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== स्त्री और पुरूष संबंधी भारतीय सोच ==
 
== स्त्री और पुरूष संबंधी भारतीय सोच ==
  भारतीय सोच के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों एकसाथ ही निर्माण हुवे थे। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 10 में कहा है - सहयज्ञा: प्रजा सृष्ट: .... प्रजा अर्थात् स्त्री और पुरूष साथ ही पप्रदा हुवे थे। स्त्री और पुरूष की भिन्नता का बुध्दियुक्त सोच के आधार पर भारतीय मनीषियों ने मूल्यांकन किया है। - परमात्मा ने सृष्टि को एक संतुलन के साथ बनाया है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते है । दोनों की पूर्ण बनने की चाह ही स्त्री और पुरूष में परस्पर आकर्षण निर्माण करती है।  - संसार में प्रत्येक वस्तू के निर्माण में परमात्मा का कोई प्रयोजन होता है। स्त्री की और पुरूष की शारीरिक और मानसिक भिन्नता का भी कुछ प्रयोजन है। दोनों की भूमिकाएं भिन्न किंतु परस्पर पूरक होंगी।  - परमात्मा से ही बना होने के कारण, परमात्मपद ( पूर्णत्व ) प्राप्ति की दिशा में आगे बढना ही प्रत्येक मानव के जीवन का लक्ष्य है। लेकिन शारीरिक रचना के कारण, सुरक्षा की आवश्यकता के कारण स्त्री के पूर्णत्व की दिशा में विकास का मार्ग अधिक कठिन होता है।  - पारीवारिक मामलों में स्त्री को निर्णय का अधिकार और सामाजिक मामलों में जहाँ परिवार से बाहर के वातावरण का संबंध होता है, स्त्री के लिये सुरक्षा की समस्या निर्माण हो सकती है, उस में पुरूष को निर्णय का अधिकार भारतीय परिवार और समाज व्यवस्था की विशेषता रही है। - हिंदू शास्त्र बताते है ' आत्मवत् सर्वभूतेषू ' या ' आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् '। अर्थ है - जो बात अपने लिये अयोग्य या प्रतिकूल समझते हो उसे औरों के लिये भी अयोग्य और प्रतिकूल समझो और उसे मत करो। इसी का विस्तार है ' मातृवत् परदारेषू '। अपनी बहन, बेटी, माता और पत्नि के साथ अन्य पुरूष अभद्र व्यवहार न करें, सम्मान का व्यवहार करें ऐसी यदि आप औरों से अपेक्षा करते है तो आप भी किसी अन्य की बहन, बेटी, पत्नि या माता के साथ अभद्र व्यवहार न करें, उन्हे सम्मान दें। समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। अपनी पत्नि को छोडकर अन्य सभी स्त्रियों के प्रति माता की भावना को सुसंस्कार कहा गया। - समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। यह भी कहा गया कि - यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तर देवता: । अर्थ : जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रहते है अर्थात् वह समाज देवता स्वरूप बन जाता है। सुख समृध्दि से भर जाता है।
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== भारतीय स्त्री विषयक दृष्टि - तत्व और व्यवहार == उपर्युक्त स्त्री विषयक भारतीय दृष्टि से सब परिचित है। फिर प्रश्न उठता है कि वर्तमान में भारतीय समाज में स्त्री की दुरवस्था क्याप्त है? इस के लिये थोडा इतिहास देखना पडेगा। दो बडे कारण समझ में आते है। एक तो बाप्रध्द काल में महात्मा गौतम बुध्द के निर्वाण के पश्चात् कई बाप्रध्द विहार अनप्रतिकता के अड्डे बन गये थे। बाप्रध्द मत को राजाश्रय मिला हुवा था। यौवन में स्त्री का पुरूषों के प्रति और पुरूष का स्त्री के प्रति याप्रन आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक बात है। फिर याप्रवन में विवेक और अनुभव भी कुछ कम ही होते है। ऐसी युवतियाँ इस स्वाभाविक आकर्षण के कारण विहारों में शरण लेतीं थीं। उन्हें वापस लाना असंभव हो जाता था। इसलिये सावधानी के ताप्रर पर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद नहीं हुवा तो भी बहुत कम हो गया। दूसरे मुस्लिम आक्रांताओं ने जो अत्याचार स्त्रियों पर किये, स्त्रियों को जबरन उठाकर अरब देशों में बेचा इस से आतंकित होकर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद हो गया। स्त्री शिक्षा के मामले में और इसलिये अन्य सभी मामलों में भी बहुत पिछड गई। स्वाधीनता के पश्चात यह अपेक्षा थी की शिक्षा राष्ट्रीय बनेगी, भारतीय बनेगी, सेमेटिक मजहबों के प्रभाव से बाहर निकलेगी । दो तीन पीढियों में स्त्री को योग्य स्थान दिलाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुवा।  