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सत्य एक ही है। किन्तु हर व्यक्ति को मिले ज्ञानेंद्रियों की, मन, बुद्धि और चित्त की क्षमताएं भिन्न है। इन साधनों के आधार पर ही कोई मनुष्य सत्य जानने का प्रयास करता है। ये सब बातें हरेक व्यक्ति की भिन्न होने के कारण उस के सत्य का आकलन भिन्न होना स्वाभाविक है {{Citation needed}}।<blockquote>सत्य एक अनुभूति भिन्न है सत्य यही तू जान </blockquote><blockquote>इंद्रिय, मन, बुद्धि भिन्न है भिन्न सत्य अनुमान </blockquote>एक प्रयोग से इसे हम समझने का प्रयास करेंगे। खुले आसमान में सितारें देखने के लिये दूरबीन लगाएं। दूरबीन के अगले कांच पर बीच में एक छोटा छेद वाला कागज चिपका दें। अब आकाश का एक छोटा हिस्सा ही दिखाई देगा। अब इस छोटे हिस्से में कितने तारे दिखाई देते है गिनती करें। संख्या लिख लें। अब एक अधू दृष्टि के मनुष्य को दूरबीन में से देखने दें। तारे गिनने दें। फिर संख्या लिख लें। अब तारों की संख्या कम हो गई होगी। अब एक अंधे को देखने दें। अब संख्या शून्य होगी। अब सोचिये तीनों मे से सत्य संख्या कौन सी है। तीनों संख्याओं के भिन्न होनेपर भी, तीनों ही अपने अपने हिसाब से सत्य का ही कथन कर रहे है।  
 
सत्य एक ही है। किन्तु हर व्यक्ति को मिले ज्ञानेंद्रियों की, मन, बुद्धि और चित्त की क्षमताएं भिन्न है। इन साधनों के आधार पर ही कोई मनुष्य सत्य जानने का प्रयास करता है। ये सब बातें हरेक व्यक्ति की भिन्न होने के कारण उस के सत्य का आकलन भिन्न होना स्वाभाविक है {{Citation needed}}।<blockquote>सत्य एक अनुभूति भिन्न है सत्य यही तू जान </blockquote><blockquote>इंद्रिय, मन, बुद्धि भिन्न है भिन्न सत्य अनुमान </blockquote>एक प्रयोग से इसे हम समझने का प्रयास करेंगे। खुले आसमान में सितारें देखने के लिये दूरबीन लगाएं। दूरबीन के अगले कांच पर बीच में एक छोटा छेद वाला कागज चिपका दें। अब आकाश का एक छोटा हिस्सा ही दिखाई देगा। अब इस छोटे हिस्से में कितने तारे दिखाई देते है गिनती करें। संख्या लिख लें। अब एक अधू दृष्टि के मनुष्य को दूरबीन में से देखने दें। तारे गिनने दें। फिर संख्या लिख लें। अब तारों की संख्या कम हो गई होगी। अब एक अंधे को देखने दें। अब संख्या शून्य होगी। अब सोचिये तीनों मे से सत्य संख्या कौन सी है। तीनों संख्याओं के भिन्न होनेपर भी, तीनों ही अपने अपने हिसाब से सत्य का ही कथन कर रहे है।  
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भारतीय मनीषियों की यही विशेषता रही है कि जो स्वाभाविक है, प्रकृति से सुसंगत है उसी को उन्होंने तत्व के रूप में सब के सामने रखा है। और एक उदाहरण देखें। न्यूटन के काल में यदि किसी ने आइंस्टीन के सिध्दांत प्रस्तुत किये होते तो क्या होता ? गणित और उपकरणों का विकास उन दिनों कम हुआ था। इसलिये आइंस्टीन के सिध्दांतों को अमान्य करदिया जाता। किन्तु आइंस्टीन के सिध्दांत न्यूटन के काल में भी उतने ही सत्य थे जितने आइंस्टीन के काल में।
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धार्मिक (भारतीय) मनीषियों की यही विशेषता रही है कि जो स्वाभाविक है, प्रकृति से सुसंगत है उसी को उन्होंने तत्व के रूप में सब के सामने रखा है। और एक उदाहरण देखें। न्यूटन के काल में यदि किसी ने आइंस्टीन के सिध्दांत प्रस्तुत किये होते तो क्या होता ? गणित और उपकरणों का विकास उन दिनों कम हुआ था। इसलिये आइंस्टीन के सिध्दांतों को अमान्य करदिया जाता। किन्तु आइंस्टीन के सिध्दांत न्यूटन के काल में भी उतने ही सत्य थे जितने आइंस्टीन के काल में।
    
