64 Kalas of ancient India (प्राचीन भारत में चौंसठ कलाऍं)

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Bharatiya Kala Vidya (भारतीय कला विद्या)

कला प्राचीन भारतीय शिक्षाप्रणाली का महत्त्वपूर्ण अंग हुआ करता था। मानव जीवन को सुन्दर एवं परिष्कृत बनाने में कला का विशेष योगदान है। इनकी संख्या चौंसठ होने के कारण इन्हैं चतुष्षष्टिः कला भी कहा जाता है।

कला के प्रकार॥ Kinds of Kalas

प्राचिन साहित्य में पूर्णावतार परमात्मा को 64 कलाओं से युक्त कहा गया है। वात्स्यायन सूत्र एवं शुक्र नीति में कला के 64 प्रकारों का विवेचन है तथा ललित-विस्तर इसके 86 प्रभेदों का निरूपण करता है। जैन एवं बौद्ध परंपरा के ग्रन्थों में चौंसठ कलाओं की सूची मिलती है। जैन आचार्य शेखरसूरि के प्रबन्धकोष में इसके 72 प्रकारों का विश्लेषण है।जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, 64 कलाओं की गणना के संबंध में भिन्नताएं हैं। इन कलाओं का उल्लेख इन ग्रन्थोंमें प्राप्त होता है -

  • शैवतन्त्रम् ॥ Shaivatantra
  • महाभारतम् (व्यास महर्षि )॥ Mahabharata by Vyasa Maharshi
  • कामसूत्रम् (वात्स्यायन)॥ Kamasutra by Vatsyayana
  • नाट्यशास्त्रम् (भरतमुनि)॥ Natya Shastra by Bharatamuni
  • भगवतपुराणम् (टिप्पणी)॥ Bhagavata Purana (Commentary)
  • शुक्रनीतिः (शुक्राचार्य)॥ Shukraneeti by Shukracharya
  • शिवतत्त्वरत्नाकरः (बसवराजेन्द्र)॥ Shivatattvaratnakara by Basavarajendra

इनमें से कुछ ग्रंथों में वर्णित कलाओं की सूची को निम्न तालिका में जोड़ा गया है-

कलाऍं ॥ Kala (Arts)
क्र.सं. ललितविस्तर [1] प्रबन्धकोश[2] शैवतन्त्रम्[3][4][5] शुक्रनीतिसारः[6][7]
1 लङ्घितम्-कूदना। लिखितम् गीतम् - गानविद्या। हावभावादिसंयुक्तं नर्त्तनम् - हावभाव के साथ नाचना।
2 प्राक्चलितम्-उछलना। गणितम् वाद्यम् - भिन्न-भिन्न प्रकार के बाजे बजाना। अनेकवाद्यविकृतौ तद्वादने ज्ञानम्- आरकेस्ट्रा में अनेक प्रकार के बाजे बजा लेना।
3 लिपिमुद्रागणनासंख्यासालम्भधनुर्वेदाः- लेखनकला, हाथकी उंगलियों से भिन्न-भिन्न आकृतियों को बनाना, गिनना, संख्याओं की गिनती, कुश्ती, धनुषविद्या। गीतम् नृत्यम् - नाचना। स्त्रीपुंसोः वस्त्रालंकारसन्धानम्- स्त्री और पुरुषों को वस्त्र - अलंकार पहनाने की कला।
4 जवितम् - दौड़ना। नृत्यम् आलेख्यम् - चित्रकारी। अनेकरूपाविर्भावकृतिज्ञानम्- पत्थर, काठ आदि पर भिन्न-भिन्न आकृतियों का निर्माण ।
5 प्लवितम् - पानी में डुबकी लगाना । पठितम् विशेषकच्छेद्यम् - तिलकरचना, पत्रावलीरचना के साँचे बनाना। शय्यास्तरणसंयोगपुष्पादिग्रथनम् - फूल का हार गूंथना और शय्या सजाना।
6 तरणम् -तैरना। वाद्यम् तण्डुलकुसुमयलिविकाराः - पूजा के लिये अक्षत एवं पुष्पों को सजाना। द्यूताद्यनेकक्रीडाभी रञ्जनम् - जुआ इत्यादि से मनोरंजन करना
7 इष्वस्त्रम् -तीर चलाना। व्याकरणम् पुष्पास्तरणम् - पुष्पसज्जा। अनेकासनसन्धानै रमतेर्ज्ञानम्- कामशास्त्रीय आसनों आदि का ज्ञान।
8 हस्तिग्रीवा- हाथी की सवारी करना। छन्दः दशनवसनाङ्गरागाः - दाँत-वस्त्र एवं शरीर के अंगों को रंगना। मकरन्दासवादीनां मद्यादीनां कृतिः - भिन्न-भिन्न भाँति के शराब बनाना।
9 रथः- रथ से सम्बद्ध ज्ञान। ज्योतिषम् मणिभूमिकाकर्म - भूमि को मणियों से सजाना। शल्यगूढाहृतौ सिराघ्रणव्यधे ज्ञानम्- शरीर में घुसे हुए शल्य को शस्त्रों की सहायता से निकालना, जर्राही।
10 धनुष्कलाप-धनुष-सम्बन्धी विज्ञान। शिक्षा शयनरचनम् - शय्या की रचना। हीनाद्रिरससंयोगान्नादिसम्पाचनम्- नाना रसों का भोजन बनाना ।
11 अश्व पृष्ठम्- घोड़े की सवार। निरुक्तम् उदकवाद्यम् - जल पर हाथ से इस प्रकार आघात करना कि मृदङ्ग आदि वाद्यों के समान ध्वनि उत्पन्न हो। वृक्षादिप्रसवारोपपालनादिकृतिः- पेड़-पौधों की देखभाल, रोपाई, सिंचाई का ज्ञान ।
12 स्थैर्यम् - स्थिरता। कात्यायनम् उदकाघातः - जलक्रीड़ा के समय कलात्मक ढंग से छींटे मारना या जल को उछालना। पाषाणधात्वादिदृतिभस्मकरणम्- पत्थर और धातुओं को गलाना तथा भस्म बनाना ।
13 स्थाम- बल। निघण्टुः चित्रायोगाः - औषधि, मणि, मंत्र आदि के रहस्यमय प्रयोग। यावदिक्षुविकाराणां कृतिज्ञानम्-फल के रस से मिश्री, चीनी आदि भिन्न-भिन्न चीजें बनाना।
14 सुशौर्यम् -साहस। पत्रच्छेद्यम् माल्यग्रथनविकल्पाः - औषधि, मणि, मंत्र आदि के रहस्यमय प्रयोग। धात्वोषधीनां संयोगक्रियाज्ञानम्- धातु और औषधों के संयोग से रसायनों का बनाना।
15 बाहुव्यायाम-बाहु का व्यायाम। नखच्छेद्यम् शेखरकापीडयोजनम् - शेखरक और आपीड (शिर पर धारण किये जाने वाले पुष्पाभरण) की योजना। धातुसाङ्कर्यपार्थक्यकरणम्-धातुओं के मिलाने और अलग करने की विद्या ।
16 अङ्कुशग्रहपाशग्रहाः - अंकुश और पाश, इन दोनों हथियारों का ग्रहण करना। रत्नपरीक्षा नेपाथ्ययोगाः - वेश-भूषा धारण की कला। धात्वादीनां संयोगापूर्वविज्ञानम्- धातुओं के नये संयोग बनाना ।
17 उद्याननिर्माणम्-ऊँची वस्तु को फाँदकर और दो ऊँची वस्तु के बीच से कूदकर पार जाना। आयुधाभ्यासः कर्णपत्रभङ्गाः - हाथीदाँत के पत्तरों आदि से कर्णाभूषण की रचना। क्षारनिष्कासनज्ञानम्- खार बनाना ।
18 अपयानम्-पीछे की ओर से निकलना। गजारोहणम् गन्धयुक्तिः - सुगंध की योजना। पदादिन्यासतः शस्त्रसन्धाननिक्षेपः- पैर ठीक करके धनुष चढ़ाना और बाण फेंकना।
19 मुष्टिबन्ध-मुट्ठी और घूसे की कला। तुरगारोहणम् भूषणयोजनम् - आभूषण निर्माण की कला। सन्ध्याघाताकृष्टिभेदैः मल्लयुद्धम्- तरह-तरह के दाँव-पेंच के साथ कुश्ती लड़ना ।
20 शिखाबन्ध- शिखा बाँधना। तपःशिक्षा ऐन्द्रजालम् - इन्द्रजाल या जादू का खेल। अभिलक्षिते देशे यन्त्राद्यस्त्रनिपातनम्- शस्त्रों को निशाने पर फेंकना ।
21 छेद्यम्- भिन्न-भिन्न सुन्दर आकृतियों को काटकर बनाना। मन्त्रवादः कौचुमारयोगाः - कुचुमारतंत्र में बताये गये वाजीकरण आदि प्रयोग। वाद्यसंकेततो व्यूहरचनादि - बाजे के संकेत से सेना की व्यूह रचना।
22 भेद्यम् - छेदना। यन्त्रवादः हस्तलाघवम् - हाथ की सफाई। गजाश्वरथगत्या तु युद्धसंयोजनम्- हाथी, घोड़े या रथ से युद्ध करना ।
23 तरणम् -नाव खेना या जहाज चलाना या तैरना। रसवादः विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकारक्रिया - नाना प्रकार के व्यंजन, यूष-सूप आदि बनाने की कला । विविधासनमुद्राभिः देवतातोषणम्- विभिन्न आसनों तथा मुद्राओं के द्वारा देवता को प्रसन्न करना।
24 स्फालनम् -(कन्दुक आदि को) उछालनेका कौशल। स्वन्यवादः पानकरसरागासवयोजनम् - प्रपाणक, आराव आदि पेय बनाने की कला। सारथ्यम् - रथ हाँकना, वाहन चलाना।
25 अक्षुण्णवेधित्वम् -भाले से लक्ष्यबेथ करना। रसायनम् सूचीवापकर्म - वस्त्ररचना एवं कढ़ाई का शिल्प। गजाश्वादे: गतिशिक्षा- हाथी-घोड़ों आदि की चाल सिखाना।
26 मर्मवेधित्वम् -मर्मस्थल का बेधना। विज्ञानम् सूत्रक्रीडा - हाथ के सूत्र (धागा आदि) से नानाप्रकार की आकृतियॉं बुनना। मृत्तिकाकाष्ठपाषाणधातुभाण्डादिसत्क्रिया -मिट्टी, लकड़ी पत्थर और धातु के बर्तन बनाना
27 शब्दवेधित्वम् - शब्दबेधी बाण चलाना। तर्कवादः वीणाडमरुकवाद्यानि - वीणा, डमरु आदि बजाना। चित्राद्यालेखनम् - चित्र बनाना।
28 दृढप्रहारित्वम् मुष्टिप्रहार करना। सिद्धान्तः प्रहेलिका - पहेलियाँ बुझाना। तटाकवापीप्रसादसमभूमिक्रिया - कुँआ, पोखरे खोदना तथा जमीन बराबर करना।
29 अक्षक्रीडा-पाशा फेंकना। विषवादः प्रतिमा* - अंत्याक्षरी। घट्याद्यनेकयन्त्राणां वाद्यानां कृतिः - वाद्य - यन्त्र तथा पनचक्की जैसी मशीनों का बनाना।
30 काव्यव्याकरणम्-काव्य की व्याख्या करना। गारुडम् दुर्वाचकयोगाः - कठिन उच्चारण और गूढ अर्थों वाले श्लोकों की रचना। हीनमध्यादिसंयोगवर्णाद्यै रंजनम् - रंगों के भिन्न-भिन्न मिश्रणों से चित्र रँगना।
31 ग्रन्थरचितम्- ग्रन्थ - रचना। शाकुनम् पुस्तकवाचनम् - पुस्तक बाँचने का शिल्प। जलवाटवग्निसंयोगनिरोधैः क्रिया - जल, वायु, अग्नि को साथ मिलाकर और अलग-अलग रखकर कार्य करना, इन्हें बाँधना।
32 रूपम् - रूप निर्माण कला ( लकड़ी-सोना इत्यादि में आकृति बनाना )। वैद्यकम् नाटिकाख्यायिकादर्शनम्  - नाट्य एवं कथा-काव्यों का रसास्वादन। नौकारथादियानानां कृतिज्ञानम् - नौका, रथ आदि सवारियों का बनाना।
33 रूपकर्म- चित्रकारी। आचार्यविद्या काव्यसमस्यापूरणम् - समस्यापूर्ति। सूत्रादिरज्जुकरणविज्ञानम्- सूत और रस्सी बनाने का ज्ञान।
34 अधीतम् -अध्ययन करना। आगमः पट्टिकावानवेत्रविकल्पाः - बेंत ओर बाँस का शिल्प। अनेकतन्तुसंयोगैः पटबन्धः- सूत से कपड़ा बुनना।
35 अग्निकर्म-आग पैदा करना । प्रासादलक्षणम् तक्षकर्माणि - नक्काशी का काम। रत्नानां वेधादिसदसद्ज्ञानम् - रत्नों की परीक्षा, उन्हें काटना- छेदना आदि।
36 वीणा- वीणा बजाना । सामुद्रिकम् तक्षणम् - काष्ठकर्म। स्वर्णादीनान्तु याथार्थ्यविज्ञानम् - सोने आदि के जाँचने का ज्ञान।
37 वाद्यनृत्यम् -नाचना और बाजा बजाना । स्मृतिः वास्तुविद्या - स्थापत्य शिल्प कृत्रिमस्वर्णरत्नादिक्रियाज्ञानम् - बनावटी सोना, रत्न (इमिटेशन) आदि बनाना।
38 गीतपठिम् -गाना और कविता- पाठ करना। पुराणम् रूप्यरत्नपरीक्षा  - चाँदी-सोना आदि धातुओं तथा रत्नों की परीक्षा। स्वर्णाद्यलंकारकृतिः - सोने आदि का गहना बनाना।
39 आख्यातम् -कहानी सुनाना। इतिहासः धातुवादः - धातु-शोधन, मिश्रण आदि। लेपादिसत्कृतिः- मुलम्मा देना, पानी चढ़ाना।
40 हास्यम् -मजाक करना। वेदः मणिरागाकरज्ञानम् - मणियों को रंगना एवं उनके आकर का ज्ञान। चर्मणां मार्दवादिक्रियाज्ञानम् चमड़े को नर्म बनाना।
41 लास्यम् -सुकुमार नृत्य । विधिः वृक्षायुर्वेदयोगाः - वृक्षों के दीर्घायुष्य का शिल्प एवं उपवन लगाने की कला। पशुचर्माङ्गनिर्हारज्ञानम्-पशु के शरीर से चमड़ा, मांस आदि को अलग कर सकना।
42 नाट्यम् -नाटक, अनुकरण नृत्य । विद्यानुवादः मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधिः - मेष आदि पशु पक्षियों को लड़ाना। दुग्धदोहादिघृतान्तं विज्ञानम् - दूध दुहना और उससे घी आदि निकालना।
43 विडिम्बितम् - दूसरे का व्यंगात्मक अनुकरण, कैरिकेचर, मिमिक्री। दर्शनसंस्कारः शुकसारिकाप्रलापनम्  - तोता-मैना आदि को बोलना सिखाना। कञ्चुकादीनां सीवने विज्ञानम् - चोली आदि का सीना ।
44 माल्यग्रन्थनम्-माला गूंथना। खेचरीकला उत्सादने संवाहने केशमर्दने च कौशलम् - शरीर दबाने, सिर पर तेल लगाने आदि की कला। जले बाह्वादिभिस्तरणम् हाथ की सहायता से तैरना।
45 संवाहितम्-शरीर की मालिश। भ्रामरीकला अक्षरमुष्टिकाकथनम् - संकेत भाषा का ज्ञान। गृहभाण्डादेर्मार्जने विज्ञानम् - घर तथा घर के बर्तनों को साफ करने में निपुणता।
46 मणिरागः- कपड़ा रँगना इन्द्रजालम् म्लेच्छितकविकल्पाः - गुप्तभाषा का ज्ञान। वस्त्रसंमार्जनम् - कपड़ा साफ करना।
47 वस्त्ररागः-बहुमूल्य पत्थरों को रँगना। पातालसिद्धिः देशभाषाज्ञानम्  - लोकभाषाओं का ज्ञान। क्षुरकर्म - हजामत बनाना ।
48 मायाकृतम्-इन्द्रजाल। धूर्तशम्बलम् पुष्पशकटिका- पुष्पों से गाड़ी आदि बनाना या सजाना। तिलमांसादिस्नेहानां निष्कासने कृतिः-तिल और मांस आदि से तेल निकालना।
49 स्वप्नाध्यायः-सपनों का अर्थ लगाना। गन्धवादः निमित्तज्ञानम् - शकुन ज्ञानम् । सीराद्याकर्षणे ज्ञानम्-खेत जोतना, निराना आदि।
50 शकुनिरुतम् - पक्षी की बोली समझना। वृक्षचिकित्सा यन्त्रमातृका - यंत्ररचना का शिल्प। वृक्षाद्यारोहणे ज्ञानम् - वृक्ष आदि पर चढ़ना।
51 स्त्रीलक्षणम् -स्त्री का लक्षण जानना। कृत्रिममणिकर्म धारणमातृका - स्मरणशक्ति बढ़ाने की कला। मनोनुकूलसेवायाः कृतिज्ञानम् - अनुकूल सेवा द्वारा दूसरों को प्रसन्न करना ।
52 पुरुषलक्षणम्-पुरुष का लक्षण जानना। सर्वकरणी सम्पाठ्यम् - काव्यपाठ की कला। वेणुतृणादिपात्राणां कृतिज्ञानम् -बाँस, नरकट आदि से बर्तन आदि बना लेना।
53 अश्वलक्षणम् - घोड़े का लक्षण जानना। वश्यकर्म मानसीकाव्यक्रिया - मौखिक काव्यरचना। काचपात्रादिकरणविज्ञानम् - शीशे का बर्तन आदि बनाना।
54 हस्तिलक्षणम् - हाथी का लक्षण जानना। पणकर्म अभिधानकोष - शब्दकोष। जलानां संसेचनं संहरणम् - जल लाना और सींचना।
55 गोलक्षणम् गाय, बैल का लक्षण जानना। सूचित्रकर्म छ्न्दोज्ञानम् - छन्द का ज्ञान। लोहाभिसारशस्त्राकृतिज्ञानम्-धातुओं से हथियार बनाना।
56 अजलक्षणम् - बकरा, बकरी का लक्षण जानना। काष्ठघटन कर्म क्रियाकल्पः - काव्यालंकार का ज्ञान। गजाश्ववृषभोष्ट्राणां पल्याणादिक्रिया - हाथी, घोड़ा, बैल, ऊँट आदि का जीन, चारजामाओं का हौदा बनाना।
57 मिश्रितलक्षणम् - मिलावट पहचानने की या भिन्न-भिन्न जन्तुओं को पहचानने की कला। पाषाणकर्म छलितकयोगाः - छलने का कौशल। शिशोस्संरक्षणे धारणे क्रीडने ज्ञानम्-बच्चों को पालना और खेलाना।
58 कैटभेश्वरलक्षणम् - लिपि विशेष। लेपकर्म वस्त्रगोपनानि - असुंदर को छिपाते हुये वस्त्रधारण का कौशल। अपराधिजनेषु युक्तताडनज्ञानम्-अपराधियों को ढंग से दण्ड देना।
59 निघण्टु- कोष। चर्मकर्म द्यूतविशेषः - द्यूतक्रीडा। नानादेशीयवर्णानां सुसम्यग्लेखने ज्ञानम्-भिन्न-भिन्न देशीय लिपियों का लिखना।
60 निगमः-श्रुति। यन्त्रकरसवती आकर्षक्रीडा - पासे का खेल। ताम्बूलरक्षादिकृतिविज्ञानम्-पान को रखने, बीड़ा बनाने की विधि।
61 पुराणम्-पुराण। काव्यम् बालकक्रीडनकानि - बच्चों की विभिन्न क्रीडाओं का ज्ञान। आदानम् - कलामर्मज्ञता।
62 इतिहासः-इतिहास। अलंकारः वैनायिकीनां विद्यानां ज्ञानम् - विनय सिखाने वाली विद्याओं का ज्ञान। आशुकारित्वम् - शीघ्र काम कर सकना ।
63 वेदः - वेद। हसितम् वैजयिकीनां विद्यानां ज्ञानम् - विजय दिलाने वाली विद्याओं का ज्ञान। प्रतिदानम् - कलाओं को सिखा सकना ।
64 व्याकरणम्-व्याकरण। संस्कृतम् व्यायामिकीनां नांविद्यानां ज्ञानम्  - व्यायामविद्या का ज्ञान। चिरक्रिया - देर-देर से काम करना।
65 निरुक्तम् - निरुक्त । प्राकृतम्
66 शिक्षा - उच्चारणविज्ञान। पैशाचिकम्
67 छन्दः- छन्द। अपभ्रंशम्
68 यज्ञकल्पः-यज्ञ-विधि। कपटम्
69 ज्योतिः-ज्योतिष। देशभाषा
70 सांख्यम्-सांख्यदर्शन। धातुकर्म
71 योगः-योगदर्शन। प्रयोगोपायः
72 क्रियाकल्पकः काव्य और अलंकार । केवलिविधिः
73 वैशेषिकम् - वैशेषिक दर्शन।
74 वेशिकम् - ‘कामसूत्र' के अनुसार वेशिक विज्ञान का प्रकरण (दत्तक नामकने पाटलिपुत्र की वेश्याओं के अनुरोध से प्रणीत किया था)।
75 अर्थविद्या - राजनीति और अर्थशास्त्र।
76 बार्हस्पत्यम् -लोकायत मत।
77 आश्चर्यम्
78 आसुरम्-असुर-सम्बन्धी विद्या।
79 मृगपक्षिरुतम् -पशुपक्षी की बोली समझना।
80 हेतुविद्या -न्याय दर्शन।
81 जतुयन्त्रम् -लाख के यन्त्र बनाना।
82 मधूच्छिष्टकृतम् -मोम का काम ।
83 सूचीकर्म-सुई के काम।
84 विदलकर्म-दलों या हिस्सों को अलग कर देने का कौशल।
85 पत्रच्छेद्यम् - पत्तियों को काट-छाँटकर विभिन्न आकृतियाँ बनाना।
86 गन्धयुक्तिः - कई द्रव्यों के मिश्रण से सुगन्धि तैयार करना।

