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=== १. नर करनी करे तो नर का नारायण बन जाये ===
 
=== १. नर करनी करे तो नर का नारायण बन जाये ===
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योग्य ढंग से प्रयास करने से मनुष्य नरोत्तम बन सकता है और आगे देवत्व या परमात्मपद भी पा सकता है । यह मान्यता केवल हिंदू या भारतीय चिंतन और मान्यता है । अन्य समाजों ने तो मानव प्रेषित भी नही बन सकता ऐसा आग्रहपूर्वक कहा है । फल की कामना किये बिना यदि कोई विहित कर्म करता जाए तो वह परमात्म्प्द प्राप्त करता है ऐसा भगवद्गीता में कहा है । इस के लिये मार्गदर्शन भी किया है ।
 
योग्य ढंग से प्रयास करने से मनुष्य नरोत्तम बन सकता है और आगे देवत्व या परमात्मपद भी पा सकता है । यह मान्यता केवल हिंदू या भारतीय चिंतन और मान्यता है । अन्य समाजों ने तो मानव प्रेषित भी नही बन सकता ऐसा आग्रहपूर्वक कहा है । फल की कामना किये बिना यदि कोई विहित कर्म करता जाए तो वह परमात्म्प्द प्राप्त करता है ऐसा भगवद्गीता में कहा है । इस के लिये मार्गदर्शन भी किया है ।
 
मनुष्य चार प्रकार के होते है । सब से नीचे के स्तरपर होता है नरराक्षस । औरों को कष्ट देकर इया औरों को दुखी देखकर इन्हें सुख मिलता है ।  जानबूझकर सडकपर केले के छिलके फेंककर लोगों को फिसलते देख आनंदित होना या खुजली का चूर्ण सार्वजनिक स्थानोंपर लोगों के बदनपर डालकर लोगों की परेशानी से आनंद पाना ऐसा इन का स्वभाव रहता है ।  
 
मनुष्य चार प्रकार के होते है । सब से नीचे के स्तरपर होता है नरराक्षस । औरों को कष्ट देकर इया औरों को दुखी देखकर इन्हें सुख मिलता है ।  जानबूझकर सडकपर केले के छिलके फेंककर लोगों को फिसलते देख आनंदित होना या खुजली का चूर्ण सार्वजनिक स्थानोंपर लोगों के बदनपर डालकर लोगों की परेशानी से आनंद पाना ऐसा इन का स्वभाव रहता है ।  
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किसी भी कृति के करने से पूर्व उस में किसी के भी अहित की सारी संभावनाओं को दूर करने के बाद में ही करना चाहिये । आयुर्वेद के एक उदाहरण से इसे हम समझ सकेंगे। पारा यह एक विषैली धातू है । किंतु पारे में औषधी गुण भी है । आयुर्वेद में इसे औषधी के रूप में प्रयोग किया जाता है । किन्तु उस से पूर्व इस के विषैलेपन को पारा-मारण प्रक्रिया से नष्ट किया जाता है । उस के बाद ही वह औषधी बनाने के लिये योग्य बनता है ।  
 
किसी भी कृति के करने से पूर्व उस में किसी के भी अहित की सारी संभावनाओं को दूर करने के बाद में ही करना चाहिये । आयुर्वेद के एक उदाहरण से इसे हम समझ सकेंगे। पारा यह एक विषैली धातू है । किंतु पारे में औषधी गुण भी है । आयुर्वेद में इसे औषधी के रूप में प्रयोग किया जाता है । किन्तु उस से पूर्व इस के विषैलेपन को पारा-मारण प्रक्रिया से नष्ट किया जाता है । उस के बाद ही वह औषधी बनाने के लिये योग्य बनता है ।  
 
महाभारत काल में हम ब्रह्मास्त्र जैसे अति संहारक अस्त्र के बारे में पढते है । किन्तु आज के अणूध्वम जैसा यह तंत्रज्ञान अधूरी स्थिति में व्यवहार में नहीं लाया गया था । ब्रह्मास्त्र का शमन करने का, छोडे हुवे ब्रह्मास्त्र को वापस लेने का तंत्र विकसित करने के बाद ही ब्रह्मास्त्र व्यवहार में लाया गया था । साथ ही में अपात्र को ब्रह्मास्त्र ना देने का भी नियम था ।
 