इसलिये मै जो कह रहा हूं केवल वही सत्य है ऐसा समझना ठीक नही है। अन्य लोगों को जो अनुभव हो रहा है वह भी सत्य ही है। प्रत्येक मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि का इतना आदर शायद ही विश्व के अन्य किसी समाज ने नही किया होगा। भारत मे कभी भी अपने से अलग मत का प्रतिपादन करनेवालों के साथ हिंसा नहीं हुई। किसी वैज्ञानिक को प्रताडित नही किया गया किसी को जीना दुस्सह नहीं किया गया। प्रचलित सर्वमान्य विचारों के विपरीत विचार रखनेवाले चार्वाक को भी महर्षि चार्वाक कहा गया। यह तो अधार्मिक (अभारतीय) चलन है जिस के चलते लोग असहमति के कारण हिंसा पर उतारू हो जाते है।
 
इसलिये मै जो कह रहा हूं केवल वही सत्य है ऐसा समझना ठीक नही है। अन्य लोगों को जो अनुभव हो रहा है वह भी सत्य ही है। प्रत्येक मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि का इतना आदर शायद ही विश्व के अन्य किसी समाज ने नही किया होगा। भारत मे कभी भी अपने से अलग मत का प्रतिपादन करनेवालों के साथ हिंसा नहीं हुई। किसी वैज्ञानिक को प्रताडित नही किया गया किसी को जीना दुस्सह नहीं किया गया। प्रचलित सर्वमान्य विचारों के विपरीत विचार रखनेवाले चार्वाक को भी महर्षि चार्वाक कहा गया। यह तो अधार्मिक (अभारतीय) चलन है जिस के चलते लोग असहमति के कारण हिंसा पर उतारू हो जाते है।
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परमात्मा सर्वव्यापी और इसलिये सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिमान है। यह पूरी सृष्टि परमात्मा ने अपनी इच्छा और शक्ति से अपने में से ही निर्माण किया है। यह है परमात्मा की संकल्पना। अल्ला या गॉड ऐसे नहीं है। आदम और ईव्ह ने ज्ञान का फल खाया इस लिये उन्हें दंड देनेवाला गॉड और ॠषियों को सत्यज्ञान का वेदों के रूप में स्वत: कथन करनेवाला परमात्मा एक कैसे हो सकता है ? सेमेटिक धर्मों में अल्ला और गॉड दोनों ही ईर्षालू है। इन्हे स्पर्धा सहन नहीं होती। ये दोनों ही असहिष्णू माने जाते है। परमात्मा वैसा नहीं है।  आत्मा रुह और सोल इन संकल्पनाओं में भी ऐसा ही मूलभूत अंतर है। वर्तमान मानवी जीवन ही सबकुछ है। इस से पहले कुछ नही था और आगे भी कुछ नही है ऐसी इस्लाम और ईसाईयत की मान्यता है। इसलिये रूह या सोल को स्थायी हेवन या जन्नत और स्थायी हेल या दोजख की इन दो मजहबों में मान्यता है।   
 
