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{{One source|date=October 2019}}
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स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि समस्त ज्ञान हमारे अन्दर ही होता है, शिक्षा से इसका अनावरण होता है । श्रीमद्भागवद्गीता भी कहती है:<blockquote>अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।5.15।।</blockquote>अर्थात ज्ञान अज्ञान से आवृत होता है इसलिए मनुष्य दिग्श्रमित होते हैं ।
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स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि समस्त ज्ञान हमारे अन्दर ही होता है, शिक्षा से इसका अनावरण होता है<ref>श्रीमद् भगवद्गीता 5.15</ref>।
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अज्ञान का आवरण दूर कर अन्दर के ज्ञान को प्रकट करने हेतु सहायता करने वाले साधन मनुष्य को जन्मजात मिले हुए हैं । उन्हें ही ज्ञानार्जन के करण कहते हैं। इन करणों के जो कार्य हैं वे ही ज्ञानार्जन की प्रक्रिया है । ज्ञाना्जन के करण और उनके कार्य इस प्रकार हैं ...
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श्रीमद्भागवद्गीता भी कहती है<ref>भारतीय शिक्षा : संकल्पना एवं स्वरूप (भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला १), प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे</ref>:<blockquote>अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।5.15।।</blockquote>अर्थात ज्ञान अज्ञान से आवृत होता है इसलिए मनुष्य दिग्श्रमित होते हैं ।
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कर्मन्द्रियाँ का कार्य क्रिया करना
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अज्ञान का आवरण दूर कर अन्दर के ज्ञान को प्रकट करने हेतु सहायता करने वाले साधन मनुष्य को जन्मजात मिले हुए हैं । उन्हें ही ज्ञानार्जन के करण कहते हैं। इन करणों के जो कार्य हैं वे ही ज्ञानार्जन की प्रक्रिया है । ज्ञानार्जन के करण और उनके कार्य इस प्रकार हैं:
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* कर्मन्द्रियों का कार्य क्रिया करना
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ज्ञानेन्ट्रियों का कार्य संवेदनों का अनुभव करना
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* ज्ञानेन्द्रियों का कार्य संवेदनों का अनुभव करना
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* मन का कार्य विचार करना और भावना का अनुभव करना
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मन का कार्य विचार करना और भावना का अनुभव
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* बुद्धि का कार्य विवेक करना
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* अहंकार का कार्य निर्णय करना
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करना
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* चित्त का कार्य संस्कारों को ग्रहण करना
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इन सबके परिणामस्वरूप ज्ञान का उदय होता है अर्थात आत्मस्वरूप ज्ञान प्रकट होता है अर्थात अनावृत होता है । हम इन सब क्रियाओं को क्रमश: समझने का प्रयास करेंगे ।
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बुद्धि का कार्य विवेक करना
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अहंकार का कार्य निर्णय करना
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चित्त का कार्य संस्कारों को ग्रहण करना
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इन सबके परिणामस्वरूप ज्ञान का उदय होता है
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अर्थात आत्मस्वरूप ज्ञान प्रकट होता है अर्थात अनावृत
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होता है ।
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हम इन सब क्रियाओं को क्रमश: समझने का प्रयास
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करेंगे ।
== क्रिया ==
== क्रिया ==
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कर्मन्द्रियाँ क्रिया करती हैं। पाँच में से हम तीन
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कर्मन्द्रियाँ क्रिया करती हैं। पाँच में से हम तीन कर्मन्द्रियों की बात करेंगे । ये हैं हाथ, पैर और वाक् अथवा वाणी। हाथ पकड़ने का, पैर गति करने का और वाक् बोलने का काम करती हैं । कर्मन्द्रियाँ अपना काम ठीक करें इसका क्या अर्थ है?
