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# छात्रों में पढ़ लिखकर "कभी भी नौकरी नहीं करूँगा अथवा किसी को नौकर नहीं बनाऊँगा" का संकल्प जगाना चाहिये ।
# छात्रों में पढ़ लिखकर "कभी भी नौकरी नहीं करूँगा अथवा किसी को नौकर नहीं बनाऊँगा" का संकल्प जगाना चाहिये ।
# विद्यालयों का निर्माणकार्य, मैदान, बगीचा तथा अतिथियों की शुश्रूषा और सेवा, छात्र और आचार्यों के जिम्मे करना चाहिये । विद्यालय संचालन की पूर्ण जिम्मेदारी छात्रों और आचार्यों की होगी तब शिक्षा सार्थक भी होगी और स्वायत्त भी होगी । जहाँ समाज के ९५ प्रतिशत लोग काम करते हैं, पसीना बहाते हैं, उत्पादन करते हैं, निर्माण करते हैं, सृजन करते हैं वहाँ सुख, समृद्धि, संस्कार, स्वमान, स्वतंत्रता, गौरव, श्रेष्ठता, स्वास्थ्य, समरसता, आध्यात्मिकता अचल होकर वास करते हैं । पाँच प्रतिशत में पागल, रोगी, पंगु लोगों का समावेश होता है । कर्मशिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ है । यह रीढ़ जितनी मजबूत, सीधी और लचीली होगी, समाज उतना ही श्रेष्ठ होगा ।
# विद्यालयों का निर्माणकार्य, मैदान, बगीचा तथा अतिथियों की शुश्रूषा और सेवा, छात्र और आचार्यों के जिम्मे करना चाहिये । विद्यालय संचालन की पूर्ण जिम्मेदारी छात्रों और आचार्यों की होगी तब शिक्षा सार्थक भी होगी और स्वायत्त भी होगी । जहाँ समाज के ९५ प्रतिशत लोग काम करते हैं, पसीना बहाते हैं, उत्पादन करते हैं, निर्माण करते हैं, सृजन करते हैं वहाँ सुख, समृद्धि, संस्कार, स्वमान, स्वतंत्रता, गौरव, श्रेष्ठता, स्वास्थ्य, समरसता, आध्यात्मिकता अचल होकर वास करते हैं । पाँच प्रतिशत में पागल, रोगी, पंगु लोगों का समावेश होता है । कर्मशिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ है । यह रीढ़ जितनी मजबूत, सीधी और लचीली होगी, समाज उतना ही श्रेष्ठ होगा ।
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भारतीय शिक्षा : संकल्पना एवं स्वरूप
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== शास्रशिक्षा ==
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शास्त्रशिक्षा का अर्थ है किसी भी क्रिया, किसी भी रचना, किसी भी पदार्थ के मूल तत्त्वों को जानना । यह सैद्धान्तिक ज्ञान है । उदाहरण के लिये वर्णमाला में स्वर और व्यंजन ऐसे दो प्रकार होते हैं । स्वर और व्यंजन की परिभाषा जानना और उस परिभाषा के अनुसार उच्चारण की प्रक्रिया का अवलोकन और परीक्षण करना शास्त्रीय ज्ञान है । बिना सिद्धान्त जाने केवल उच्चारण का अनुकरण कर उच्चारण करना यह क्रियात्मक शिक्षण है । सही उच्चारण के आनन्द का अनुभव करना, सही उच्चारण करना अपना कर्तव्य समझना, सही उच्चारण के साथ साथ मधुर स्वर से उच्चारण को भगवती सरस्वती की आराधना समझना यह भाषा के सम्बन्ध में धर्मशिक्षा है । एक भाषा का शास्त्रज्ञान है, दूसरा भाषा का व्यवहार है और तीसरा वाग्देवी की उपासना है। स्वाभाविक रूप से ही उपासना अर्थात् धर्मशिक्षा का क्रम प्रथम है, व्यवहार अर्थात् कर्मशिक्षा का क्रम दूसरा है और व्याकरणज्ञान अर्थात् शास्त्रशिक्षा का क्रम तीसरा है ।
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शास्रशिक्षा
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हमारा व्यवहार का भी अनुभव है कि बालक में प्रथम भाषा के संस्कार होते हैं । गर्भावस्था से ही उसके ऊपर भाषा के संस्कार होते हैं । परिणामस्वरूप उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में भाषा अनुस्यूत हो जाती है । यही उसके लिये भाषा की उपासना है । आयु के साथ साथ उपासना का यह भाव विकसित होता है । जन्म के साथ ही भाषा तो बालक के साथ होती है । भाषा के वातावरण में वह बडा होता है । उसके उच्चारण के अवयव सक्रिय होते हैं तब वह बोलना सीखता है । प्रेरणा और अभ्यास से उसका उच्चारण सही और मधुर होता जाता है। यह कर्मशिक्षा है । जब उसके धर्म और कर्म दोनों पक्ष स्थिर होते हैं तब वह स्वर और व्यंजन की परिभाषा सीखता है ।
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शासख्त्रशिक्षा का अर्थ है किसी भी क्रिया, किसी भी