परमात्मा सर्वव्यापी और इसलिये सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिमान है। यह पूरी सृष्टि परमात्मा ने अपनी इच्छा और शक्ति से अपने में से ही निर्माण किया है। यह है परमात्मा की संकल्पना। अल्ला या गॉड ऐसे नहीं है। आदम और ईव्ह ने ज्ञान का फल खाया इस लिये उन्हें दंड देनेवाला गॉड और ॠषियों को सत्यज्ञान का वेदों के रूप में स्वत: कथन करनेवाला परमात्मा एक कैसे हो सकता है ? सेमेटिक धर्मों में अल्ला और गॉड दोनों ही ईर्षालू है। इन्हे स्पर्धा सहन नहीं होती। ये दोनों ही असहिष्णू माने जाते है। परमात्मा वैसा नहीं है।  आत्मा रुह और सोल इन संकल्पनाओं में भी ऐसा ही मूलभूत अंतर है। वर्तमान मानवी जीवन ही सबकुछ है। इस से पहले कुछ नही था और आगे भी कुछ नही है ऐसी इस्लाम और ईसाईयत की मान्यता है। इसलिये रूह या सोल को स्थायी हेवन या जन्नत और स्थायी हेल या दोजख की इन दो मजहबों में मान्यता है।   
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भारतीय संकल्पना की आत्मा यह परमात्मा का ही अंश है। जो परमात्मा की इच्छा से ही निर्माण हुआ है। अंत में इसे परमात्मा में ही विलीन होना है। वह अनादि और अनंत ऐसे परमात्मा का ही अंश होने से वह भी अनादि और अनंत ही है। कुछ कच्चे वैज्ञानिक कहते है कि परमात्मा को जबतक प्रयोगशाला में सिध्द नही किया जाता हम विश्वास नही कर सकते। ऐसे अडियल वैज्ञानिकों को स्वामी विवेकानंद उलटी चुनौती देते है कि वे उन की प्रयोगशाला में सिध्द कर के दिखाएं कि परमात्मा नहीं है। एक और भी दृष्टि से इसे देखने की बात स्वामी विवेकानंद करते है। परमात्मा के मानने से यदि लोग सदाचारी बनते है तो परमात्मा में विश्वास रखने में क्या बुराई है ?  वास्तविक बात तो यह है कि मानव शरीर पंचमहाभूतों का बना होता है। वैज्ञानिक उपकरण उन्ही पंचमहाभूतों के बने होते है। शरीर से सूक्ष्म इंद्रियाँ होती है। इंद्रियों से सूक्ष्म मन, मन से सूक्ष्म बुद्धि, बुद्धि से सूक्ष्म चित्त और चित्त से भी अधिक सूक्ष्म आत्मतत्व होता है। यह तो मीटर की मापन पट्टी लेकर नॅनो कण का आकार मापने जैसी गलत बात है। परमात्वतत्व को जानने के साधन वर्तमान प्रयोगशाला में उपलब्ध भौतिक उपकरण नही हो सकते। हमारे पूर्वजों ने आत्मा और परमात्मा इन संकल्पनाओं से जुडे कई वर्तनसूत्रों और मान्यताओं का विकास किया है। उन का अब संक्षिप्त परिचय हम करेंगे।   
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धार्मिक (भारतीय) संकल्पना की आत्मा यह परमात्मा का ही अंश है। जो परमात्मा की इच्छा से ही निर्माण हुआ है। अंत में इसे परमात्मा में ही विलीन होना है। वह अनादि और अनंत ऐसे परमात्मा का ही अंश होने से वह भी अनादि और अनंत ही है। कुछ कच्चे वैज्ञानिक कहते है कि परमात्मा को जबतक प्रयोगशाला में सिध्द नही किया जाता हम विश्वास नही कर सकते। ऐसे अडियल वैज्ञानिकों को स्वामी विवेकानंद उलटी चुनौती देते है कि वे उन की प्रयोगशाला में सिध्द कर के दिखाएं कि परमात्मा नहीं है। एक और भी दृष्टि से इसे देखने की बात स्वामी विवेकानंद करते है। परमात्मा के मानने से यदि लोग सदाचारी बनते है तो परमात्मा में विश्वास रखने में क्या बुराई है ?  वास्तविक बात तो यह है कि मानव शरीर पंचमहाभूतों का बना होता है। वैज्ञानिक उपकरण उन्ही पंचमहाभूतों के बने होते है। शरीर से सूक्ष्म इंद्रियाँ होती है। इंद्रियों से सूक्ष्म मन, मन से सूक्ष्म बुद्धि, बुद्धि से सूक्ष्म चित्त और चित्त से भी अधिक सूक्ष्म आत्मतत्व होता है। यह तो मीटर की मापन पट्टी लेकर नॅनो कण का आकार मापने जैसी गलत बात है। परमात्वतत्व को जानने के साधन वर्तमान प्रयोगशाला में उपलब्ध भौतिक उपकरण नही हो सकते। हमारे पूर्वजों ने आत्मा और परमात्मा इन संकल्पनाओं से जुडे कई वर्तनसूत्रों और मान्यताओं का विकास किया है। उन का अब संक्षिप्त परिचय हम करेंगे।   
    
