Dharmashastra and Ayurveda (धर्मशास्त्र एवं आयुर्वेद)

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भारतीय ज्ञानपरम्परा में आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को पृथक-पृथक शास्त्र मानते हुए भी उनका अन्तःसंबंध अत्यन्त गहन है। आयुर्वेद जहाँ शरीर, मन और आत्मा के स्वास्थ्य की वैज्ञानिक विवेचना करता है, वहीं धर्मशास्त्र मनुष्य के आचार, व्यवहार और सामाजिक कर्तव्यों का नियमन करता है। दोनों का लक्ष्य एक ही है मानव जीवन को सुखी, संतुलित और आरोग्यपूर्ण बनाना। इस दृष्टि से धर्मशास्त्र और आयुर्वेद को जीवन-विज्ञान के पूरक के रूप में देखा जा सकता है।

परिचय

धर्मशास्त्रों में वर्णित आचार-विधान, यम-नियम, शौच, संयम, सदाचार आदि केवल नैतिक अनुशासन नहीं हैं, बल्कि वे स्वास्थ्य-संरक्षण के उपाय भी हैं। धर्मशास्त्र यह मानता है कि अधर्म, असंयम और आचारहीनता से मन विकृत होता है और विकृत मन शरीर में रोग उत्पन्न करता है। इस प्रकार धर्मशास्त्र अप्रत्यक्ष रूप से आयुर्वेदिक स्वास्थ्य-सिद्धान्तों का समर्थन करता है। आयुर्वेद शरीर, मन और जीवात्मा- इन तीनों के संयोगको जीवन मानता है -

सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्। लोकस्तिष्ठति संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ (चरकसंहिता १/१८)

आयुर्वेद के अनुसार जीवन (आयुः) का तात्पर्य केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, अपितु शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के समन्वित अस्तित्व से है। सुश्रुत और चरक जैसे आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन चारों का संतुलन बना रहता है, तभी व्यक्ति को वास्तविक आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद में रोग को केवल शारीरिक विकार नहीं माना गया, बल्कि उसे मानसिक और आचारगत असंतुलन से भी जोड़ा गया है।[1]

आयुर्वेद

आयुर्विज्ञान आयु से संबंधित वह व्यापक विज्ञान है, जिसके अंतर्गत सम्पूर्ण सृष्टि में विद्यमान जीवन के स्वरूप, संरक्षण, सुव्यवस्था तथा उनसे जुड़े हित–अहित तत्त्वों का सम्यक् ज्ञान प्रदान किया जाता है। आयु की रक्षा एवं संवर्धन के उद्देश्य से कालान्तर में विविध उपायों का विकास हुआ, जो क्रमशः एक संगठित पद्धति के रूप में स्थापित हुए। इन पद्धतियों में आयुर्वेद को सर्वाधिक प्राचीन एवं मूलभूत स्थान प्राप्त है। वैदिक युग से ही आयुर्वेद का सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक स्वरूप ग्रंथों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध होता है। आधुनिक काल में आयुर्वेद के साथ-साथ यूनानी, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा, योग एवं सिद्ध चिकित्सा, एलोपैथी तथा इलेक्ट्रोपैथी जैसी विविध चिकित्सा प्रणालियाँ प्रचलन में हैं। तथापि आयुर्वेद में विशेष रूप से मानव स्वास्थ्य की रक्षा तथा दीर्घायु प्राप्ति से संबंधित सिद्धान्तों का विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अन्य प्राणियों के कल्याण हेतु हस्त्यायुर्वेद, अश्वायुर्वेद एवं वृक्षायुर्वेद जैसी स्वतंत्र शाखाओं का भी उल्लेख आयुर्वैदिक साहित्य में मिलता है, जो इसकी सर्वांगीण दृष्टि को रेखांकित करता है।[2]

स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का संरक्षण तथा रोगग्रस्त व्यक्ति के रोगों का उपचार - ये दोनों ही आयुर्वेद के प्रधान उद्देश्य माने गए हैं। इन्हीं उद्देश्यों की सिद्धि के लिए दिनचर्या, ऋतुचर्या, विशिष्ट चिकित्सीय उपक्रम जैसे पंचकर्म, रसायन एवं वाजीकरण आदि का क्रमबद्ध और वैज्ञानिक प्रतिपादन किया गया है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद तक अनेक स्थलों पर विभिन्न रोगों के नाम, उनके लक्षण तथा चिकित्सा-विधियों का विस्तारपूर्वक वर्णन प्राप्त होता है। इसी प्रकार रामायण एवं महाभारत जैसे महाकाव्यों में आयुर्वेदिक ज्ञान के अनेक संदर्भ उपलब्ध हैं। आगे चलकर सम्राट् अशोक द्वारा आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार हेतु किए गए प्रयासों तथा चीनी यात्रियों के वृत्तान्तों से भारत में आयुर्वेद के पूर्ण विकसित स्वरूप का विवरण मिलता है। प्राचीन काल से वर्तमान समय तक आयुर्वेद के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक शिक्षण एवं शोध संस्थानों की विधिवत स्थापना की गई है।

