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श्रीमद्भगवद्गीता<ref>श्रीमद्भगवद्गीता 1-43</ref> में महायुद्ध के परिणामों को बताते समय अर्जुन ने कहा है -  <blockquote>उत्साद्यंते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: ।। 1-43 ।।</blockquote>गीता में अर्जुन ने कई बातें कहीं हैं जो ठीक नहीं थीं । कुछ बातें गलत होने के कारण भगवान ने अर्जुन को उलाहना दी है, डाँटा है, जैसे अध्याय २ श्लोक ३ में या अध्याय २ श्लोक ११ में। किन्तु अर्जुन के  उपर्युक्त कथन पर भगवान कुछ नहीं कहते । अर्थात् अर्जुन के  ‘जातिधर्म शाश्वत हैं’  इस कथन को मान्य करते हैं। जो शाश्वत है वह परमेश्वर निर्मित है। मीमांसा दर्शन के अनुसार भी ‘अनिषिध्दमनुमताम्’  अर्थात् जिसका निषेध नहीं किया गया उसकी अनुमति मानी जाती है। इसका यही अर्थ होता है कि जातिधर्म शाश्वत हैं। अर्जुन के  कथन का भगवान जब निषेध नहीं करते, इस का अर्थ है कि भगवान अर्जुन के ‘जातिधर्म (इस लिये जाति भी) शाश्वत हैं’ इस कथन को मान्य करते हैं।   
 
श्रीमद्भगवद्गीता<ref>श्रीमद्भगवद्गीता 1-43</ref> में महायुद्ध के परिणामों को बताते समय अर्जुन ने कहा है -  <blockquote>उत्साद्यंते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: ।। 1-43 ।।</blockquote>गीता में अर्जुन ने कई बातें कहीं हैं जो ठीक नहीं थीं । कुछ बातें गलत होने के कारण भगवान ने अर्जुन को उलाहना दी है, डाँटा है, जैसे अध्याय २ श्लोक ३ में या अध्याय २ श्लोक ११ में। किन्तु अर्जुन के  उपर्युक्त कथन पर भगवान कुछ नहीं कहते । अर्थात् अर्जुन के  ‘जातिधर्म शाश्वत हैं’  इस कथन को मान्य करते हैं। जो शाश्वत है वह परमेश्वर निर्मित है। मीमांसा दर्शन के अनुसार भी ‘अनिषिध्दमनुमताम्’  अर्थात् जिसका निषेध नहीं किया गया उसकी अनुमति मानी जाती है। इसका यही अर्थ होता है कि जातिधर्म शाश्वत हैं। अर्जुन के  कथन का भगवान जब निषेध नहीं करते, इस का अर्थ है कि भगवान अर्जुन के ‘जातिधर्म (इस लिये जाति भी) शाश्वत हैं’ इस कथन को मान्य करते हैं।   
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वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था ये दोनों हजारों वर्षों से भारतीय समाज में विद्यमान हैं। महाभारत काल ५००० वर्षों से अधिक पुराना है। भारतीय कालगणना के अनुसार त्रेता युग का रामायण काल तो शायद १७ लाख वर्ष पुराना (रामसेतु की आयु) है। इन दोनों में जातियों के संदर्भ हैं। अर्थात् वर्ण और जाति व्यवस्था दोनों बहुत प्राचीन हैं इसे तो जो रामायण और महाभरत के यहाँ बताए काल से सहमत नहीं हैं वे भी मान्य करेंगे। कई दश-सहस्राब्दियों के इस सामाजिक जीवन में हमने कई उतार चढाव देखें हैं। जैसे पतन के काल में जाति व्यवस्था थी उसी प्रकार उत्थान के समय भी थी । इस जाति व्यवस्था के होते हुए भी वह हजारों वर्षों तक ज्ञान और समृध्दि के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। उन्नत अवस्थाओं में भी जाति व्यवस्था का कभी अवरोध रहा ऐसा कहीं भी दूरदूर तक उल्लेख हमारे ३०० वर्षों से अधिक पुराने किसी भी भारतीय साहित्य में नहीं है। किसी भी भारतीय चिंतक ने इन व्यवस्थाओं को नकारा नहीं है।   
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वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था ये दोनों हजारों वर्षों से धार्मिक (भारतीय) समाज में विद्यमान हैं। महाभारत काल ५००० वर्षों से अधिक पुराना है। धार्मिक (भारतीय) कालगणना के अनुसार त्रेता युग का रामायण काल तो शायद १७ लाख वर्ष पुराना (रामसेतु की आयु) है। इन दोनों में जातियों के संदर्भ हैं। अर्थात् वर्ण और जाति व्यवस्था दोनों बहुत प्राचीन हैं इसे तो जो रामायण और महाभरत के यहाँ बताए काल से सहमत नहीं हैं वे भी मान्य करेंगे। कई दश-सहस्राब्दियों के इस सामाजिक जीवन में हमने कई उतार चढाव देखें हैं। जैसे पतन के काल में जाति व्यवस्था थी उसी प्रकार उत्थान के समय भी थी । इस जाति व्यवस्था के होते हुए भी वह हजारों वर्षों तक ज्ञान और समृध्दि के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। उन्नत अवस्थाओं में भी जाति व्यवस्था का कभी अवरोध रहा ऐसा कहीं भी दूरदूर तक उल्लेख हमारे ३०० वर्षों से अधिक पुराने किसी भी धार्मिक (भारतीय) साहित्य में नहीं है। किसी भी धार्मिक (भारतीय) चिंतक ने इन व्यवस्थाओं को नकारा नहीं है।   
    
