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'''गुण वृत्ति विरोध दुःख''' - गुण का अर्थ है सत्त्वगुण, रजोगुण व तमोगुण। वृत्ति का अर्थ है इनका कार्य। व विरोध का अर्थ होता है आपसी मतभेद। इन सभी गुणों का कार्य अलग-अलग होता है। सत्त्वगुण सुख, ज्ञान व प्रकाश का अनुभव करवाता है। रजोगुण इच्छाओं व चंचलता का अनुभव करवाता है। व तमोगुण अज्ञान व अंधकार का अनुभव करवाता है। लेकिन आपसी जब इन गुणों में आपसी तालमेल टूटता है तब यह एक दूसरे के ऊपर दबाव बनाते हैं। उसमें सत्त्वगुण रजोगुण पर रजोगुण तमोगुण पर व तमोगुण सत्त्वगुण पर प्रभावी होने का प्रयास करते रहते हैं। और एक गुण के प्रभावी होने से बाकी के दो गुण स्वयं ही दब जाते हैं। ऐसी अवस्था में शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं। यह स्थिति भी दुःख को उत्पन्न करने वाली होती है।
 
'''गुण वृत्ति विरोध दुःख''' - गुण का अर्थ है सत्त्वगुण, रजोगुण व तमोगुण। वृत्ति का अर्थ है इनका कार्य। व विरोध का अर्थ होता है आपसी मतभेद। इन सभी गुणों का कार्य अलग-अलग होता है। सत्त्वगुण सुख, ज्ञान व प्रकाश का अनुभव करवाता है। रजोगुण इच्छाओं व चंचलता का अनुभव करवाता है। व तमोगुण अज्ञान व अंधकार का अनुभव करवाता है। लेकिन आपसी जब इन गुणों में आपसी तालमेल टूटता है तब यह एक दूसरे के ऊपर दबाव बनाते हैं। उसमें सत्त्वगुण रजोगुण पर रजोगुण तमोगुण पर व तमोगुण सत्त्वगुण पर प्रभावी होने का प्रयास करते रहते हैं। और एक गुण के प्रभावी होने से बाकी के दो गुण स्वयं ही दब जाते हैं। ऐसी अवस्था में शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं। यह स्थिति भी दुःख को उत्पन्न करने वाली होती है।
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=== न्याय-वैशेषिक दर्शन में दुःख की अवधारणा ===
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मिथ्याज्ञान (मोह वा विपर्यय वा भ्रम) रूप कारण के नाश से दोषों (राग और द्वेष) का नाश होता है। ये राग-द्वेष और मोह रूप दोष ही (जिनमें मोह अधिक पापी है क्योंकि इसके बिना राग-द्वेष उत्पन्न ही नहीं हो सकते हैं) धर्म और अधर्म के जनक पुण्य वा पाप-रूप कर्मों में प्रवृत्ति कराते हैं, अतः इन दोषों के नाश से प्रवृत्ति की भी समाप्ति हो जाती है। और इस वाणी, मन तथा शरीर की क्रिया-रूप प्रवृत्ति (अर्थात सत्य प्रिय और हित वचन वाली पुण्य रूप वाचिकी क्रिया तथा असत्य अप्रिय और अहित वचन वाली पाप-रूप वाचिकी क्रिया, एवं प्राणियों पर दया-भाव इत्यादि की पुण्य-रूप मानसी क्रिया तथा उसकी विपरीत पाप-रूप मानसी क्रिया, एवं दान-सेवादि शारीरी पुण्य-क्रिया तथा उसकी विपरीत पाप-रूप शारीरिकी क्रिया) के न रह जाने पर फिर आगे उत्पन्न होना (पुनर्जन्म, प्रेत्य भाव) बन्द हो जाता है - <blockquote>दुःख-जन्म-प्रवृत्ति-दोष-मिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः। (अ० १ आ० १ सू० २)</blockquote>वैशेषिक दर्शन में इस प्रकार कहा गया है - <blockquote>आत्मेन्द्रिय मनोsर्थसंनिकर्षात्सुखदुःखे(अ० ५, आ० २, सू० १५)</blockquote>अर्थात जब आत्मा मन से, मन इंद्रिय से और इंद्रिय अपने विषय से, सन्निकर्ष (समीप) में होती हैं तभी सुख-दुःख होते हैं।
    
==दुःख निवृत्ति उपाय==
 
==दुःख निवृत्ति उपाय==
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