* शब्दकल्पद्रुम में प्रतिमाला के स्थान में प्रतिमा (मूर्तिकला) का उल्लेख है।

कलाओं का वर्गीकरण॥ Classification of Arts

कलाओं के वर्गीकरण की प्रवृत्ति आधुनिक है। संस्कृत वाङ्मय में कलाओं का परिगणन हुआ है न कि वर्गीकरण। ललितकला शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कालिदास साहित्य में हुआ है किन्तु कलाओं का वर्गीकरण उनका अभिप्राय नहीं है। शुक्रनीति में भी कलाओं के वर्गीकरण का प्रयास किञ्चित् परिलक्षित है। यहां स्रोत की दृष्टि से कलाओं के चार वर्ग कहे गये हैं-

  1. गान्धर्ववेदोक्त कला= नृत्य, वाद्य, वस्त्रालंकार, संधान, पुष्पग्रथन, शयन-रचना, द्यूत-क्रीडा, रतिज्ञान आदि सात कलाऐं इस वर्ग में आती हैं।
  2. आयुर्वेदोक्त कला= आसव-मद्य आदि बनाने की कला, शल्य-क्रिया की कला, पाककला, धातुवाद, क्षार-निष्कासन आदि दस कलाऐं इस श्रेणी में परिगणित होती है।
  3. धनुर्वेदोक्त कला= शस्त्रसन्धान, मल्लयुद्ध, यन्त्रादि, संचालन, अस्त्रसंचालन, व्यूहरचना आदि पॉंच धनुर्वेदोक्त कलाऐं हैं।
  4. विविध = मृत्तिका- काष्ठ-पाषाण और धातु से भाण्डरचना, चित्रादि आलेखन, तडाग-वापी-प्रासाद आदि की रचना पृथक-पृथक् कलाऐं हैं।

शिल्प एवं कला॥ Crafts & Arts

यह वर्गीकरण उपजीव्य स्रोत की दृष्टि से है। शिल्प और कला का भेद यहां नहीं है। वस्तुतः प्राचीन वाङ्ममय में जिस व्यापक अर्थ में शिल्प शिल्प शब्द का प्रयोग हुआ करता था उस अर्थ में वर्तमान युग में कला शब्द का प्रयोग होता है। तथा शिल्प कला का विशेषण बन गया है। आधुनिक विचारकों ने कला को मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त किया है-

  1. ललित कलाऐं = इसके अन्तर्गत वास्तु, मूर्ति, चित्र, संगीत और काव्य को रखा गया है। यद्यपि अधिकांश विद्वान् काव्य को कला मानने के पक्ष में नहीं हैं। इसे चारुशिल्प भी कहा गया है। यह कलाकार की महान् साधना, अंतःप्रज्ञा और अभ्यास से प्रसूत होती है। सौंदर्य, रस और आनन्द की सृष्टि ही इसका मूल लक्ष्य है।
  2. शिल्प कलाऐं = दैनिक जीवन की आवश्यकताओं को सुन्दर ढंग से पूर्ण करने के लिये जो कौशल विकसित हुए हैं जैसे- पुष्पसज्जा, गन्धयुक्ति, वृक्षायुर्वेद, तक्षण कर्म आदि उन्हैं इस वर्ग में रखा गया है। इसे कारुशिल्प या उपयोगी कलाऐं भी कहा गया है।

विद्याओं के साथ ही इन कलाओं का अध्ययन भी भारतीय सुबुद्ध नागरिक क्योंकि कला जीवन जीने की कला है तथा प्रेममय दाम्पत्य जीवन, सुखी परिवार और सुन्दर समाज की आधार शिला है। संस्कृत वाङ्ममय में निबद्ध कलाऐं पुरातन भारतीय जीवन, सभ्यता, संस्कृति धर्म और दर्शन को समझने तथा वर्तमान जीवन शैली को सँवारने की दृष्टि देती है।

कलाओं का संक्षिप्त परिचय

गीतम् ॥ Geeta

संस्कृत वाङ्ममय में ' गीत, वाद्य, तथा नृत्य इन तीनों की त्रयी को संगीत कहा गया है।

गीतं वाद्यं तथा नृत्तं त्रयं संगीतमुच्यते।(संगीत रत्नाकर१/२१)

संगीत में वाद्य गीत का अनुगामी है और नृत्य वाद्य का। अतः गीत ही प्रधान एवं प्रथम है।

नृत्यं वाद्यानुगं प्रोक्तं वाद्यं गीतानुवर्ति च। अतो गीतं प्रधानत्वादत्रादावभिधीयते॥ (संगीत रत्नाकर १/२५)

गीत नादब्रह्म की साधना है, फलतः पुरुषार्थ चतुष्टय की साधक है-

धर्मार्थकाममोक्षाणामिदमेवैकसाधनम् ।(संगीत रत्नाकर १/३०)

आचार्य शार्गदेवके अनुसार मनोरंजक स्वरसमुदाय की संज्ञा गीत है-

रञ्जकः स्वरसन्दर्भो गीतमित्यभिधीयते।((संगीत रत्नाकर ४/१)

संगीतकला के उद्भावक ब्रह्मा अथवा आदिदेव भगवान् शिव हैं। उनके पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और आकाशोन्मुख इन पाँच मुखों से क्रमशः भैरव, हिण्डोल, मेघ, दीपक और श्रीराग उद्भूत हुये हैं। नन्दिकेश्वर, नारद, स्वाति, भरत, तुम्बरु आदि संगीत के आद्य आचार्य हैं। गायन कला का स्रोत वेदों में सामवेद और उपवेदों में गान्धर्ववेद है। बृहदारण्यक उपनिषद् में '''साम'' शब्द की अत्यन्त सुन्दर निरुक्ति है-