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हम समझ सकते हैं कि भाषा सीखने में शास्त्र पक्ष का क्रम बाद में ही आता है । हममें से कोई भी सिद्धान्त प्रथम सीखकर बोलना बाद में नहीं सीखते । चलना, गाना, खाना, खेलना, रोटी बनाना, कपडे धोना, सुई धागे से कपडा सीलना, सिलाई मशीन चलाना, चित्र बनाना, गिनती बोलना, जोड करना आदि सब सिद्धान्त जानकर उसे लागू करते हुए नहीं सीखा जाता । क्रम इससे उल्टा है। अच्छी तरह से क्रिया करने का अभ्यास परिपक्क होने के बाद सिद्धान्त सरलता से सीखा जाता है । कभी कभी तो सिद्धान्त अपने आप समझ में आता है । सिद्धान्त अपने आपको हमारे सामने प्रकट करता है ।
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रचना, किसी भी पदार्थ के मूल तत्त्वों को जानना । यह
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ऐसा नहीं है कि पढ़ने के क्रम में शास्त्रशिक्षा की आवश्यकता नहीं है । पदार्थविज्ञान, गणित, भूमिति आदि सीखते समय सिद्धान्त जानकर फिर विषय सीखा जाता है । परन्तु उस समय भी सिद्धान्त के साथ क्रिया नहीं जुडी है तो सिद्धान्त समझना, कठिन कभी कभी तो असंभव हो जाता है । निम्नलिखित उदाहरण इस तथ्य को ठीक से समझाता है ।
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सैद्धान्तिक ज्ञान है ।
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गुरु ने कहा, ब्रह्म इस सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है । शिष्य को यह बात समझ में नहीं आई क्यों कि ब्रह्म कहीं पर दिखाई तो नहीं देता है । फिर इसका अनुभव भी तो नहीं है। अतः उसे समझाने के लिये गुरु ने शिष्य को एक गिलास भरकर पानी और चुटकी भर नमक लाने के लिये कहा । शिष्य नमक और पानी ले आया । गुरु ने शिष्य को पानी में नमक घोलने के लिये कहा । शिष्य ने वैसा ही किया । गुरु ने पूछा, “नमक दिखाई देता है क्या ?” शिष्य ने कहा, “नहीं दिखाई देता।' फिर नमक कहाँ है ? नमक पानी में है । अतः "दिखाई नहीं देता है तब भी नमक है", इस उदाहरण से, "दिखाई नहीं देता तो भी ब्रह्म है" यह सिद्धान्त से समझ में आया । फिर गुरु ने कहा, "गिलास में ऊपर की ओर से पानी लेकर चखो।" शिष्य ने चखा । पानी खारा लगा । इसका अर्थ है, ऊपर की ओर जो पानी है उसमें नमक है । फिर कहा, “मध्य का पानी चखो ।" चखा। मध्य में भी नमक है । नीचे का चखा । वहाँ भी नमक है । कहीं से भी चखो, पानी खारा है अर्थात् नमक पानी में सर्वत्र है । उसी प्रकार से ब्रह्म भी सृष्टि में सर्वत्र है । इसे कहते हैं विज्ञान का प्रयोग । प्रयोग क्रिया है, अनुभव है, और क्रिया और अनुभव से सिद्धान्त अर्थात् शास्त्र जल्दी समझ में आता है, ठीक प्रकार से समझ में आता है । इसलिये शास्त्रशिक्षा, धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा के बाद में होती है ।
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उदाहरण के लिये वर्णमाला में स्वर और व्यंजन ऐसे
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शास्त्रशिक्षा से सिद्धान्त समझ में आता है परन्तु व्यवहार जीवन धर्म और कर्म के बिना चलता नहीं है । रोटी बनाने का शास्त्र जानने से भूख शान्त नहीं होती, रोटी बनाकर खाने से भूख मिटती है । रोटी बनाने के कौशल से रोटी बनती है, शास्त्र से नहीं । आरोग्यशास्त्र के नियम जानने से निरामय प्राप्त नहीं होता, तैरने की कला की पुस्तकें पढने से तैरना नहीं आता, लिखित वर्णन करना भले ही आता हो । लिखने से परीक्षा में अंक प्राप्त होकर पास भले ही हुआ जाता हो, पानी में उतरने पर तैरना नहीं आता | अतः व्यवहार की दुनिया में धर्म और कर्म ही तारक हैं, उद्धारक हैं, शास्त्र नहीं ।
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दो प्रकार होते हैं । स्वर और व्यंजन की परिभाषा जानना
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फिर भी शास्त्रशिक्षा की अनिवार्यता है । शास्त्र के बिना क्रिया सही ढंग से नहीं होती । शास्त्र से ही किसी भी क्रिया को, रचना को या प्रक्रिया को वैज्ञानिकता प्राप्त होती है। श्रीमदभगवद्गीता में श्री भगवान कहते हैं<ref>श्रीमदभगवद्गीता 16.23</ref> -<blockquote>यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।</blockquote><blockquote>न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।16.23।।</blockquote>अर्थात्
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और उस परिभाषा के अनुसार उच्चारण की प्रक्रिया का
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शास्त्र विधि को छोड़कर जो मन में उठे तुक्कों या तरंगों के अनुसार व्यवहार करता है उसे सुख, सिद्धि या मोक्ष नहीं मिलते । इसलिये शास्त्रशिक्षा अनिवार्य है । परन्तु शास्त्रशिक्षा के सन्दर्भ में दो बातें ठीक से समझना आवश्यक है ।