==== ४.१ अमृतस्य पुत्रा: वयं ====
 
==== ४.१ अमृतस्य पुत्रा: वयं ====
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इस्लाम और ईसाईयत में पुण्य नाम की कोई संकल्पना नहीं है। केवल ईसा मसीह पर श्रध्दा या पैगंबर मुहम्मद पर श्रध्दा उन्हें हमेशा के लिये स्वर्गप्राप्ति करा सकती है। इस के लिये सदाचार की कोई शर्त नहीं है। अंग्रेजी भाषा में शायद इसी कारण से ‘पुण्य’ शब्द ही नहीं है।   
 
इस्लाम और ईसाईयत में पुण्य नाम की कोई संकल्पना नहीं है। केवल ईसा मसीह पर श्रध्दा या पैगंबर मुहम्मद पर श्रध्दा उन्हें हमेशा के लिये स्वर्गप्राप्ति करा सकती है। इस के लिये सदाचार की कोई शर्त नहीं है। अंग्रेजी भाषा में शायद इसी कारण से ‘पुण्य’ शब्द ही नहीं है।   
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भारतीय मान्यता के अनुसार तो पाप और पुण्य दोनों ही मन, वचन ( वाणी ) और कर्म ( कृति ) इन तीनों से होते है। और इन तीनों के पाप के बुरे और पुण्य के अच्छे फल मिलते हैं। मन में भी किसी के विषय में बुरे विचार आने से पाप हो जाता है। और उस का मानसिक क्लेष के रूप में फल भुगतना पडता है। हमारे बोलने से भी यदि किसी को दुख होता है तो ऐसे ही दुख देनेवाले वचन सुनने के रूप में हमें इस पाप का फल भोगना ही पडता है। कृति तो प्रत्यक्ष शारीरिक पीडा देनेवाला कार्य है। उस का फल शारीरिक दृष्टि से भोगना ही पडेगा। आगे कर्मसिध्दांत में हम इस की अधिक विवेचना करेंगे।   
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धार्मिक (भारतीय) मान्यता के अनुसार तो पाप और पुण्य दोनों ही मन, वचन ( वाणी ) और कर्म ( कृति ) इन तीनों से होते है। और इन तीनों के पाप के बुरे और पुण्य के अच्छे फल मिलते हैं। मन में भी किसी के विषय में बुरे विचार आने से पाप हो जाता है। और उस का मानसिक क्लेष के रूप में फल भुगतना पडता है। हमारे बोलने से भी यदि किसी को दुख होता है तो ऐसे ही दुख देनेवाले वचन सुनने के रूप में हमें इस पाप का फल भोगना ही पडता है। कृति तो प्रत्यक्ष शारीरिक पीडा देनेवाला कार्य है। उस का फल शारीरिक दृष्टि से भोगना ही पडेगा। आगे कर्मसिध्दांत में हम इस की अधिक विवेचना करेंगे।   
    
यहाँ अपराध और पाप इन में अंतर भी समझना आवश्यक है। वर्तमान कानून के विरोधी व्यवहार को अपराध कहते है। ऐसी कृति से किसी को हानि होती हो या ना होती हो वह अपराध है। और प्रचलित कानून की दृष्टि से दंडनीय है। किंतु हमारी कृति से जब तक किसी को दुख नहीं होता, किसी की हानि नहीं होती तब तक वह पाप नहीं है। धार्मिक (भारतीय) सोच में कानून को महत्व तो है किन्तु उस से भी अधिक महत्व पाप-पुण्य विचार को है। दो उदाहरणों से इसे हम स्पष्ट करेंगे। रेलवे कानून के अनुसार रेलवे की पटरियां लाँघकर इधर-उधर जाना अपराध है। किंतु जब तक मेरे ऐसा करने से किसी को हानि नहीं होती है किसी को कष्ट नहीं होता, वह पाप नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व मेल गाडियों में धूम्रपान की अनुमति हुआ करती थी। और पियक्कड लोग रेलों में धूम्रपान किया करते थे। उन का धूम्रपान कानून के अनुसार अपराध नहीं था। दंडनीय नहीं था। किन्तु उन के धूम्रपान से लोगों को तकलीफ होती ही थी। इसलिये वह पाप अवश्य था। वर्तमान में तो सार्वजनिक स्थानपर धूम्रपान कानून से अपराध माना जाता है। इसलिये रेल के डिब्बे जैसे सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान अब अपराध भी है और पाप भी है। अपराध का दण्ड मिलने की सभावनाएं तो इस जन्म के साथ समाप्त हो जातीं है। किन्तु पाप के फल को भोगने का बोझ तो जन्म-जन्मांतर तक पीछा नहीं छोडता।   
 