सा च अमश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् ॥

'सा' का अर्थ है- 'ऋक्' और 'अम्' का अर्थ है-गान्धार आदि स्वर ऋक् से सम्बद्ध स्वरबद्ध गायन ही साम है।ऋग्वेद में भी सामगान का बहुशः उल्लेख हुआ है।

सामगान के चार प्रकार हैं

  1. वेयगान या (ग्राम) गेय गान
  2. आरण्य गान
  3. ऊहगान
  4. ऊह्यगान

नारदीय शिक्षा के अनुसार साम के स्वरमण्डल में-७ स्वर, ३ग्राम, २१ मूर्च्छ्नायें तथा ४९ तान हैं।

गीत कला के दो भेद हैं- गान्धर्व और गान।

  1. गान्धर्व-सनातनकाल से प्रचलित, गन्धर्वों द्वारा प्रयुक्त, श्रेयस् का हेतु गीत सम्प्रदन्य ''गान्धर्व" कहा जाता है। इसे ही भरतादि आचार्यों द्वारा प्रयुक्त मार्ग संगीत कहते हैं। भगवान् विरिञ्चि द्वारा इसका मार्गण या खोज होने के कारण इसे मार्ग कहा गया है।
  2. गान - लोकगायकों द्वारा रचित देशी रागादि से युक्त लोकरंजक गीत गान कहा जाता है। इसी की संज्ञा देशी गीत है।

वाद्यम् ॥ Vadya

कामसूत्र की 64 कलाओं में द्वितीय कला है वाद्यम् अर्थात् वादन-कला। गीत, नृत्य और नाट्य की पूर्णता वाद्य से मानी गई है। अतः संगीत के अन्तर्गत वाद्य का विशेष महत्त्व है।

संगीत के स्वरों की उत्पत्ति सर्वप्रथम मानव की शरीररूपी वीणा पर हुई, तत्पश्चात् दारवी (लकड़ी की) वीणा पर। तदन्तर ये स्वर पुष्कर एवं घन वाद्यों में संक्रान्त हुये हैं। नारदीयशिक्षा के अनुसार वाद्य पाँच प्रकार के हैं। प्रथम ईश्वरनिर्मित मानव कण्ठ नैसर्गिक वाद्य है, अन्य चार मनुष्यनिर्मित हैं। मानवनिर्मित वाद्य चार प्रकार के हैं -

ततं चैवावनद्धं च घनं सुषिरमेव च । चतुर्विधं तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम् ॥

(1) तत (2) अवनद्ध (3) घन तथा (4) सुषिर वाद्य। वीणा आदि तन्त्री - वाद्य तत वाद्य कहे जाते हैं। मृदङ्ग, मर्दल, दुन्दुभि आदि पुष्करवाद्य अवनद्ध (चमड़े की डोरियों से बँधे हुये) वाद्य हैं। ताल, घण्टा, मंजीरा आदि की संज्ञा घनवाद्य है। वंशी, तूर्य, शंख, शृड्ग आदि सुषिर (छिद्रयुक्त) वाद्य हैं।

इन चतुर्विध वाद्यों की उत्पत्ति, प्रकार, वाद्यवादनपद्धति, उत्तम वादक के गुण, वाद्यवादन के अवसर एवं फल का वर्णन भरत के नाट्यशास्त्र में विस्तार से हुआ है। वादनकला के सन्दर्भ ऋग्वेद से ही प्राप्त होने लगते हैं। यहाँ वीणा के लिये 'वाण' शब्द का प्रयोग हुआ है। हिरण्यकेशी सूक्त में 'आघाटी' शब्द का प्रयोग वाद्यवृन्द के लिये हुआ है।

रामायण के साथ किया लव-कुश तन्त्री-लय द्वारा रामकथा का गायन गया है उत्सव, पुत्रजन्म, विवाह, नृप-मंगल (राज्याभिषेक, दिग्विजय), नाट्यप्रयोग आदि वाद्यकला के प्रयोग के अवसर हैं। ऋतु के अनुकूल वाद्ययोजना भी भारत का वैशिष्ट्य है। वर्षा में घनगर्जन के समान गम्भीर मृदङ्ग की थाप तो ग्रीष्म में शीतल वंशी की सुरीली तान, सब कुछ प्रकृति के छन्द मिलाते हुये हैं।

नृत्यम् ॥ Nrtya

नृत्यम् मानव की अन्तश्चेतना में निहित आनन्दोपासना की चिरन्तन प्रवृत्ति नृत्यकला को जन्म देती है। ‘नृत्य' संगीत का अंग भी है और एक स्वतन्त्र कला भी। सृष्टि का प्रारम्भ इस ‘नर्तन’ से ही हुआ है।

अत्रा वो नृत्यतामिव तीव्रो रेणुरपातयत।

सुसंरब्ध, निष्पन्द अवस्था में विद्यमान सृष्टि के उपादानों में स्पन्दन एवं तीव्र विक्षोभ ही सृष्टि का आरम्भ है अतः नर्तन मूल प्रवृत्ति के रूप में प्राणिजगत् में सर्वत्र देखा जाता है। '‘हम दीर्घजीवी होकर नृत्य और आनन्द के लिये अभ्युदय की ओर अग्रसर हों'' यह कामना विश्व के प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में सुस्पष्ट है। ‘नृत्य’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘नृत्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है नर्तन या अङ्गविक्षेप। यह नर्तन दो प्रकार से हो सकता है-

  1. केवल ताल और लय के आधार पर नर्तन, इसे ही नृत्त, देशी अथवा लोकनृत्य कहा जाता है।
  1. रस और भाव के अभिनय से युक्त नर्तन को नृत्य कहा जाता है। है। भावाश्रय नृत्य में भावाभिव्यञ्जना प्रमुख होती है। अतः नन्दिकेश्वर ने नृत्य की परिभाषा इस प्रकार दी है-रसभावव्यंजनादियुक्तं नृत्यमितीर्यते। नर्तक द्वारा गीत और वाद्य के साथ करणों और अंगहारों का प्रदर्शन करते हुये; रस एवं भाव की कलात्मक अभिव्यक्ति नृत्य कही जाती है।

भरतमुनि के अनुसार नृत्य के आद्य आचार्य भगवान् शिव हैं। दक्ष के यज्ञध्वंस के पश्चात् भगवान् शिव द्वारा रेचक, अङ्गहार, पिण्डीबन्ध आदि के साथ नृत्य की शिक्षा तण्डु मुनि को दी गई। तण्डु द्वारा गीत और वाद्य के साथ इसका नाट्य में प्रयोग किया गया। तण्डु द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इसकी संज्ञा ताण्डव है। ताण्डव उद्धत नृत्य है । नृत्य में मधुर भावों के निवेश के लिये पार्वती ने ''लास्य नृत्य'' की उद्भावना की ।

नाट्यदर्पण में नृत्य चार अड्ग कहे गये हैं-गीत, अभिनय, भाव एवं ताल यशोधर ने इनमें करणों और अङ्गहारों का योग कर इनकी संख्या छः बताई है। लौकिक संस्कृत साहित्य में संगीतकला का सबसे सुन्दर उदाहरण मालविका द्वारा प्रस्तुत छलिक नृत्य (मा. ग्नि. 218) है। अप्सरायें नृत्यकला में विशेष निपुण कही गई हैं।

आलेख्यम् ॥ Alekhya

संस्कृत वाङ्मय में चित्रकला के लिये लेख्य या आलेख्य पद का तथा चित्रांकन के लिये ‘लिखितम्', 'लिखितानि', 'आलिखन्ती' आदि पदों का बहुल प्रयोग हुआ है। लिखू धातु का प्रयोग चित्रकला में रेखा (लेखा) के महत्त्व को स्पष्ट करता है। रेखाओं में चित्र उसी प्रकार प्रतिष्ठित होता है, जिस प्रकार रीतियों में काव्य। 'लेखा' से ही चित्र के अंगप्रत्यङ्ग का लावण्य उन्मीलित होता है। 'चित्र' शब्द का प्रयोग सामान्य रूप से अलोकसामान्य या विस्मयजनक के लिये किया जाता है। ब्राह्मी और मानसी सृष्टि के असंख्य रूपों और भावों को वर्णों और रेखाओं के माध्यम से प्रत्यक्ष कराता हुआ चित्र, विस्मयजनक आनन्द की सृष्टि के कारण 'चित्र' कहा जाता है। चित्रकला रूपात्मक ललितकलाओं में सर्वोपरि है। इसे सभी शिल्पों में प्रमुख शरीर में मुख के समान माना गया है-

चित्रं हि सर्वशिल्पानां मुखं लोकस्य च प्रियम् ।

चित्रकला इहलौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रयोजनों को सिद्ध करती है। अतः विष्णुधर्मोत्तर पुराण में कहा गया है-

कलानां प्रवरं चित्रं धर्मकामार्थमोक्षदम् ।

चित्रसूत्र के अनुसार नारायण मुनि ने लोकहित की कामना से देवाङ्गनाओं के अहंकार को समाप्त करने के लिये अपने ऊरु पर सहकाररस से एक सुन्दर स्त्री का चित्र बनाया जिससे उर्वशी नामक अप्सरा का जन्म हुआ। सर्वलक्षणसमन्वित वह प्रथम चित्र था जिसकी शिक्षा एक कला के रूप में नारायण मुनि द्वारा विश्वकर्मा को दी गई। शास्त्रीय ग्रंथों में आलेख्य कला से सम्बद्ध निम्न विषयों का वर्णन हुआ है- (1) चित्र का महत्त्व, उद्देश्य एवं उत्पत्ति (2) चित्र के प्रकार एवं विषय, (3) भूमिबन्ध एवं लेप्य कर्म (4) अण्डक प्रमाण एवं मान (5) ऋज्वायतादि स्थानलक्षण (5) चित्र के गुण-दोष (6) रसदृष्टि (7) चित्रद्रव्य-वर्तिका, लेखनी, वर्ण आदि (8) चित्र के षडग । यशोधर के अनुसार चित्र के ये छह अंग हैं

रूपभेदाः प्रमाणानि लावण्यं भावयोजनम् । सादृश्यं वर्णिकाभङ्ग इति चित्रं षडङ्गकम् ।।

चित्र के कई प्रकार हैं-पटचित्र, पट्टचित्र एवं भित्तिचित्र, विद्धचित्र, अविद्धचित्र, रसचित्र एवं धूलिचित्र आदि ।

जो तरङ्ग, अग्निशिखा, धूम, ध्वजा और स्वरलहरी को वायु की गति के साथ उठता-गिरता, काँपता और लहराता हुआ दिखा पाता है, जो सोये हुये को चेतनायुक्त, मृत को चेतनारहित तथा निम्नोन्नत विभागपूर्वक चित्ररचना में समर्थ है वही श्रेष्ठ चित्रकार है। चित्र के संबंध में दर्शकों की अभिरुचियाँ भिन्न होती हैं। आचार्य रेखाओं के समीक्षक और प्रशंसक होते हैं, तो समालोचक वर्तना के । स्त्रियाँ चित्र के अलंकरण से आकर्षित होती हैं तो सामान्य जन वर्णों की चमक-दमक से । चित्रकला के सुन्दर उदाहरण रामायण, महाभारत, मालविकाग्निमित्र, अभिज्ञानशाकुन्तल, उत्तररामचरित, कादम्बरी, नैषध आदि काव्यग्रंथों में देखे जा सकते हैं ।

विशेषकच्छेद्यम् ॥ Visheshakacchedya

कस्तूरी, अगुरु, चन्दन आदि से तिलकरचना एवं बिन्दी आदि रचना के लिये छेद्य (खाके) बनाने की कला विशेषकच्छेद्य कही जाती है। प्राचीन भारत में तिलक रचना के लिये भूर्ज, तमाल, स्वर्णादि पत्रों को विभिन्न आकृतियों में काटकर खाके बनाये जाते थे। अथवा उन पत्राकृतियों को ही चिपका लिया जाता था। अतः इस कला को पत्रच्छेद्य भी कहा गया है।

विशेषक का अर्थ है- तिलक। विलासिनियों को अति प्रिय होने के कारण; विशेष आदर की अभिव्यक्ति के लिये इसे विशेषक नाम दिया गया है। माघ भी कहते हैं-

स्निग्धांजनश्यामरुचिः सुवृत्तो वध्वाः । विशेषको वा विशिशेष यस्याः श्रियम् ॥

अमरकोश के अनुसार विशेषक के तीन पर्य्याय हैं-तमालपत्र, तिलक एवं चित्रक। तिलकरचना के दो नाम हैं-पत्रलेखा एवं पत्रांगुलि संस्कृत साहित्य में पत्रलता, पत्रप्रपंच, पत्ररचना, पत्रप्रबन्ध, पत्रभङ्ग, पत्रविशेषक, पत्रभक्ति, भक्तिच्छेद, विच्छिति आदि पद इस कला के लिये प्रयुक्त हुये हैं। पत्रलता की आकृतियाँ बारीक तूलिका या लेखनी से ललाट, कपोल, चिबुक, वक्षः स्थल, बाहु आदि पर लिखी जाती थीं। शुक्ल अगुरु या चन्दन के लेप से त्वचा को गौर बनाकर उस पर कृष्ण अगुरु के गाढ़े घोल अथवा कुंकुम रस से पत्ररचना की जाती थी -

कालागुरुदत्तपत्रभक्तिर्भुवश्चन्दनकल्पितेव ॥

पत्रलेख से स्त्रीशरीर की शोभा उसी प्रकार खिल उठती थी जैसे चक्रवाक मिथुनों से अङ्कित सैकत तट वाली गंगा की शोभा शोभायमान होती है।

