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=== अध्याय २५ ===
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== जीवनदृष्टि ==
 
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=== संकटों का मूल ===
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==== '''जीवनदृष्टि''' ====
   
जीवन और जगत को देखने की पश्चिम की दृष्टि ही विश्व के वर्तमान संकटों की जड है। पश्चिम विश्व को भौतिक मानता है। जो दिखाई देता है वही सत्य है। इस विश्व के सारे भौतिक पदार्थों और उन्हें संचालित करनेवाली ऊर्जा ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। पदार्थ और ऊर्जा को समझने का विज्ञान भौतिक विज्ञान है । भौतिक विज्ञान को ही विज्ञान कहने का आज प्रचलन है। इस भौतिक जीवनदृष्टि में मन, बुद्धि, आत्मा आदि का अस्तित्व तो है परन्तु उन्हें भौतिक जीवन के लिये भौतिक विज्ञान के मानकों पर ही परखा और समझा जाता है।
 
जीवन और जगत को देखने की पश्चिम की दृष्टि ही विश्व के वर्तमान संकटों की जड है। पश्चिम विश्व को भौतिक मानता है। जो दिखाई देता है वही सत्य है। इस विश्व के सारे भौतिक पदार्थों और उन्हें संचालित करनेवाली ऊर्जा ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। पदार्थ और ऊर्जा को समझने का विज्ञान भौतिक विज्ञान है । भौतिक विज्ञान को ही विज्ञान कहने का आज प्रचलन है। इस भौतिक जीवनदृष्टि में मन, बुद्धि, आत्मा आदि का अस्तित्व तो है परन्तु उन्हें भौतिक जीवन के लिये भौतिक विज्ञान के मानकों पर ही परखा और समझा जाता है।
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२. इस विश्व में जन्मजन्मान्तर जैसा कुछ नहीं है। जन्म के साथ जीवन शुरू होता है और मृत्यु के साथ पूरा होता है। इसलिये पूर्वजन्म के संस्कार जैसी शब्दावली को विचारधारा में कोई स्थान नहीं है ।  
 
२. इस विश्व में जन्मजन्मान्तर जैसा कुछ नहीं है। जन्म के साथ जीवन शुरू होता है और मृत्यु के साथ पूरा होता है। इसलिये पूर्वजन्म के संस्कार जैसी शब्दावली को विचारधारा में कोई स्थान नहीं है ।  
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मन की सारी इच्छाओं की पूर्ति करना मनुष्यजीवन का लक्ष्य है। कामनाओं की पूर्ति हेतु प्रयास करना जीवन का मुख्य कार्य है। अधिक से अधिकतर कामनायें होना ऊँचा जीवनमान है। अधिकतम कामनाओं की पूर्ति कर पाना यश है। इसी दिशा में गति करना विकास है। विकास की दिशा में यात्रा अनन्त है । कभी भी विकास पूर्ण नहीं होता।  
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३. मन की सारी इच्छाओं की पूर्ति करना मनुष्यजीवन का लक्ष्य है। कामनाओं की पूर्ति हेतु प्रयास करना जीवन का मुख्य कार्य है। अधिक से अधिकतर कामनायें होना ऊँचा जीवनमान है। अधिकतम कामनाओं की पूर्ति कर पाना यश है। इसी दिशा में गति करना विकास है। विकास की दिशा में यात्रा अनन्त है । कभी भी विकास पूर्ण नहीं होता।  
    
४. विश्व में मनुष्य सबसे श्रेष्ठ है । मनुष्य के उपभोग के लिये यह सृष्टि बनी है। अपने सुख के लिये मनुष्य सृष्टि के सारे पदार्थों का किसी बी हद तक उपयोग कर सकता है। सृष्टि उसकी दास है। उसका पूरा रसकस निकालना उसका अधिकार है।  
 
