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=== सूरत ===
=== सूरत ===
गुजरात राज्य का यह प्रमुख नगर तापी या ताप्ती के तट पर बसा है। सूरत का पुराना नाम सूर्यपुर है। देव-वैद्य अश्विनीकुमारों ने यहाँ तपस्या की और शिव को प्रसन्न किया। वैद्यराज महादेव व अम्बाजी के मन्दिर यहाँ के सर्वप्रमुख मन्दिर हैं। टालेमी ने सूरत की पहचान फूलपाद के रूप है किआदि शांकराचार्य नेअपना वेदान्त भाष्य यहीं लिखा। ए.डी. बारबोसा नामक पुर्तगाली यात्रा ने सूरत का वर्णन एक व्यापारिक केन्द्र व प्रमुख पत्तन के रूप में किया है। सूरत केवल व्यापार का ही केन्द्र नहीं रहा वरन शिक्षा केन्द्र के रूप में भी विकसित हुआ।
गुजरात राज्य का यह प्रमुख नगर तापी या ताप्ती के तट पर बसा है। सूरत का पुराना नाम सूर्यपुर है। देव-वैद्य अश्विनीकुमारों ने यहाँ तपस्या की और शिव को प्रसन्न किया। वैद्यराज महादेव व अम्बाजी के मन्दिर यहाँ के सर्वप्रमुख मन्दिर हैं। टालेमी ने सूरत की पहचान फूलपाद के रूप है किआदि शांकराचार्य नेअपना वेदान्त भाष्य यहीं लिखा। ए.डी. बारबोसा नामक पुर्तगाली यात्रा ने सूरत का वर्णन एक व्यापारिक केन्द्र व प्रमुख पत्तन के रूप में किया है। सूरत केवल व्यापार का ही केन्द्र नहीं रहा वरन शिक्षा केन्द्र के रूप में भी विकसित हुआ।
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=== खम्भात ===
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खम्भात माही व साबरमती नदी के मध्य में स्थित प्राचीन पत्तन (बन्दरगाह) है। यह पत्तन खम्भात की खाड़ी के शीर्ष पर अति सुरक्षित स्थिति में था। प्राचीन साहित्य इसको स्तम्भ तीर्थ, ताम्रलिफित, त्रम्बावती माहीनगर औरभोगावती के नाम से पुकारा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर विजय के उपलक्ष्य में एक स्तम्भ स्थापित कराया और स्तम्भेश्वर शिव की स्थापना की, अत: इसका नाम स्तम्भ तीर्थ पड़ा। बाद में नाम स्तम्भों से बिगड़कर खम्भ और खम्भात हो गया।
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एक अन्य विवरण के अनुसार खम्भात की व्युत्पत्ति स्कम्भ से हुई। स्कम्भ शिव का प्रतीक है। खम्भात पुराना शैव तीर्थ है, अत: स्कम्भ से खम्भात बन गया। वल्लभी और सोलंकी शासनकाल में खम्भात भारत का सबसे विशाल पत्तन था।अरब यात्रियों ने इसे बौद्ध तीर्थ के रूप में पाया। चालुक्य काल में यहाँ जैन तीर्थों का विकास हुआ। प्रसिद्ध जैन आचार्य हेमचन्द्र सूरी ने यहीं दीक्षा ली। सुरक्षा की दृष्टि से भी खम्भात महत्वपूर्ण रहा। सोलंकी शासकों ने यहाँ सुदूढ़ नौसैनिक बेड़ा व सेना का आधार (छावनी) बनाया। परन्तु कालक्रम से सब नष्ट हो गया- विशेषत: विदेशी विधर्मी लुटेरों के कारण। ये मुस्लिम आक्रान्ता मन्दिरों को अपना निशाना बनाते थे, अत: शिखरयुक्त मन्दिरों का निर्माण बन्द हो गया। परिणामत: आज के मन्दिर घरों में ही बने हैं, बाहर से उनका पता नहीं चलता।
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पालिताणा ( शत्रुंजय )
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पालिताणा व शत्रुजय अविभाज्य हैं। पालिताणा मुख्यरूप से आवासीय क्षेत्र है,जबकि शत्रुंजय पूर्ण रूप से मन्दिरों का परिसर है। यह मणिकांचन संयोग विश्व मेंअद्वितीय है। मन्दिरों का परिसर शत्रुंजय ६०० मीटर ऊँचे पहाड़ी क्षेत्र में विस्तृत है। पहाड़ी में ८६० से अधिक मन्दिर, ११००० प्रतिमाएँ और लगभग ९00 पादुकाएँ (चरणचिह्न) हैं। इनमें १०६ बड़े मन्दिर हैं। सम्पूर्ण देश और विदेश से भी तीर्थ-यात्रियों का तांता लगा रहता है। सबसे प्रमुख मन्दिरों में आदिनाथ, विमलशाह, चौमुख, सम्प्राप्तिराजा, हनुमान, हिंगलाज माता मन्दिर हैं। पालिताणा शब्द का उद्भव पादलिप्त या पालित से हुआ है। योगी नागार्जुन ने अपने गुरु पादलिप्त की स्मृति में पालिताणा की स्थापना की थी। यहाँ का चौमुख मन्दिरइतना विशाल है कि ४० किमी. दूरी से भी दिखाई देता है।