महाभारत काल में हम ब्रह्मास्त्र जैसे अति संहारक अस्त्र के बारे में पढते है । किन्तु आज के अणूध्वम जैसा यह तंत्रज्ञान अधूरी स्थिति में व्यवहार में नहीं लाया गया था । ब्रह्मास्त्र का शमन करने का, छोडे हुवे ब्रह्मास्त्र को वापस लेने का तंत्र विकसित करने के बाद ही ब्रह्मास्त्र व्यवहार में लाया गया था । साथ ही में अपात्र को ब्रह्मास्त्र ना देने का भी नियम था ।
२.१ आ नो भद्रा: कृतवो यन्तु विश्वता:
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भद्र या शुभ-ज्ञान संपूर्ण विश्व से हमें मिले। हमारा जो ज्ञान है वही सर्वश्रेष्ठ है ऐसा अहंकार भारतीय मनीषियों ने कभी नही पाला। यहाँतक कह डाला की ‘बालादपि सुभाषितं ग्राह्यं’। छोटा बच्चा भी कुछ श्रेष्ठ ज्ञान देता है तो उसे स्वीकार करना चाहिये । बाहर से आनेवाली शीतल और शुध्द हवा के लिये हम अपने घरों की खिडकियाँ खोलते है । ठीक उसी तरह हमने अपने मन की खिडकियाँ भी शुभ ज्ञान की प्राप्ति के लिये खुली रखनी चाहिये । किन्तु कुछ अशुद्ध हवा आने लगे तो हम जैसे खिडकियाँ बंद भी कर लेते है वैसी ही हमारी अभद्र ज्ञान के विषय में भूमिका होनी चाहिये । कोई बात अन्यों के लिए हितकर है इसलिये यह आवश्यक नही की वह हमारे लिये भी उपयुक्त होगी ही । इसलिये उसे अपनी स्थानिकता की दृष्टि से वह कितनी हितकर है, इस की कसौटिपर ही भद्र-अभद्र का निर्णय कर स्वीकार करना होगा ।  
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२.१ आ नो भद्रा: कृतवो यन्तु विश्वता:
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भद्र या शुभ-ज्ञान संपूर्ण विश्व से हमें मिले। हमारा जो ज्ञान है वही सर्वश्रेष्ठ है ऐसा अहंकार भारतीय मनीषियों ने कभी नही पाला। यहाँतक कह डाला की ‘बालादपि सुभाषितं ग्राह्यं’। छोटा बच्चा भी कुछ श्रेष्ठ ज्ञान देता है तो उसे स्वीकार करना चाहिये । बाहर से आनेवाली शीतल और शुध्द हवा के लिये हम अपने घरों की खिडकियाँ खोलते है । ठीक उसी तरह हमने अपने मन की खिडकियाँ भी शुभ ज्ञान की प्राप्ति के लिये खुली रखनी चाहिये । किन्तु कुछ अशुद्ध हवा आने लगे तो हम जैसे खिडकियाँ बंद भी कर लेते है वैसी ही हमारी अभद्र ज्ञान के विषय में भूमिका होनी चाहिये । कोई बात अन्यों के लिए हितकर है इसलिये यह आवश्यक नही की वह हमारे लिये भी उपयुक्त होगी ही । इसलिये उसे अपनी स्थानिकता की दृष्टि से वह कितनी हितकर है, इस की कसौटिपर ही भद्र-अभद्र का निर्णय कर स्वीकार करना होगा ।  
 
यहाँ भद्र का अर्थ भी ठीक से समझना होगा । भद्र का अर्थ केवल हमारे हित का है ऐसा नहीं वरना सब के हित का जो है वही भद्र ज्ञान है। और यह सब का हित भी केवल वर्तमान से संबंधित या अल्पावधी के लिये नहीं होकर चिरकालतक सब के हित का होना आवश्यक है । ऐसे ज्ञान को ही भद्र या शुभ ज्ञान कहा जा सकता है ।   
 