वर्तमान में भारतीय स्त्री, जिस में अभी कुछ भारतीयता शेष है, वह बहुत संभ्रम में है। उस के विरासत में मिले संस्कार उस की शिक्षा से मेल नहीं खाते। वर्तमान शिक्षा की झंझा उसे पश्चिमी रहन सहन की ओर घसीटती रहती है। जो पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित है ऐसी स्त्रियाँ भी अपेक्षा तो यह करतीं है कि हर अन्य पुरूष उन की ओर ध्यान अवश्य दे किन्तु उन्हों ने तय की हुई मर्यादा को नहीं लांघे। उन से आदर से व्यवहार करे। किन्तु इस के लिये वह अपने बच्चों पर ऐसे संस्कार करने के लिये न तो तप्रयार है और न ही सक्षम।
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भारतीय सोच के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों एकसाथ ही निर्माण हुवे थे। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 3 के श्लोक 10 में कहा है - सहयज्ञा: प्रजा सृष्ट: .... प्रजा अर्थात् स्त्री और पुरूष साथ ही पप्रदा हुवे थे। स्त्री और पुरूष की भिन्नता का बुध्दियुक्त सोच के आधार पर भारतीय मनीषियों ने मूल्यांकन किया है। - परमात्मा ने सृष्टि को एक संतुलन के साथ बनाया है। स्त्री और पुरूष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे होते है । दोनों की पूर्ण बनने की चाह ही स्त्री और पुरूष में परस्पर आकर्षण निर्माण करती है।  - संसार में प्रत्येक वस्तू के निर्माण में परमात्मा का कोई प्रयोजन होता है। स्त्री की और पुरूष की शारीरिक और मानसिक भिन्नता का भी कुछ प्रयोजन है। दोनों की भूमिकाएं भिन्न किंतु परस्पर पूरक होंगी।  - परमात्मा से ही बना होने के कारण, परमात्मपद ( पूर्णत्व ) प्राप्ति की दिशा में आगे बढना ही प्रत्येक मानव के जीवन का लक्ष्य है। लेकिन शारीरिक रचना के कारण, सुरक्षा की आवश्यकता के कारण स्त्री के पूर्णत्व की दिशा में विकास का मार्ग अधिक कठिन होता है।  - पारीवारिक मामलों में स्त्री को निर्णय का अधिकार और सामाजिक मामलों में जहाँ परिवार से बाहर के वातावरण का संबंध होता है, स्त्री के लिये सुरक्षा की समस्या निर्माण हो सकती है, उस में पुरूष को निर्णय का अधिकार भारतीय परिवार और समाज व्यवस्था की विशेषता रही है। - हिंदू शास्त्र बताते है ' आत्मवत् सर्वभूतेषू ' या ' आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् '। अर्थ है - जो बात अपने लिये अयोग्य या प्रतिकूल समझते हो उसे औरों के लिये भी अयोग्य और प्रतिकूल समझो और उसे मत करो। इसी का विस्तार है ' मातृवत् परदारेषू '। अपनी बहन, बेटी, माता और पत्नि के साथ अन्य पुरूष अभद्र व्यवहार न करें, सम्मान का व्यवहार करें ऐसी यदि आप औरों से अपेक्षा करते है तो आप भी किसी अन्य की बहन, बेटी, पत्नि या माता के साथ अभद्र व्यवहार न करें, उन्हे सम्मान दें। समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। अपनी पत्नि को छोडकर अन्य सभी स्त्रियों के प्रति माता की भावना को सुसंस्कार कहा गया। - समाज में स्त्री को योग्य स्थान और सम्मान मिले इस दृष्टि से स्त्री को माँ के रूप में देखा गया। यह भी कहा गया कि - यत्र नार्यस्तु पुज्यंते रमंते तर देवता: । अर्थ : जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता रहते है अर्थात् वह समाज देवता स्वरूप बन जाता है। सुख समृध्दि से भर जाता है।
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== भारतीय स्त्री विषयक दृष्टि - तत्व और व्यवहार ==
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उपर्युक्त स्त्री विषयक भारतीय दृष्टि से सब परिचित है। फिर प्रश्न उठता है कि वर्तमान में भारतीय समाज में स्त्री की दुरवस्था क्याप्त है? इस के लिये थोडा इतिहास देखना पडेगा। दो बडे कारण समझ में आते है। एक तो बाप्रध्द काल में महात्मा गौतम बुध्द के निर्वाण के पश्चात् कई बाप्रध्द विहार अनप्रतिकता के अड्डे बन गये थे। बाप्रध्द मत को राजाश्रय मिला हुवा था। यौवन में स्त्री का पुरूषों के प्रति और पुरूष का स्त्री के प्रति याप्रन आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक बात है। फिर याप्रवन में विवेक और अनुभव भी कुछ कम ही होते है। ऐसी युवतियाँ इस स्वाभाविक आकर्षण के कारण विहारों में शरण लेतीं थीं। उन्हें वापस लाना असंभव हो जाता था। इसलिये सावधानी के ताप्रर पर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद नहीं हुवा तो भी बहुत कम हो गया। दूसरे मुस्लिम आक्रांताओं ने जो अत्याचार स्त्रियों पर किये, स्त्रियों को जबरन उठाकर अरब देशों में बेचा इस से आतंकित होकर स्त्रियों का घर से बाहर निकलना पूर्णत: बंद हो गया। स्त्री शिक्षा के मामले में और इसलिये अन्य सभी मामलों में भी बहुत पिछड गई।