सुख-दुःख और मन की भूमिका

आयुर्वेद तथा धर्मशास्त्र - दोनों में सुख-दुःख का मूल कारण मन को माना गया है। मन यदि शुद्ध, संयमित और सात्त्विक है, तो व्यक्ति सुख और आरोग्य का अनुभव करता है; जबकि रजस और तमस से युक्त मन दुःख और रोग का कारण बनता है। धर्मशास्त्र मन की शुद्धि के लिए सदाचार, सत्य, अहिंसा और संयम पर बल देता है, वहीं आयुर्वेद मानसिक दोषों को रोग-उत्पत्ति का प्रमुख कारण मानता है। सुख-दुःख, रोग एवं आरोग्यका आधार शरीर और मन ही है -

शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः। तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः॥ (चरक संहिता १/२७)

शरीर और मन- ये दोनों ही व्याधियों के आश्रय माने गये हैं तथा सुख (आरोग्य) के आश्रय भी ये ही हैं। आहार, आचार-विचार, व्यवहारका सम, उचित प्रयोग ही सुखोंका कारण हैं, आरोग्य सच्चा सुख एवं रोग ही दुःख है -

सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च॥ (चरक संहिता)

रोगको हटाने या उत्पन्न न होने देनेकी विधि बतलाना आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनोंका समान उद्देश्य है।

त्रिदोष सिद्धान्त और नैतिक जीवन

आयुर्वेद का वात-पित्त-कफ सिद्धान्त केवल शारीरिक तत्त्वों तक सीमित नहीं है। इनके असंतुलन का सम्बन्ध व्यक्ति के आहार-विहार और मानसिक प्रवृत्तियों से भी है। धर्मशास्त्रों में वर्णित अति-भोग, क्रोध, लोभ और असंयम त्रिदोषों के विकार को बढ़ाते हैं। इस प्रकार नैतिक और अनुशासित जीवनशैली को दोनों शास्त्र समान रूप से आवश्यक मानते हैं।

भारतीय ज्ञान-परंपरा में आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दो ऐसे मूलभूत स्तम्भ हैं, जो मानव जीवन को केवल भौतिक या सामाजिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि नैतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक धरातल पर भी संतुलित करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आयुर्वेद जहाँ शरीर-मन-आत्मा के सामंजस्य को स्वास्थ्य का आधार मानता है, वहीं धर्मशास्त्र मानव कर्तव्यों, आचरण और सामाजिक उत्तरदायित्वों की सुव्यवस्थित रूपरेखा प्रस्तुत करता है। यह शोध-लेख दोनों परंपराओं के दार्शनिक, व्यावहारिक एवं नैतिक अंतर्संबंधों का विश्लेषण करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि आयुर्वेद और धर्मशास्त्र परस्पर पूरक प्रणालियाँ हैं, जो समग्र एवं सार्थक जीवन-दृष्टि प्रदान करती हैं।

आयुर्वेद एवं धर्मशास्त्र का समन्वय

मन अस्वस्थ और शरीर स्वस्थ या शरीर स्वस्थ और मन अस्वस्थ कभी नहीं रह सकते, दोनों अन्योन्याश्रित हैं। अतः दोनोंका उपचार बतलाना आयुर्वेदका लक्ष्य है। यही कारण है कि- आहार, आचार-विचार, व्यवहार-दिनचर्यामें आयुर्वेद और धर्मशास्त्र एकमत हो जाते हैं। दोनोंका लक्ष्य मानवको सुख प्राप्त कराना है जैसा कि -

सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः। सुखं च न विना धर्मात् तस्माद् धर्मपरो भवेत्॥ (वा० सू० २।२)

सब प्रकारके प्राणियोंकी प्रवृत्ति सुखके लिये ही होती है, सुख धर्मपालन किये बिना नहीं मिलता। अतः सुख चाहनेवालेको धर्मपरायण रहना चाहिये। अधार्मिक पुरुष सुखी नहीं रह सकता -

अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम्। हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते॥ (मनु० ४। १७०)

जो पुरुष अधार्मिक है, जिसका झूठ बोलना ही धनागमका साधन है, जो मन-वाणी-शरीरसे दूसरोंकी हिंसा करता है या प्राणवियोग करता है, वह इस लोकमें कभी सुखी नहीं रह सकता।

भारतीय बौद्धिक परंपरा की विशेषता यह है कि यहाँ ज्ञान को खंडों में नहीं, बल्कि समग्रता में देखा गया है। जीवन, समाज, स्वास्थ्य और धर्म - ये सभी पृथक विषय न होकर परस्पर संबद्ध तत्व हैं। आयुर्वेद को ‘आयुः’ अर्थात् जीवन का विज्ञान कहा गया है, जबकि धर्मशास्त्र मानव जीवन के लिए आचार-संहिता और कर्तव्यबोध का विधान प्रस्तुत करता है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को प्रकृति एवं ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (ऋत) के साथ सामंजस्य में स्थापित करना है।

धर्मशास्त्र की वैचारिक संरचना

धर्मशास्त्र ग्रंथ - जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति और उनके भाष्य - मानव जीवन के नैतिक, सामाजिक और विधिक पक्षों को स्पष्ट करते हैं। धर्म यहाँ केवल धार्मिक अनुष्ठान न होकर कर्तव्य, न्याय, शील और लोक-कल्याण का व्यापक सिद्धांत है। आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों का दार्शनिक आधार वैदिक विश्वदृष्टि है, जिसमें ब्रह्माण्ड को एक नैतिक-प्राकृतिक व्यवस्था के रूप में देखा गया है।

  • आयुर्वेद में दोष-संतुलन और गुण-त्रय (सत्त्व, रजस्, तमस्) की अवधारणा
  • धर्मशास्त्र में वर्ण-आश्रम-धर्म तथा कर्तव्य-संतुलन

दोनों ही यह स्वीकार करते हैं कि असंतुलन - चाहे वह शारीरिक हो या नैतिक - दुःख और अव्यवस्था को जन्म देता है।

  • दिनचर्या और ऋतुचर्या - आयुर्वेद की दिनचर्या एवं ऋतुचर्या की संकल्पना धर्मशास्त्रीय अनुशासन से मेल खाती है। नियमित जीवन, संयम और स्वच्छता - ये सभी धर्म और स्वास्थ्य दोनों के लिए अनिवार्य माने गए हैं।
  • आहार एवं आचार - आयुर्वेदिक आहार-नियम सत्त्वगुण की वृद्धि पर बल देते हैं। धर्मशास्त्र भी सात्त्विक भोजन को मानसिक शुद्धि और सदाचार का आधार मानता है। इस प्रकार आहार शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ नैतिक उन्नति का भी साधन बनता है।
  • शौच और पवित्रता - धर्मशास्त्रों में वर्णित शौच-नियम केवल धार्मिक नहीं, अपितु स्वास्थ्यपरक भी है। आयुर्वेद इन्हें रोग-निवारण और मानसिक स्वच्छता से जोड़ता है।

चरकसंहिता में वैद्य के लिए करुणा, सत्य, संयम और निष्काम सेवा को अनिवार्य बताया गया है। वैद्य का आचरण स्वयं एक प्रकार का धर्म है। धर्मशास्त्र भी रोगियों, वृद्धों और असहायों की सेवा को पुण्यकर्म मानता है। इस प्रकार चिकित्सा केवल तकनीकी कौशल न होकर एक नैतिक उत्तरदायित्व बन जाती है। अधर्मसे मनुष्य एक बार बढ़ता है, अन्तमें समूल नष्ट हो जाता है-

अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति। ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ (मनु० ४। १७४)

अधर्मसे मनुष्य पहले तो एक बार बढ़ता है, फिर मौज-शौक आनन्द भी करता है और अपने छोटे-मोटे शत्रुओंपर धनके बलसे विजय भी प्राप्त कर लेता है, किंतु अन्तमें वह देह, धन और संतानादिसहित समूल नष्ट हो जाता है। इसीलिये मनुजी कहते हैं-

परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ। (मनु० ४। १७६)