विन्यस्तशुक्लागुरु चक्रुरङ्गं गोरोचनापत्रविभक्तमस्याः। सा चक्रवाकाङ्कितसैकतायास्त्रिस्रोतसः कान्तिमतीत्य तस्थौ ।।

पत्ररचना में कटावदार पत्राकृतियों के साथ अन्य आकृतियाँ भी बनाई जाती थीं यथा-परस्परसंसक्त चक्रवाकमिथुन, उड़ते हुये हंस, गुँथे हुये मत्स्य एवं मकरसमूह ' भक्तिरचना भूति, श्री और मंगल के लिये की जाती थी। यह निसर्ग के सुन्दर चित्रों को सुगंधित वर्णों से स्वयं अपने शरीर पर सजा लेने की कला थी। यह आधुनिक ''टेटू'' रचना का उत्कृष्ट स्वास्थ्यकर स्वरूप है।

तण्डुलकुसुमयलिविकाराः ॥ Tandula kusumayalivikara

अक्षत (अखण्डित चावल) और पुष्पों को पूजा के लिये सजाना भी एक कला है अक्षतों को अनेक वर्गों में रंगकर देवमदिरों या गृहभूमि पर सुन्दर आकृति की रचना तथा बहुवर्णी पुष्पों के संयोजन से पुष्पोपहार की रचना, प्राचीन भारत की एक ललित कला रही है। जिसे आचार्य वात्स्यायन ने कहा है- ‘तण्डुलकुसमबलिविकाराः’ द्वारा निष्पन्न ‘बलि’ धातु से 'इन्’ प्रत्यय शब्द का अर्थ है-पूजा के दानार्थक बल् लिये भक्तिपूर्वक दिया गया उपहार या नैवेद्य। मेघदूत की विरहिणी यक्षिणी पति के माङ्गल्य के लिये प्रायः पुष्पबलि देती हुई दिखाई पड़ती है। राजभवनों की मणिमय भूमि (फर्श) पर चम्पकदलों के उपहार स्वर्णदीप के समान प्रतीत होते हैं कांचनदीपायमानं चम्पकदलोपहारैः किया प्रातःकाल और संध्याकाल इस ललितकला से था-'अहो विविधसुगन्धिकुसुमोपहारचित्रलिखितभूमिभागस्य' मानी गई थी। यह रंगोली के रूप एक मनोहारी कला जाता को।

श्रीसम्पन्न ......भवनद्वारस्य सश्रीकता।

यह एक मनोहारी कला मानी गई थी यह रंगोली के रूप में विकसित हुई है।

पुष्पास्तरणम् ॥ Pushpaastarana

पुष्पास्तरणम् (पुष्पसज्जा) का देश है। षड् ऋतुओं ने भारत पुष्पों की विविधता सुगन्ध के ऋतुपुष्पों से इस भारतभूमि का शृंगार किया है। निसर्ग की इस मनोरम पुष्प समृद्धि को, कला के कोमलतम उपादान को, मानव ने गृहवाटिकाओं एवं उद्यानों में संजोया तथा पुष्पास्तरण की सुकुमार कला के रूप में जीवन्त किया है। यशोधरा के अनुसार-नानावर्णो बाँधकर वासगृह, उपस्थान-मण्डप आदि की कलात्मक सज्जा के पुष्पों को गूंथकर या सज्जा पुष्प-आधारों या पात्रों पुष्पास्तरण कही जाती है। पुष्प-समृद्धि के उस युग में यह में ही नहीं की अपितु गृहभूमि, उपवनवेदिका, राजमार्ग आदि पर पुष्पों को बिछाकर की जाती थी; अतः इसकी संज्ञा पुष्पास्तरण थी। पुष्पशयन की रचना भी इसी कला का एक अंग थी।

श्रीराम के अभिषेक के अवसर पर पुरवासियों द्वारा सम्पूर्ण राजपथ को कमलों और उत्पलों से सजाया गया था-

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकमलोत्पलाम्।

लाल या गुलाबी कमलों और नील उत्पलों का संयोजन नयनाभिराम होता था।

कालिदास के अनुसार, हर्थों में सजाये गये पुष्पों की गंध दूर से ही पथिकों के मार्गश्रम को हर लेती थी। था। वात्स्यायन ने पुष्पसज्जा को गृहिणी का आवश्यक दैनिक कर्तव्य माना है। उस युग में जीवन का कोई भी उत्सव पुष्पसज्जा के बिना पूर्ण नहीं होता था। पुष्पसज्जा की कला का आज भी व्यापक उपयोग है।

दशनवसनाङ्गरागाः ॥ Dashana vasananga raga

जीवन को सुन्दर रंगों से सजाने का शिल्प था दशनवसनागराग, अर्थात् दाँत, वस्त्र और शरीर के अंगों को रंगने की कला। रञ्ज धातु से भाव अथवा करण अर्थ में घञ् प्रत्यय लगकर निष्पन्न 'राग' शब्द रंजन क्षमता को व्यक्त करता है। इस रंजनक्षमता के कारण ही सभ्यता के उषःकाल से मानव-मन रंगों के प्रति आकर्षित होता आया है।

(१) दशनराग-प्राचीन भारत में विलासिनी स्त्रियाँ सामने के कुछ दाँतों को रँगती थीं। आचार्य भरत ने नेपथ्यविधि के अन्तर्गत इस कला का उल्लेख किया है। संस्कृत साहित्य में इसके अन्य सन्दर्भ अन्वेषणीय हैं।

(ii) वसनराग-उज्ज्वल रंगों से वस्त्रों को रंगकर पहनने की कला है। संस्कृत साहित्य में नाना रंगों-कुसुम्भराग -अरुण, तरुण अर्कराग, बाल अरुण-बभ्रु पाटल, कुसुम्भ- बभ्रु लाक्षालोहित, रक्त, नील, मेचक, शुकपिच्छनील, अलिनील, शुकोदरश्याम, हरिद्रापिञ्जर आदि नाना रंगोंवाले वस्त्रों का वर्णन हुआ है। विलासिनी स्त्रियाँ वसन्त ऋतु में कुङ्कुमराग-पिंजर अंशुकों का प्रयोग करती थीं तो हेमन्त में सराग कौशेयक का । रक्त वर्ण के प्रति अंगनाओं की अभिरुचि अधिक थी- तनूनि लाक्षारसरञ्जितानि धत्ते जनः काममदालसाङ्गः। इस कला में निपुण रंजकों का वर्ग तो था ही, घर की कन्यायें, वधुयें और प्रौढ़ायें भी इस कला में निपुण होती थीं। हर्षचरित में विभिन्न प्रकार की बाँधनू की रंगाई और वस्त्रों पर फूल-पत्तों की छपाई के कार्य में निपुण स्त्रियों का वर्णन हुआ है । वस्त्र रंगने की इस 'डाइंग' कला का आज भी विस्तृत कारोबार है ।

(iii) अंगराग- शरीर के सौंदर्य की वृद्धि के लिये अंगराग का उपयोग अत्यंत प्राचीन काल से होता रहा है। साहित्य में अंगराग के दो गुणों का बहुशः वर्णन हुआ है। प्रथम-लाल रंग, द्वितीय- मनोरम गंध। अंगराग से ललाट, मुख, कपोल एवं वक्षः स्थल को रंजित किया जाता था। अधरराग और चरणराग की कला भी संस्कृत कवियों का वर्ण्य विषय बनी है। आचार्य भरत ने 'अधर-संस्कार' को अधरों का 'विभूषक' माना है। रतिसर्वस्व अधरों में अति माधुर्य, उच्छूनता एवं लालिमा की सृष्टि के लिये निपुण हाथों से रंग भरकर, अधरों की रेखाओं को जब कुछ अधिक गाढ़े रंग से स्पष्ट कर दिया जाता था, तब उनकी छवि अपूर्व लावण्य से भर उठती थी।

चरण-राग के लिये लाक्षारस या अलक्तक का प्रयोग होता था। इसका सर्वाधिक मनोरम वर्णन मालविकाग्निमित्र में हुआ है। नैसर्गिक रूप से अरुण चरणों पर अलक्तक की मसृण शोभा वैसी ही होती थी जैसी कमलकोश पर बाल-अरुण की कोमल धूप वस्तुतः 'दशन-वसन-अंगरागाः' वस्त्रों के साथ ही शरीर के विभिन्न अंगों की उज्ज्वल रंग से रंगने एवं उसके माध्यम से जीवन में रागसृष्टि की कला थी।

मणिभूमिकाकर्म॥

अपने भासुर वर्ण और स्थायी चमक के कारण मणियाँ प्राचीन काल से ही मानव को लुब्ध करती रही हैं। अंधकार में भी आलोक बिखेरने वाली दमकती हुई मणियों को आभूषणों में तो गूँथा गया ही है, राजभवनों और प्रासादों के भूमिनिर्माण के कार्य में भी इनका उपयोग हुआ है। प्राचीन भारत में बहुवर्णी मणियों से कलात्मक डिज़ाइनों में भवन के फर्श की रचना एक शिल्प या कला के रूप में मान्य रही है जिसे वात्स्यायन ने मणि-भूमिका कर्म कहा है। संस्कृत साहित्य में राज-प्रासादों के वर्णनप्रसंग में `मणि-भूमि या मणि-कुट्टिम का बहुलता से वर्णन हुआ है।

इस ऋतु, अवसर और स्थान के अनुकूल मणि-भूमि की रचना में ही कला थी। ग्रीष्म में श्वेत स्फटिक मणि की योजना होती थी जिसे मलयज रस से धोकर और अधिक शीतल बना लिया जाता था। आकाश की नील शोभा की सृष्टि के लिये इन्द्रनीलमणि का प्रयोग होता था तो उपवनों की हरीतिका के मध्य मरकतमणि से भूमिरचना की जाती थी ऋतु द्वारा ‘मणिभूमिका-कर्म’ द्वारा रत्नगर्भा भूमि को रत्नों से सजाने की कला गृह-प्राङ्गण और उपवन की भूमि पर मणियों से रचे गये पुष्पचित्र और इन्द्र धनुष हजारों वर्ष बाद भी म्लान नहीं हुये हैं।

शयनरचनम् ॥ Shayana rachana

शयन-रचन शय्या की विरचना (विशेष रचना) की कला है जिसमें शयन सुख का आनन्द भी समाहित है। शय्या पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन का मर्मस्थान है। व्यक्ति की आयु, वैभव, आवश्यकता, ऋतु, प्रसंग आदि के अनुरूप विविध प्रकार की सुन्दर, सुखद, सुकोमल, कमनीय शय्यायों की रचना एक ऐसी जीवनोपयोगिनी कला है जिसमें सौन्दर्यबोध और कौशल दोनों ही निहित है।

प्रसंगानुकूल शय्या के लिये उपयुक्त स्थान एवं सामग्री का चयन, शय्या की कल्पना, साज-सज्जा एवं अलंकरण आदि का बहुल वर्णन संस्कृत साहित्य में हुआ है। नानाप्रकार की पत्र-पुष्प शय्यायें, यथा-तमालपत्रास्तरण, नवपत्लवसंस्तर, प्रवालशय्या, हेमपल्लवविभङ्गसंस्तर, नलिनीदलशयन, कमलकुमुदकुवलयशयन, कदलीतलप, सुश्लक्ष्म, उपधान, धवल, उत्तरच्छद, हंसधवलशयनतल आदि शयन-रचन की विविधता को सूचित करते हैं।

शय्या की सार्थकता पति-पत्नी के मथुरमिलन में थी। इसका लक्ष्य था-स्वस्थ, सुन्दर सर्जन अर्थात् प्रजनन। ''प्रजायै शयनम'' ही शयनरचना का सार था जिसे वैदिक मन्त्र भी कहते हैं-आरोह तल्पं सुमनस्यमानेह प्रजा जनय पत्ये अस्मै॥

उदकवाद्यम् ॥ Udakavadya

रघुवंश महाकाव्य में महाराज कुश की कलानिपुण अन्तःपुरिकाओं को सरयू नदी में इस कला का आनन्द लेते हुये वर्णित किया गया है। इस वारि-मृदंग ध्वनि का अभिनन्दन तटवर्ती मयूर अपनी केका ध्वनि से करते हैं। वस्तुतः जलप्रवाह में स्वयं ही एक नाद और छन्द होता है। जल के इस नाद को राग और लय में बाँध लेना ही मानवीय कौशल है जिसे प्राचीन भारत की नागरिकाओं ने जलक्रीड़ा के माध्यम से अधिगत किया था।

उदकघातः ॥ Udakaghata

उदकघात-‘उदकघात’ का अर्थ है-जल से आघात; अर्थात् मनोरंजन के लिये एक दूसरे पर जल के छींटे मारना। यह दो प्रकार से संभव है- हाथ से अथवा यन्त्र (पिचकारी) से। जलक्रीड़ा में सच्चा विनोद या मनोरंजन इसी क्रिया से होता है। मोती के समान स्थूल जलकणों से जब प्रहार किया जाता है, तब विलासिनियों को अपने टूटते हुये मुक्ताहारों का भी बोध नहीं रहता। जल से मोती की लड़ियों या चाँद की कतारों का बनना तभी संभव है जब निरन्तर एक लय में पानी उछाला जाये और यही इस विनोद का कलात्मक पक्ष है।

इस कला का दूसरा रूप है- पिचकारी से जलाघात। महाकवि माघ के अनुसार इस कलात्मक विनोद के साधन हैं- स्वर्णरचित चमकते हुये शृंग, कस्तूरी-कुङ्कुमादि सुगन्धित द्रव्य, कुसुम्भी रंग के वस्त्र, मादक मदिरा और प्रिय का सान्निध्य। वर्तमान होली या फाग के रूप में यह कला आज भी जीवित है।

चित्रायोगाः ॥ Chitrayoga

मणि, मन्त्र, औषधियों के विचित्र प्रयोगों की विद्या या इनकी शक्ति से असंभव को भी संभव बना लेने की कला 'चित्रयोग' कही गई है। इस कला का बीज ऋग्वेद में एवं विकसित स्वरूप अथर्ववेद में प्राप्त होता है । ऋग्वेद में यज्ञों में प्रयुक्त हवि से असपत्न (शत्रुहीन) होने की कामना की गई है