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अवलोकन और परीक्षण करना शास्त्रीय ज्ञान है । बिना
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पहली, शास्त्र शिक्षा सभी के लिये आवश्यक नहीं है । शिक्षित समाज के दस प्रतिशत लोग यदि शास्त्र जानते हैं तो पर्याप्त है । व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो किसान खेत में खेती करेगा, या खेती के शास्त्र का अध्ययन करेगा ? गृहिणी भोजन बनायेगी या भोजन के शास्त्र का अध्ययन करेगी ? यदि सब अध्ययन में ही लगेंगे तो फिर काम कौन करेगा ? काम नहीं होगा तो व्यवहार कैसे चलेगा ? व्यवहार ही नहीं चलेगा तो जीवन ही रुक जायेगा ।
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सिद्धान्त जाने केवल उच्चारण का अनुकरण कर उच्चारण
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इसलिये नब्बे प्रतिशत लोगों को तो काम करना चाहिये । काम करने के लिये जितने शास्त्रज्ञान की आवश्यकता है उतना ज्ञान काम करते करते स्वयं प्राप्त होता है, और / अथवा आसपास के अनुभवी लोगों से प्राप्त हो जाता है । परन्तु काल के प्रवाह में, एक पीढी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होते होते क्रियाप्रक्रियाओं में, पद्धतियों में विकृतियाँ आती हैं, अंधश्रद्धायें निर्माण होती हैं, निरर्थकता आती हैं । कई बातें कालबाह्म हो जाती हैं । उनमें दोष निर्माण होते हैं । इन्हें नित्य परिष्कृत करने की आवश्यकता होती है । शास्त्र के जानकार लोग ही यह कार्य कर सकते हैं। उनका ही यह अधिकार है । वास्तव में इस कार्य को शास्त्रीय अध्ययन और अनुसन्धान कहते हैं।
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करना यह क्रियात्मक शिक्षण है । सही उच्चारण के आनन्द
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इस प्रकार का अध्ययन और अनुसंधान करना यह वास्तव में ज्ञानसाधना है । शिक्षित समाज के दस प्रतिशत लोगों को ऐसी ज्ञानसाधना करने के लिये अपने आपको प्रस्तुत करना चाहिये । परन्तु इस प्रकार की ज्ञानसाधना भी धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा के बिना नहीं की जाती । जिसे अध्यापन करना है उसे भी शास्त्रशिक्षा की आवश्यकता है, क्यों कि क्रिया आधारित, अनुभव आधारित शिक्षा प्राप्त करने हेतु प्रेरित करना और मार्गदर्शन करना भी शास्त्रीय ज्ञान के बिना संभव नहीं है । इस प्रकार धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा और शास्त्रशिक्षा का मेल बिठाकर घरों में, विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, अनुसंधान केन्द्रों में, समाज में, धर्मकेन्द्रों में शिक्षा की पुर्चना करने की आवश्यकता है ।
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का अनुभव करना, सही उच्चारण करना अपना कर्तव्य
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समझना, सही उच्चारण के साथ साथ मधुर स्वर से
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उच्चारण को भगवती सरस्तवी की आराधना समझना यह
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भाषा के सम्बन्ध में धर्मशिक्षा है । एक भाषा का शाख््रज्ञान
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है, दूसरा भाषा का व्यवहार है और तीसरा वाग्देवी की
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उपासना है। स्वाभाविक रूप से ही उपासना अर्थात्
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धर्मशिक्षा का क्रम प्रथम है, व्यवहार अर्थात् कर्मशिक्षा का
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क्रम दूसरा है और व्याकरणज्ञान अर्थात् शास्त्रशिक्षा का क्रम
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तीसरा है ।
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हमारा व्यवहार का भी अनुभव है कि बालक में
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प्रथम भाषा के संस्कार होते हैं । गर्भावस्था से ही उसके
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ऊपर भाषा के संस्कार होते हैं । परिणामस्वरूप उसके
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सम्पूर्ण व्यक्तित्व में भाषा अनुस्यूत हो जाती है । यही
