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९. भारत के उद्योग धन्धों का नाश करना उनका एक माध्यम था । तकनीकी के क्षेत्र में, व्यापार के क्षेत्र में, कारीगरी के क्षेत्र में, भौतिक पदार्थों के उत्पादन के क्षेत्र में, कृषि के क्षेत्र में भारत इतना विकसित था और उसके परिणाम स्वरूप इतना समृद्ध भी था कि विश्व उसका लोहा मानता था । ब्रिटीशों ने इन उद्योग धन्धों का नाश किया जिससे भारत की भूमि तो समृद्धि की खान रही परन्तु समृद्धि को निर्माण करने वाले साधन ही नष्ट हो गये और प्रजा गरीब होने लगी, भूखों मरने लगी । व्यापार सारा कम्पनी के हाथ में चला गया ।
 
९. भारत के उद्योग धन्धों का नाश करना उनका एक माध्यम था । तकनीकी के क्षेत्र में, व्यापार के क्षेत्र में, कारीगरी के क्षेत्र में, भौतिक पदार्थों के उत्पादन के क्षेत्र में, कृषि के क्षेत्र में भारत इतना विकसित था और उसके परिणाम स्वरूप इतना समृद्ध भी था कि विश्व उसका लोहा मानता था । ब्रिटीशों ने इन उद्योग धन्धों का नाश किया जिससे भारत की भूमि तो समृद्धि की खान रही परन्तु समृद्धि को निर्माण करने वाले साधन ही नष्ट हो गये और प्रजा गरीब होने लगी, भूखों मरने लगी । व्यापार सारा कम्पनी के हाथ में चला गया ।
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१०. अत्याचार और शोषण उनका दूसरा माध्यम था । मार, भूख और शोषण से त्रस्त प्रजा शारीरिक और मानसिक रूप से टूट गई, हताश हो गई, भयभीत हो गई, गुलाम बन गई, दास बन गई । चाकरी करने के लिये विवश हो गई । शासक केवल अत्याचारी नहीं था, विदेशी भी था । भारत के प्रदीर्घ इतिहास में अनेक अत्याचारी शासक हुए थे । परन्तु वे सब भारतीय थे । ब्रिटीश अत्याचारी होने के साथ साथ विदेशी भी थे इसलिये उनकी रीतिनीति की यहाँ की प्रजा को कल्पना भी नहीं होती थी । वे उन्हें समझ ही नहीं पाते थे ।
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१०. अत्याचार और शोषण उनका दूसरा माध्यम था । मार, भूख और शोषण से त्रस्त प्रजा शारीरिक और मानसिक रूप से टूट गई, हताश हो गई, भयभीत हो गई, गुलाम बन गई, दास बन गई । चाकरी करने के लिये विवश हो गई । शासक केवल अत्याचारी नहीं था, विदेशी भी था । भारत के प्रदीर्घ इतिहास में अनेक अत्याचारी शासक हुए थे । परन्तु वे सब धार्मिक थे । ब्रिटीश अत्याचारी होने के साथ साथ विदेशी भी थे इसलिये उनकी रीतिनीति की यहाँ की प्रजा को कल्पना भी नहीं होती थी । वे उन्हें समझ ही नहीं पाते थे ।
    
११. अंग्रेजों ने जब राज्य छीन लिये तब वह केवल राज्यसत्ता का हस्तान्तरण नहीं था, व्यवस्थाओं में परिवर्तन का प्रारम्भ भी था । राज्य चलाने की पद्धति भी ब्रिटीश होने लगी ।. प्रशासन व्यवस्था, करव्यवस्था, न्यायव्यवस्था, दण्डव्यवस्था बदल गई । उन्होंने न केवल ब्रिटन में थीं वैसी व्यवस्थायें बनाई, अपने लिये अनूकूल थीं वैसी बनाई । भारत में राजा और प्रजा के मध्य जिस प्रकार के सम्बन्धों की कल्पना की गई है इसका अंशमात्र उसमें नहीं था ।
 
