| − | धर्मशास्त्रों में वर्णित आचार-विधान, यम-नियम, शौच, संयम, सदाचार आदि केवल नैतिक अनुशासन नहीं हैं, बल्कि वे स्वास्थ्य-संरक्षण के उपाय भी हैं। धर्मशास्त्र यह मानता है कि अधर्म, असंयम और आचारहीनता से मन विकृत होता है और विकृत मन शरीर में रोग उत्पन्न करता है। इस प्रकार धर्मशास्त्र अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-सिद्धान्तों का समर्थन करता है। | + | धर्मशास्त्रों में वर्णित आचार-विधान, यम-नियम, शौच, संयम, सदाचार आदि केवल नैतिक अनुशासन नहीं हैं, बल्कि वे स्वास्थ्य-संरक्षण के उपाय भी हैं। धर्मशास्त्र यह मानता है कि अधर्म, असंयम और आचारहीनता से मन विकृत होता है और विकृत मन शरीर में रोग उत्पन्न करता है। इस प्रकार धर्मशास्त्र अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-सिद्धान्तों का समर्थन करता है। आयुर्वेद शरीर, मन और जीवात्मा- इन तीनों के संयोगको जीवन मानता है - <blockquote>सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्। लोकस्तिष्ठति संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ (चरकसंहिता १/१८)</blockquote>आयुर्वेद के अनुसार जीवन (आयुः) का तात्पर्य केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, अपितु शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के समन्वित अस्तित्व से है। सुश्रुत और चरक जैसे आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन चारों का संतुलन बना रहता है, तभी व्यक्ति को वास्तविक आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार नहीं माना गया, बल्कि उसे मानसिक और आचारगत असंतुलन से भी जोड़ा गया है।<ref>कल्याण-धर्मशास्त्रांक, [https://archive.org/details/kalyan-dharma-shastra-anka/page/n158/mode/1up आयुर्वेद और धर्मशास्त्र], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १६०)।</ref> |
| − | आयुर्वेद के अनुसार जीवन (आयुः) का तात्पर्य केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, अपितु शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के समन्वित अस्तित्व से है। सुश्रुत और चरक जैसे आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन चारों का संतुलन बना रहता है, तभी व्यक्ति को वास्तविक आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार नहीं माना गया, बल्कि उसे मानसिक और आचारगत असंतुलन से भी जोड़ा गया है।<ref>कल्याण-धर्मशास्त्रांक, [https://archive.org/details/kalyan-dharma-shastra-anka/page/n158/mode/1up आयुर्वेद और धर्मशास्त्र], गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १६०)।</ref> | |
| − | आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र - दोनों में सुख-दुःख का मूल कारण मन को माना गया है। मन यदि शुद्ध, संयमित और सात्त्विक है, तो व्यक्ति सुख और आरोग्य का अनुभव करता है; जबकि रजस और तमस से युक्त मन दुःख और रोग का कारण बनता है। धर्मशास्त्र मन की शुद्धि के लिए सदाचार, सत्य, अहिंसा और संयम पर बल देता है, वहीं आयुर्वेद मानसिक दोषों को रोग-उत्पत्ति का प्रमुख कारण मानता है। | + | आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र - दोनों में सुख-दुःख का मूल कारण मन को माना गया है। मन यदि शुद्ध, संयमित और सात्त्विक है, तो व्यक्ति सुख और आरोग्य का अनुभव करता है; जबकि रजस और तमस से युक्त मन दुःख और रोग का कारण बनता है। धर्मशास्त्र मन की शुद्धि के लिए सदाचार, सत्य, अहिंसा और संयम पर बल देता है, वहीं आयुर्वेद मानसिक दोषों को रोग-उत्पत्ति का प्रमुख कारण मानता है। सुख-दुःख, रोग एवं आरोग्यका आधार शरीर और मन ही है - <blockquote>शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः। तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः॥ (चरक संहिता १/२७)</blockquote>शरीर और मन- ये दोनों ही व्याधियों के आश्रय माने गये हैं तथा सुख (आरोग्य) के आश्रय भी ये ही हैं। आहार, आचार-विचार, व्यवहारका सम, उचित प्रयोग ही सुखोंका कारण हैं, आरोग्य सच्चा सुख एवं रोग ही दुःख है - <blockquote>सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च॥ (चरक संहिता)</blockquote>रोगको हटाने या उत्पन्न न होने देनेकी विधि बतलाना आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनोंका समान उद्देश्य है। |