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कर्मन्द्रियों की बात करेंगे । ये हैं हाथ, पैर और as
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अच्छी क्रिया के तीन आयाम हैं । एक है कौशल, दूसरा है गति और तीसरा है निपुणता । हाथ वस्तु को पकड़ते हैं, दबाते हैं, फेंकते हैं, झेलते है, उछालते हैं । पकड़ने का काम एक उँगली और अंगूठे से, दो ऊँगलिया और अंगूठे से, चारों उँगलियाँ और अंगूठे से, मुट्ठी से होता है । पकड़ने में कुशलता चाहिए अर्थात ऊँगलियों और अंगूठे की स्थिति ठीक बनानी चाहिए । कई बार हम देखते हैं कि लिखने वाला पेंसिल ही ठीक नहीं पकड़ता है । उँगलियों की या मुट्ठी की स्थिति ही ठीक नहीं बनी है । लिखते समय केवल उँगलियाँ ही नहीं तो कलाई और कोहनी तक के हाथ की स्थिति ठीक नहीं बनी है । उँगलियाँ गूँथती हैं । उनकी सलाई पकड़ने की स्थिति ठीक नहीं बनती है। हाथों से कपड़ों या कागज की तह की जाती है । तब दोनों हाथों से कपड़ा या कागज पकड़ने की और उसे चलाने की स्थिति ठीक नहीं बनती है ।
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अथवा वाणी । हाथ पकड़ने का, पैर गति करने का और
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वाक बोलने का काम करती हैं ।
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उसी प्रकार से पैर खड़े रहकर शरीर का भार उठाते हैं। तब दोनों पैरों की सीधे खड़े रहने की, पैरों के तलवे की स्थिति ठीक नहीं बनती है । चलते हैं तब पैर उठाकर आगे रखने की स्थिति ठीक नहीं बनती है । व्यक्ति बोलता है तब बोलने में जो अवयव काम में आते हैं उनकी स्थिति ठीक नहीं बनती है । इस कारण से उच्चार ठीक नहीं होते, अक्षर सुन्दर नहीं बनते, चला ठीक नहीं जाता । क्रिया ठीक नहीं होती । आगे चित्र बनाने का, आकृति में रंग भरने का, मंत्र या गीत का गान करने का, छलांग लगाने का, दौड़ने का आदि काम भी ठीक से नहीं होते । कारीगरी के काम ठीक से नहीं होते क्योंकि साधन पकड़ने की स्थिति ठीक नहीं होती । दो हाथ जोड़कर, दृंडवत होकर प्रणाम करना, यज्ञ में आहुती देना, मालिश करना, गाँठ लगाना, आटा गुंधना, मिट्टी को आकार देना आदि असंख्य काम ठीक से नहीं होते । कर्मेन्द्रियों की स्थितियाँ दीवार में इँटों जैसी हैं । इंटें यदि ठीक नहीं बनी हैं तो दीवार ठीक नहीं बनती । दीवार ठीक नहीं बनती तो भवन भी ठीक नहीं बनता । अत: कर्मन्द्रियों की स्थिति ठीक बनाना प्रथम आवश्यकता है । स्थितियाँ ठीक बनाने के लिए अच्छे प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है । बारीकी से निरीक्षण कर छोटी से छोटी बात भी ठीक करनी होती है । ऐसा नहीं किया तो इंद्रियों की स्थिति में एक अवधि के बाद अनेक प्रयास करने पर भी सुधार नहीं होता है । इन स्थितियों के भी संस्कार बन जाते हैं । प्रारंभ में, छोटी आयु में एक बार संस्कार हो गए तो बाद में सुधार लगभग असम्भव हो जाते हैं । यही कारण है कि हम देखते हैं कि वर्णमाला के स्वरों और व्यंजनों के उच्चारणों की अनेक अशुद्धियाँ होती हैं और वे बड़ी आयु में ठीक नहीं होतीं । अक्षरों की बनावट ठीक नहीं होती और लेख सुन्दर या सही नहीं बनता । संगीत बेसुरा होता है । यज्ञ में आहुति डालना नहीं आता । प्रणाम करना नहीं आता । ये तो बहुत छोटी बातें हैं परंतु आगे चलकर भाषण और संभाषण ठीक नहीं होता, कारीगरी और कला ठीक नहीं अवगत होती, वस्तुयें ठीक नहीं रखी दूसरा आयाम है गति का । गति अभ्यास से बढ़ती है। पातंजल योगसूत्र अभ्यास को परिभाषित करते हुए कहते हैं:जातीं, वे खराब होती हैं आदि व्यवहार की अनेक कठिनाइयाँ निर्माण होती हैं ।<blockquote>तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः <ref>पतंजलि रचित योग सूत्र - 1.13 </ref>। 1.13 ।। </blockquote>और
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स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः || 1.14 ||
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कर्मन्द्रियाँ अपना काम ठीक करें इसका क्या अर्थ
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है?