यहाँ अपराध और पाप इन में अंतर भी समझना आवश्यक है। वर्तमान कानून के विरोधी व्यवहार को अपराध कहते है। ऐसी कृति से किसी को हानि होती हो या ना होती हो वह अपराध है। और प्रचलित कानून की दृष्टि से दंडनीय है। किंतु हमारी कृति से जब तक किसी को दुख नहीं होता, किसी की हानि नहीं होती तब तक वह पाप नहीं है। धार्मिक (भारतीय) सोच में कानून को महत्व तो है किन्तु उस से भी अधिक महत्व पाप-पुण्य विचार को है। दो उदाहरणों से इसे हम स्पष्ट करेंगे। रेलवे कानून के अनुसार रेलवे की पटरियां लाँघकर इधर-उधर जाना अपराध है। किंतु जब तक मेरे ऐसा करने से किसी को हानि नहीं होती है किसी को कष्ट नहीं होता, वह पाप नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व मेल गाडियों में धूम्रपान की अनुमति हुआ करती थी। और पियक्कड लोग रेलों में धूम्रपान किया करते थे। उन का धूम्रपान कानून के अनुसार अपराध नहीं था। दंडनीय नहीं था। किन्तु उन के धूम्रपान से लोगों को तकलीफ होती ही थी। इसलिये वह पाप अवश्य था। वर्तमान में तो सार्वजनिक स्थानपर धूम्रपान कानून से अपराध माना जाता है। इसलिये रेल के डिब्बे जैसे सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान अब अपराध भी है और पाप भी है। अपराध का दण्ड मिलने की सभावनाएं तो इस जन्म के साथ समाप्त हो जातीं है। किन्तु पाप के फल को भोगने का बोझ तो जन्म-जन्मांतर तक पीछा नहीं छोडता।   
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==== ८.१ कुटुंब ====
 
==== ८.१ कुटुंब ====
भारतीय एकत्रित परिवार आज भी विदेशी लोगों के लिये आकर्षण का विषय है। बडी संख्या में वर्तमान जीवनशैली और वर्तमान शिक्षा के कारण टूट रहे यह परिवार अब तो भारतीयों के भी चिंता और अध्ययन का विषय बन गये है।   
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धार्मिक (भारतीय) एकत्रित परिवार आज भी विदेशी लोगों के लिये आकर्षण का विषय है। बडी संख्या में वर्तमान जीवनशैली और वर्तमान शिक्षा के कारण टूट रहे यह परिवार अब तो भारतीयों के भी चिंता और अध्ययन का विषय बन गये है।   
    
अंग्रेजी में एक काहावत है ' क्राईंग चाईल्ड ओन्ली गेट्स् मिल्क् ' अर्थात् यदि बच्चा भूख से रोएगा नही तो उसे दूध नहीं मिलेगा। इस कहावत का जन्म उन के अधिकारों के लिये संघर्ष के वर्तनसूत्र में है। अन्यथा ऐसी कोई माँ (अंग्रेज भी) नहीं हो सकती जो बच्चा रोएगा नहीं तो उसे भूखा रखेगी।   
 
अंग्रेजी में एक काहावत है ' क्राईंग चाईल्ड ओन्ली गेट्स् मिल्क् ' अर्थात् यदि बच्चा भूख से रोएगा नही तो उसे दूध नहीं मिलेगा। इस कहावत का जन्म उन के अधिकारों के लिये संघर्ष के वर्तनसूत्र में है। अन्यथा ऐसी कोई माँ (अंग्रेज भी) नहीं हो सकती जो बच्चा रोएगा नहीं तो उसे भूखा रखेगी।   
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पाश्चात्य समाजों में कृतज्ञता व्यक्त करने की पध्दति धार्मिक (भारतीय) पध्दति से भिन्न है। किसी से उपकार लेनेपर थँक यू और किसी को अपने कारण तकलीफ होनेपर सॉरी ऐसा तुरंत कहने की पाश्चात्य पध्दति है। इतना संक्षेप में कृतज्ञता या खेद व्यक्त करके विषय पूरा हो जाता है। दूसरे ही क्षण वह जिस बात के लिये थँक यू कहा है या सॉरी कहा है उसे भूल जाता है। दूसरे ही क्षण से उस के लिये वह उपकार का या पश्चात्ताप का विषय नहीं रह जाता।   
 