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उसके लिये भाषा की उपासना है । आयु के साथ साथ
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उपासना का यह भाव विकसित होता है । जन्म के साथ ही
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भाषा तो बालक के साथ होती है । भाषा के वातावरण में
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वह बडा होता है । उसके उच्चारण के अवयव सक्रिय होते
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हैं तब वह बोलना सीखता है । प्रेरणा और अभ्यास से
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उसका उच्चारण सही और मधुर होता जाता है। यह
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कर्मशिक्षा है । जब उसके धर्म और कर्म दोनों पक्ष स्थिर
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होते हैं तब वह स्वर और व्यंजन की परिभाषा सीखता है ।
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हम समझ सकते हैं कि भाषा सीखने में शाख्रपक्ष का
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क्रम बाद में ही आता है । हममें से कोई भी सिद्धान्त प्रथम
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सीखकर बोलना बाद में नहीं सीखते । चलना, गाना,
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खाना, खेलना, रोटी बनाना, कपडे धोना, सुई धागे से
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कपडा सीलना, सिलाई मशीन चलाना, चित्र बनाना,
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गिनती बोलना, जोड करना आदि सब सिद्धान्त जानकर
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उसे लागू करते हुए नहीं सीखा जाता । क्रम इससे उल्टा
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है। अच्छी तरह से क्रिया करने का अभ्यास परिपक्क होने
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के बाद सिद्धान्त सरलता से सीखा जाता है । कभी कभी
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तो सिद्धान्त अपने आप समझ में आता है । सिद्धान्त अपने
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आपको हमारे सामने प्रकट करता है ।
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ऐसा नहीं है कि पढ़ने के क्रम में शास्त्रशिक्षा की
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आवश्यकता नहीं है । पदार्थविज्ञान, गणित, भूमिति आदि
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सीखते समय सिद्धान्त जानकर फिर विषय सीखा जाता है ।
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परन्तु उस समय भी सिद्धान्त के साथ क्रिया नहीं जुडी है
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तो सिद्धान्त समझना, कठिन कभी कभी तो असंभव हो
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जाता है । निम्नलिखित उदाहरण इस तथ्य को ठीक से
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समझाता है ।
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गुरु ने कहा, ब्रह्म इस सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है ।
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शिष्य को यह बात समझ में नहीं आई क्यों कि ब्रह्म कहीं
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पर दिखाई तो नहीं देता है । फिर इसका अनुभव भी तो
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नहीं है । अतः उसे समझाने के लिये गुरु ने शिष्य को एक
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गिलास भरकर पानी और चुटकी भर नमक लाने के लिये
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कहा । शिष्य नमक और पानी ले आया । गुरु ने शिष्य को
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पानी में नमक घोलने के लिये कहा । शिष्य ने वैसा ही
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किया । गुरु ने पूछा, “नमक दिखाई देता है क्या ?” शिष्य
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ने कहा, “नहीं दिखाई देता ।' फिर नमक कहाँ है ? नमक
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पानी में है । अतः दिखाई नहीं देता है तब भी नमक है इस
