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वर्तमान न्याय व्यवस्था के तीन प्रमुख अंग है। एक न्यायाधीश, दूसरा वकील और तीसरा पक्षकार। पक्षकार के मुकदमे वकील न्यायालय में लड़ते हैं। सामान्यत: इन मुकदमों में केवल एक ही पक्ष न्याय का होता है। स्वाभाविक रूप से दूसरा पक्ष अन्याय का ही होता है। और हमारे लगभग ५० प्रतिशत वकील इस अन्याय के पक्ष के लिये मुकदमे लड़ते हैं। अपनी पूरी बुद्धिमत्ता अन्यायवाले पक्ष को जिताने के लिये लगा देते है । इसे व्यावसायिक आवश्यकता या मजबूरी कहा जाता है। किन्तु  वास्तविक देखा जाये तो क्या यह 'अनैतिक धंधा' नहीं है? किन्तु इसे वकीलों की मान्यता है। न्यायालय की मान्यता है। कानून की मान्यता है। और संविधान की भी मान्यता है। यह कैसा अंधेर है ? ऐसा न्याय के क्षेत्र में काम करनेवाले विद्वानों को लगता है या नहीं ? केवल इतना ही नहीं, वर्तमान न्यायतंत्र में न्यायाधीश शासक का हित देखनेवाला है या नहीं यह भी महत्वपूर्ण होता है ।  
 
वर्तमान न्याय व्यवस्था के तीन प्रमुख अंग है। एक न्यायाधीश, दूसरा वकील और तीसरा पक्षकार। पक्षकार के मुकदमे वकील न्यायालय में लड़ते हैं। सामान्यत: इन मुकदमों में केवल एक ही पक्ष न्याय का होता है। स्वाभाविक रूप से दूसरा पक्ष अन्याय का ही होता है। और हमारे लगभग ५० प्रतिशत वकील इस अन्याय के पक्ष के लिये मुकदमे लड़ते हैं। अपनी पूरी बुद्धिमत्ता अन्यायवाले पक्ष को जिताने के लिये लगा देते है । इसे व्यावसायिक आवश्यकता या मजबूरी कहा जाता है। किन्तु  वास्तविक देखा जाये तो क्या यह 'अनैतिक धंधा' नहीं है? किन्तु इसे वकीलों की मान्यता है। न्यायालय की मान्यता है। कानून की मान्यता है। और संविधान की भी मान्यता है। यह कैसा अंधेर है ? ऐसा न्याय के क्षेत्र में काम करनेवाले विद्वानों को लगता है या नहीं ? केवल इतना ही नहीं, वर्तमान न्यायतंत्र में न्यायाधीश शासक का हित देखनेवाला है या नहीं यह भी महत्वपूर्ण होता है ।  
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वर्तमान न्याय व्यवस्था धार्मिक  न्याय व्यवस्था नहीं है। इसे हमारी गुलामी के दिनों में अंग्रेजों ने यहाँ स्थापित किया था। वर्तमान में केवल भारत में ही नहीं विश्व के सभी देशों ने इसी प्रकार की न्याय व्यवस्था को स्वीकार किया है। इस में एक महत्वपूर्ण कारण पाश्चात्य देशों की गुलामी का है। दूसरा कारण इन देशों में शायद इस से अधिक संगठित और न्यायपूर्ण कोई व्यवस्था योरप के देशों द्वारा गुलाम बनाए जाने से पहले नहीं थी, यह भी है। किन्तु भारत की स्थिति भिन्न है। हमारे इतिहास में अत्यंत श्रेष्ठ न्याय व्यवस्था थी, इस के प्रमाण और न्याय व्यवस्था से जुड़ा काफी साहित्य आज भी उपलब्ध है। किन्तु स्वाधीनता के बाद भी हमारी मानसिकता तो दासता की ही रही है। हमने उस पाश्चात्य न्याय व्यवस्था को निष्ठा से आगे बढाया है।
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वर्तमान न्याय व्यवस्था धार्मिक  न्याय व्यवस्था नहीं है। इसे हमारी गुलामी के दिनों में अंग्रेजों ने यहाँ स्थापित किया था। वर्तमान में केवल भारत में ही नहीं विश्व के सभी देशों ने इसी प्रकार की न्याय व्यवस्था को स्वीकार किया है। इस में एक महत्वपूर्ण कारण पाश्चात्य देशों की गुलामी का है। दूसरा कारण इन देशों में संभवतः इस से अधिक संगठित और न्यायपूर्ण कोई व्यवस्था योरप के देशों द्वारा गुलाम बनाए जाने से पहले नहीं थी, यह भी है। किन्तु भारत की स्थिति भिन्न है। हमारे इतिहास में अत्यंत श्रेष्ठ न्याय व्यवस्था थी, इस के प्रमाण और न्याय व्यवस्था से जुड़ा काफी साहित्य आज भी उपलब्ध है। किन्तु स्वाधीनता के बाद भी हमारी मानसिकता तो दासता की ही रही है। हमने उस पाश्चात्य न्याय व्यवस्था को निष्ठा से आगे बढाया है।
    
कहने को तो हम कहते है कि हम स्वतंत्र हो गये है। किन्तु स्वाधीनता और स्वतन्त्रता इन में अन्तर भी हम नहीं समझते। स्वाधीनता का अर्थ है पराए शासकों की अधीनता समाप्त होकर अपने शासकों के अधीन देश हो जाना। स्वतन्त्रता स्वाधीनता से अधिक कठिन बात है। इस में अपने समाज के हित में अपनी जीवनदृष्टि के अनुरूप अपने तंत्र अर्थात् अपनी व्यवस्थाएं निर्माण करनी पडती है। किन्तु हमारी स्वाधीनता के बाद हमने अपनी जीवनदृष्टि से सुसंगत तंत्रों के या अपनी व्यवस्थाओं के विकास का कोई प्रयास नहीं किया है। अंग्रेजी शासन ने उन के लाभ के लिये भारत में प्रतिष्ठित की हुई शासन, प्रशासन, न्याय, राजस्व, अर्थ, उद्योग, कृषि, शिक्षा आदि सभी व्यवस्थाएं हमने निष्ठा के साथ आज भी वैसी ही बनाए रखी है।
 
कहने को तो हम कहते है कि हम स्वतंत्र हो गये है। किन्तु स्वाधीनता और स्वतन्त्रता इन में अन्तर भी हम नहीं समझते। स्वाधीनता का अर्थ है पराए शासकों की अधीनता समाप्त होकर अपने शासकों के अधीन देश हो जाना। स्वतन्त्रता स्वाधीनता से अधिक कठिन बात है। इस में अपने समाज के हित में अपनी जीवनदृष्टि के अनुरूप अपने तंत्र अर्थात् अपनी व्यवस्थाएं निर्माण करनी पडती है। किन्तु हमारी स्वाधीनता के बाद हमने अपनी जीवनदृष्टि से सुसंगत तंत्रों के या अपनी व्यवस्थाओं के विकास का कोई प्रयास नहीं किया है। अंग्रेजी शासन ने उन के लाभ के लिये भारत में प्रतिष्ठित की हुई शासन, प्रशासन, न्याय, राजस्व, अर्थ, उद्योग, कृषि, शिक्षा आदि सभी व्यवस्थाएं हमने निष्ठा के साथ आज भी वैसी ही बनाए रखी है।

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