पाश्चात्य समाजों में कृतज्ञता व्यक्त करने की पध्दति धार्मिक (भारतीय) पध्दति से भिन्न है। किसी से उपकार लेनेपर थँक यू और किसी को अपने कारण तकलीफ होनेपर सॉरी ऐसा तुरंत कहने की पाश्चात्य पध्दति है। इतना संक्षेप में कृतज्ञता या खेद व्यक्त करके विषय पूरा हो जाता है। दूसरे ही क्षण वह जिस बात के लिये थँक यू कहा है या सॉरी कहा है उसे भूल जाता है। दूसरे ही क्षण से उस के लिये वह उपकार का या पश्चात्ताप का विषय नहीं रह जाता।   
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भारतीय मान्यताओं में इस से बहुत अधिक गंभीरता से इस बात का विचार किया गया है। केवल एक दो शब्दों से किये उपकार का प्रतिकार नही हो सकता। या दिये दुख को नि:शेष नहीं किया जा सकता। यह तो प्रत्यक्ष कृति से ही दिया जाना चाहिये। इसलिये जरा जरा सी बातपर थँक यू या सॉरी कहने की प्रथा धार्मिक (भारतीय) समाज में नही है। पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में पश्चिमी तौर तरीकों का अंधानुकरण हो ही रहा है। इस के फलस्वरूप 'आप को मेरे कारण तकलीफ हुई। मान लिया ना ! और सॉरी कह दिया ना। अब क्या ‘मेरी जान लोगे’ ऐसा कहनेवाले धार्मिक (भारतीय) भी दिखाई देने लगे है। इसलिये कृतज्ञता के संबंध में धार्मिक (भारतीय) सोच का अधिक अध्ययन कर उसे व्यवहार में लाने की आवश्यकता है।  
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धार्मिक (भारतीय) मान्यताओं में इस से बहुत अधिक गंभीरता से इस बात का विचार किया गया है। केवल एक दो शब्दों से किये उपकार का प्रतिकार नही हो सकता। या दिये दुख को नि:शेष नहीं किया जा सकता। यह तो प्रत्यक्ष कृति से ही दिया जाना चाहिये। इसलिये जरा जरा सी बातपर थँक यू या सॉरी कहने की प्रथा धार्मिक (भारतीय) समाज में नही है। पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में पश्चिमी तौर तरीकों का अंधानुकरण हो ही रहा है। इस के फलस्वरूप 'आप को मेरे कारण तकलीफ हुई। मान लिया ना ! और सॉरी कह दिया ना। अब क्या ‘मेरी जान लोगे’ ऐसा कहनेवाले धार्मिक (भारतीय) भी दिखाई देने लगे है। इसलिये कृतज्ञता के संबंध में धार्मिक (भारतीय) सोच का अधिक अध्ययन कर उसे व्यवहार में लाने की आवश्यकता है।  
    
कृतज्ञता यह मनुष्य का लक्षण है। कृतज्ञता का अर्थ है किसी ने मेरे उपर किये उपकार का स्मरण रखना और उस के उपकार के प्रतिकार में उसे जब आवश्यकता है ऐसे समय उसपर उपकार करना। पशुओं में कृतज्ञता का अभाव ही होता है। शेर और उसे जाल में से छुडाने वाले चूहे की कथा बचपन में बच्चों को बताना ठीक ही है। किन्तु कृतज्ञता की भावना मन में गहराई तक बिठाने के लिये, बडे बच्चों को भी इस विषय की सुधारित कथा बताने की आवश्यकता है।   
 
