तम थी
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परन्तु जैसे ही अर्जुन और कृष्णने श्लोक गाना शुरू
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किया तो ध्यान में आया कि न तो उच्चारण शुद्ध था न
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ART SE का गायन सही था । यह किस बात का
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संकेत है ? हमें मूल विषय की नहीं, आसपास की
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बातों की ही परवाह अधिक है । आज के धारावाहिक
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और फिल्मों में प्रकाश, ध्वनि, रंगभूषा, फोटोग्राफी
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उत्तम होते हैं, परन्तु अभिनय अच्छा नहीं होता वैसा
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ही विद्यालयों में होता है । विद्यालयों से शुरू होकर
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सारी प्रजा का मानस ऐसा विपरीत बन जाता है । ज्ञान
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के क्षेत्र की यह दुर्गति है। समाज sar,
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विपरीतज्ञानी और अनीतिमान बनता है ।
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सही मानसिकता बनाने के प्रयास
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==== सही मानसिकता बनाने के प्रयास ====
अतः विद्यालयों में सही मानसिकता निर्माण करने को
अतः विद्यालयों में सही मानसिकता निर्माण करने को