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अच्छी क्रिया के तीन आयाम हैं । एक है कौशल,
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दूसरा है गति और तीसरा है निपुणता ।
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हाथ वस्तु को पकड़ते हैं, दबाते हैं, फेंकते हैं, झेलते
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है, उछालते हैं । पकड़ने का काम एक उँगली और अंगूठे
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से, दो ऊँगलिया और अंगूठे से, चारों उँगलियाँ और अंगूठे
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से, मुट्ठी से होता है । पकड़ने में कुशलता चाहिए अर्थात
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ऊँगलियों और अंगूठे की स्थिति ठीक बनानी चाहिए । कई
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बार हम देखते हैं कि लिखने वाला पेंसिल ही ठीक नहीं
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पकड़ता है । उँगलियों की या मुट्ठी की स्थिति ही ठीक नहीं
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बनी है । लिखते समय केवल उँगलियाँ ही नहीं तो कलाई
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और कोहनी तक के हाथ की स्थिति ठीक नहीं बनी है ।
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उँगलियाँ गूँथती हैं । उनकी सलाई पकड़ने की स्थिति ठीक
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नहीं बनती है । हाथों से कपड़ों या कागज की तह की
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जाती है । तब दोनों हाथों से कपड़ा या कागज पकड़ने की
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और उसे चलाने की स्थिति ठीक नहीं बनती है ।
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उसी प्रकार से पैर खड़े रहकर शरीर का भार उठाते
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हैं। तब दोनों पैरों की सीधे खड़े रहने की, पैरों के तलवे
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की स्थिति ठीक नहीं बनती है । चलते हैं तब पैर उठाकर
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आगे रखने की स्थिति ठीक नहीं बनती है । व्यक्ति बोलता
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है तब बोलने में जो अवयव काम में आते हैं उनकी स्थिति
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ठीक नहीं बनती है । इस कारण से उच्चार ठीक नहीं होते,
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अक्षर सुन्दर नहीं बनते, चला ठीक नहीं जाता । क्रिया ठीक
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नहीं होती । आगे चित्र बनाने का, आकृति में रंग भरने का,
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मंत्र या गीत का गान करने का, छलांग लगाने का, दौड़ने
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का आदि काम भी ठीक से नहीं होते । कारीगरी के काम
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ठीक से नहीं होते क्योंकि साधन पकड़ने की स्थिति ठीक
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नहीं होती । दो हाथ जोड़कर, दृंडवत
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होकर प्रणाम करना, यज्ञ में आहुती देना, मालिश करना,
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गाँठ लगाना, आटा गुंधना, मिट्टी को आकार देना आदि
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असंख्य काम ठीक से नहीं होते । कर्मेन्द्रियों की स्थितियाँ
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दीवार में इँटों जैसी हैं । इंटें यदि ठीक नहीं बनी हैं तो
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दीवार ठीक नहीं बनती । दीवार ठीक नहीं बनती तो भवन
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भी ठीक नहीं बनता । अत: कर्मेन्ट्रियों की स्थिति ठीक
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बनाना प्रथम आवश्यकता है । स्थितियाँ ठीक बनाने के
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लिए अच्छे प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है । बारीकी से