== व्यावसायिक कुशलताओं के समायोजन (जाति व्यवस्था) के लाभ ==
 
== व्यावसायिक कुशलताओं के समायोजन (जाति व्यवस्था) के लाभ ==
जाति व्यवस्था के अनेकानेक लाभों की दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं का हम अब विचार करेंगे । परमात्मा ने सृष्टि निर्माण करते समय इसे संतुलन के साथ ही निर्माण किया है । समाज में इस संतुलन के लिये मनुष्य में उस प्रकार की वृत्तियाँ भीं निर्माण कीं । भारतीय हो या अभारतीय हर समाज में चार वर्णों के लोग होते ही हैं। समाज को नि:स्वार्थ भाव से समाजहित के लिये मार्गदर्शन करनेवाला एक वर्ग समाज में होता है । जिस समाज में नि:स्पृह, नि:स्वार्थी, समाजहित के लिये समर्पित भाव से ज्ञानार्जन और ज्ञानदान (बिक्री नहीं) करने वाला एक वर्ग प्रभावी होता है , वह समाज विश्व में श्रेष्ठ बन जाता है। इस वर्ग को ब्राह्मण कहा गया।  
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जाति व्यवस्था के अनेकानेक लाभों की दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं का हम अब विचार करेंगे । परमात्मा ने सृष्टि निर्माण करते समय इसे संतुलन के साथ ही निर्माण किया है । समाज में इस संतुलन के लिये मनुष्य में उस प्रकार की वृत्तियाँ भीं निर्माण कीं । धार्मिक (भारतीय) हो या अधार्मिक (अभारतीय) हर समाज में चार वर्णों के लोग होते ही हैं। समाज को नि:स्वार्थ भाव से समाजहित के लिये मार्गदर्शन करनेवाला एक वर्ग समाज में होता है । जिस समाज में नि:स्पृह, नि:स्वार्थी, समाजहित के लिये समर्पित भाव से ज्ञानार्जन और ज्ञानदान (बिक्री नहीं) करने वाला एक वर्ग प्रभावी होता है , वह समाज विश्व में श्रेष्ठ बन जाता है। इस वर्ग को ब्राह्मण कहा गया।  
    
समाज में जान की बाजी लगाकर भी दुष्टों, दुर्जनों और मूर्खों का नियंत्रण करनेवाला एक क्षत्रिय वर्ग, समाज का पोषण करने हेतु कृषि, गोरक्षण और व्यापार-उद्योग-उत्पादन करनेवाला वैश्य वर्ग और ऐसे सभी लोगों की सेवा करनेवाला शूद्र वर्ग ऐसे नाम दिये गये । इन चार वृत्तियों की हर समाज को आवश्यकता होती ही है । इन का समाज में अनुपात महत्वपूर्ण होता है । इस अनुपात के कारण समाज में संतुलन बना रहता है। यह अनुपात बिगडने से समाज व्याधिग्रस्त हो जाता है।  
 