यहाँ भद्र का अर्थ भी ठीक से समझना होगा । भद्र का अर्थ केवल हमारे हित का है ऐसा नहीं वरना सब के हित का जो है वही भद्र ज्ञान है। और यह सब का हित भी केवल वर्तमान से संबंधित या अल्पावधी के लिये नहीं होकर चिरकालतक सब के हित का होना आवश्यक है । ऐसे ज्ञान को ही भद्र या शुभ ज्ञान कहा जा सकता है ।   
 
ऐसा भी हो सकता है की बाहर से आनेवाला ज्ञान सब के हित का ना हो या सब के हित का होनेपर भी चिरंतन हित का ना हो । ऐसी स्थिति में ऐसे ज्ञान को सुधारकर जबतक हम उसे चिरकालतक सब के हित का नही बना देते उस ज्ञान का उपयोग वर्जित रखें । वह ज्ञान भले ही हमारे हित का हो लेकिन कम से कम उस ज्ञानसे अन्यों का अहित नही होगा यह सुनिश्चित करनेपर ही वह ज्ञान भद्र कहा जा सकेगा ।  
 
ऐसा भी हो सकता है की बाहर से आनेवाला ज्ञान सब के हित का ना हो या सब के हित का होनेपर भी चिरंतन हित का ना हो । ऐसी स्थिति में ऐसे ज्ञान को सुधारकर जबतक हम उसे चिरकालतक सब के हित का नही बना देते उस ज्ञान का उपयोग वर्जित रखें । वह ज्ञान भले ही हमारे हित का हो लेकिन कम से कम उस ज्ञानसे अन्यों का अहित नही होगा यह सुनिश्चित करनेपर ही वह ज्ञान भद्र कहा जा सकेगा ।  
 
   भद्र ज्ञान के विषय में एक और पहलू भी विचार करने योग्य है । कोई तंत्रज्ञान कुछ मात्रा में तो लाभदाई है और कुछ मात्रा में हानी करनेवाला । ऐसे तंत्रज्ञान को वह जबतक सब के हित में काम करनेवाला है उस सीमातक ही उपयोग में लाना होगा । उस से आगे उस का उपयोग वर्जित करना होगा । उदा. संगणक को लें । एक सीमातक तो संगणक बहुत ही लाभदायक तंत्रज्ञान है । किंतु वह जब मानव के अहित के लिये उपयोग में लाया जाएगा तब उस का उपयोग वर्जित होगा । जिस व्यक्ति या संस्था के पास यह शुभ ज्ञान का विवेक नहीं है ऐसे लोगों को संगणक के ज्ञान से वंचित रखने में ही सब की भलाई होगी ।  
 
   भद्र ज्ञान के विषय में एक और पहलू भी विचार करने योग्य है । कोई तंत्रज्ञान कुछ मात्रा में तो लाभदाई है और कुछ मात्रा में हानी करनेवाला । ऐसे तंत्रज्ञान को वह जबतक सब के हित में काम करनेवाला है उस सीमातक ही उपयोग में लाना होगा । उस से आगे उस का उपयोग वर्जित करना होगा । उदा. संगणक को लें । एक सीमातक तो संगणक बहुत ही लाभदायक तंत्रज्ञान है । किंतु वह जब मानव के अहित के लिये उपयोग में लाया जाएगा तब उस का उपयोग वर्जित होगा । जिस व्यक्ति या संस्था के पास यह शुभ ज्ञान का विवेक नहीं है ऐसे लोगों को संगणक के ज्ञान से वंचित रखने में ही सब की भलाई होगी ।  
  २.२ आत्मनो मोक्षार्थं जगद् हिताय च  
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२.२ आत्मनो मोक्षार्थं जगद् हिताय च
मेरे जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है । किन्तु जबतक मैं अपने सांसारिक कर्तव्य और लोकहित के संबंध में अपनी भूमिका ठीक से पूरी नहीं करता मुझे मोक्षगामी होने का कोई अधिकार नहीं है । ऐसी भारतीय मान्यता है । स्वामी विवेकानंद कहते थे जबतक मेरे भारत का एक भी व्यक्ति दुख से ग्रस्त है मुझे मोक्ष नहीं चाहिये ।
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मेरे जीवन का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है । किन्तु जबतक मैं अपने सांसारिक कर्तव्य और लोकहित के संबंध में अपनी भूमिका ठीक से पूरी नहीं करता मुझे मोक्षगामी होने का कोई अधिकार नहीं है । ऐसी भारतीय मान्यता है । स्वामी विवेकानंद कहते थे जबतक मेरे भारत का एक भी व्यक्ति दुख से ग्रस्त है मुझे मोक्ष नहीं चाहिये ।
    