११. अंग्रेजों ने जब राज्य छीन लिये तब वह केवल राज्यसत्ता का हस्तान्तरण नहीं था, व्यवस्थाओं में परिवर्तन का प्रारम्भ भी था । राज्य चलाने की पद्धति भी ब्रिटीश होने लगी ।. प्रशासन व्यवस्था, करव्यवस्था, न्यायव्यवस्था, दण्डव्यवस्था बदल गई । उन्होंने न केवल ब्रिटन में थीं वैसी व्यवस्थायें बनाई, अपने लिये अनूकूल थीं वैसी बनाई । भारत में राजा और प्रजा के मध्य जिस प्रकार के सम्बन्धों की कल्पना की गई है इसका अंशमात्र उसमें नहीं था ।
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१४. शिक्षा और शिक्षाव्यवस्था ऐसे दो शब्दों से क्या तात्पर्य है ? शिक्षा से तात्पर्य है वह विषयवस्तु, वह ज्ञान जो विषयों, पाठ्यक्रमों, पुस्तकों के माध्यम से दिया जाता है। दृष्टि, दृष्टिकोण, विचारधारा, सिद्धान्त, जानकारी आदि का समावेश इसमें होता है । शिक्षाव्यवस्था से तात्पर्य है भौतिक सुविधायें, साधनसामग्री, पाठनपद्धति, अर्थव्यवस्था, संचालन, नियमावली आदि । शिक्षा में जब परिवर्तन हुआ तो ये सारी बातें बदल गई । यह आमूलचूल परिवर्तन था । इसके परिणाम स्वरूप शेष सारी बातें दृढमूल हो गईं ।
 
१४. शिक्षा और शिक्षाव्यवस्था ऐसे दो शब्दों से क्या तात्पर्य है ? शिक्षा से तात्पर्य है वह विषयवस्तु, वह ज्ञान जो विषयों, पाठ्यक्रमों, पुस्तकों के माध्यम से दिया जाता है। दृष्टि, दृष्टिकोण, विचारधारा, सिद्धान्त, जानकारी आदि का समावेश इसमें होता है । शिक्षाव्यवस्था से तात्पर्य है भौतिक सुविधायें, साधनसामग्री, पाठनपद्धति, अर्थव्यवस्था, संचालन, नियमावली आदि । शिक्षा में जब परिवर्तन हुआ तो ये सारी बातें बदल गई । यह आमूलचूल परिवर्तन था । इसके परिणाम स्वरूप शेष सारी बातें दृढमूल हो गईं ।
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१५. आज स्थिति यह है कि ब्रिटीश राज्य समाप्त हुआ, राज्य के अधीन होती हैं ऐसी सारी बातें हमारे आधीन हो गईं । परन्तु शिक्षा और शिक्षाव्यवस्था में परिवर्तन नहीं हुआ । इस कारण से शेष सारी व्यवस्थायें तान्त्रिक रूप से भारतीय होने पर भी मान्त्रिक रूप से अर्थात्‌ वैचारिक रूप से भारतीय नहीं बनीं ।
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१५. आज स्थिति यह है कि ब्रिटीश राज्य समाप्त हुआ, राज्य के अधीन होती हैं ऐसी सारी बातें हमारे आधीन हो गईं । परन्तु शिक्षा और शिक्षाव्यवस्था में परिवर्तन नहीं हुआ । इस कारण से शेष सारी व्यवस्थायें तान्त्रिक रूप से धार्मिक होने पर भी मान्त्रिक रूप से अर्थात्‌ वैचारिक रूप से धार्मिक नहीं बनीं ।
    
=== बुद्धि विश्रम : कारण और परिणाम ===
 
=== बुद्धि विश्रम : कारण और परिणाम ===
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=== संकल्पनात्मक शब्द ===
 
