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४... बातबात में दवाई खाने की आदत एक और कारण है । खाँसी, जुकाम, साधारण सा बुखार, सरदर्द, पेटर्द्द आदि में दवाई खाना, डॉक्टर के पास जाना, मूल कारण को नष्ट नहीं करना शरीर पर भारी विपरीत परिणाम करता है । बिमारी तो दूर होती नहीं उल्टे शरीर की रोगप्रतिकारक शक्ति कम हो जाती है । छोटे मोटे कारणों से होने वाली इन छोटी मोटी बिमारियों के उपचार भी घर में होते हैं जो सस्ते, सुलभ, प्राकृतिक और शरीर के अनुकूल होते हैं । इनके विषय में ज्ञान और आस्था दोनों का अभाव होता है इसलिये हम संकट मोल लेते हैं ।
४... बातबात में दवाई खाने की आदत एक और कारण है । खाँसी, जुकाम, साधारण सा बुखार, सरदर्द, पेटर्द्द आदि में दवाई खाना, डॉक्टर के पास जाना, मूल कारण को नष्ट नहीं करना शरीर पर भारी विपरीत परिणाम करता है । बिमारी तो दूर होती नहीं उल्टे शरीर की रोगप्रतिकारक शक्ति कम हो जाती है । छोटे मोटे कारणों से होने वाली इन छोटी मोटी बिमारियों के उपचार भी घर में होते हैं जो सस्ते, सुलभ, प्राकृतिक और शरीर के अनुकूल होते हैं । इनके विषय में ज्ञान और आस्था दोनों का अभाव होता है इसलिये हम संकट मोल लेते हैं ।
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५... अनुचित आहारविहार का सबसे पहला विपरीत
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५... अनुचित आहारविहार का सबसे पहला विपरीत परिणाम शरीर पर होता है और दुर्बल और रोगी शरीर का परिणाम मन और बुद्धि पर होता है । साथ ही इससे उल्टा भी सत्य है मन का प्रभाव शरीर पर होता है । अब तो यह स्वीकृत होने लगा है कि रक्तचाप, डायाबीटीज, अम्लपित्त जैसी बिमारियाँ मन में जन्मती हैं और शरीर में प्रकट होती हैं । बच्चों में छोटी आयु से ही भय, तनाव, निराशा, हताशा आदि निर्माण होते हैं जिनका उनके शरीर-स्वास्थ्य पर विपरीत परिणाम होता है। ईर्ष्या, ट्रेष, आसक्ति, लालच आदि मनोविकार भी शारीरिक विकारों को जन्म देते हैं ।
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परिणाम शरीर पर होता है और दुर्बल और रोगी शरीर
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==== विद्यालय क्या करे ====
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विद्यालय को यह बात गम्भीरतापूर्वक लेनी चाहिये । शरीर स्वस्थ और बलवान बनाने हेतु परिणामकारी उपाय करने को प्रधानता देनी चाहिये । कुछ इस प्रकार की बातें हो सकती हैं...
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का परिणाम मन और बुद्धि पर होता है । साथ ही इससे
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१, विद्यालय में आरोग्यशास््र को महत्त्व देना चाहिये । शरीरविज्ञान, आरोग्यशास्त्र, आहारशास्त्र, हस्तोद्योग, शारीरिक शिक्षा आदि विषयों का समूह शरीर से सम्बन्धित है । इनका सार्थक नियोजन होने की आवश्यकता है। ये सारे विषय सैद्धान्तिक और प्रायोगिक दोनों प्रकार से होने चाहिये ।
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seal भी सत्य है मन का प्रभाव शरीर पर होता है ।
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अब तो यह स्वीकृत होने लगा है कि रक्तचाप,
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डायाबीटीज, अम्लपित्त जैसी बिमारियाँ मन में जन्मती
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हैं और शरीर में प्रकट होती हैं । बच्चों में छोटी आयु से
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ही भय, तनाव, निराशा, हताशा आदि निर्माण होते हैं
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जिनका उनके शरीर-स्वास्थ्य पर विपरीत परिणाम
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होता है। ईर्ष्या, ट्रेष, आसक्ति, लालच आदि
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मनोविकार भी शारीरिक विकारों को जन्म देते हैं ।
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विद्यालय क्या करे
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विद्यालय को यह बात गम्भीरतापूर्वक लेनी चाहिये ।
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शरीर स्वस्थ और बलवान बनाने हेतु परिणामकारी उपाय
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करने को प्रधानता देनी चाहिये । कुछ इस प्रकार की बातें
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हो सकती हैं...
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१, विद्यालय में आरोग्यशास््र को महत्त्व देना चाहिये ।
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पर्व २ : विद्यार्थी, शिक्षक, विद्यालय, परिवार
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शरीरविज्ञान, आरोग्यशास्त्र, आहारशास्त्र, हस्तोद्योग,
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शारीरिक शिक्षा आदि विषयों का समूह शरीर से
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सम्बन्धित है । इनका सार्थक नियोजन होने की
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आवश्यकता है। ये सारे विषय सैद्धान्तिक और
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प्रायोगिक दोनों प्रकार से होने चाहिये ।
जिनका जन्म सिझेरीयन ऑपरेशन से नहीं हुआ है
जिनका जन्म सिझेरीयन ऑपरेशन से नहीं हुआ है