कृतज्ञता यह मनुष्य का लक्षण है। कृतज्ञता का अर्थ है किसी ने मेरे उपर किये उपकार का स्मरण रखना और उस के उपकार के प्रतिकार में उसे जब आवश्यकता है ऐसे समय उसपर उपकार करना। पशुओं में कृतज्ञता का अभाव ही होता है। शेर और उसे जाल में से छुडाने वाले चूहे की कथा बचपन में बच्चों को बताना ठीक ही है। किन्तु कृतज्ञता की भावना मन में गहराई तक बिठाने के लिये, बडे बच्चों को भी इस विषय की सुधारित कथा बताने की आवश्यकता है।   
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कुछ लोग मानते हैं कि सत्ययुग में सत्य, ज्ञान, तप और दान इन चार खंभों के आधारपर सृष्टि के व्यवहार चलते  थे। हर युग में एक एक आधार कम हुआ। और कलियुग में सृष्टि केवल दान पर चलेगी। कलियुग में दान का इतना महत्व माना गया है। धार्मिक (भारतीय) समाज में दान की परंपरा के विषय में एक और मुहावरा है। देने वाला देता जाए। लेने वाला लेता जाए। लेने वाला एक दिन देने वाले के देने वाले हाथ ले ले। अर्थात् आवश्यकतानुसार दान अवश्य ले। किन्तु ऐसा दान लेकर परिश्रम से, तप से, औरों को दान देने की क्षमता और मानसिकता विकसित करे। पुरुषार्थ की पराकाष्ठा करो। खूब धन कमाओ। लेकिन यह सब "मै अधिक प्रमाण में दान दे सकूं" इस भावना से करो।
 
कुछ लोग मानते हैं कि सत्ययुग में सत्य, ज्ञान, तप और दान इन चार खंभों के आधारपर सृष्टि के व्यवहार चलते  थे। हर युग में एक एक आधार कम हुआ। और कलियुग में सृष्टि केवल दान पर चलेगी। कलियुग में दान का इतना महत्व माना गया है। धार्मिक (भारतीय) समाज में दान की परंपरा के विषय में एक और मुहावरा है। देने वाला देता जाए। लेने वाला लेता जाए। लेने वाला एक दिन देने वाले के देने वाले हाथ ले ले। अर्थात् आवश्यकतानुसार दान अवश्य ले। किन्तु ऐसा दान लेकर परिश्रम से, तप से, औरों को दान देने की क्षमता और मानसिकता विकसित करे। पुरुषार्थ की पराकाष्ठा करो। खूब धन कमाओ। लेकिन यह सब "मै अधिक प्रमाण में दान दे सकूं" इस भावना से करो।
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भारतीय शब्द ' दान ' और अंग्रेजी डोनेशन इन में अंतर है। डोनेशन देने वाला बडा होता है। लेनेवाला छोटा माना जाता है। किन्तु दान देते समय भावना भिन्न होती है। एक श्रेष्ठ कार्य के लिये यह सामनेवाला मुझसे दान लेकर मुझे मेरी सामाजिक जिम्मेदारी से उतराई होने का अवसर दिला रहा है। यह इस का मेरे उपर उपकार है। मै इसे दान देकर इस का ॠणी बन रहा हूं। दान लेनेवाला भी गरिमा के साथ श्रेष्ठ सामाजिक हित के लिये दान माँगता था।  
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धार्मिक (भारतीय) शब्द ' दान ' और अंग्रेजी डोनेशन इन में अंतर है। डोनेशन देने वाला बडा होता है। लेनेवाला छोटा माना जाता है। किन्तु दान देते समय भावना भिन्न होती है। एक श्रेष्ठ कार्य के लिये यह सामनेवाला मुझसे दान लेकर मुझे मेरी सामाजिक जिम्मेदारी से उतराई होने का अवसर दिला रहा है। यह इस का मेरे उपर उपकार है। मै इसे दान देकर इस का ॠणी बन रहा हूं। दान लेनेवाला भी गरिमा के साथ श्रेष्ठ सामाजिक हित के लिये दान माँगता था।  
    
दान देने की इस सार्वजनिक प्रवृत्ति के पीछे पंचॠणों से उतराई होने की भावना ही काम करती थी।
 
दान देने की इस सार्वजनिक प्रवृत्ति के पीछे पंचॠणों से उतराई होने की भावना ही काम करती थी।
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योग भी अपने आप में सदाचार से जीने के लिये मार्गदर्शन करनेवाला एक संपूर्ण जीवनदर्शन है।  
 