समाज में जान की बाजी लगाकर भी दुष्टों, दुर्जनों और मूर्खों का नियंत्रण करनेवाला एक क्षत्रिय वर्ग, समाज का पोषण करने हेतु कृषि, गोरक्षण और व्यापार-उद्योग-उत्पादन करनेवाला वैश्य वर्ग और ऐसे सभी लोगों की सेवा करनेवाला शूद्र वर्ग ऐसे नाम दिये गये । इन चार वृत्तियों की हर समाज को आवश्यकता होती ही है । इन का समाज में अनुपात महत्वपूर्ण होता है । इस अनुपात के कारण समाज में संतुलन बना रहता है। यह अनुपात बिगडने से समाज व्याधिग्रस्त हो जाता है।  
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# व्यक्तिगत व्यवसाय का चयन जब होता है तब समाज में असंतुलन निर्माण होता है । अधिक लाभ और कम परिश्रम जिस व्यवसाय में है, उन का सभी लोग यथासंभव चयन करते हैं। किन्तु ऐसा करने से बेरोजगारी निर्माण होती है । समाज की कई आवश्यकताओं की पूर्ति खतरे में पड जाती है। वर्तमान का उदाहरण लें । वर्तमान शिक्षा और शासकीय नीतियों के कारण आज किसान नहीं चाहता की उसका बच्चा किसान बने । अन्य व्यावसायिकों का तो दूर रहा किसान भी नहीं चाहता की उस की बेटी किसान के घर की बहू बने । जाति और जातिधर्म की भावना नष्ट करने के कारण अन्न का उत्पादन करने को आज किसान अपना जातिधर्म नहीं मानता । इस के कारण हमारा देश अन्नसंकट की दिशा में तेजी से बढ रहा दिखाई दे रहा है।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय का चयन जब होता है तब समाज में असंतुलन निर्माण होता है । अधिक लाभ और कम परिश्रम जिस व्यवसाय में है, उन का सभी लोग यथासंभव चयन करते हैं। किन्तु ऐसा करने से बेरोजगारी निर्माण होती है । समाज की कई आवश्यकताओं की पूर्ति खतरे में पड जाती है। वर्तमान का उदाहरण लें । वर्तमान शिक्षा और शासकीय नीतियों के कारण आज किसान नहीं चाहता की उसका बच्चा किसान बने । अन्य व्यावसायिकों का तो दूर रहा किसान भी नहीं चाहता की उस की बेटी किसान के घर की बहू बने । जाति और जातिधर्म की भावना नष्ट करने के कारण अन्न का उत्पादन करने को आज किसान अपना जातिधर्म नहीं मानता । इस के कारण हमारा देश अन्नसंकट की दिशा में तेजी से बढ रहा दिखाई दे रहा है।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका या रोजगार की आश्वस्ति नहीं दी जा सकती । जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में यह आश्वस्ति जन्म से ही मिल जाती है।   
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका या रोजगार की आश्वस्ति नहीं दी जा सकती । जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में यह आश्वस्ति जन्म से ही मिल जाती है।   
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली जिन समाजों की अर्थव्यवस्था में मान्यता पाती है, वे समाज किसी ना किसी कमी के शिकार बनते हैं। इस कमी को पूरा करने के लिये उन के पास अन्य समाज पर आक्रमण कर, उस समाज का शोषण करने का एकमात्र उपाय शेष रह जाता है। ऐसे समाज आक्रमणकारी बन जाते हैं । विश्व में जो भी समाज बलवान बनें, उन्होंने अन्य समाजों पर आक्रमण किये, उन को लूटा, शोषित किया यह इतिहास का वास्तव है। केवल भारत ही इस में अपवाद है। और इस का सब से प्रबल कारण भारतीय वर्ण और जाति व्यवस्था रहा है। ये व्यवस्थाएँ आवश्यकताओं की पूर्ति की आश्वस्ति देती है।  
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# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली जिन समाजों की अर्थव्यवस्था में मान्यता पाती है, वे समाज किसी ना किसी कमी के शिकार बनते हैं। इस कमी को पूरा करने के लिये उन के पास अन्य समाज पर आक्रमण कर, उस समाज का शोषण करने का एकमात्र उपाय शेष रह जाता है। ऐसे समाज आक्रमणकारी बन जाते हैं । विश्व में जो भी समाज बलवान बनें, उन्होंने अन्य समाजों पर आक्रमण किये, उन को लूटा, शोषित किया यह इतिहास का वास्तव है। केवल भारत ही इस में अपवाद है। और इस का सब से प्रबल कारण धार्मिक (भारतीय) वर्ण और जाति व्यवस्था रहा है। ये व्यवस्थाएँ आवश्यकताओं की पूर्ति की आश्वस्ति देती है।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में हर पीढी में व्यवसाय बदलने के कारण हर पीढी को नये सिरे से कुशलताओं को सीखना होता है। इस से सामान्यत: कुशलताओं में पीढी दर पीढी कमी होने की संभावना होती है। जब की जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में कुशलताओं का पीढी दर पीढी विकास होने की संभावनाएँ बहुत अधिक होतीं हैं।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में हर पीढी में व्यवसाय बदलने के कारण हर पीढी को नये सिरे से कुशलताओं को सीखना होता है। इस से सामान्यत: कुशलताओं में पीढी दर पीढी कमी होने की संभावना होती है। जब की जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में कुशलताओं का पीढी दर पीढी विकास होने की संभावनाएँ बहुत अधिक होतीं हैं।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में कुशलताओं में पीढी दर पीढी कमी होने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय भी बढता जाता है। जबकि जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में कुशलताओं का पीढी दर पीढी विकास होने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग न्यूनतम होता जाता है। प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय नहीं होता। बचत होती है।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में कुशलताओं में पीढी दर पीढी कमी होने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय भी बढता जाता है। जबकि जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में कुशलताओं का पीढी दर पीढी विकास होने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग न्यूनतम होता जाता है। प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय नहीं होता। बचत होती है।  
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# जिस समाज की प्रजा ओजस्वी और तेजस्वी होती है वह समाज अन्यों से श्रेष्ठ होता है। जब स्त्री और पुरूष विवाह में कोइ बंधन नहीं रहता तब स्वैराचार पनपता है। हर सुन्दर लड़की की चाहत हर युवक को और हर सुन्दर और सुडौल युवक की चाहत हर लड़की को होती है। इसमें लडके और लड़की का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं भी बनता तब भी इस चाहत के कारण होनेवाले चिंतन के कारण दोनों के ब्रह्मचर्य की हानि तो होती ही है। संयम के लिए कुछ मात्रा में लोकलाज ही बंधन रह जाता है। वर्त्तमान के मुक्त वातावरण के कारण लडकों और लड़कियों के सम्बन्ध भी मुक्त होने लग गए हैं। ब्रह्मचर्य पालन यह मजाक का विषय बन गया है। लेकिन जब विवाहों को जातियों का बंधन होता है तो युवक और युवातियों की दिलफेंकू वृत्ती को लगाम लग जाती है। इससे युवा वर्ग शारीरिक और मानसिक दृष्टी से अधिक संयमी बनाता है। समाज का स्वास्थ्य सुधरता है। समाज सुसंस्कृत बनता है।  
 