=== ३. एकं सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति/विविधता में एकता ===
 
=== ३. एकं सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति/विविधता में एकता ===
सत्य एक ही है । किन्तु हर व्यक्ति को मिले ज्ञानेंद्रियों की, मन, बुध्दि और चित्त की क्षमताएं भिन्न है । इन साधनों के आधारपर ही कोई मनुष्य सत्य जानने का प्रयास करता है । ये सब बातें हरेक व्यक्ति की भिन्न होने के कारण उस के सत्य का आकलन भिन्न होना स्वाभाविक है ।  
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सत्य एक ही है । किन्तु हर व्यक्ति को मिले ज्ञानेंद्रियों की, मन, बुध्दि और चित्त की क्षमताएं भिन्न है । इन साधनों के आधारपर ही कोई मनुष्य सत्य जानने का प्रयास करता है । ये सब बातें हरेक व्यक्ति की भिन्न होने के कारण उस के सत्य का आकलन भिन्न होना स्वाभाविक है ।  
 
सत्य एक अनुभूति भिन्न है सत्य यही तू जान इंद्रिय, मन, बुध्दि भिन्न है भिन्न सत्य अनुमान
 
सत्य एक अनुभूति भिन्न है सत्य यही तू जान इंद्रिय, मन, बुध्दि भिन्न है भिन्न सत्य अनुमान
 
एक प्रयोग से इसे हम समझने का प्रयास करेंगे । खुले आसमान में सितारें देखने के लिये दूरबीन लगाएं । दूरबीन के अगले कांचपर बीच में एक छोटा छेदवाला कागज चिपका दें । अब आकाश का एक छोटा हिस्सा ही दिखाई देगा । अब इस छोटे हिस्से में कितने तारे दिखाई देते है गिनती करें। संख्या लिख लें। अब एक अधू दृष्टि के मनुष्य को दूरबीन में से देखेने दें । तारे गिनने दें । फिर संख्या लिख लें । अब तरों की संख्या कम हो गई होगी । अब एक अंधे को देखने दें । अब संख्या शून्य होगी । अब सोचिये तीनों मे से सत्य संख्या कौनसी है । तीनों संख्याओं के भिन्न होनेपर भी उत्तर होगा तीनों ही अपने अपने हिसाब से सत्य का ही कथन कर रहे है ।  
 
एक प्रयोग से इसे हम समझने का प्रयास करेंगे । खुले आसमान में सितारें देखने के लिये दूरबीन लगाएं । दूरबीन के अगले कांचपर बीच में एक छोटा छेदवाला कागज चिपका दें । अब आकाश का एक छोटा हिस्सा ही दिखाई देगा । अब इस छोटे हिस्से में कितने तारे दिखाई देते है गिनती करें। संख्या लिख लें। अब एक अधू दृष्टि के मनुष्य को दूरबीन में से देखेने दें । तारे गिनने दें । फिर संख्या लिख लें । अब तरों की संख्या कम हो गई होगी । अब एक अंधे को देखने दें । अब संख्या शून्य होगी । अब सोचिये तीनों मे से सत्य संख्या कौनसी है । तीनों संख्याओं के भिन्न होनेपर भी उत्तर होगा तीनों ही अपने अपने हिसाब से सत्य का ही कथन कर रहे है ।  
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