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उदाहरण से दिखाई नहीं देता तो भी ब्रह्म है यह सिद्धान्त से
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समझ में आया । फिर गुरु ने कहा, “गिलास में ऊपर की
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ओर से पानी लेकर चखो ।' शिष्य ने चखा । पानी खारा
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लगा । इसका अर्थ है, ऊपर की ओर जो पानी है उसमें
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पर्व ६ : शक्षाप्रक्रियाओं का सांस्कृतिक स्वरूप
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नमक है । फिर कहा, “मध्य का पानी चखो ।' चखा ।
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मध्य में भी नमक है । नीचे का चखा । वहाँ भी नमक है ।
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कहीं से भी चखो, पानी खारा है अर्थात् नमक पानी मेंछ्व
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सर्वत्र है । उसी प्रकार से ब्रह्म भी सृष्टि में सर्वत्र है । इसे
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कहते हैं विज्ञान का प्रयोग । प्रयोग क्रिया है, अनुभव है,
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और क्रिया और अनुभव से सिद्धान्त अर्थात् शास्त्र जल्दी
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समझ में आता है, ठीक प्रकार से समझ में आता है ।
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इसलिये शास्त्रशिक्षा, धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा के
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बाद में होती है ।
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शाख्त्रशिक्षा से सिद्धान्त समझ में आता है परन्तु
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व्यवहार जीवन धर्म और कर्म के बिना चलता नहीं है ।
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रोटी बनाने का शास्त्र जानने से भूख शान्त नहीं होती, रोटी
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बनाकर खाने से भूख मिटती है । रोटी बनाने के कौशल से
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रोटी बनती है, शास्त्र से नहीं । आरोग्यशास्त्र के नियम
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जानने से निरामय प्राप्त नहीं होता, तैरने की कला की
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पुस्तकें पढने से तैरना नहीं आता, लिखित वर्णन करना
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भले ही आता हो । लिखने से परीक्षा में अंक प्राप्त होकर
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पास भले ही हुआ जाता हो, पानी में उतरने पर तैरना नहीं
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आता |
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अतः व्यवहार की दुनिया में धर्म और कर्म ही तारक
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हैं, उद्धारक हैं, शाख्र नहीं ।
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फिर भी शास्त्रशिक्षा की अनिवार्यता है । शास्त्र के
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बिना क्रिया सही ढंग से नहीं होती । शास्त्र से ही किसी भी
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क्रिया को, रचना को या प्रक्रिया को वैज्ञानिकता प्राप्त होती
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है । श्रीमदू भगवद्गीता में श्री भगवान कहते हैं -
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यः शाख्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
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न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिमू ॥।
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अर्थात्
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शाख्रविधि को छोड़कर जो मन में उठे तुक्कों या
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तरंगों के अनुसार व्यवहार करता है उसे सुख, सिद्धि या
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मोक्ष नहीं मिलते ।
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इसलिये शास्त्रशिक्षा अनिवार्य है । परन्तु शास्त्रशिक्षा