# जिस समाज की प्रजा ओजस्वी और तेजस्वी होती है वह समाज अन्यों से श्रेष्ठ होता है। जब स्त्री और पुरूष विवाह में कोइ बंधन नहीं रहता तब स्वैराचार पनपता है। हर सुन्दर लड़की की चाहत हर युवक को और हर सुन्दर और सुडौल युवक की चाहत हर लड़की को होती है। इसमें लडके और लड़की का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं भी बनता तब भी इस चाहत के कारण होनेवाले चिंतन के कारण दोनों के ब्रह्मचर्य की हानि तो होती ही है। संयम के लिए कुछ मात्रा में लोकलाज ही बंधन रह जाता है। वर्त्तमान के मुक्त वातावरण के कारण लडकों और लड़कियों के सम्बन्ध भी मुक्त होने लग गए हैं। ब्रह्मचर्य पालन यह मजाक का विषय बन गया है। लेकिन जब विवाहों को जातियों का बंधन होता है तो युवक और युवातियों की दिलफेंकू वृत्ती को लगाम लग जाती है। इससे युवा वर्ग शारीरिक और मानसिक दृष्टी से अधिक संयमी बनाता है। समाज का स्वास्थ्य सुधरता है। समाज सुसंस्कृत बनता है।  
 
