Changes

Jump to navigation Jump to search
Line 11: Line 11:  
आपने शिक्षा को भौतिक पदार्थ मान लिया उसके कारण कल्पना से भी अधिक नुकसान हुआ है। आपने अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये शिक्षा को प्रयुक्त किया है। परन्तु यह तो श्रेष्ठ सत्ता को कनिष्ठ सत्ता की सेवा में प्रयुक्त करने का काम है। इससे कनिष्ठ की सेवा तो नहीं होती उल्टे श्रेष्ठ का श्रेष्ठत्व कम होता है, उसका गौरव समाप्त होता है। इससे एक बहुत बडा मिथ्या संसार निर्माण हो जाता है जिसमें परिश्रम तो होता है पर फल नहीं मिलता। इसके स्थान पर यदि भौतिक पदार्थों के उत्पादन हेतु भौतिक स्तर पर प्रयास किये जाय तो अधिक भौतिक लाभ होगा। सही बात यह होगी कि शिक्षा को भौतिक से अधिक उन्नत स्तर पर उठाया जाना चाहिये।
 
आपने शिक्षा को भौतिक पदार्थ मान लिया उसके कारण कल्पना से भी अधिक नुकसान हुआ है। आपने अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये शिक्षा को प्रयुक्त किया है। परन्तु यह तो श्रेष्ठ सत्ता को कनिष्ठ सत्ता की सेवा में प्रयुक्त करने का काम है। इससे कनिष्ठ की सेवा तो नहीं होती उल्टे श्रेष्ठ का श्रेष्ठत्व कम होता है, उसका गौरव समाप्त होता है। इससे एक बहुत बडा मिथ्या संसार निर्माण हो जाता है जिसमें परिश्रम तो होता है पर फल नहीं मिलता। इसके स्थान पर यदि भौतिक पदार्थों के उत्पादन हेतु भौतिक स्तर पर प्रयास किये जाय तो अधिक भौतिक लाभ होगा। सही बात यह होगी कि शिक्षा को भौतिक से अधिक उन्नत स्तर पर उठाया जाना चाहिये।
   −
शिक्षा का विचार भौतिक स्तर पर ही करने के कारण आपने और एक अनिष्ठ को जन्म दिया है। शिक्षा के मापन हेतु भी आपने भौतिक मापदण्ड ही बताये हैं । भौतिक का भी पर्यवसान तो पैसे में ही होता है । इसलिये शिक्षा के लिये भौतिक सुविधायें आपके लिये मापन का एक साधन बनती हैं। विद्यालय का भवन कितना बड़ा है, फर्नीचर कितना अधिक और सुविधापूर्ण है, साधन सामग्री कितनी
+
शिक्षा का विचार भौतिक स्तर पर ही करने के कारण आपने और एक अनिष्ठ को जन्म दिया है। शिक्षा के मापन हेतु भी आपने भौतिक मापदण्ड ही बताये हैं । भौतिक का भी पर्यवसान तो पैसे में ही होता है । इसलिये शिक्षा के लिये भौतिक सुविधायें आपके लिये मापन का एक साधन बनती हैं। विद्यालय का भवन कितना बड़ा है, फर्नीचर कितना अधिक और सुविधापूर्ण है, साधन सामग्री कितनी विपुल मात्रा में है और यह सब कितना महँगा है यह आपके लिये बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है। इसके साथ पैसा भी जुड़ जाता है । इसलिये शुल्क कितना ऊँचा है, प्राध्यापकों का वेतन कितना अधिक है, कार्यक्रमों का बजट कितना बड़ा है यह आपके लिये श्रेष्ठत्व के साथ जुड़ा है। पढाई पूरी करने के बाद ऊँचे वेतन की नौकरी अथवा अधिक कमाई का व्यवसाय कितनी अधिक मात्रा में प्राप्त होता है यह आपके लिये महत्त्वपूर्ण मापदण्ड है। आपके विश्वविद्यालयों में जो अनुसन्धान होता है उसमें पेटण्ट कितना मिलता है और उसके आधार पर आय कितनी होती है वह मापन का और एक मुद्दा है। यह तो अनर्थों की शृंखला है। इसके साथ श्रेष्ठत्व को जोडना ही उल्टा सोचना है। यह तो भौतिक दृष्टि से भी सुखी और समृद्ध होने का उपाय नहीं है, मानसिक शान्ति और बौद्धिक आनन्द की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। आपको अपने भले के लिये भी इस स्थिति को बदलना होगा। अपने वर्तमान प्रयासों की व्यर्थता को समझना होगा।
 +
 
 +
केवल अन्न, वस्त्र, कामप्रवृत्ति से मनुष्य श्रेष्ठ नहीं बनता । ये तो शारीरिक और प्राणिक स्तर की प्रवृत्तियाँ हैं । अन्य प्राणी भी यह सब करते हैं। उनका जीवन इन प्रवृत्तियों में ही समाहित हो जाता है । हम भारतवासी मनुष्य को इनसे श्रेष्ठ मानते हैं। आपके देशों में भी मनुष्य इन प्राणियों से श्रेष्ठ ही है। मनुष्य का श्रेष्ठत्व किस में है ? भौतिक पदार्थों का अनापशनाप. शोषणकारी प्रयोग और प्राणियों को अपना दास बनाने में, अपना आहार बनाने में श्रेष्ठत्व नहीं है। अपनी अन्तःकरण की प्रवृत्तियों को परिष्कृत और व्यवस्थित करने में ही श्रेष्ठत्व है। शिक्षा इसका प्रमुख साधन है। अतः शिक्षा के सारे प्रयासों को इस स्तर पर स्थापित करने की आवश्यकता है।
 +
 
 +
यह अन्तःकरण क्या है ? अन्तःकरण में मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त का समावेश होता है । आप भी माइण्ड, इण्टेलेक्ट, ईगो और कॉन्सियन्स के रूप में इन्हें जानते ही हैं । हाँ, यह मुद्दा भी महत्त्वपूर्ण है कि इन शब्दों के आपके और हमारे अर्थ और व्याप्ति भिन्न है। यह भिन्नता संस्कृतियों की भिन्नता है यह भी सच है। परन्तु इन
    
==References==
 
==References==
1,815

edits

Navigation menu