=== संकल्पनात्मक शब्द ===
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२९. हमने भारतीय जीवनविचार के अत्यन्त मूल्यवान , श्रेष्ठ अर्थवाले, श्रेष्ठ सन्दर्भवाले संकल्पनात्मक शब्दों को उल्टे ही अर्थों के साथ जोडकर न केवल विपरीत अर्थवाले बना दिये हैं अपितु उलझा भी दिये हैं। कभी बुद्धि के क्षेत्रगं उलझा दिये कभी बुद्धि और व्यवहार दोनों में । उदाहरण के लिये धर्म, आत्मा, संस्कृति, राष्ट्र, आधुनिकता, विज्ञान, वैज्ञानिकता, वैश्विकता, श्रद्धा, प्रेम, आनन्द, चित्त आदि अनेक संकल्पनायें उलझ गई हैं । लोकतन्त्र, समाज, वर्ण, जाति आश्रम, परिवार शिक्षा आदि को भी मूल स्वरूप में ही विपरीत अर्थ प्रदान कर दिये हैं । भारतीय सन्दूर्भों में जो जिनके अर्थ हैं ही नहीं ऐसे अर्थ उन्हें प्राप्त हो गये हैं ।
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२९. हमने धार्मिक जीवनविचार के अत्यन्त मूल्यवान , श्रेष्ठ अर्थवाले, श्रेष्ठ सन्दर्भवाले संकल्पनात्मक शब्दों को उल्टे ही अर्थों के साथ जोडकर न केवल विपरीत अर्थवाले बना दिये हैं अपितु उलझा भी दिये हैं। कभी बुद्धि के क्षेत्रगं उलझा दिये कभी बुद्धि और व्यवहार दोनों में । उदाहरण के लिये धर्म, आत्मा, संस्कृति, राष्ट्र, आधुनिकता, विज्ञान, वैज्ञानिकता, वैश्विकता, श्रद्धा, प्रेम, आनन्द, चित्त आदि अनेक संकल्पनायें उलझ गई हैं । लोकतन्त्र, समाज, वर्ण, जाति आश्रम, परिवार शिक्षा आदि को भी मूल स्वरूप में ही विपरीत अर्थ प्रदान कर दिये हैं । धार्मिक सन्दूर्भों में जो जिनके अर्थ हैं ही नहीं ऐसे अर्थ उन्हें प्राप्त हो गये हैं ।
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३०. ऐसी एक संकल्पना स्वतन्त्रता और स्वायत्तता की है । भारतीय जीवनविचार में प्रत्येक पदार्थ का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है और उसका प्रयोजन है इसका स्वीकार किया गया है। हम पदार्थों, प्राणियों, वनस्पति और मनुष्यों की स्वतन्त्रता का स्वीकार, सम्मान और रक्षण करने वाले हैं इसे न समझकर हम स्वतन्त्रता की पश्चिमी संकल्पना को स्वीकार कर बैठे हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की स्वतन्त्रता को एकदूसरे के विरोधी मानती है और मनुष्य के अलावा और किसी की स्वतन्त्रता को तो मान्यता ही नहीं देती । श्रेष्ठता कनिष्ठ बनकर गर्व का अनुभव करती है यह कितनी विचित्र बात है ।
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३०. ऐसी एक संकल्पना स्वतन्त्रता और स्वायत्तता की है । धार्मिक जीवनविचार में प्रत्येक पदार्थ का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है और उसका प्रयोजन है इसका स्वीकार किया गया है। हम पदार्थों, प्राणियों, वनस्पति और मनुष्यों की स्वतन्त्रता का स्वीकार, सम्मान और रक्षण करने वाले हैं इसे न समझकर हम स्वतन्त्रता की पश्चिमी संकल्पना को स्वीकार कर बैठे हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की स्वतन्त्रता को एकदूसरे के विरोधी मानती है और मनुष्य के अलावा और किसी की स्वतन्त्रता को तो मान्यता ही नहीं देती । श्रेष्ठता कनिष्ठ बनकर गर्व का अनुभव करती है यह कितनी विचित्र बात है ।
    
३१. व्यक्ति केन्द्रित विकास की संकल्पना से स्पर्धा निर्माण होती है । स्पर्धा को विकास का कारक तत्त्व मानना उल्टी बुद्धि का द्योतक है। स्वस्थ स्पर्धा यह शब्द्प्रयोग ही “आकाशकुसुम' जैसा असम्भव प्रयोग है । आकाश में जिस प्रकार फूल नहीं ऊगता उसी प्रकार स्पर्धा कभी स्वस्थ नहीं हो सकती । स्पर्धा से संघर्ष, संघर्ष से हिंसा और हिंसा से विनाश यही गति है। परन्तु हमने स्पर्धा को व्यवहार का dad तत्त्व बना दिया, स्पर्धा के साथ पुरस्कार को जोड दिया, श्रेष्ठत्व का निदर्शक बना दिया |
 
३१. व्यक्ति केन्द्रित विकास की संकल्पना से स्पर्धा निर्माण होती है । स्पर्धा को विकास का कारक तत्त्व मानना उल्टी बुद्धि का द्योतक है। स्वस्थ स्पर्धा यह शब्द्प्रयोग ही “आकाशकुसुम' जैसा असम्भव प्रयोग है । आकाश में जिस प्रकार फूल नहीं ऊगता उसी प्रकार स्पर्धा कभी स्वस्थ नहीं हो सकती । स्पर्धा से संघर्ष, संघर्ष से हिंसा और हिंसा से विनाश यही गति है। परन्तु हमने स्पर्धा को व्यवहार का dad तत्त्व बना दिया, स्पर्धा के साथ पुरस्कार को जोड दिया, श्रेष्ठत्व का निदर्शक बना दिया |

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