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के सन्दर्भ में दो बातें ठीक से समझना आवश्यक है ।
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१, शाख््रशिक्षा सभी के लिये आवश्यक नहीं है ।
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शिक्षित समाज के दस प्रतिशत लोग
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यदि शास्त्र जानते हैं तो पर्याप्त है । व्यावहारिक दृष्टि से
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देखें तो किसान खेत में खेती करेगा, या खेती के शास्त्र का
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अध्ययन करेगा ? गृहिणी भोजन बनायेगी या भोजन के
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शास्त्र का अध्ययन करेगी ? यदि सब अध्ययन में ही लगेंगे
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तो फिर काम कौन करेगा ? काम नहीं होगा तो व्यवहार
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कैसे चलेगा ? व्यवहार ही नहीं चलेगा तो जीवन ही रुक
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जायेगा ।
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इसलिये नब्बे प्रतिशत लोगों को तो काम करना
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चाहिये । काम करने के लिये जितने शास्त्ज्ञान की
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आवश्यकता है उतना ज्ञान काम करते करते स्वयं प्राप्त
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होता है, और / अथवा आसपास के अनुभवी लोगों से
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प्राप्त हो जाता है ।
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परन्तु काल के प्रवाह में, एक पीढी से दूसरी पीढ़ी
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तक हस्तांतरित होते होते क्रियाप्रक्रियाओं में, पद्धतियों में
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विकृतियाँ आती हैं, अंधश्रद्धायें निर्माण होती हैं, fete
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आती हैं । कई बातें कालबाह्म हो जाती हैं । उनमें दोष
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निर्माण होते हैं । इन्हें नित्य परिष्कृत करने की आवश्यकता
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होती है । शास्त्र के जानकार लोग ही यह कार्य कर सकते
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हैं । उनका ही यह अधिकार है । वास्तव में इस कार्य को
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शास्त्रीय अध्ययन और अनुसन्धान कहते हैं ।
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इस प्रकार का अध्ययन और अनुसंधान करना यह
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वास्तव में ज्ञानसाधना है । शिक्षित समाज के दस प्रतिशत
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लोगों को ऐसी ज्ञानसाधना करने के लिये अपने आपको
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प्रस्तुत करना चाहिये । परन्तु इस प्रकार की ज्ञानसाधना भी
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धर्मशिक्षा और कर्मशिक्षा के बिना नहीं की जाती ।
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जिसे अध्यापन करना है उसे भी शास्त्रशिक्षा की
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आवश्यकता है, क्यों कि क्रिया आधारित, अनुभव
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आधारित शिक्षा प्राप्त करने हेतु प्रेरित करना और मार्गदर्शन
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करना भी शास्त्रीय ज्ञान के बिना संभव नहीं है ।
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इस प्रकार धर्मशिक्षा, कर्मशिक्षा और शास्त्रशिक्षा का
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मेल बिठाकर घरों में, विद्यालयों में, महाविद्यालयों में,
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अनुसंधान केन्द्रों में, समाज में, धर्मकेन्द्रों में शिक्षा की
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पुर्चना करने की आवश्यकता है ।
==References==
==References==