| | शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।<ref>डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।</ref> किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं - <blockquote>अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE/%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%83 श्रीमद्भगवद्गीता], अध्याय- 18, श्लोक - 14।</ref></blockquote>अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं। | | शुक्लयजुर्वेद के चौतींसवें अध्याय के १ से ६ मन्त्र समूह को शिवसंकल्प सूक्त कहा जाता है। इसके मन देवता, त्रिष्टुप् छन्द और याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।<ref>डॉ० अनीता जैन, वैदिक वाग् ज्योतिः-शिव संकल्प से अनुप्रेरित वैदिक मनः प्रबन्धन (२०१६), गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार (पृ० ६०)।</ref> किसी भी कर्म के किये जाने के लिये पाँच आवश्यक अंग हैं - <blockquote>अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्॥ (भगवद्गीता 18.14)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE/%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A4%83 श्रीमद्भगवद्गीता], अध्याय- 18, श्लोक - 14।</ref></blockquote>अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (मन), करण (इन्द्रियाँ), चेष्टा (पाँच -प्राण) और दैव अथवा चेतन शक्ति। लेकिन ज्ञानी जानता है कि इन सबमें भी केवल अकर्ता आत्मा की उपस्थिति मात्र के कारण सभी कर्म सम्भव हो पाते हैं। |
| | + | शिवसंकल्प सूक्त शुक्ल यजुर्वेद का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूक्त है, जिसमें मन को शुभ संकल्प, शुभ निश्चय एवं कल्याणकारी विचारों से युक्त करने की प्रार्थना की गई है। प्रस्तुत लेख में शिवसंकल्प की अवधारणा को वैदिक मनोविज्ञान, सामाजिक समरसता तथा आध्यात्मिक उन्नयन के सन्दर्भ में विवेचित किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मन की शुद्धता ही व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के उत्थान का मूल आधार है। |