४. विश्व में मनुष्य सबसे श्रेष्ठ है । मनुष्य के उपभोग के लिये यह सृष्टि बनी है। अपने सुख के लिये मनुष्य सृष्टि के सारे पदार्थों का किसी बी हद तक उपयोग कर सकता है। सृष्टि उसकी दास है। उसका पूरा रसकस निकालना उसका अधिकार है।  
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मनुष्य मनुष्य का सम्बन्ध भी व्यक्ति केन्द्री है। हर व्यक्ति स्वतन्त्र है। हर व्यक्ति को अपने हित और सुख की चिन्ता स्वयं करनी है। यह एक व्यावहारिक सत्य है कि व्यक्तियों को अपनी सभी आवश्यकताओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये एकदूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है । लेनदेन के बिना जीवनव्यवहार चलता नहीं है। लेनदेन के समय स्वयं के हित की हानि न हो इसकी सावधानी हर व्यक्ति को रखनी है। अपने अपने हित की रक्षा की व्यवस्था हेतु समाज की विभिन्न व्यवस्थायें बनाई जाती हैं । मनुष्यों के परस्पर सम्बन्धों के स्वरूप को सामाजिक करार का सिद्धान्त कहा जाता है।
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५. मनुष्य मनुष्य का सम्बन्ध भी व्यक्ति केन्द्री है। हर व्यक्ति स्वतन्त्र है। हर व्यक्ति को अपने हित और सुख की चिन्ता स्वयं करनी है। यह एक व्यावहारिक सत्य है कि व्यक्तियों को अपनी सभी आवश्यकताओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये एकदूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है । लेनदेन के बिना जीवनव्यवहार चलता नहीं है। लेनदेन के समय स्वयं के हित की हानि न हो इसकी सावधानी हर व्यक्ति को रखनी है। अपने अपने हित की रक्षा की व्यवस्था हेतु समाज की विभिन्न व्यवस्थायें बनाई जाती हैं । मनुष्यों के परस्पर सम्बन्धों के स्वरूप को सामाजिक करार का सिद्धान्त कहा जाता है।
    
पश्चिम की जीवनदृष्टि के इन सूत्रों के आधार पर विश्व की असंख्य रचनायें बनी हैं। इसकी बडी और छोटी शाखाप्रशाखाओं का एक बडा जाल बना है जिसमें विश्व फँस गया है। यह जाल अब बुरी तरह से उलझ भी गया है। इस जाल से विश्व को मुक्त करना है।
 
पश्चिम की जीवनदृष्टि के इन सूत्रों के आधार पर विश्व की असंख्य रचनायें बनी हैं। इसकी बडी और छोटी शाखाप्रशाखाओं का एक बडा जाल बना है जिसमें विश्व फँस गया है। यह जाल अब बुरी तरह से उलझ भी गया है। इस जाल से विश्व को मुक्त करना है।
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पश्चिम की यह जीवनदृष्टि भारत के लिये नई नहीं है। वास्तव में पहले कहा है उस प्रकार भारत पूर्व और पश्चिम का भेद नहीं करता है। आज जिसे पश्चिमी जीवनदृष्टि कहा जाता है उसे भारतने आसुरी जीवनदृष्टि कहा है। आसुरी जीवनदृष्टि से देखने वाला मनुष्य इस जगत के विषय में कहता है, <blockquote>असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । </blockquote><blockquote>अपरस्परसम्भूतं किमन्यद् कामहैतुकम् ।। </blockquote>अर्थात्  
 
पश्चिम की यह जीवनदृष्टि भारत के लिये नई नहीं है। वास्तव में पहले कहा है उस प्रकार भारत पूर्व और पश्चिम का भेद नहीं करता है। आज जिसे पश्चिमी जीवनदृष्टि कहा जाता है उसे भारतने आसुरी जीवनदृष्टि कहा है। आसुरी जीवनदृष्टि से देखने वाला मनुष्य इस जगत के विषय में कहता है, <blockquote>असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । </blockquote><blockquote>अपरस्परसम्भूतं किमन्यद् कामहैतुकम् ।। </blockquote>अर्थात्  
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यह जगत सत्य है, इसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं है,
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यह जगत सत्य है, इसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं है,इस जगत में ईश्वर जैसा कुछ नहीं है। जगत के अन्यान्य पदार्थों का एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। उसका अस्तित्व केवल कामनाओं की पूर्ति के लिये ही है।
 
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इस जगत में ईश्वर जैसा कुछ नहीं है। जगत के अन्यान्य पदार्थों का एक दूसरे के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता। उसका अस्तित्व केवल कामनाओं की पूर्ति के लिये ही है।
      