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निरीक्षण कर छोटी से छोटी बात भी ठीक करनी होती है ।
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ऐसा नहीं किया तो इंद्रियों की स्थिति में एक अवधि के
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बाद अनेक प्रयास करने पर भी सुधार नहीं होता है । इन
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स्थितियों के भी संस्कार बन जाते हैं । प्रारंभ में, छोटी
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आयु में एक बार संस्कार हो गए तो बाद में सुधार लगभग
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असम्भव हो जाते हैं । यही कारण है कि हम देखते हैं कि
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वर्णमाला के स्वरों और व्यंजनों के उच्चारणों की अनेक
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अशुद्धियाँ होती हैं और वे बड़ी आयु में ठीक नहीं होतीं ।
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अक्षरों की बनावट ठीक नहीं होती और लेख सुन्दर या
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सही नहीं बनता । संगीत बेसुरा होता है । यज्ञ में आहुती
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डालना नहीं आता । प्रणाम करना नहीं आता । ये तो बहुत
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छोटी बातें हैं परंतु आगे चलकर भाषण और संभाषण ठीक
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नहीं होता, कारीगरी और कला ठीक नहीं अवगत होती,
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वस्तुयें ठीक नहीं रखी जातीं, वे खराब होती हैं आदि
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व्यवहार की अनेक कठिनाइयाँ निर्माण होती हैं ।
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दूसरा आयाम है गति का । गति अभ्यास से बढ़ती
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है। पातंजल योगसूत्र अभ्यास को परिभाषित करते हुए
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कहता है,
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तत्र स्थितौ यत्नो$भ्यासा: । और
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स तु दीर्घकालनैरंतर्यसत्कारसेवितों दृढ़भूमि: ।
अर्थात अभ्यास स्थिरतापूर्वक करना चाहिए, निरन्तर
अर्थात अभ्यास स्थिरतापूर्वक करना चाहिए, निरन्तर
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सब करना चाहिए ।
सब करना चाहिए ।
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अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए । कर्मेन्ट्रियों
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अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए । कर्मन्द्रियों
को भी आदत पड़ती है । केवल कर्मेन्ट्रि यों को ही नहीं
को भी आदत पड़ती है । केवल कर्मेन्ट्रि यों को ही नहीं
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केवल कर्मेन्द्रियाँ ही क्रिया करती हैं ऐसा नहीं है ।
केवल कर्मेन्द्रियाँ ही क्रिया करती हैं ऐसा नहीं है ।
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कर्मेन्ट्रियों के साथ साथ, कर्मेन्ट्रि यों की सहायता से पूरा
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कर्मन्द्रियों के साथ साथ, कर्मेन्ट्रि यों की सहायता से पूरा
शरीर क्रिया करता है । पूरा शरीर यंत्र ही है जो काम करने
शरीर क्रिया करता है । पूरा शरीर यंत्र ही है जो काम करने
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संवेदन ध्वनियुक्त, वैसे ही कर्कश वाद्ययन्त्रों का संगीत, तेज
संवेदन ध्वनियुक्त, वैसे ही कर्कश वाद्ययन्त्रों का संगीत, तेज
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पाँच कर्मेन्द्रियों की तरह पाँच ज्ञानेंद्रिया हैं। वे हैं मसालों से युक्त खाद्य पदार्थ ज्ञानेन्ट्रियों की संबेदनाओं को
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पाँच कर्मेन्द्रियों की तरह पाँच ज्ञानेंद्रिया हैं। वे हैं मसालों से युक्त खाद्य पदार्थ ज्ञानेन्द्रियों की संबेदनाओं को