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स्वाधीनता के पश्चात यह अपेक्षा थी की शिक्षा राष्ट्रीय बनेगी, भारतीय बनेगी, सेमेटिक मजहबों के प्रभाव से बाहर निकलेगी । दो तीन पीढियों में स्त्री को योग्य स्थान दिलाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुवा।  वर्तमान में भारतीय स्त्री, जिस में अभी कुछ भारतीयता शेष है, वह बहुत संभ्रम में है। उस के विरासत में मिले संस्कार उस की शिक्षा से मेल नहीं खाते। वर्तमान शिक्षा की झंझा उसे पश्चिमी रहन सहन की ओर घसीटती रहती है। जो पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित है ऐसी स्त्रियाँ भी अपेक्षा तो यह करतीं है कि हर अन्य पुरूष उन की ओर ध्यान अवश्य दे किन्तु उन्हों ने तय की हुई मर्यादा को नहीं लांघे। उन से आदर से व्यवहार करे। किन्तु इस के लिये वह अपने बच्चों पर ऐसे संस्कार करने के लिये न तो तप्रयार है और न ही सक्षम।
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== समाज में कामों का वर्गीकरण ==
 
== समाज में कामों का वर्गीकरण ==
 
पारिवारिक और सामाजिक काम निम्न है । पारिवारिक काम वे है जो केवल परिवार में किये जाते है। और सामाजिक काम वे है जो समाज ( परिवार भी समाज का ही हिस्सा होता है ) में किये जाते है।  १.  प्रजा का निर्माण २.  संस्कार और शिक्षा ३.  सामाजिक व्यवस्थाओं को चलाना।  ४.  जीने के लिये या मनोरंजन के लिये आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन इन में प्रजा का निर्माण यह तो शुध्द पारिवारिक काम है। इस से आगे पाँच वर्ष तक की शिक्षा का अर्थात् इंद्रिय, मन और संस्कारों की शिक्षा का काम भी मोटे ताप्रर पर परिवार में ही होता है। इस के बाद जब बालक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तब वह जिम्मेदारी समाज की होती है।  जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के उद्योग चलाये जाते है। यह सामाजिक प्रयासों का ही क्षेत्र होता है। समाज ठीक चले इस दृष्टि से विभिन्न व्यवस्थाओं का निर्माण भी किया जाता है। जप्रसे सडक बनाना, कुए बनाना, धर्मशालाएं बनाना, मंदिर बनाना, विद्यालय बनाना आदि। यह व्यवस्थाएं अच्छीं चलें इस के लिये भी ध्यान देना पडता है। सामाजिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक कार्यों की सूचि में आता है।
 
पारिवारिक और सामाजिक काम निम्न है । पारिवारिक काम वे है जो केवल परिवार में किये जाते है। और सामाजिक काम वे है जो समाज ( परिवार भी समाज का ही हिस्सा होता है ) में किये जाते है।  १.  प्रजा का निर्माण २.  संस्कार और शिक्षा ३.  सामाजिक व्यवस्थाओं को चलाना।  ४.  जीने के लिये या मनोरंजन के लिये आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन इन में प्रजा का निर्माण यह तो शुध्द पारिवारिक काम है। इस से आगे पाँच वर्ष तक की शिक्षा का अर्थात् इंद्रिय, मन और संस्कारों की शिक्षा का काम भी मोटे ताप्रर पर परिवार में ही होता है। इस के बाद जब बालक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तब वह जिम्मेदारी समाज की होती है।  जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के उद्योग चलाये जाते है। यह सामाजिक प्रयासों का ही क्षेत्र होता है। समाज ठीक चले इस दृष्टि से विभिन्न व्यवस्थाओं का निर्माण भी किया जाता है। जप्रसे सडक बनाना, कुए बनाना, धर्मशालाएं बनाना, मंदिर बनाना, विद्यालय बनाना आदि। यह व्यवस्थाएं अच्छीं चलें इस के लिये भी ध्यान देना पडता है। सामाजिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक कार्यों की सूचि में आता है।
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