अभीवर्तेन हविषा येनेन्द्रो अभिवावृते । तेनास्मान् ब्रह्मणस्पते ऽभि राष्ट्राय वर्तय ।। येनेन्द्रो हविषा कृत्व्यभवद्युम्न्युत्तमः । इदं तदक्रि देवा असपत्नः किलाभुवम् ।।

अथर्ववेद में 'जगिड' मणि को कृत्या-नाशिनी, आरोग्यदायिनी और आयुष्यवर्धिनी कहा गया है। कौटिल्य अर्थशास्त्र के औपनिषदिक अधिकरण में ऐसे अनेक अद्भुत योगों, भैषज्य और मन्त्र प्रयोगों का वर्णन है, जिनसे रूपपरिवर्तन, महीनों तक भूख न लगना, श्वेतीकरण, कुष्ठयोग, शरीर पर बिना पीड़ा के आग जला लेना, अंगारों के ऊपर चलना, मुँह से आग छोड़ना, जल में आग जलाना, घन अंधकार में भी वस्तुओं को देख पाना, अदृश्य हो जाना, पानी पर चलना आदि अद्भुत क्रियाओं को किया जा सकता है। 'प्रस्वापन' मंत्र की शक्ति से सभी को सुला देना, बन्द दरवाजे को खोल देना, आदि विस्मयजनक यौगिक क्रियायों का वर्णन भी हुआ है। कामसूत्र के औपनिषदिक अधिकरण में 'चित्रयोग' नामक प्रकरण में भी ऐसे अद्भुत प्रयोगों का निरूपण हुआ है।

माल्यग्रथनविकल्पाः ॥ Malyagrathana vikalpa

संस्कृत साहित्य में 'माल्य' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में हुआ है, पुष्प के अर्थ में तथा पुष्पों से रचित माला' के अर्थ में । अतः 'माल्यग्रथनविकल्प' से अभिप्राय-पुष्पों को सुन्दर कलात्मक ढंग से गूंथकर या बाँधकर माला, करधनी, कर्णाभूषण, शिरोभूषण आदि बनाने की कला है। सभ्यता के प्रथम चरण में जब सामान्य जन ने स्वर्णादि धातुओं का प्रयोग नहीं सीखा था; तब माल्य ही मानव के प्रथम प्रसाधन बने । प्राचीन भारत में माल्य देवता और मनुष्य दोनों के ही नेपथ्यविधान का अनिवार्य अंग था। वैदिक उल्लेखों से लेकर अद्यतन युग तक, संपूर्ण संस्कृत साहित्य में शायद ही कोई ऐसी कृति हो जिसमें माल्य का उल्लेख न हुआ हो।

ऋग्वेद में अश्विनीकुमारों को 'पुष्करसृज' कमलपुष्पों की माला धारण करने वाला कहा गया है। रामायण में कमलों की माला को धारण करती हुई वनवासिनी सीता की उपमा पद्मिनी से दी गई है।

संस्कृत साहित्य में नाना प्रकार की मालाओं का वर्णन हुआ है-कदम्ब, नवकेसर और केतकी की सिर पर धारण की जाने वाली मालायें, बकुलमाला, वेणीस्रक्, वनमाला, वक्षःस्थल को सुशोभित करने वाले पुष्पहार, कण्ठ से वक्षःस्थल तक लटकती हुई 'प्रालम्ब' मालायें, कण्ठमालिका, आजानुलम्बी वैकक्षक (बाँये कन्धे से दाहिनी ओर एवं दाहिने कंधे से बाँई ओर जाती हुई मध्य में स्वस्तिकाकार) मालायें, पैरों का स्पर्श करती हुई आप्रपदीन माला, कौतुकमालिका, वन्दनमाला आदि ।

इसी प्रकार केसरदामकांची, विलासमेखला, शिरीषकुसुमस्तबक-कर्णपूर आदि पुष्पाभरणों का सौन्दर्य भी देखा जा सकता है।

भरतमुनि के अनुसार संरचना की दृष्टि से माल्य पाँच प्रकार के होते हैं वेष्टिम, संघात्य, ग्रन्थिमत् एवं प्रलम्बित ‘माल्यग्रथन' एक सुन्दर हस्तशिल्प था जिसमें अन्य कलाओं की भाँति ही विदग्धता की अपेक्षा रहती थी। माल्यग्रथन की अनेक व्यक्तिगत शैलियाँ थीं। कुन्दमाला नाटक इसका सुन्दर उदाहरण है। माल्यग्रथनविकल्प जीवन के शृंगार की कला है। यह प्रेम की ऐसी मूक भाषा है, जिसे मानव ने कोमल पुष्पों के बहुवर्णी वैविध्य के माध्यम से मुखर किया है।

केशशेखरापीडयोजनम् ॥ Keshashekharapeeda yojana

‘शेखरक' और 'आपीड' सिर पर धारण किये जाने वाले दो पुष्परचित अलंकार हैं? यह कला माल्यग्रथन का ही अङ्ग है तथापि सुन्दर ढंग से इसकी योजना में भी एक प्रकार की कलात्मकता है। अतः वात्स्यायन ने इसे एक स्वतन्त्र कला माना है। यशोधर के अनुसार शेखर और आपीड में सूक्ष्म भेद है। शेखर शिखास्थान में अवलम्बन्यास से पहना जाता है तथा इसकी रचना शिखराकार होती है। आपीड मालाकार गूँथा जाता है तथा सिर को घेरते हुये काष्ठिका (पिन) आदि की सहायता से पहना जाता है। कालिदास के युग में मौलिमाला या मौलिक् का ही प्रयोग हुआ है। बाणभट्ट के युग में इसने शेखर का रूप ले लिया। शूद्रक के मस्तक को आमोदित मालती-कुसुम-शेखर

अलंकृत करते हैं तो राजकुमार चन्द्रापीड की पहचान ही चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल शेखर से होती है

वाल्मीकि के अनुसार आपीड दाक्षिणात्यों का विशिष्ट शिरोभूषण था। बाणभट्ट इसके स्थान पर ‘मुण्डमाला” शब्द का प्रयोग करते हैं। वर्तमान समय में शेखरक विवाह के अवसर पर वर द्वारा धारण किये गये सेहरे के रूप में एवं आपीड वधुओं की शिरोमाला के रूप में दिखाई देते हैं।

नेपथ्ययोगाः ॥ Nepathyayoga

वात्स्यायन द्वारा वर्णित चौंसठ कलाओं में से एक महत्त्वपूर्ण कला है- नेपथ्ययोग अर्थात् वेशभूषाधारण करने की कला या प्रसाधनकला। यशोधर के अनुसार देश और काल के अनुरूप वस्त्र, माल्य, आभूषणादि से स्वयं को या दूसरों को, शोभा के लिये मण्डित करने की कला नेपथ्ययोग है।

नेपथ्य नाट्यशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है, जिसका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है-नेता का पथ्य (नेः नेता तस्य पथ्यम्), अर्थात वे साधन जो सामाजिक को रसानुभूति की ओर ले जाने वाले अभिनयव्यापार में सहयोगी होते हैं-नेपथ्य हैं । आचार्य भरत के अनुसार 'आहार्य' अभिनय का नाम ही नेपथ्यविधान है। संस्कृत साहित्य में नेपथ्य शब्द का प्रयोग प्रारम्भ में केवल नटों द्वारा धारण की जाने वाली वेशभूषा, मंचसज्जा आदि के लिये हुआ । आद्य नाट्यकार भास ने इसी अभिप्राय से नेपथ्यपालिनी' शब्द का प्रयोग किया है। बाद में जन-जीवन में स्त्री-पुरुष द्वारा धारण की जाने वाली विशिष्ट वेशभूषा को भी नेपथ्य कहा गया। भरत के पश्चात् नेपथ्यकला का सर्वप्रथम सागोपांग वर्णन कालिदास की कृतियों में हुआ है। नेपथ्ययोग कलात्मक ढंग से सुसज्जित होने की कला थी । स्नान के पश्चात् नेपथ्यविधि प्रारम्भ होती थी। इसके निम्नलिखित मुख्य अंग थे-

  • केशरचना।
  • अनुलेप या अंगराग।
  • पत्रावलीरचना।
  • अलंकारयोग।
  • वस्त्रयोग।
  • माल्यप्रयोग।

सुरुचिपूर्ण नेपथ्य सुसंस्कृत अभिरुचि, आभिजात्य और समृद्धि का परिचायक था। नेपथ्यकला की कसौटी ''वधूनेपथ्य'' को माना गया था। इस कला का सम्प्रति ब्यूटीपार्लर द्वारा व्यवसाय के स्वरूप में प्रचलन है।

कर्णपत्रभङ्गाः ॥ Karnapatrabhanga

हाथीदाँत, शंख, आदि से पत्राकृति कर्णाभूषण बनाने की कला कर्णपत्रभंग कही जाती के अनुकरण पर जिस प्रकार कनक-कमल आदि आभूषणों की रचना हुई उसी प्रकार कटावदार तरंगायित पत्रों के अनुकरण पर 'कर्णपत्र' की। भंग का अर्थ है- अंश या टुकड़ा। अतः कर्णपत्रभंग से अभिप्राय है, हाथीदाँत के टुकड़ों से पत्ते के आकार की आभरणरचना जिसकी विशेष संज्ञा 'दन्तपत्र' है। दन्तपत्र को धारण करने के सन्दर्भ अत्यंत प्राचीन काल से ही प्राप्त होते हैं उदाहरण स्वरूप विवाह के अवसर पर पार्वती के मुख को शोभित करने वाला कर्णावसक्त दन्तपत्र दन्तपत्र के प्रति स्त्रियों की अनुरक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि चन्द्रापीड से मिलने आई कादम्बरी ने अन्य आभूषणों का प्रयोग किया था।

गन्धयुक्तिः ॥ Gandhayukti

गन्ध पृथ्वी का गुण है। प्रत्येक पार्थिव तत्त्व में यही गन्ध बसी हुई है। प्रकृति ने मानव को उपहार के रूप में पुष्प, चन्दन, केसर, कुकुम, अगुरु, कस्तूरी जैसे सुगंधित द्रव्य प्रदान किये हैं। निसर्ग के इन उपादानों का बहुविध संयोजन कर मानव ने गन्धयुक्ति की कला विकसित की है। कलाप्रेमी भारत के नागरक-नागरिकाओं को संभवतः सर्वाधिक प्रेम सुगन्धित द्रव्यों से रहा है। वाल्मीकि का साक्ष्य इसका प्रमाण है। अयोध्या के नागरिकों में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो सुगन्ध का उपयोग न करता हो । वस्तुतः प्राचीन भारत में गर्भाधान से लेकर, अन्त्येष्टि पर्यन्त मानव के सम्पूर्ण जीवन में सुगन्ध रची बसी थी।

मूलतः पाँच प्रक्रियाओं से गन्ध प्राप्त की जा सकती थी

(i)चूर्ण से; यथा- लोध्रचूर्ण, पारिजातचूर्ण आदि।

(ii) घर्षण से; यथा- चन्दन, अगुरुपंक आदि को पानी के साथ घिस कर प्राप्त किया जाता था।

(ii) दाहाकर्षण से–विभिन्न प्रकार की धूप, गुग्गुलु आदि को जलाकर सुगन्ध पाई जाती थी।

(iv) सम्मर्दन से-करवी, बिल्व, गन्धिनी, केतकी आदि के पत्र-पुष्पों के निष्पीडन से सुगन्धित रस निकाला जाता था।

(v) प्राणी के अंग से; यथा मृगनाभि से उत्पन्न कस्तूरी से।

बृहत्संहिता में निम्नलिखित हुआ है-गन्धोदक, गन्धद्रव्य, गन्धधूप, गन्धतेल, शिरःस्नान, स्नानचूर्ण, पटवास एवं मुखवास । वराहमिहिर के अनुसार गणित के प्रकार एवं प्रस्तार भेद से गन्धों की संख्या एक लाख चौहत्तर हजार सात सौ बीस तक हो सकती है। बकुल चम्पक, अतिमुक्तक, उत्पल आदि के समान कृत्रिम गन्ध भी बनाई जा सकती है।

सुगन्धित यौगिकों की निर्माण विधि एवं उपयोग का वर्णन

भूषणयोजनम् ॥ Bhushanayojana

शरीर के विभिन्न अंगों को भूषित करने वाले आभूषणों की योजना भी एक कला है। मानव के अत्यधिक अलंकरण- प्रेम, जीवन के प्रति कलात्मक दृष्टिकोण एवं प्राचीनभारत की भौतिक समृद्धि ने भूषण-योजन की कला को जन्म दिया है।

इस कला के दो रूप हैं- प्रथम विभिन्न अंगों में इस प्रकार आभूषणों की योजना करना कि वे सम्पूर्ण शरीर एवं उसके माध्यम से समग्र व्यक्तित्व को मण्डित करने वाले वन जायें । कला का यह रूप नेपथ्य - विधि का अंग है। द्वितीय प्रकार है कि आभूषणों में इस प्रकार मणि-मुक्ता रत्नादि की योजना करना कि वे स्वयं एक ललित कलासृष्टि बन जायें। अतः इस शिल्प का सम्बन्ध आभूषणरचना या निर्माण की कला से है। संस्कृत साहित्य में निम्नलिखित आभूषणों की योजना हुई हैं

(1) शिरोभूषण-मस्तकी, अर्द्धमुकुट, पट्टबन्ध, शिखापाश, चूड़ामणि, मुकुट, किरीट, चूड़ामणिमकरिका, चटुला तिलकमणि, आदि ।

(2) कर्णाभूषण-कुण्डक, शिखिपत्र, वेणीगुच्छ, मोचक, कर्णिका, कर्णवलय, पत्रकर्णिका, कुण्डल, कर्णमुद्रा, कर्णपूर, कर्णोत्कीलक तथा नानाविध रत्नजटित दन्तपत्र, अवतंस आदि।

