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४२. इसी प्रकार स्वमान, स्वगौरव, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता का आग्रह भी विकसित होना चाहिये । यह भी ध्यान में रहना चाहिये कि यदि इनकी समझ सही नहीं रही तो ये विकृतियों में परिवर्तित हो जाते हैं और सामाजिकता का नाश करते हैं ।
 
४२. इसी प्रकार स्वमान, स्वगौरव, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता का आग्रह भी विकसित होना चाहिये । यह भी ध्यान में रहना चाहिये कि यदि इनकी समझ सही नहीं रही तो ये विकृतियों में परिवर्तित हो जाते हैं और सामाजिकता का नाश करते हैं ।
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४३. बुद्धिमानों के लिये धार्मिक शाख्रग्रन्थों को प्रमाण मानने की निष्ठा विकसित होना आवश्यक है । शास्त्रों की समझ नहीं है तो शास्त्र जाननेवालों को आप अर्थात्‌ श्रद्धा के पात्र मानना चाहिये | शास्त्र जानने वालों का चयन विचारपूर्वक करना चाहिये ।
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४३. बुद्धिमानों के लिये धार्मिक शास्त्रग्रन्थों को प्रमाण मानने की निष्ठा विकसित होना आवश्यक है । शास्त्रों की समझ नहीं है तो शास्त्र जाननेवालों को आप अर्थात्‌ श्रद्धा के पात्र मानना चाहिये | शास्त्र जानने वालों का चयन विचारपूर्वक करना चाहिये ।
    
४४. ऐसा चयन यदि नहीं कर सकते तो सन्तों और सजऊ्जनों की शरण में जाना चाहिये । हमारी बुद्धि यदि निःस्वार्थ है तो शासख्त्रज्ञ, सन्त, सज्जन को पहचानना बहुत कठिन नहीं होता है ।
 
४४. ऐसा चयन यदि नहीं कर सकते तो सन्तों और सजऊ्जनों की शरण में जाना चाहिये । हमारी बुद्धि यदि निःस्वार्थ है तो शासख्त्रज्ञ, सन्त, सज्जन को पहचानना बहुत कठिन नहीं होता है ।

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