जो धन धर्मविरुद्ध कर्मोंसे मिलता हो, जो भोग धर्मरहित हो उन दोनोंका त्याग कर दे, क्योंकि उनका परिणाम बुरा होगा। अतः मनुस्मृति का यह उपदेश मानव जीवन के लिए एक महत्त्वपूर्ण नैतिक संदेश प्रदान करता है कि धर्म को केंद्र में रखकर ही अर्थ और काम का उपार्जन एवं उपभोग करना चाहिए। यही दृष्टिकोण व्यक्ति को स्थायी सुख, सामाजिक समरसता एवं दीर्घकालिक कल्याण की ओर अग्रसर करता है।

मानसिक स्वास्थ्य और नैतिकता

आयुर्वेद मानता है कि क्रोध, लोभ और ईर्ष्या जैसे दोष मानसिक असंतुलन उत्पन्न करते हैं, जो आगे चलकर शारीरिक रोगों का कारण बनते हैं।

धर्मशास्त्र इन्हीं वृत्तियों को अधर्म का मूल बताकर आत्मसंयम और सदाचार पर बल देता है। इससे स्पष्ट होता है कि मानसिक स्वास्थ्य और नैतिक जीवन परस्पर आश्रित हैं।

आधुनिक युग में बढ़ते तनाव, जीवनशैली-जन्य रोग और नैतिक संकटों के समाधान हेतु आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों अत्यंत प्रासंगिक हैं।

  • आयुर्वेद : व्यक्तिगत दोष निवारक और समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि
  • धर्मशास्त्र : सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक दिशा

इनका समन्वय सतत विकास और संतुलित जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। आयुर्वेद और धर्मशास्त्र भारतीय परंपरा में जीवन के दो अलग-अलग नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक आयाम हैं। जहाँ आयुर्वेद स्वस्थ जीवन की विधि सिखाता है, वहीं धर्मशास्त्र उस जीवन को मूल्य और उद्देश्य प्रदान करता है। दोनों का संयुक्त अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि सच्चा स्वास्थ्य वही है, जो शरीर, मन, समाज और आत्मा - सभी स्तरों पर संतुलन स्थापित करे।

धर्मशास्त्रीय आयुर्वेदिक दृष्टि

आयुर्वेद के अनुसार सदाचार का नियमित अनुपालन व्यक्ति को आगन्तुक रोगों से सुरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चरकसंहिता में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है कि ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, मान एवं द्वेष आदि मानसिक विकार हैं, जिनकी उत्पत्ति प्रज्ञापराध से होती है। प्रज्ञापराध का तात्पर्य बुद्धि, स्मृति एवं विवेक के अनुचित प्रयोग से है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य अपने हितकारी आचरण से विचलित हो जाता है और मानसिक तथा शारीरिक व्याधियों का शिकार बनता है -

ईर्ष्याशोक भयक्रोधमानद्वेषादयश्च ये। मनोविकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः॥

त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः। देशकालात्मविज्ञानं सवृत्तस्यानुवर्तनम्॥

आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गो निदर्शितः। प्राज्ञः प्रागेव तत् कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः॥ (च० सू० ७। २५-२७)

भाषार्थ - ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, मान तथा द्वेष आदि सब मनके रोग हैं, जो प्रज्ञापराधसे उत्पन्न होते हैं। प्रज्ञापराधोंका त्याग, इन्द्रियोंका उपशम, धर्मशास्त्रोंके तथा आयुर्वेदके उपदेशोंको याद रखना, देश-काल-आत्माका विज्ञान, सवृत्तका अनुवर्तन- ये सब आगन्तुक व्याधियोंसे बचनेके उपाय हैं। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि रोग उत्पन्न होनेके पहले ही आत्महितके इन उपायोंका पालन करे, जिससे आगन्तुक रोग हों ही नहीं। सदाचारवान मानव ही शतायु प्राप्त करता है -

सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः। श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति॥ (मनु० ४। १५८)

सब शुभ लक्षणोंसे हीन पुरुष भी यदि सदाचारी हो, ईश्वर तथा धर्मशास्त्रपर श्रद्धा रखनेवाला हो, परदोष देखने-कहनेवाला न हो तो वह सौ वर्षतक जीता है।

आयुर्वेद में आयु-संरक्षण के धर्मशास्त्रीय उपाय

आयुर्वेद के अनुसार आयु की रक्षा केवल औषधियों के प्रयोग से ही नहीं, अपितु जीवन-शैली, आचार एवं मानसिक संस्कारों के समुचित पालन से भी सुनिश्चित होती है। चरकसंहिता में आयु के परिपालन हेतु जिन उपायों को श्रेष्ठ भेषज के रूप में निरूपित किया गया है, वे मुख्यतः आचारात्मक एवं धर्मप्रधान हैं। मङ्गलमय, स्वास्थ्यवर्धक तथा शान्त प्रदेशों में निवास करना व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाता है और रोगोत्पत्ति की संभावनाओं को न्यून करता है -

हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम्। सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम्॥ संकथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम्। धार्मिकैः सात्त्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसम्मतैः॥ इत्येतद्धेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम्॥ (च० वि० ३।८-१०)

भाषार्थ - मङ्गलमय स्वास्थ्यप्रद शान्त देशोंमें निवास करना, ब्रह्मचर्यका पालन, ब्रह्मचारियोंकी सेवा, धर्मशास्त्रोंकी कथाओंका श्रवण करना, जितात्मा महर्षियोंके चरित्रोंका श्रवण-पठन एवं मनन करना, जिन धार्मिक सात्त्विक पुरुषोंकी ज्ञानवृद्ध वयोवृद्ध धार्मिक पुरुष प्रशंसा करें, उनके साथ निरन्तर रहनेकी चेष्टा- आयुके परिपालनके ये सब उत्तम भेषज हैं।

ब्रह्मचर्य का पालन तथा ब्रह्मचारियों की सेवा को आयु-संरक्षण का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है। इससे इन्द्रिय-संयम, मानसिक स्थिरता तथा जीवन-ऊर्जा का संरक्षण होता है। इसी प्रकार धर्मशास्त्रों से संबंधित कथाओं का श्रवण, जितेन्द्रिय महर्षियों के चरित्रों का पठन-मनन एवं उनसे प्रेरणा ग्रहण करना मनुष्य के आचरण को परिष्कृत करता है और सद्वृत्त की ओर प्रवृत्त करता है। आयुर्वेद यह भी प्रतिपादित करता है कि जिन धार्मिक, सात्त्विक एवं सदाचारी व्यक्तियों की प्रशंसा अनुभवी, ज्ञानवृद्ध एवं वयोवृद्ध सज्जनों द्वारा की जाती है, उनके सान्निध्य में निरंतर रहने का प्रयास करना आयु-रक्षा के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐसे सत्संग से मन, बुद्धि एवं आचार में सात्त्विक गुणों की वृद्धि होती है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु एवं निरोग जीवन की ओर अग्रसर होता है।

अतः चरकसंहिता के अनुसार देश, आचार, ब्रह्मचर्य, सत्संग एवं धर्मशास्त्रीय चिंतन - ये सभी आयु के परिपालन हेतु सर्वोत्तम भेषज हैं। इस दृष्टि से आयुर्वेद न केवल चिकित्सा-विज्ञान है, अपितु धर्म एवं सदाचार पर आधारित एक समग्र जीवन-दर्शन भी है, जो मानव को दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं आत्मिक कल्याण की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

निष्कर्ष॥ Conclusion

आयुर्वेद और धर्मशास्त्र को अलग-अलग शास्त्र मानना उनके वास्तविक स्वरूप को सीमित करना होगा। दोनों मिलकर भारतीय जीवन-दृष्टि का निर्माण करते हैं, जहाँ स्वास्थ्य केवल रोग-रहित अवस्था नहीं, बल्कि धर्म, आचार और मानसिक संतुलन से युक्त जीवन है। आधुनिक समय में जब मानसिक तनाव और जीवनशैली जनित रोग बढ़ रहे हैं, तब आयुर्वेद-धर्मशास्त्र का यह समन्वय मानवता के लिए अत्यन्त प्रासंगिक सिद्ध होता है।

यत्र हिंसास्तेयान्यथाकामं पैशुन्यं परुषानृते। सम्भिन्नालापं व्यापादमभिध्यां दृग्विपर्ययम्। पापं कर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत्॥ (चरक संहिता)

हिंसा, चोरी, अन्यथाकाम, चुगुलखोरी, कठोर एवं अप्रियवचन, झूठी बात, दोगलापन, द्रोहचिन्तन, दूसरों की सम्पत्ति का अपहरण, शास्त्रविरुद्ध आचरण - इन दस प्रकार के दोषों को मन, वचन तथा कर्म से त्याग करना चाहिए।

उद्धरण॥ References

  1. कल्याण-धर्मशास्त्रांक, आयुर्वेद और धर्मशास्त्र, गीताप्रेस गोरखपुर (पृ० १६०)।
  2. संस्कृत वाङ्मय में विज्ञान का इतिहास-आयुर्विज्ञान (2018), राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) नई दिल्ली (पृ० ६८)।