# भारत अब भी भारत है, इस का एकमात्र कारण है कि भारत में हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। लगभग ३०० वर्षों के मुस्लिम और १९० वर्षों के अंग्रेजी शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है, इस का एक  कारण है, हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था।  
 
# भारत अब भी भारत है, इस का एकमात्र कारण है कि भारत में हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। लगभग ३०० वर्षों के मुस्लिम और १९० वर्षों के अंग्रेजी शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है, इस का एक  कारण है, हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था।  
<blockquote>धर्मपालजी लिखते हैं<ref>धर्मपाल, ‘भारत का पुनर्बोंध’ पृष्ठ क्र. 14 </ref>, "‘अंग्रेजों के लिये जाति एक  बडा प्रश्न था। … इसलिये नहीं कि वे जातिरहित या वर्गव्यवस्था के अभाववाली पद्दति में मानते थे, किन्तु इसलिये कि यह जाति व्यवस्था उन के भारतीय समाज को तोडने के कार्य में विघ्नस्वरूप थी"।</blockquote>
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<blockquote>धर्मपालजी लिखते हैं<ref>धर्मपाल, ‘भारत का पुनर्बोंध’ पृष्ठ क्र. 14 </ref>, "‘अंग्रेजों के लिये जाति एक  बडा प्रश्न था। … इसलिये नहीं कि वे जातिरहित या वर्गव्यवस्था के अभाववाली पद्दति में मानते थे, किन्तु इसलिये कि यह जाति व्यवस्था उन के धार्मिक (भारतीय) समाज को तोडने के कार्य में विघ्नस्वरूप थी"।</blockquote>
 
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<li>भारत के अलावा अन्य किसी भी देश में जब मुस्लिम शासन रहा उसने २५-५० वर्षों में स्थानीय समाज को पूरा का पूरा मुसलमान बना दिया था । ५०० वर्षों के मुस्लिम शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था इस का मुख्य कारण है। जाति व्यवस्था के ढेर सारे लाभ हैं । काल के प्रवाह में जाति व्यवस्था में दोष भी निर्माण हुए हैं। उन्हें दूर करना ही होगा। इस के ढेर सारे लाभ दुर्लक्षित नहीं किये जा सकते।
 
<li>भारत के अलावा अन्य किसी भी देश में जब मुस्लिम शासन रहा उसने २५-५० वर्षों में स्थानीय समाज को पूरा का पूरा मुसलमान बना दिया था । ५०० वर्षों के मुस्लिम शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था इस का मुख्य कारण है। जाति व्यवस्था के ढेर सारे लाभ हैं । काल के प्रवाह में जाति व्यवस्था में दोष भी निर्माण हुए हैं। उन्हें दूर करना ही होगा। इस के ढेर सारे लाभ दुर्लक्षित नहीं किये जा सकते।
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डॉ श्रीधर व्यंकटेश केतकर लिखते हैं<ref>भारतीय समाजशास्त्र (वरदा प्रकाशन, सेनापति बापट मार्ग, पुणे 16) पृष्ठ 142</ref> - ब्राह्मणांचा सर्वत्र प्रचार होण्यापूर्वी समाजाला असे स्वरूप होते कि प्रत्येक जातीत चातुरर््वण्य होते म्हणजे शेतकरी, पुजारी, व्यापारी, आणि सेवक वर्ग होते'। अर्थात् ब्राह्मणों का सर्वत्र प्रचार होने से पूर्व प्रत्येक जाति में किसान, पुजारी, व्यापारी और सेवक ऐसे चार वर्ण थे।   
 