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जूनागढ़
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नरसीभक्त का जन्म जूनागढ़ मेंहुआ था। यह नगर गिरनारपर्वत की
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तलहटी में अवस्थित है। पूर्व में गिरनार पर्वत है, अत: इसका नाम
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गिरिनगर भी है। नगर में कई धर्मशालाएँ व देव-मन्दिर हैं। महाप्रभु
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वल्लभाचार्य की निवास भूमि यही नगर है। नगर के पास पर्वतीय चढ़ाई
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पर ऊपरकोट नामक पुराना किला है। इसमें अनेक बौद्ध प्रतिमाएँ तथा
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हनुमानजी की विशाल मूर्तिहै। वामनेश्वर शिव, मुचकुन्द महादेव, नेमिनाथ,
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अम्बिका शिखरआदि प्रमुख मन्दिर व धर्मस्थल हैं।चढ़ाईपर भर्तृहरि गुफा
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भी विद्यमान हैं।
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पोरबन्दर (मुदामापुरी)
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भगवान् श्री कृष्ण के परम मित्र विप्र सुदामा का जन्म पोरबन्दर में हुआ
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था,अत: यह पवित्र तीर्थ बन गया और सुदामापुरी कहलाया। यहएकदम
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समुद्रतट पर स्थित है। विगत शताब्दी में महात्मा गाँधी का जन्म भी
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पोरबन्दर में ही हुआ,अत:इसका महत्व और भी बढ़ गया। गांधीजी के
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जन्म-स्थान को कीर्ति मन्दिर के रूप में संवारा गया है। इस नगर में
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सुदामा मन्दिर के अतिरिक्त श्रीराम मन्दिर, राधाकृष्ण मन्दिर, पंचमुखी
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महादेव और अन्नपूर्णा मन्दिर हैं।
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कणविर्ती (अहमदाबाद)
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साबरमती नदी के तटपर गुजरात राज्य का यह सबसे बड़ा नगरहै।
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इसका पुराना नाम कर्णावती है।भारत में वस्त्र उद्योग का मुम्बई के बाद
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यह सबसे बड़ा केन्द्र है। अनेक वर्षों तक यह गुजरात की राजधानी रहा
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महात्मा गांधी का साबरमती आश्रम यहीं है। इसी आश्रम से गाँधीजी ने
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ऐतिहासिक दांडी यात्रा प्रारम्भ की थी। नगर में अनेक धार्मिक व
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ऐतिहासिक स्थल हैं।दुधारेश्वर, नृसिंह, हनुमान, भद्रकाली के मन्दिरयहाँ
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के प्रमुख मन्दिरहैं। दधीचि ऋषि का आश्रम यहीं साबरमती के तट पर
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थ||
==References==
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