ये आसुरी प्रकृति के लोग कम प्रभावी नहीं होते । वे बलवान, धनवान, सत्तावान, सौन्दर्यवान होते हैं। वे बुद्धिमान, चतुर, दक्ष, कार्यकुशल होते हैं। अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सम्पदा के आधार पर वे वैभव और समृद्धि प्राप्त करते हैं । विशेषता केवल यही है कि वे सज्जन नहीं होते । दूसरों की परवाह नहीं करते । दमन, उत्पीडन, शोषण, अत्याचार करने में उन्हें कुछ भी अनुचित नहीं लगता।
 
ये आसुरी प्रकृति के लोग कम प्रभावी नहीं होते । वे बलवान, धनवान, सत्तावान, सौन्दर्यवान होते हैं। वे बुद्धिमान, चतुर, दक्ष, कार्यकुशल होते हैं। अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सम्पदा के आधार पर वे वैभव और समृद्धि प्राप्त करते हैं । विशेषता केवल यही है कि वे सज्जन नहीं होते । दूसरों की परवाह नहीं करते । दमन, उत्पीडन, शोषण, अत्याचार करने में उन्हें कुछ भी अनुचित नहीं लगता।
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भारत का कर्तव्य है कि इस विनाश से पश्चिम को बचाये।
 
भारत का कर्तव्य है कि इस विनाश से पश्चिम को बचाये।
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=== भारतीय शिक्षा - वैश्विक संकटों का स्वरूप ===
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== भारतीय शिक्षा - वैश्विक संकटों का स्वरूप ==
 
विश्व आज जिन संकटों से ग्रस्त हो गया है वे दो प्रकार के हैं। एक है प्राकृतिक और दूसरे हैं सांस्कृतिक । त्सुनामी, चक्रवात, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, शारीरिक बिमारियाँ आदि प्राकृतिक संकट हैं। भुखमरी, जानहानि, भौतिक सम्पदा का नाश, शारीरिक स्वास्थ्य का नाश आदि इसके परिणाम हैं। चौरी, डकैती, बलात्कार, अनाचार, भ्रष्टाचार, शोषण, आतंकवाद, युद्ध, धर्मान्तरण, आदि सांस्कृतिक संकट हैं। जानहानि, असुरक्षा, गुलामी, मानसिक बिमारियाँ, क्षुद्रता, पशुवृत्ति, मानवीय गौरव का नाश इनके परिणाम हैं।
 
विश्व आज जिन संकटों से ग्रस्त हो गया है वे दो प्रकार के हैं। एक है प्राकृतिक और दूसरे हैं सांस्कृतिक । त्सुनामी, चक्रवात, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अकाल, शारीरिक बिमारियाँ आदि प्राकृतिक संकट हैं। भुखमरी, जानहानि, भौतिक सम्पदा का नाश, शारीरिक स्वास्थ्य का नाश आदि इसके परिणाम हैं। चौरी, डकैती, बलात्कार, अनाचार, भ्रष्टाचार, शोषण, आतंकवाद, युद्ध, धर्मान्तरण, आदि सांस्कृतिक संकट हैं। जानहानि, असुरक्षा, गुलामी, मानसिक बिमारियाँ, क्षुद्रता, पशुवृत्ति, मानवीय गौरव का नाश इनके परिणाम हैं।
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कुल मिलाकर मनुष्य का व्यवहार ही विश्व के संकटों को आमन्त्रित करता है । इसलिये विश्व के संकट कम करने हैं, जगत को संकटों से मुक्त करना है तो मनुष्य को ठीक होना होगा। मनुष्य को ठीक होने का सर्वाधिक उपयुक्त साधन शिक्षा है। हम समझ सकते हैं कि पंचमहाभूतों, वनस्पति, प्राणियों को नहीं अपितु मनुष्य को ही शिक्षा की आवश्यकता है।
 