योग भी अपने आप में सदाचार से जीने के लिये मार्गदर्शन करनेवाला एक संपूर्ण जीवनदर्शन है।  
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भारतीय मान्यता के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति के चार प्रमुख मार्ग है। ज्ञानमार्ग, निष्काम कर्म मार्ग, भक्तिमार्ग और अष्टांग योग मार्ग। इन में योगमार्ग सबसे कठिन लेकिन शीघ्र मोक्षगामी बनाने वाला मार्ग है। पूर्व कर्मों के फलों को नष्ट करने की संभावनाएं अन्य तीन मार्गों में नहीं है। किन्तु इस का लाभ केवल मोक्षप्राप्ति के इच्छुक मुमुक्षु को ही होता है ऐसा नहीं है। योग के दो हिस्से है। बहिरंग योग और अंतरंग योग। इन में से बहिरंग योग का लाभ तो समाज के हर घटक को हर अवस्था में मिल सकता है। योगिक साधना से ज्ञानार्जन के करण और अंत:करण के घटकों का विकास किया जा सकता है। इसीलिये योग विषय का शिक्षा की दृष्टि से अनन्य साधारण महत्व है।   
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धार्मिक (भारतीय) मान्यता के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति के चार प्रमुख मार्ग है। ज्ञानमार्ग, निष्काम कर्म मार्ग, भक्तिमार्ग और अष्टांग योग मार्ग। इन में योगमार्ग सबसे कठिन लेकिन शीघ्र मोक्षगामी बनाने वाला मार्ग है। पूर्व कर्मों के फलों को नष्ट करने की संभावनाएं अन्य तीन मार्गों में नहीं है। किन्तु इस का लाभ केवल मोक्षप्राप्ति के इच्छुक मुमुक्षु को ही होता है ऐसा नहीं है। योग के दो हिस्से है। बहिरंग योग और अंतरंग योग। इन में से बहिरंग योग का लाभ तो समाज के हर घटक को हर अवस्था में मिल सकता है। योगिक साधना से ज्ञानार्जन के करण और अंत:करण के घटकों का विकास किया जा सकता है। इसीलिये योग विषय का शिक्षा की दृष्टि से अनन्य साधारण महत्व है।   
    
मन की शिक्षा यह शिक्षा का प्रमुख और प्राथमिक अंग है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था ‘मुझे यदि फिर से शिक्षा का अवसर मिले और क्या सीखना चाहिये यह निर्णय भी मेरे हाथ में हो तो मै सर्वप्रथम अपने मन को नियंत्रित करने की शिक्षा प्राप्त करूंगा। बाद में तय करूंगा की अन्य कौन सी जानकारी मुझे चाहिये।‘ और मन की शिक्षा के लिये वर्तमान में योग जैसा प्रभावी मार्ग नहीं है। श्रेष्ठ शिक्षा के विषय में ऐसा कहा जाता है कि {{Citation needed}}:<blockquote>साक्षरा विपरिताश्चेत राक्षसा एव केवलम्। सरसो विपरितश्चेत सरसत्वं न मुंचते ॥</blockquote>भावार्थ : मनुष्य शिक्षण के द्वारा केवल साक्षर हुआ होगा तब विपरीत परिस्थिति में उस में छिपा हीन भाव ही प्रकट होगा। राक्षस ही प्रकट होगा। किन्तु उसे यदि मन की शिक्षा मिली है, उस का मन सुसंस्कृत हुआ है तो वह विपरीत परिस्थिती में भी अपने संस्कार नही छोडेगा।
 
मन की शिक्षा यह शिक्षा का प्रमुख और प्राथमिक अंग है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था ‘मुझे यदि फिर से शिक्षा का अवसर मिले और क्या सीखना चाहिये यह निर्णय भी मेरे हाथ में हो तो मै सर्वप्रथम अपने मन को नियंत्रित करने की शिक्षा प्राप्त करूंगा। बाद में तय करूंगा की अन्य कौन सी जानकारी मुझे चाहिये।‘ और मन की शिक्षा के लिये वर्तमान में योग जैसा प्रभावी मार्ग नहीं है। श्रेष्ठ शिक्षा के विषय में ऐसा कहा जाता है कि {{Citation needed}}:<blockquote>साक्षरा विपरिताश्चेत राक्षसा एव केवलम्। सरसो विपरितश्चेत सरसत्वं न मुंचते ॥</blockquote>भावार्थ : मनुष्य शिक्षण के द्वारा केवल साक्षर हुआ होगा तब विपरीत परिस्थिति में उस में छिपा हीन भाव ही प्रकट होगा। राक्षस ही प्रकट होगा। किन्तु उसे यदि मन की शिक्षा मिली है, उस का मन सुसंस्कृत हुआ है तो वह विपरीत परिस्थिती में भी अपने संस्कार नही छोडेगा।

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