(3) कण्ठाभूषण-मणिग्रीव, रुक्म, हार, मुक्ताहार, एकावली, हारयष्टि, ताराहार, शेषहार, महाहार, मुक्ताकलाप, प्रालम्बहार रत्नावली, कण्ठसूत्र आदि ।

(4) कराभूषण - अंगद, वलय, कांचनवलय, शिंजावलय, दोलावलय, कटक, कङ्कण, केयूर, अंगुलीयक आदि ।

(5) कटि एवं श्रोणि- देश के आभरण-शृंखला, कटिसूत्र, कांची, क्वणितकनककांची, मेखला, रशना, मुक्ताजाल, तलक और कलाप ।

(6) पादाभूषण-नूपुर, शिञ्जितनूपुर, मणिनूपुर, मंजीर, पादहंसक, किङ्किणीका, घण्टिका, रत्नजालक, कटक, पैरों की अंगुलियों में अंगुलीय और अंगुष्ठ में तिलक।

इन्द्रजालम् ॥ Indrajala

मनोरंजनात्मक कलाओं में प्रमुख है- इन्द्रजाल या जादू का खेल । इसके मूल में निहित है चमत्कार या अलौकिकता का तत्त्व । यह कला विस्मयजनक आनन्द द्वारा मानव का मनोरंजन करती है। 'इन्द्रजाल' का शाब्दिक अर्थ है - 'इन्द्र का जाल' या 'इन्द्रियों की शक्ति को बांध लेने वाला जाल' । यह शब्द वैदिक आर्यों के महान् देवता इन्द्र के नाम से प्रचलित हुआ है जो अपनी माया शक्ति से असंख्य रूपों को धारण कर सकते हैं? शक्तिशाली इन्द्र का यह जाल भी महान् है।

बृहद्धि जालं बृहतः शक्रस्य वाजिनीवतः' जिसे फैलाकर वे अनेक चमत्कारपूर्ण मायावी कार्य करते हैं ।

जादूगर या ऐन्द्रजालिक का मायाजाल भी दर्शकों की दृष्टि को आच्छन्न कर असत्य दृश्यों की सृष्टि करता है। संस्कृत साहित्य में इस कला के संबंध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी 'दशकुमारचरित' में प्राप्त होती है। इस कला में सर्वप्रथम सामाजिकों के मन को बाँधने के लिये उच्च स्वर में वाद्य बजाये जाते हैं, फिर गायिकाओं द्वारा मधुर गीत गाया जाता है, तत्पश्चात् ऐन्द्रजालिक मयूरपिच्छ को घुमाते हुये दर्शकों की दृष्टि को बाँधता है।

कौचुमारयोगाः ॥ Kauchumarayoga

कुचुमार द्वारा कथित वाजीकरण, सुभगंकरण आदि औपनिषदिक (रहस्यमय गुप्त) योग इस कला के अन्तर्गत आते हैं। मानव कितना भी सभ्य या सुसंस्कृत क्यों न हो जाये, आज भी ऐसी क्रियाओं पर विश्वास रखनेवाले एवं इनका प्रयोग करने वाले लोग मिल जाते हैं। कौचुमार योग का बीज हम ऋग्वेद में पाते हैं। इन्द्रपत्नी इन्द्राणी सपत्नी-बाधन और पति-वशीकरण के लिये औषधि का प्रयोग करती हैं। कामसूत्र के औपनिषदिक अधिकरण के सुभगंकरण, वशीकरण, वृष्ययोग, नष्टरागप्रत्यायन, औपरिष्टक आदि प्रकरणों में इन गुप्त योगों का सविस्तार निरूपण हुआ है। ‘वृष्य योग’ में बल-वीर्य, राग और रतिक्षमतावर्धक कुछ नुस्खे दिये गये हैं। भास के नाटक स्वप्नवासवदत्तम् में 'अविधवाकरण' एवं 'सपत्नीमर्दन' नामक औषधियों का उल्लेख है जिन्हें कौतुकमाला (विवाहमाला) के साथ गूँथा जाता था।

हस्तलाघवम् ॥ Hastalaghava

हाथ की सफाई या फुर्ती से यन्त्र के समान हस्त-संचालन 'हस्तलाघव' कहा जाता है। सभी कार्यों में लघुहस्तताशिल्प एक विशिष्ट गुण है जिसकी अपेक्षा शिल्पी में की जाती है। इस कला में वे सभी क्रियायें आ जाती हैं जो विस्मयसृष्टि और जनानुरंजन के लिये की जाती हैं। इन्द्रजाल या जादू के खेल का यही प्राण तत्त्व है।

चित्रशाकापूपभक्ष्यविकारक्रिया ॥ Chitrashakapupabhakyavikara kriya

नानाप्रकार के शाक, यूष (सूप, रसा) एवं भोज्य पदार्थ बनाने की कला या पाक-कला भी चतुःषष्टि कलाओं में परिगणित होती है। सृष्टिप्रक्रिया में अग्नि में सोम की निरन्तर आहुति दी जाती है। मनुष्य भी अपनी जठराग्नि में भक्ष्य और पेय की हवि देता है। इस हवि को ही 'आहार' कहा गया है। आहार की सामान्य संज्ञा 'अन्न' है। मानव ने सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदत्त नैसर्गिक अन्न को अपने कौशल से सुसंस्कृत कर 'पाककला' का विकास किया है।

ग्रहण की पद्धति के आधार पर आहार पाँच प्रकार के हो सकते हैं-भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य और पेय । संस्कृत साहित्य में इनका उल्लेख अत्यन्त प्राचीन काल से ही प्राप्त । भरद्वाज मुनि के आश्रम में कुमार भरत और उनकी सेना के स्वागत में जो भोजन प्रस्तुत किया गया था उसमें ये पाँचों प्रकार के पदार्थ थे-भक्ष्यं भोज्यं च लेह्यं च विविधं बहु ।

कालिदास के अनुसार राजप्रासादों के महानस में इन पंचविध आहारों को बनाने की विपुल सामग्री और सुनियोजित तैयारी को देखकर ही विदूषक जैसे भोजनप्रिय आनन्दित हो उठते थे। जनश्रुति के अनुसार राजा नल पाककला में अत्यंत निपुण थे। उनका पाकदर्पण पाककला का एक संग्रहणीय ग्रंथ है जिसमें नानाप्रकार के यूष, सूप आदि बनाने की विधि का वर्णन हुआ है।

विवाह, राज्याभिषेक, उत्सव आदि के अवसर पर असंख्य प्रकार के भोज्य पदार्थ बनाये जाते थे। दमयन्ती के विवाह में इतने प्रकार के भोजन बने थे कि बारातियों के लिये उन्हें जीमना (खाना) तो दूर, गिनना भी कठिन हो गया था । भोजन को परोसना भी एक कला मानी जाती थी। मनु के अनुसार परोसने वाले को प्रसन्नचित्त होकर एक-एक व्यंजन के गुणों की प्रशंसा करते हुये, सावधानी के साथ धीरे-धीरे भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार परमब्रह्म के उपासक इस देश ने 'अन्नब्रह्म' साधना भी पूर्ण मनोयोग से की है।

पानकरसरागासवयोजनम् ॥ Panakarasaragasava yojana

जल ही जीवन है। इस जीवन-रस से स्वयं को जीवन्त करने के साथ ही रसनेन्द्रिय की तृप्ति के लिये मानव ने विविध प्रकार के पानक रसों (पेय पदार्थों) को बनाने की कला विकसित की है। इसे ही वात्स्यायन ने पानकरसराग आसवयोजन कहा है।

यशोधर के अनुसार पेय दो प्रकार के होते हैं- (1) अग्निनिष्पाद्य (2) अनग्निनिष्पाद्य। ये भी दो प्रकार के हो सकते हैं-सन्धानकृत तथा असंधानकृत । संस्कृत साहित्य में-रसाल, सहकारभंग, तिन्तिका-पानक, प्रपाणक, आसव, पुष्पा सव, फलासव, मधु, कादम्बर मधु, द्राक्षामधु, मैरेय, शीथु, वारुणी आदि पेयों के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं।

गन्धमाल्य से सुसज्जित ऋतु के अनुकूल आकर्षक 'पानभूमि' की रचना' और 'समापान'' सामूहिक पानगोष्ठियों का आयोजन भी इस कला का एक अंग था।

सूचीवापकर्म ॥ Suchivapakarma

यशोधर के अनुसार सूची (सुई) का काम 'सूचीवान' कहा जाता है। इसके अन्तर्गत तीन क्रियायें आती हैं-

  1. सीवन - कंचुकादि वस्त्रों को सिलना ।
  2. ऊतन-कटे-फटे वस्त्रों को इस प्रकार सिलना, रफू करना कि त्रुटि या दोष दिखाई न दे।
  3. विरचन-कुथा (गलीचा) आस्तरण (बिछौना) आदि बनाना तथा दुइल, चोलक आदि वस्त्रों पर बेलबूटे काढ़ना ।

‘कसीदाकारी’ की कला वैदिक समाज से ही प्रचलित थी । इस कार्य में लगी हुई स्त्रियों को ‘पेशस्करी' कहा जाता था। ऋग्वेद में उषा और रात्रि की कल्पना ऐसी स्त्रियों के रूप में की गई है जो आकाशरूपी वस्त्र पर धागे से सुन्दर रूप की सृष्टि करती हैं। प्राचीन भारत में कढ़ाई में सोने के तारों के साथ माणिक्य, मूँगा, मरकत आदि रत्न पिरोकर भी पत्र-पुष्प-लता आदि की डिज़ाइन बनाई जाती थीं। बाणभट्ट ऐसी दो डिज़ाइनों का वर्णन करते हैं-

  • (i) स्तबकित-पुष्पगुच्छ के समान डिजाइन।
  • (ii) उपचीयमान-सम्पूर्ण वस्त्र को भर देने वाली डिज़ाइन।

इसमें मोतियों को सीधी, तिरछी, आड़ी, लहरदार, कोणाकार आदि रेखाकृतियों में टाँका जाता था। कालिदास ऐसे रत्नखचित उत्तरीय और राजशेखर मणिखचित कञ्चुक का वर्णन करते हैं।

वीणाडमरुकसूत्रक्रीडा ॥ Veena damaruka sutra kreeda

वात्स्यायन के अनुसार वीणा और डमरुक वाद्य का वादन एक कला है। यद्यपि वाद्य कला के अन्तर्गत ही इस कला का भी अन्तर्भाव होता है, तथापि वाद्यों में तन्त्रीवाद्यों में भी वीणा के महत्व को प्रदर्शित करने के लिये वीणावादन को एक स्वतन्त्र कला माना गया है। यशोधर इसी तथ्य को रेखांकित करते हुये कहते हैं-

वादित्रान्तर्गतत्वेऽपि तन्त्रीवाद्यं प्रधानम् । तत्रापि वीणावाद्यम् ॥

वीणा को असमुद्रोत्पन्न रत्न माना गया है। देवी सरस्वती की कच्छपी वीणा, ब्रह्म के नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मवीणा, रुद्रों से सम्बद्ध रुद्रवीणा, पिनाकपाणि से सम्बद्ध पिनाकीवीणा, देवर्षि नारद की महतीवीणा, तुम्बरु ऋषि की तुम्बरु वीणा, ऋषि स्वाति की विपंचीवीणा, विश्वावसु गन्धर्व की बृहती वीणा, किन्नरों की किन्नरी वीणा, रावण की रावणी अथवा रावणहस्ता आदि वीणा की प्राचीनता एवं महत्ता को प्रमाणित करते हैं ।

डमरुक वाद्य अवनद्ध वाद्य है। इसका स्वतन्त्र परिगणन भी संगीतसृष्टि में इसकी महत्ता को सूचित करने के लिये है। डमरु नटराज भगवान् शिव का वाद्य है। वर्णमाला की ध्वनियों की सृष्टि इसी वाद्य से हुई है। डमरु वाद्य से ही पाणिनि के 14 सूत्रों एवं संगीत के स्वरों की सृष्टि हुई है।

प्रहेलिका ॥ Prahelika एवं प्रतिमाला ॥ Pratima

प्रहेलिका अर्थात् पहेली बूझना और प्रतिमाला अर्थात् अन्त्याक्षरी, दोनों ही लोक प्रसिद्ध मनोविनोदात्मक क्रीडायें हैं। ऋग्वेद के सृष्टिविषयक दार्शनिक प्रश्नों को प्रहेलिका के माध्यम से भी प्रस्तुत किया गया है जिसे विभिन्न भाष्यकारों ने अपनी-अपनी दृष्टि से बूझा है। दण्डी ने क्रीडागोष्ठियों, गुप्तभाषण, परिहास आदि के लिये प्रहेलिका को उपयोगी माना है।

क्रीडागोष्ठीविनोदेषु तज्ज्ञैराकीर्णमन्त्रणे । परव्यामोहने चापि सोपयोगाः प्रहेलिकाः॥

समागता, वंचिता, परुषा, संख्याता आदि इसके भेद-प्रभेद हैं। कादम्बरी में महाराज शूद्रक को अक्षरच्युतक, मात्राच्युतक, बिन्दुमती प्रहेलिका आदि काव्यक्रीडाओं से मनोरंजन करते हुये वर्णित किया गया है।

दुर्वचकयोगाः ॥ Durvachaka yog

ऐसी पदावली जिसका उच्चारण और अर्थबोध दोनों ही कठिन हो, का प्रयोग एवं अर्थबोध भी एक कला है। इसका प्रयोजन भी मनोरंजन और प्रतिस्पर्धा है। आनन्द की भी सृष्टि करती थी। इस प्रकार के कवि कवित्वशक्ति के क्षीण होने पर भी विदग्धगोष्ठियों में बिहार के योग्य हो जाते हैं-