कुल मिलाकर मनुष्य का व्यवहार ही विश्व के संकटों को आमन्त्रित करता है । इसलिये विश्व के संकट कम करने हैं, जगत को संकटों से मुक्त करना है तो मनुष्य को ठीक होना होगा। मनुष्य को ठीक होने का सर्वाधिक उपयुक्त साधन शिक्षा है। हम समझ सकते हैं कि पंचमहाभूतों, वनस्पति, प्राणियों को नहीं अपितु मनुष्य को ही शिक्षा की आवश्यकता है।
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आज विश्व पर पश्चिम की जीवनदृष्टि छाई हुई है। श्रीमद् भगवद्गीता में जिसे आसुरी सम्पद् कहा है वही यह पश्चिमी जीवनदृष्टि है। आसुरी सम्पद् स्वयं के लिये भी बन्धन ही निर्माण करती है ऐसा गीता में श्री भगवान कहते हैं। भगवानने कहा हुआ समझने के लिये तो अब पश्चिमी जगत की स्थिति ही प्रत्यक्ष प्रमाण है। आसुरी सम्पदा का प्रभाव कम करने के लिये, विश्व के जो अनेक देश उससे प्रभावित हो गये हैं उन्हें बचाने के लिये, स्वयं पश्चिम को सही दृष्टि देने के लिये और सही व्यवहार सिखाने के लिये भारतीय जीवनदृष्टि ही एक मात्र उपाय दिखाई देता है। स्वयं पश्चिम को भी अब संकटों का अनुभव हो रहा है। वह भी अनेक प्रकार के प्रयास तो कर ही रहा है। परन्तु वे प्रवास वांछित परिणाम देने वाले नहीं हैं। इसका कारण यह है कि संकट से मुक्त होने के लिये वह वही कर रहा है जिससे संकट कम होने के स्थान पर बढें । जिन कारणों से दुःख उत्पन्न हो रहे हैं उन कारणों को दूर किये बिना वह दुःखों से मुक्ति चाहता है। उसकी बुद्धि यह सीधासादा कार्यकारण सम्बन्ध ही नहीं समझ रही है। तात्पर्य यह है कि अब सुख, शान्ति, समृद्धि, संस्कार आदि प्राप्त हो इस हेतु से प्रयास करने की पश्चिम में क्षमता ही नहीं रही है। वह दुर्बल हो गया है। इस स्थिति में अब भारत को ही मार्गदर्शन करने की, बचाने के कुछ उपाय करने की जिम्मेदारी लेनी होगी।
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आज विश्व पर पश्चिम की जीवनदृष्टि छाई हुई है। श्रीमद् भगवद्गीता में जिसे आसुरी सम्पद् कहा है वही यह पश्चिमी जीवनदृष्टि है। आसुरी सम्पद् स्वयं के लिये भी बन्धन ही निर्माण करती है ऐसा गीता में श्री भगवान कहते हैं। भगवानने कहा हुआ समझने के लिये तो अब पश्चिमी जगत की स्थिति ही प्रत्यक्ष प्रमाण है। आसुरी सम्पदा का प्रभाव कम करने के लिये, विश्व के जो अनेक देश उससे प्रभावित हो गये हैं उन्हें बचाने के लिये, स्वयं पश्चिम को सही दृष्टि देने के लिये और सही व्यवहार सिखाने के लिये भारतीय जीवनदृष्टि ही एक मात्र उपाय दिखाई देता है। स्वयं पश्चिम को भी अब संकटों का अनुभव हो रहा है। वह भी अनेक प्रकार के प्रयास तो कर ही रहा है। परन्तु वे प्रवास वांछित परिणाम देने वाले नहीं हैं। इसका कारण यह है कि संकट से मुक्त होने के लिये वह वही कर रहा है जिससे संकट कम होने के स्थान पर बढें । जिन कारणों से दुःख उत्पन्न हो रहे हैं उन कारणों को दूर किये बिना वह दुःखों से मुक्ति चाहता है। उसकी बुद्धि यह सीधासादा कार्यकारण सम्बन्ध ही नहीं समझ रही है। तात्पर्य यह है कि अब सुख, शान्ति, समृद्धि, संस्कार आदि प्राप्त हो इस हेतु से प्रयास करने की पश्चिम में क्षमता ही नहीं रही है। वह दुर्बल हो गया है। इस स्थिति में अब भारत को ही मार्गदर्शन करने की, बचाने के कुछ उपाय करने की जिम्मेदारी लेनी होगी।
    
यह जिम्मेदारी निभा सके इस दृष्टि से भारत को समर्थ बनना होगा । यह सामर्थ्य सत्य और धर्म से प्राप्त होता है । सत्य और धर्म समाज में प्रतिष्ठित करने हेतु उत्तम साधन शिक्षा है यह सब जानते हैं अतः भारत को अपनी शिक्षाव्यवस्था का विचार जगत के कल्याण के सन्दर्भ में करना होगा, अपनी पद्धति से करना होगा।
 