डॉ श्रीधर व्यंकटेश केतकर लिखते हैं<ref>भारतीय समाजशास्त्र (वरदा प्रकाशन, सेनापति बापट मार्ग, पुणे 16) पृष्ठ 142</ref> - ब्राह्मणांचा सर्वत्र प्रचार होण्यापूर्वी समाजाला असे स्वरूप होते कि प्रत्येक जातीत चातुरर््वण्य होते म्हणजे शेतकरी, पुजारी, व्यापारी, आणि सेवक वर्ग होते'। अर्थात् ब्राह्मणों का सर्वत्र प्रचार होने से पूर्व प्रत्येक जाति में किसान, पुजारी, व्यापारी और सेवक ऐसे चार वर्ण थे।   
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ऐसा कहते हैं कि १९११ की जन-गणना तक भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह जातियाँ ही नहीं थीं। जातियाँ तो थीं। लेकिन उन्हे वर्ण से जोडा हुआ नहीं था। हर जाति में चारों वर्णों के बच्चे पैदा होते थे और अपने जन्मगत स्वभाव (वर्ण) के अनुसार अपने परिवार के काम में सहायक बनते थे। इस जन-गणना में अंग्रेजों ने जतियों को वर्णों में बाँटा। कई जातियों ने उन का वर्गीकरण किस वर्ण में करना चाहिये इस के लिये जन-गणना अधिकारियों और अंग्रेज सरकार के साथ चर्चाएँ कीं तथा छुटपुट आंदोलन भी चलाये थे। तब से पूरी जाति ही किसी वर्ण की कहलाई जाने लग गयी थी। यह तो भारतीय वर्ण की मान्यता से पूर्णत: भिन्न व्यवस्था थी। अप्राकृतिक थी। अस्वीकार्य थी। किंतु इस विषय को संवेदनशील बना देने के कारण इस विषय पर कोई बहस होती है तो जाति व्यवस्था को गालियाँ देने के लिये ही होती है। जाति व्यवस्था के तत्त्व को या मर्म को समझने के लिये नहीं होती। इस कारण से जातियों का चार वर्णों में बँट जाना यह बात पिछली ५ पीढियों में सर्वमान्य बन गयी है। वास्तव में तो वर्ण की वास्तविक कल्पना के अनुसार शूद्र जाति होती ही नहीं है। पशू हत्या से जुडे कर्मों के कारण या अन्य कुछ कारणों से हो, कुछ जातियाँ अछूत कहलाईं। कितु वे शूद्र जातियाँ नहीं थीं। हर जाति में सेवक का काम करने वाले लोग शूद्र वर्ण के ही माने जाते थे। इन शूद्रों में कुछ तो जन्म से ही शूद्र के गुण-कर्म लेकर आते हैं इस लिये शूद्र होते हैं तो दूसरे मनुस्मृति में कहे अनुसार अपने कर्मों से शूद्र बन जाते हैं तो तीसरे कुछ लोग परिस्थिति के कारण शूद्र (सेवक कर्म) करने के लिये बाध्य हो जाते हैं। हालाँकि समाज के त्रिवर्ण का कोई शूद्र (सेवक) कर्म करने को बाध्य हो जाये, यह नहीं तो उस व्यक्ति के और ना ही समाज के हित में होता है।   
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ऐसा कहते हैं कि १९११ की जन-गणना तक भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह जातियाँ ही नहीं थीं। जातियाँ तो थीं। लेकिन उन्हे वर्ण से जोडा हुआ नहीं था। हर जाति में चारों वर्णों के बच्चे पैदा होते थे और अपने जन्मगत स्वभाव (वर्ण) के अनुसार अपने परिवार के काम में सहायक बनते थे। इस जन-गणना में अंग्रेजों ने जतियों को वर्णों में बाँटा। कई जातियों ने उन का वर्गीकरण किस वर्ण में करना चाहिये इस के लिये जन-गणना अधिकारियों और अंग्रेज सरकार के साथ चर्चाएँ कीं तथा छुटपुट आंदोलन भी चलाये थे। तब से पूरी जाति ही किसी वर्ण की कहलाई जाने लग गयी थी। यह तो धार्मिक (भारतीय) वर्ण की मान्यता से पूर्णत: भिन्न व्यवस्था थी। अप्राकृतिक थी। अस्वीकार्य थी। किंतु इस विषय को संवेदनशील बना देने के कारण इस विषय पर कोई बहस होती है तो जाति व्यवस्था को गालियाँ देने के लिये ही होती है। जाति व्यवस्था के तत्त्व को या मर्म को समझने के लिये नहीं होती। इस कारण से जातियों का चार वर्णों में बँट जाना यह बात पिछली ५ पीढियों में सर्वमान्य बन गयी है। वास्तव में तो वर्ण की वास्तविक कल्पना के अनुसार शूद्र जाति होती ही नहीं है। पशू हत्या से जुडे कर्मों के कारण या अन्य कुछ कारणों से हो, कुछ जातियाँ अछूत कहलाईं। कितु वे शूद्र जातियाँ नहीं थीं। हर जाति में सेवक का काम करने वाले लोग शूद्र वर्ण के ही माने जाते थे। इन शूद्रों में कुछ तो जन्म से ही शूद्र के गुण-कर्म लेकर आते हैं इस लिये शूद्र होते हैं तो दूसरे मनुस्मृति में कहे अनुसार अपने कर्मों से शूद्र बन जाते हैं तो तीसरे कुछ लोग परिस्थिति के कारण शूद्र (सेवक कर्म) करने के लिये बाध्य हो जाते हैं। हालाँकि समाज के त्रिवर्ण का कोई शूद्र (सेवक) कर्म करने को बाध्य हो जाये, यह नहीं तो उस व्यक्ति के और ना ही समाज के हित में होता है।   
    