कृशे कवित्वेऽपि जनाः कृतश्रमाः विदग्धगोष्ठीषु विहर्तुमीशते।।

पुस्तकवाचनम् ॥ Pustaka vachana

वाक्सौन्दर्य पर आश्रित वाचिक कलाओं में से एक है- पुस्तकवाचन अर्थात् पुस्तक बाँचने की कला। ज्ञान-विज्ञान, धर्म-दर्शन, कला और शिल्प की महनीय विरासत को एक पीढ़ी से एक दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती हुई पुस्तकें हजारों वर्षों से ज्ञानवर्धन और आत्मिक आनन्द का स्रोत रही हैं। प्राचीन भारत में और आज भी रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, पुराण आदि के वाचन की लोकानुरंजिनी परम्परा रही है। इस कला में विशेष रूप से निपुण पुस्तक वाचक या कथा वाचक होते थे। बाणभट्ट की मित्रमण्डली में पुस्तकवाचक ‘सुदृष्टि’ भी था जो सरस्वती की नूपुर ध्वनि के समान, गमक नामक मधुर स्वर में, श्रोताओं को आकर्षित करता हुआ पुराण वाचन करता था । सरस गीतों के साथ वंशी आदि वाद्यों की संगत इस कलाप्रस्तुति को अत्यंत मनोरम और श्रुतिसुभग बना देती थी । वस्तुतः वाचन-कौशल द्वारा श्रव्य से ही दृश्य का भी आनन्द देने की कला है-पुस्तकवाचन कला ।

नाटिकाख्यायिकादर्शनम्  ॥ Natika Akhyayika darshana

जनमानस का समाराधन करने वाली कलाओं में से एक कला है- नाटक-आख्यायिका दर्शन। दर्शन शब्द यहाँ केवल प्रत्यक्ष दर्शन या अवलोकन का पर्याय नहीं अपितु चिन्तन-दृष्टि, समझ और परिज्ञान का भी वाचक है। अतः इस कला का अर्थ हुआ नाटक और आख्यायिका को देखने-परखने और रस-आस्वादन की कला ।

नाटक और आख्यायिका काव्यशास्त्र के पारिभाषिक शब्द हैं। नाट्य को दृश्य होने के कारण रूप कहा जाता है। संस्कृत वाङ्मय में इतिहासपुरुषों के जीवन को आख्यायिकाओं के माध्यम से संगृहीत किया गया है। आख्यानों के अभिनेय प्रसंगों का नटों द्वारा अभिनय भी किया जाता था। कृष्णलीला, हर-लीला, मदन-लीला आदि का भी अभिनय होता था। इस प्रकार यह कला कविहृदय के साथ संवाद स्थापित करने की और साहित्य के शिव तत्त्व से जीवन को मंगलमय बनाने की कला है ।

काव्यसमस्यापूरणम् ॥ Kavya samasya purana

समस्यापूर्ति या पादपूर्ति प्राचीन भारत की एक मनोरंजक काव्य-क्रीडा रही है जिसमें समस्या के रूप में दिये गये किसी एक पाद (चरण) के आधार पर शेष तीन चरणों की रचना करनी होती है। आशुकवि इस कला में विशेष निपुण होते थे। इस कला के माध्यम से काव्यरचना का अभ्यास, मनोरंजन और राजसभाओं में सम्मान की प्राप्ति होती थी। गोष्ठी समवायों में ऐसी काव्य समस्यायों की पूर्ति नागरकवृत्त का एक सहज अंग था

पट्टिकावेत्रवाणविकल्पाः ॥ Pattikavetravana vikalpa

बाँस की बारीक पट्टियों, सरकण्डे की तीलियों तथा बेंत से कलात्मक उपकरण बनाना भी एक कला है। यजुर्वेद में बेंत और बाँस का काम करने वाले स्त्री-पुरुष को विदलकारी तथा विदलकार कहा गया है। अर्थशास्त्र के अनुसार बेंत और बाँस से मोटी रस्सियाँ बनाई जाती थीं जिन्हें वरत्र कहा जाता था। इनका उपयोग कवच बनाने के लिये होता था। रामायण के अनुसार बाँस का काम करने वाले शिल्पी वंशकृत कहे जाते थे। सैन्ययात्रा आदि के प्रसंग में रथकार, इषुकार आदि शिल्पियों के साथ ये वंशकार भी चलते थे। सैन्य शिविर की रचना एवं शय्या- आसन आदि आवश्यक वस्तुओं को तत्काल तैयार करने में इनका नैपुण्य परिलक्षित होता था। संस्कृत साहित्य में इस कला से निर्मित इन वस्तुओं के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं - वेत्रासन, आसन्दी, वेत्रपट्टिका (शीतल पाटी), करण्डक, पिटारी, पिंजर, यष्टि, तितउ (चलनी), शरशलाका यन्त्र (सरकण्डों का पीढ़ा) आदि । वेत्र के सुन्दर आसन, आसन्दी, चटाइयाँ और पिटारियाँ राजभवनों तक पहुँचती थीं।

तर्कूकर्माणि ॥ Tarkukarma

तक्षणम् ॥ Takshana

तक्षू (काटना या छीलना ) धातु से निष्पन्न तक्षण शब्द का अर्थ है-लकड़ी को काट-छील कर आसन, रथ आदि बनाने की कला, जिसे वर्धकीकर्म, दारुकर्म तथा काष्ठविधि भी कहा गया है। वैदिक सन्दर्भों में तक्षणकार्य करने वाले शिल्पी की संज्ञा तक्षा थी। साहित्य में तक्षणशिल्प के निम्न उदाहरण प्राप्त होते हैं-अष्टास्र यूप, स्तम्भ, शयन, तल्प, पर्यङ्क, सिंहासन, पीठ, पीठिका, शिबिका, रथ

एवं नौका । प्राचीन भारत में इस कला ने एक व्यवस्थित व्यवसाय या उद्योग का रूप ले लिया था। सभी प्रकार के काष्ठकर्म के लिये लकड़ी का चयन अत्यंत सावधानी से किया जाता था। काष्ठचयन से लेकर उपकरणनिर्माण तक निर्दोषता तथा शुभ-अशुभ का विशेष ध्यान रखा जाता था। एक कुशल शिल्पी के रूप में स्थपति का यह कर्तव्य माना जाता था कि वह ऐसी कलाकृति का सर्जन करें जो-सुश्लिष्ट, दृढ, स्थिर, निर्दोष और सुन्दर वर्ण (पॉलिश) से आकर्षक हो।

सुश्लिष्टां तामतः कुर्यान्निर्दोषां वर्णनशालिनीम् । दृढां स्थिरां च स्थपतिः पत्युः कामविवृद्धये ।।

वास्तुविद्या ॥ Vastuvidya

वास्तुविद्या या भवननिर्माण कला का विस्तृत वर्णन विश्वकर्मा-वास्तुशास्त्र आदि शिल्पग्रंथों की विषयवस्तु के वर्णन प्रसंग में किया जा चुका है। स्थापत्य के आठ अंग माने गये थे-

  1. (i) वास्तुपुरुष-विकल्पना
  2. (ii) पुरविनिवेश
  3. (iii) प्रासाद-निवेश
  4. (iv) ध्वजोच्छ्रय
  5. (v) नृपति वेश्म
  6. (vi) चातुर्वर्ण्य-गृह-विभाग
  7. (vii) यज्ञशालानिर्माण
  8. (viii) राजशिविरनिवेश (दुर्गकर्म)।

इन अष्टांगों का ज्ञाता ही राजस्थपति पद का अधिकारी होता था।

रूप्यरत्नपरीक्षा  ॥ Roopya ratna pariksha

कोशग्रंथों में रूप्य शब्द का प्रयोग रजत और स्वर्ण दोनों के लिये हुआ है। वज्र (हीरा), मुक्ता, प्रवाल (मूँगा), गोमेद, इन्द्रनील (नीलम), वैदूर्य, पुष्पराग (पुखराज), मरकत और माणिक्य महारत्न कहे गये हैं। रजत और स्वर्ण का उपयोग मुद्राओं के अतिरिक्त आभूषण, पात्र, छत्रदण्ड, तलवार की मूँठ, भवन-तोरण, प्रासाद- शिखर, सिंहासन, पादपीठ, पर्यङ्कपाद आदि की रचना के लिये होता था। रत्नों का सर्वाधिक उपयोग आभूषणों के रूप में होता था। राजकोश में संग्रह से पूर्व रूप्य एव रत्नों की भलीभाँति परीक्षा कर ली जाती थी। भूषा के अतिरिक्त ग्रहदोष, शान्ति, अनिष्टनिवारण, इष्टप्राप्ति आदि के लिये भी शुभ-अशुभ रत्नों की परीक्षा के बाद ही रत्न धारण किये जाते थे। रत्न श्रेष्ठता, गुणातिशयता और बहुमूल्यता का प्रतीक था। इस श्रेष्ठता को जाँचने की कला ही रूप्यरत्न-परीक्षा कही गई है।

प्रथमदृष्ट्या रजत और स्वर्ण की शुद्धता की परीक्षा उज्ज्वल वर्ण तथा स्निग्ध-कोमल स्पर्श से होती थी। अन्य परीक्षणें में कसौटी पर कसना तथा अग्नि में तपाना प्रमुख था । रत्नों की परीक्षा उनके गुण-दोषों के आधार पर की जाती थी, जिनका विस्तृत वर्णन अर्थशास्त्र, बृहत्संहिता, राजनिघण्टु आदि ग्रंथों में हुआ है।

धातुवादः  ॥ Dhatuvada

स्वर्ण, रजत, ताम्र, रीति (पीतल), काँस्य, त्रपु ( रांगा), सीस (सीसा) और कालायस (लोहा) आदि धातुओं को खनि से निकालकर, शुद्ध करने, गलाने, मिलाने तथा इनसे विविध प्रकार के उपकरण, रसायन आदि बनाने का शिल्प 'धातुवाद' है। इस शिल्प के ज्ञाता को 'धातुवादविद्' कहा जाता था। धातुशोधन की प्रक्रिया वैदिक मन्त्रों से ही ज्ञात थी। कच्ची धातु को गलाकर लोहा, सोना आदि निकालने की प्रक्रिया का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में हुआ है

तस्मादश्मनोऽयो धमन्ति अयसो हिरण्यम् ।'

कर्मार (लुहार) धातुओं को गलाने के लिये धौंकनी का प्रयोग करता था। परवर्ती युग में ‘धातुवाद’ का शिल्प अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचा था। भू-गर्भ में निहित धातुओं का मानवीय हित और समृद्धि के लिये उपयोग का यह शिल्प था।

मणिरागज्ञानम्  ॥ Maniraga jnana

मणिराग (मणियों को रंगने) एवं उनके आकर अर्थात् स्रोत (उत्पत्तिस्थान) का ज्ञान भी प्राचीन भारत में एक कला मानी थी। अपने चिरस्थायी चमकदार रंग एवं प्रभामण्डल के कारण मणियाँ अनादिकाल से ही मानव को आकर्षित करती रही हैं। चूडामणि से लेकर नूपुर-मणि तक आभूषणों में इनका उपयोग हुआ है। मन्दिरों और राजभवनों को भी मणियों ने अपने रश्मिजाल से उद्भासित किया है। मणि शब्द का अभिप्राय उन बहुमूल्य चमकदार पत्थरों से है जो अन्धकार में प्रकाश बिखेरते हैं। कोशग्रंथों में मणि और रत्न को पर्यायवाची माना गया है तथा मुक्ता एवं प्रवाल को भी मणि कहा गया है। मणियों के अपने विशिष्ट रंग हैं। पद्म के समान लाल रंग की मणि पद्मराग कही जाती है। शुक, वंश-पत्र, कदली और शिरीष पुष्प के समान आभा वाली हरित वर्ण मणि की संज्ञा मरकत है। अतः मणि-राग का अभिप्राय स्फटिक या काचमणि को नाना रंगों में रंगकर पद्मराग आदि बहुमूल्य मणियों के समान वर्णशोभा को उत्पन्न करना है। मणि को रंगने की प्रक्रिया विज्ञान का अंग थी तो उनमें वर्णों की सुन्दर योजना कला का अंग। इसका प्रयोजन शोभा, भूषा और धन की प्राप्ति थी।

इस कला का द्वितीय पक्ष मणियों के आकर का ज्ञान था। कौटिल्य ने मणियों के तीन आकरों का उल्लेख किया है-खनि, स्रोत (जलप्रवाह) एवं प्रकीर्ण। महाकवि कालिदास ने 'न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत्' कहकर रत्न की बहुमूल्यता के साथ उसकी दुर्लभता को भी सूचित किया है। प्राचीन भारत ने इस शिल्प को एक व्यवसाय के रूप में विकसित किया था।

आकरज्ञानम् ॥ Akara jnana

वृक्षायुर्वेदयोगाः ॥ Vrkshayurveda yoga

मानव ने प्रकृति की जिस हरी-भरी गोद में जन्म लिया है; वनस्पति जगत के जिस अबदान से वह पुष्ट हुआ है; निसर्ग की जिस पावन सुन्दरता ने उसे मन की उदात्तता और विश्रान्ति दी है-उसी निसर्ग को अपने समीप बसा लेने की, आत्मीय बना लेने की कला है-वृक्षायुर्वेदयोग ।

आयुर्वेद का अर्थ है-आयु को देने वाला वेद या शास्त्र। वृक्षायुर्वेद वृक्षों को दीर्घायुष्य एवं स्वास्थ्य प्रदान करने वाला शास्त्र है। अतः यह वृक्षों के रोपण, पोषण, चिकित्सा एवं दोहद आदि के द्वारा मनचाहे फल, फूलों की समृद्धि को प्राप्त करने की कला है। इस कला का उद्देश्य है-मनोरम उद्यान या उपवन की रचना ।'

प्राचीन भारत में उद्यान, नगरनिवेश एवं भवन-वास्तु के अनिवार्य अंग माने गये थे। वराह के अनुसार उद्यानों से युक्त नगरों में देवता सर्वदा निवास करते हैं-