यह जिम्मेदारी निभा सके इस दृष्टि से भारत को समर्थ बनना होगा । यह सामर्थ्य सत्य और धर्म से प्राप्त होता है । सत्य और धर्म समाज में प्रतिष्ठित करने हेतु उत्तम साधन शिक्षा है यह सब जानते हैं अतः भारत को अपनी शिक्षाव्यवस्था का विचार जगत के कल्याण के सन्दर्भ में करना होगा, अपनी पद्धति से करना होगा।
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=== भौतिकवाद ===
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== भौतिकवाद ==
यह सृष्टि जड और चेतन दोनों तत्त्व मिलकर बनी है। वह न तो केवल जड है न केवल चेतन । जो दिखाई देता है वह तो केवल जड ही है यह सत्य है। रूप परिवर्तन जड का ही होता है यह भी सत्य है । परन्तु सर्व प्रकार के रूप परिवर्तन का प्रेरक या कारक चेतन है यह बात पश्चिम की समझ में नहीं आती। यदि चेनत के अस्तित्व को ही नकारा जाता है तब जहाँ जहाँ जड है वहाँ वहाँ अनिवार्य रूप से चेतन रहता ही है यह भी समझमें नहीं आना स्वाभाविक है। चेतन के सार्वत्रिक अस्तित्व को नकारना ही वास्तव में भौतिकवाद है. वरना भौतिक भी सर्वत्र है ही । चेतन को नकारने के कारण अनेक प्रकार के प्रश्न निरुत्तरित रह जाते हैं। उदाहरण के लिये इस सृष्टि का सृजन क्यों हुआ इसका भी उत्तर नहीं मिल सकता । किसी एक भौतिक पदार्थ में बिना किसी कारण से स्फोट हुआ और सृष्टि में रूपान्तरण की प्रक्रिया शुरू हुई यह कहना तार्किक नहीं है । तार्किक तो यह होगा कि बिना द्वन्द्व के सष्टि में किसी प्रकार का सृजन नहीं हो सकता । तार्किकता इसमें भी है कि यह द्वन्द्व व्यक्त स्वरूप में आने से पूर्व भी एक ही सत्ता में निहित था । सृष्टि का सृजन शुरू होते ही वह व्यक्त हो गया, परन्तु व्यक्त होने के साथ भी वह द्वन्द्व रूप में सम्पृक्त ही था । उस एक में वह निहित था, अव्यक्त था, दो में व्यक्त होकर वह निहित न होकर सम्पृक्त था । बिना सम्पृक्त हुए, एकदूसरे से स्वतन्त्र और पृथक् रहते हुए वह सृष्टि के रूप में विस्तार को प्राप्त नहीं हो सकता था। अतः इस सृष्टि के आदि कारण परमात्मा में चेतन और जड निहित हैं, वे चेतन और जड के रूप में प्रथम व्यक्त होते हैं, व्यक्त होने के बाद सम्पृक्त होते हैं और सम्पृक्त होने के बाद असीम वैविध्यपूर्ण सृष्टि के रूप में व्यक्त होने की लगभग अनन्त प्रतीत होनेवाली परम्परा शुरू होती है । सृष्टि में जिस का रूप रूपान्तरण होता है वह जड है और जिसके कारण से रूपान्तरण होता है वह कारक तत्त्व चेतन है। चेतन का स्वयं का रूपान्तरण नहीं होता परन्तु बिना चेतन के जड का रूपान्तरण नहीं हो सकता । अतः इस विश्व को जड मानना, केवल भौतिक मानना युक्तिसंगत नहीं है।
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यह सृष्टि जड और चेतन दोनों तत्त्व मिलकर बनी है। वह न तो केवल जड है न केवल चेतन । जो दिखाई देता है वह तो केवल जड ही है यह सत्य है। रूप परिवर्तन जड का ही होता है यह भी सत्य है । परन्तु सर्व प्रकार के रूप परिवर्तन का प्रेरक या कारक चेतन है यह बात पश्चिम की समझ में नहीं आती। यदि चेनत के अस्तित्व को ही नकारा जाता है तब जहाँ जहाँ जड है वहाँ वहाँ अनिवार्य रूप से चेतन रहता ही है यह भी समझमें नहीं आना स्वाभाविक है। चेतन के सार्वत्रिक अस्तित्व को नकारना ही वास्तव में भौतिकवाद है, वरना भौतिक भी सर्वत्र है ही । चेतन को नकारने के कारण अनेक प्रकार के प्रश्न निरुत्तरित रह जाते हैं। उदाहरण के लिये इस सृष्टि का सृजन क्यों हुआ इसका भी उत्तर नहीं मिल सकता । किसी एक भौतिक पदार्थ में बिना किसी कारण से स्फोट हुआ और सृष्टि में रूपान्तरण की प्रक्रिया शुरू हुई यह कहना तार्किक नहीं है । तार्किक तो यह होगा कि बिना द्वन्द्व के सष्टि में किसी प्रकार का सृजन नहीं हो सकता । तार्किकता इसमें भी है कि यह द्वन्द्व व्यक्त स्वरूप में आने से पूर्व भी एक ही सत्ता में निहित था । सृष्टि का सृजन शुरू होते ही वह व्यक्त हो गया, परन्तु व्यक्त होने के साथ भी वह द्वन्द्व रूप में सम्पृक्त ही था । उस एक में वह निहित था, अव्यक्त था, दो में व्यक्त होकर वह निहित न होकर सम्पृक्त था । बिना सम्पृक्त हुए, एकदूसरे से स्वतन्त्र और पृथक् रहते हुए वह सृष्टि के रूप में विस्तार को प्राप्त नहीं हो सकता था। अतः इस सृष्टि के आदि कारण परमात्मा में चेतन और जड निहित हैं, वे चेतन और जड के रूप में प्रथम व्यक्त होते हैं, व्यक्त होने के बाद सम्पृक्त होते हैं और सम्पृक्त होने के बाद असीम वैविध्यपूर्ण सृष्टि के रूप में व्यक्त होने की लगभग अनन्त प्रतीत होनेवाली परम्परा शुरू होती है । सृष्टि में जिस का रूप रूपान्तरण होता है वह जड है और जिसके कारण से रूपान्तरण होता है वह कारक तत्त्व चेतन है। चेतन का स्वयं का रूपान्तरण नहीं होता परन्तु बिना चेतन के जड का रूपान्तरण नहीं हो सकता । अतः इस विश्व को जड मानना, केवल भौतिक मानना युक्तिसंगत नहीं है।
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विश्व को जड अर्थात् भौतिक मानने से व्यवहार में भी नहीं सुलझने वाली समस्यायें निर्माण होती हैं। उदाहरण के लिये चेतन आत्मतत्त्व है । आत्मतत्त्व में ही प्रेम, आनन्द, सौन्दर्यबोध, सृजनशीलता आदि गुणों का निवास है। आत्मा के ये सारे गुण शुद्ध चित्त में झलकते हैं । आत्मतत्त्व को नहीं माना तो ये सारे गुण वास्तव में अनाश्रित हो जाते हैं। उनका मूल अधिष्ठान नहीं रहने पर वे मन का आश्रय लेते हैं और आनन्द सुख का और सुख मनोरंजन का स्वरूप लेता है। मनोरंजन भी भौतिक पदार्थों का आश्रय लेता है। तब जितने भौतिक पदार्थ अधिक उतना ही सुख अधिक ऐसा हिसाब बन जाता है । सौन्दर्य भी रूप, रंग में समाहित हो जाता है। सारी कला इन्द्रियोपभोग के लिये हो जाती है। आत्मीयता शब्द ही आत्मा से बना है । जब आत्मा की संकल्पना नहीं रहती तब आत्मीयता भी नहीं रहती। उससे उद्भूत सेवा, त्याग, दान आदि का स्वरूप भी भौतिक हो जाता है, वे भी व्यवसाय बन जाते हैं । प्रेम की अभिव्यक्ति काम के रूप में होती है। अंग्रेजी भाषा में प्रेम के लिये 'लव' शब्द है। मैं प्रेम करता हूँ' कहने के लिये 'आई लव...' कहा जाता है परन्तु 'आई एम मेकिंग लव' भी कहा जाता है। अर्थात् प्रेम और काम के लिये एक ही संज्ञा है । अर्थात् प्रेम, आनन्द, त्याग, सेवा, सौन्दर्य आदि का स्वरूप भौतिक बन जाता है। यही नहीं मोक्ष की संकल्पना भी 'साल्वेशन' बन जाती है।
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विश्व को जड अर्थात् भौतिक मानने से व्यवहार में भी नहीं सुलझने वाली समस्यायें निर्माण होती हैं। उदाहरण के लिये चेतन आत्मतत्त्व है । आत्मतत्त्व में ही प्रेम, आनन्द, सौन्दर्यबोध, सृजनशीलता आदि गुणों का निवास है। आत्मा के ये सारे गुण शुद्ध चित्त में झलकते हैं । आत्मतत्त्व को नहीं माना तो ये सारे गुण वास्तव में अनाश्रित हो जाते हैं। उनका मूल अधिष्ठान नहीं रहने पर वे मन का आश्रय लेते हैं और आनन्द सुख का और सुख मनोरंजन का स्वरूप लेता है। मनोरंजन भी भौतिक पदार्थों का आश्रय लेता है। तब जितने भौतिक पदार्थ अधिक उतना ही सुख अधिक ऐसा हिसाब बन जाता है । सौन्दर्य भी रूप, रंग में समाहित हो जाता है। सारी कला इन्द्रियोपभोग के लिये हो जाती है। आत्मीयता शब्द ही आत्मा से बना है । जब आत्मा की संकल्पना नहीं रहती तब आत्मीयता भी नहीं रहती। उससे उद्भूत सेवा, त्याग, दान आदि का स्वरूप भी भौतिक हो जाता है, वे भी व्यवसाय बन जाते हैं । प्रेम की अभिव्यक्ति काम के रूप में होती है। अंग्रेजी भाषा में प्रेम के लिये 'लव' शब्द है। 'मैं प्रेम करता हूँ' कहने के लिये 'आई लव...' कहा जाता है परन्तु 'आई एम मेकिंग लव' भी कहा जाता है। अर्थात् प्रेम और काम के लिये एक ही संज्ञा है । अर्थात् प्रेम, आनन्द, त्याग, सेवा, सौन्दर्य आदि का स्वरूप भौतिक बन जाता है। यही नहीं मोक्ष की संकल्पना भी 'साल्वेशन' बन जाती है।
    