नाक, कान, जीभ, आँखें और त्वचा । इन्हें क्रमश: .. अंधिर कर देते हैं । इन खोई हुई संवेदनशक्ति फिर से इस
नाक, कान, जीभ, आँखें और त्वचा । इन्हें क्रमश: .. अंधिर कर देते हैं । इन खोई हुई संवेदनशक्ति फिर से इस
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=== अनुभूति की शिक्षा ===
=== अनुभूति की शिक्षा ===
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ज्ञानेन्द्रियों से और कर्मेन्ट्रियों से जानना होता है । वह
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ज्ञानेन्द्रियों से और कर्मन्द्रियों से जानना होता है । वह
इंद्रियों के माध्यम से होने वाली शिक्षा होती है। यह
इंद्रियों के माध्यम से होने वाली शिक्षा होती है। यह
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कर्मेन््रियों का कार्य क्रिया करना
कर्मेन््रियों का कार्य क्रिया करना
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ज्ञानेन्ट्रियों का कार्य संवेदनों का अनुभव करना
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ज्ञानेन्द्रियों का कार्य संवेदनों का अनुभव करना
मन का कार्य विचार करना और भावना का अनुभव
मन का कार्य विचार करना और भावना का अनुभव
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दीवार ठीक नहीं बनती । दीवार ठीक नहीं बनती तो भवन
दीवार ठीक नहीं बनती । दीवार ठीक नहीं बनती तो भवन
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भी ठीक नहीं बनता । अत: कर्मेन्ट्रियों की स्थिति ठीक
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भी ठीक नहीं बनता । अत: कर्मन्द्रियों की स्थिति ठीक
बनाना प्रथम आवश्यकता है । स्थितियाँ ठीक बनाने के
बनाना प्रथम आवश्यकता है । स्थितियाँ ठीक बनाने के
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सब करना चाहिए ।
सब करना चाहिए ।
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अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए । कर्मेन्ट्रियों
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अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए । कर्मन्द्रियों
को भी आदत पड़ती है । केवल कर्मेन्ट्रि यों को ही नहीं
को भी आदत पड़ती है । केवल कर्मेन्ट्रि यों को ही नहीं
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केवल कर्मेन्द्रियाँ ही क्रिया करती हैं ऐसा नहीं है ।
केवल कर्मेन्द्रियाँ ही क्रिया करती हैं ऐसा नहीं है ।
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कर्मेन्ट्रियों के साथ साथ, कर्मेन्ट्रि यों की सहायता से पूरा
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कर्मन्द्रियों के साथ साथ, कर्मेन्ट्रि यों की सहायता से पूरा
शरीर क्रिया करता है । पूरा शरीर यंत्र ही है जो काम करने
शरीर क्रिया करता है । पूरा शरीर यंत्र ही है जो काम करने
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संवेदन ध्वनियुक्त, वैसे ही कर्कश वाद्ययन्त्रों का संगीत, तेज
संवेदन ध्वनियुक्त, वैसे ही कर्कश वाद्ययन्त्रों का संगीत, तेज
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पाँच कर्मेन्द्रियों की तरह पाँच ज्ञानेंद्रिया हैं। वे हैं मसालों से युक्त खाद्य पदार्थ ज्ञानेन्ट्रियों की संबेदनाओं को
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पाँच कर्मेन्द्रियों की तरह पाँच ज्ञानेंद्रिया हैं। वे हैं मसालों से युक्त खाद्य पदार्थ ज्ञानेन्द्रियों की संबेदनाओं को
नाक, कान, जीभ, आँखें और त्वचा । इन्हें क्रमश: .. अंधिर कर देते हैं । इन खोई हुई संवेदनशक्ति फिर से इस
नाक, कान, जीभ, आँखें और त्वचा । इन्हें क्रमश: .. अंधिर कर देते हैं । इन खोई हुई संवेदनशक्ति फिर से इस
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अनुभूति की शिक्षा
अनुभूति की शिक्षा
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ज्ञानेन्द्रियों से और कर्मेन्ट्रियों से जानना होता है । वह
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ज्ञानेन्द्रियों से और कर्मन्द्रियों से जानना होता है । वह
इंद्रियों के माध्यम से होने वाली शिक्षा होती है। यह
इंद्रियों के माध्यम से होने वाली शिक्षा होती है। यह