भारत के इतिहास में कई बार ब्राह्मण जाति का मनुष्य राजा बना। सम्राट यशोधर्मा, पुष्यमित्र आदि ब्राह्मण जाति के ही तो थे। शूद्र राजा भी कई हुए है। ये सब उन जातियों के क्षत्रिय वर्ण के लोग ही थे। क्षत्रिय राजा मनु द्वारा प्रस्तुत की गई 'मनुस्मृति’ हजारों वर्षों तक भारत में सबसे अधिक मान्यता प्राप्त स्मृति रही है। क्या मनु का ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है? इसी तरह क्या बाबासाहब अंबेडकर को ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है?   
 
भारत के इतिहास में कई बार ब्राह्मण जाति का मनुष्य राजा बना। सम्राट यशोधर्मा, पुष्यमित्र आदि ब्राह्मण जाति के ही तो थे। शूद्र राजा भी कई हुए है। ये सब उन जातियों के क्षत्रिय वर्ण के लोग ही थे। क्षत्रिय राजा मनु द्वारा प्रस्तुत की गई 'मनुस्मृति’ हजारों वर्षों तक भारत में सबसे अधिक मान्यता प्राप्त स्मृति रही है। क्या मनु का ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है? इसी तरह क्या बाबासाहब अंबेडकर को ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है?   
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कुछ लोगों की पक्की धारणा है कि जाति व्यवस्था मूलत: ही दोषपूर्ण थी। इन में जो विचारशील लोग हैं उन्हें समझाना होगा। और नयी व्यवस्था के पक्ष में लाना होगा। जो लोग समझते हैं कि जाति व्यवस्था कभी ठीक रही होगी। लेकिन वर्तमान में तो यह अप्रासंगिक हो गई है। ऐसे लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वर्तमान जाति व्यवस्था को तोडने से पहले वे एक सशक्त वैकल्पिक व्यवस्था की प्रस्तुति करें। वैकल्पिक व्यवस्था के प्रयोग कर यह सिध्द करें कि उन के द्वारा प्रस्तुत की हुई व्यवस्था वर्तमान जाति व्यवस्थाओं के सभी लाभों को बनाए रखते हुए इस के दोषों का निवारण करती है। ऐसी परिस्थिति में उन के द्वारा प्रस्तुत व्यवस्था का स्वीकार करना हर्ष की ही बात होगी। किंतु ऐसी किसी वैकल्पिक व्यवस्था की योजना के बगैर ही वर्तमान व्यवस्था को तोडने के प्रयास को बुध्दिमानी नहीं कहा जा सकता। ऐसा विकल्प जबतक नहीं मिल जाता, वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखते हुए उस के दोषों का निवारण करने के प्रयास करने होंगे।  
 