बौद्धिक और मानसिक जगत की सारी बातें भौतिकता के मापदण्डों से नापी जाती हैं । बौद्धिक और मानसिक स्तर के प्रश्नों, व्यवहारों और घटनाओं के खुलासे भौतिक स्तर पर होते हैं। हम अनुभव कर रहे हैं कि तनाव, उत्तेजना, हताशा जैसी नितान्त मानसिक, या मधुमेह, रक्तचाप जैसे मनोविकारजन्य या आहारविहार की अनियमितता या ऋतुपरिवर्तन से जन्य बिमारियों के उपचार भौतिक स्तर पर ही किये जाते हैं । अन्तःकरण से सम्बन्धित योग जैसे विषय का व्यवहार भौतिक स्वरूप में होता है, संगीत, कला, साहित्य आदि का यश भौतिक उपलब्धियों से नापा जाता है । मजेदार बात यह है कि विश्वविद्यालयों की उपलब्धियों में एक उपलब्धि छात्रों को कितने ऊँचे वेतन की नौकरियाँ मिलती हैं और विश्वविद्यालय के शोधकार्य से कितनी आमदनी होती है यह भी मानी जाती है। सर्वत्र, सर्वक्षेत्रों में गुणवत्ता भौतिकता पर ही आधारित है।
 
बौद्धिक और मानसिक जगत की सारी बातें भौतिकता के मापदण्डों से नापी जाती हैं । बौद्धिक और मानसिक स्तर के प्रश्नों, व्यवहारों और घटनाओं के खुलासे भौतिक स्तर पर होते हैं। हम अनुभव कर रहे हैं कि तनाव, उत्तेजना, हताशा जैसी नितान्त मानसिक, या मधुमेह, रक्तचाप जैसे मनोविकारजन्य या आहारविहार की अनियमितता या ऋतुपरिवर्तन से जन्य बिमारियों के उपचार भौतिक स्तर पर ही किये जाते हैं । अन्तःकरण से सम्बन्धित योग जैसे विषय का व्यवहार भौतिक स्वरूप में होता है, संगीत, कला, साहित्य आदि का यश भौतिक उपलब्धियों से नापा जाता है । मजेदार बात यह है कि विश्वविद्यालयों की उपलब्धियों में एक उपलब्धि छात्रों को कितने ऊँचे वेतन की नौकरियाँ मिलती हैं और विश्वविद्यालय के शोधकार्य से कितनी आमदनी होती है यह भी मानी जाती है। सर्वत्र, सर्वक्षेत्रों में गुणवत्ता भौतिकता पर ही आधारित है।

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