कुछ लोगों की पक्की धारणा है कि जाति व्यवस्था मूलत: ही दोषपूर्ण थी। इन में जो विचारशील लोग हैं उन्हें समझाना होगा। और नयी व्यवस्था के पक्ष में लाना होगा। जो लोग समझते हैं कि जाति व्यवस्था कभी ठीक रही होगी। लेकिन वर्तमान में तो यह अप्रासंगिक हो गई है। ऐसे लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वर्तमान जाति व्यवस्था को तोडने से पहले वे एक सशक्त वैकल्पिक व्यवस्था की प्रस्तुति करें। वैकल्पिक व्यवस्था के प्रयोग कर यह सिध्द करें कि उन के द्वारा प्रस्तुत की हुई व्यवस्था वर्तमान जाति व्यवस्थाओं के सभी लाभों को बनाए रखते हुए इस के दोषों का निवारण करती है। ऐसी परिस्थिति में उन के द्वारा प्रस्तुत व्यवस्था का स्वीकार करना हर्ष की ही बात होगी। किंतु ऐसी किसी वैकल्पिक व्यवस्था की योजना के बगैर ही वर्तमान व्यवस्था को तोडने के प्रयास को बुध्दिमानी नहीं कहा जा सकता। ऐसा विकल्प जबतक नहीं मिल जाता, वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखते हुए उस के दोषों का निवारण करने के प्रयास करने होंगे।  
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जिन्हें शास्त्र के अनुसार व्यवहार नही करना है उन का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में दिया है<ref>श्रीमद्भगवद्गीता 16-23 </ref>: <blockquote>य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ॥</blockquote><blockquote>न स सिध्दिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ 16-23॥  </blockquote><blockquote>अर्थात् ऐसे लोगों को न सुख मिलता है न कोई सिध्दी प्राप्त होती है अर्थात् कोई ना तो ऐहिक लाभ मिलते हैं और ना ही कोई पारलौकिक ही । </blockquote>ऐसे लोगों को उन के हालपर छोड देना ही ठीक रहेगा । किन्तु जहाँ तत्वबोध की संभावनाएँ हैं वाद-संवाद तो करना होगा । विवाद और वितंडा वाद को टालकर ही आगे बढना होगा। एक और अत्यंत महत्व की बात की ओर भी ध्यान देना होगा। वर्ण और जाति यह व्यवस्थाएँ  कितनी भी उपयुक्त  समझमें आती होगी, जबतक जीवन का वर्तमान प्रतिमान (Paradigm), जो पूरी तरह से अभारतीय बन गया है, इसे जडसे बदलकर जीवन के भारतीय प्रतिमान के एक अंग की तरह वर्ण और जाति व्यवस्थाओं को प्रतिष्ठित नहीं करते तब तक अलग से वर्ण और जाति व्यवस्थाओं को प्रतिष्ठित नहीं कर सकते।  
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जिन्हें शास्त्र के अनुसार व्यवहार नही करना है उन का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में दिया है<ref>श्रीमद्भगवद्गीता 16-23 </ref>: <blockquote>य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ॥</blockquote><blockquote>न स सिध्दिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ 16-23॥  </blockquote><blockquote>अर्थात् ऐसे लोगों को न सुख मिलता है न कोई सिध्दी प्राप्त होती है अर्थात् कोई ना तो ऐहिक लाभ मिलते हैं और ना ही कोई पारलौकिक ही । </blockquote>ऐसे लोगों को उन के हालपर छोड देना ही ठीक रहेगा । किन्तु जहाँ तत्वबोध की संभावनाएँ हैं वाद-संवाद तो करना होगा । विवाद और वितंडा वाद को टालकर ही आगे बढना होगा। एक और अत्यंत महत्व की बात की ओर भी ध्यान देना होगा। वर्ण और जाति यह व्यवस्थाएँ  कितनी भी उपयुक्त  समझमें आती होगी, जबतक जीवन का वर्तमान प्रतिमान (Paradigm), जो पूरी तरह से अधार्मिक (अभारतीय) बन गया है, इसे जडसे बदलकर जीवन के धार्मिक (भारतीय) प्रतिमान के एक अंग की तरह वर्ण और जाति व्यवस्थाओं को प्रतिष्ठित नहीं करते तब तक अलग से वर्ण और जाति व्यवस्थाओं को प्रतिष्ठित नहीं कर सकते।  
    
==References==
 
==References==

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