रमन्ते देवता नित्यं पुरेषूद्यानवत्सु च॥

इस कला के अन्तर्गत निम्न विषयों का निरूपण हुआ है-उपवनयोग्य भूमि का चयन, वृक्षरोपण के लिये भूमि तैयार करना, मांगलिक वृक्षों का प्रथम रोपण, पादप-संरोपण, पादप-सिंचन, वृक्ष-चिकित्सा, बीजोपचार, वृक्षदोहद, कतिपय अलौकिक प्रयोग आदि। वस्तुतः वृक्षायुर्वेदयोग विज्ञान और कला, प्रयोग और चमत्कार का रोचक समन्वय है।

मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधिः ॥ Mesha kukkutalavaka yuddhavidhi

यह प्राचीन भारत की एक मनोरंजक कला है जिसका अर्थ है- भेड़, मुर्गा और तीतर लड़ाने की कला। वात्स्यायन इसे कलाक्रीड़ा या कलात्मक विनोद कहते हैं। पशु-पक्षियों को लड़ाकर उनके युद्ध, घात-प्रतिघात, हार और जीत से उत्तेजना प्राप्त करने की प्रवृत्ति मानव में चिरन्तन से रही है। चीन-तुर्किस्तान की चंगबाजी और रोमन पशु-युद्ध का उन्माद विश्वप्रसिद्ध रहा है। प्राचीन भारत में इन क्रीडाओं के लिये हाथी, घोड़े आदि के साथ मेढ़े एवं शुक-सारिकाओं के साथ तीतर-लाव आदि पक्षी भी पाले जाते थे। राजभवनों के द्वितीय प्रकोष्ठ में इन पशुओं को तथा छठें प्रकोष्ठ में पक्षियों को रखा जाता था।

मृच्छकटिक में वसन्तसेना के भवन में ऐसे पशुओं की खातिरदारी एवं शिक्षा देखी जा सकती है जहाँ एक मल्ल के समान मेष की गर्दन पर मालिश की जा रही है, लावक पक्षियों को युद्ध का अभ्यास कराया जा रहा है। कादम्बरी में उज्जयिनी के राजकुल में हम ऐसा ही पक्षि-युद्ध देखते हैं। दशकुमारचरित में हाट में होने वाले कुक्कुट-युद्ध का एक रोचक वर्णन प्राप्त होता है।

ये युद्ध पण या बाजी लगाकर लड़े जाते थे। अतः इन्हें प्राणि-द्यूत संजीवद्यूत और समाहूवय भी कहा गया है।

यह शास्त्र और कौशल द्वारा पशु-पक्षियों को साधकर उनके युद्ध से उत्तेजना, जोश और वीर रस का आनन्द प्राप्त करने की कला है।

शुकसारिकाप्रलापनम्  ॥ Shuka sarika pralapana

आकाशचारी विहग और इस धरती पर बसने वाले मानव के स्नेह संबंध से जो कला विकसित हुई है। उसे शुकसारिका-प्रलापन अर्थात् तोता-मैना को पढ़ाने की कला कहा गया है। नाना प्रकार के पक्षियों में से तोता-मैना इस प्रकार के पक्षी हैं जिनमें मनुष्य समान ध्वनियों के उच्चारण की क्षमता पाई जाती है। प्राचीन काल से आज तक भारतीय घरों में जिन पक्षियों को पाला जाता है, उनमें से प्रमुख हैं-शुक और उसकी संगिनी सारिका। प्राचीन भारत के इन वानिपुण पक्षियों ने राजभवनों, गणिकावाटों और नागरकों के गृहों के साथ ही गुरुकुलों और आश्रमों की शोभा भी बढ़ाई थी। उज्जयिनी के राजभवनों में निशा का अवसान शुक्र-सारिकाओं के मंगलगीतों से होता था। बौद्धभिक्षु दिवाकरमित्र के आश्रम में शुक्र-सारिकायें धर्मदेशना करते थे तो मीमांसक मण्डनमिश्र के घर में स्वतःप्रमाण और परतःप्रमाण पर शास्त्रार्थ शुक-सारिकाओं की इस योग्यता के तीन कारण माने गये थे -

  1. (i) पूर्व जन्मों के संचित संस्कार
  2. (ii) पुरुष का प्रयत्न और शिक्षा
  3. (iii) निरन्तर श्रवण

पोषित शुकों को विधिवत् शिक्षा दी जाती थी। नागरिक मध्याह्न भोजन के बाद अपने शयनगृह में आराम करता हुआ इन्हें बोलना सिखाता था। कन्यान्तःपुरों में इन्हें उपदेश दिया जाता था । मानव के पक्षीप्रेम और इन विहगों की विशिष्ट योग्यता से यह मनोरम कला विकसित हुई थी ।

उत्सादनम्  ॥ Utsadana

मानव को सुन्दर, स्वस्थ और आकर्षक बनाये रखनेवाली कलाओं में से एक कला है - मर्दनकला (मालिश या मसाज की कला )। यशोधर के अनुसार वात्स्यायन-प्रोक्त ये तीनों क्रियायें मर्दन के ही प्रकार हैं। पैर से किया जाने वाला मर्दन उत्सादन है। हाथ से तेल आदि से शिर का मर्दन केशमर्दन है। शेष अंगों का मर्दन संवाहन है। आयुर्वेद में इन तीनों के ही विशिष्ट गुण कहे गये हैं। साहित्य में संवाहन का वर्णन एक सुकुमार कला के रूप में हुआ है। भास के चारुदत्त नाटक में गणिका वसन्तसेना इस कला की प्रशंसा करते हुये कहती हैं- सुकुमारकला शिक्षितार्येण। शिक्षिता पद का प्रयोग यह सूचित करता है कि इस कला की विधिवत् शिक्षा प्राप्त की जाती थी। इस कला में निपुण व्यक्ति को संवाहक या अंगमर्दक कहा जाता था। इस कला के कई मनोरम चित्र साहित्य में प्राप्त होते हैं। महाराज दुष्यन्त अस्वस्थ शकुन्तला को सुख देने के लिये उसके पद्मताम्र चरणों को अपने अंक में रखकर दबाना चाहते हैं ।

महाराज शूद्रक शय्या पर बैठे हैं। भूमितल पर बैठी हुई प्रतिहारी नवनलिनदलकोमल करसम्पुट से उनके चरणों को दबा रही है। आयुर्वेद में संवाहन के निम्नलिखित लाभ बताये गये हैं -

प्रीतिनिद्राकरं वृष्यं कफवात श्रमापहम् । संवाहनं मांसरक्तत्वक्प्रसादकरं मतम् ।।

यही कारण है कि सभी वर्ग के स्त्री-पुरुष यहाँ तक कि राजकुमार भी इस कला को सीखते थे। युवतियाँ इस कला से अपने प्रेमियों को वश में कर लेती थी' तो पुरुष अपनी प्रेयसियों को प्रसन्न । सुन्दर रूप-रस और गन्ध से मिलने वाले आनन्द के समान सुन्दर स्पर्श का भी एक आनन्द है और इसी आनन्द को देती है - संवाहनकला।

केशमार्जनकौशलम्  ॥ Keshamarjana kaushala

अक्षरमुष्टिकाकथनम् ॥ Aksharamushtika kathana

मनुष्य ने अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम 'भाषा' का मनोरञ्जन के लिये प्रयोग करते हुये अपने बुद्धिचातुर्य और कल्पना- कौशल से जिन कलाओं को विकसित किया है, उनमें से एक है- अक्षरमुष्टिका कथन' अर्थात् सङ्केताक्षरों का अर्थ बताने की कला। अक्षरमुष्टिका की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है-

  1. प्रथम अक्षरमुष्टिका अर्थात् अक्षरों की मुट्ठी। इसमें पदों को अक्षरों की मुट्ठी में बन्द कर दिया जाता है। अक्षरों के माध्यम से उनका अनुमान करते हुये उन पदों को बताना होता है।
  2. द्वितीय-अक्षरमुष्टिका अर्थात् 'अक्षरों को बताने वाली मुट्ठी'। इसमें मुट्ठी खोलना, • अंगुली उठाना आदि हस्त संकेतों से अक्षरों को जानकर उनसे पद बनाकर उनका अर्थ • बताना होता है। इष्टमित्रों की गोष्ठियों और कविसमवायों में इस प्रकार की क्रीड़ाओं द्वारा मनोविनोद के साथ ही बुद्धि की धार को तेज किया जाता था।

म्लेच्छितकविकल्पाः॥ Mlecchitaka vikalpa

भाषाबोध के ही एक कौशल का प्रकार है-'म्लेच्छितविकल्प' अर्थात् गुप्तभाषा का ज्ञान यशोधर के अनुसार साधु शब्दों की अक्षरविन्यास के कारण अस्पष्टता म्लेच्छित कही। जाती है, इसके विकल्प या प्रकारों को ''लेच्छित-विकल्प' कहते हैं। यह उच्चारण या लेखन में अस्पष्टता के द्वारा अपनी बात को रहस्यमय या गुप्त बनाने की कला है। ऐसी भाषा को समझना और उसका स्वयं प्रयोग करना दोनों ही इस कला के अन्तर्गत आते हैं। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग विशेष रूप से गुप्तचरों की संस्था के लिये होता था। कौटिल्य इसके लिखित रूप को 'गूढलेख' या 'संज्ञालिपि' कहते हैं। इसे कूटभाषा भी कहा जा सकता है। -

देशभाषाज्ञानम्  ॥ Deshabhasha jnana

देश - भाषाओं का ज्ञान भी एक कला है। संस्कृत में देशभाषा शब्द का प्रयोग जातिभाषा, लोकभाषा या क्षेत्रीय बोलियों के अर्थ में हुआ है। भरतमुनि ने नाट्यप्रयोग के सन्दर्भ में भाषाओं के चार प्रकारों की चर्चा की है- (i) अतिभाषा (ii) आर्यभाषा (ii) जातिभाषा तथा (iv) योन्यन्तरी भाषा। इनमें से जातिभाषा को ही देशभाषा कहा गया है। प्राचीन भारत में सात देश-भाषायें मुख्य मानी गई थीं मागधी, आवन्ती, प्राच्या, शौरसेनी, अर्द्धमागधी, बालीका और दाक्षिणात्या।3

प्राचीन भारत के नागरक, राजकुमार, राजकुमारियाँ, गणिकायें, कवि और अभिनेता देशभाषाओं की विधिवत् शिक्षा प्राप्त करते थे। बाणभट्ट ने उज्जयिनी के प्रधान पुरुषों को 'शिक्षित-अशेष-देशभाषा' तथा 'सर्वलिपिज्ञ' कहा है। राजकुमार चन्द्रापीड ने भी सभी भाषाओं और लिपियों में कौशल अर्जित किया था। अथर्ववेद के ऋषि ने नाना भाषा-भाषी लोगों के लिये पृथिवी के रूप में जिस ‘एकघर’ की आराधना की थी-जनं बिभ्रती बहुधा विवासं नानाथर्माणं पृथिवी यथौकसम्' उसी घर के स्वप्न को साकार करने की कला है-देशभाषाविज्ञान।

पुष्पशकटिकानिमित्तज्ञानम् ॥ Pushpashakatika nimitta jnana

पुष्पशकटिका

छोटी गाड़ी या खिलौनागाड़ी को 'शकटिका' कहा जाता है। शकटिका को पुष्पों से सजाना या शकटिका बनाना भी एक कला थी। किन्तु इस कला के विशेष सन्दर्भ प्राप्त नहीं हैं।

निमित्तज्ञानम्

मनुष्य ने अपने सूक्ष्म प्रकृतिनिरीक्षण और सुदीर्घ अनुभव से जिन कलाओं को

विकसित किया है, उनमें से एक है-निमित्तज्ञान अर्थात् शकुन-अपशकुन के विचार की कला। मानव के अदृष्ट या नियति के सूचक ग्रहनक्षत्रों की गति, प्राकृतिक परिदृश्य आदि अनेक तत्त्वों में से कुछ संकेत ऐसे हैं जो आसन्न (तुरन्त या निकट भविष्य में घटने वाली) घटनाओं, शुभ और अशुभ की सूचना देते हैं, इन्हें ही निमित्त कहा गया है। फल के आधार पर समस्त निमित्तों को दो वर्गों में रखा जा सकता है-1. शुभ एवं 2. अशुभनिमित्त। इन निमित्तों में प्राकृतिक परिदृश्य (पवन की अनुकूलता दिशाओं की निर्मलता, फल-पुष्प समृद्धि), पशु-पक्षियों की गतिविधियाँ एवं ध्वनि, अङ्गस्पन्दन, स्वप्न आदि आते हैं। बाणभट्ट के अनुसार-जैसे वृक्ष का विकार भूगर्भ में छिपे धन का, सब ओर छिटकता हुआ प्रकाश श्रेष्ठ मणि का, लाली सूर्योदय का तथा तेज हवा का झोंका वर्षा के आगमन का सूचक होता है उसी प्रकार निमित्त शुभ-अशुभ के सूचक होते हैं। प्रकृति और जीव-जगत् के इङ्गित को समझकर अनिष्ट के निवारण, इष्ट की प्राप्ति तथा अवश्यम्भावी मंगल-अमङ्गल के लिये स्वयं को मानसिक रूप से तैयार करने की कला थी-निमित्तज्ञान ।

यन्त्रमातृका ॥ Yantramatrka

यंत्र-रचना की विद्या या कला यंत्रमातृका कही जाती है। यन्त्र शब्द की निष्पत्ति यम् धातु से हुई है। भूतों की स्वैच्छिक गति को जिस उपकरण में नियन्त्रित कर दिया जाता है; उसे यन्त्र कहते हैं। यन्त्र के बीज चार हैं-भूमि, जल, वायु और अग्नि। इनका आश्रय होने के कारण आकाश भी बीज या उपादान होता है। जल, वायु और अग्नि यंत्र में शक्ति या ऊर्जा के रूप में प्रयुक्त होते हैं । भौम या पार्थिव तत्त्वों से यन्त्र के विविध अंगों की रचना होती है।

संचालन या गति की दृष्टि से यन्त्र चार प्रकार के होते हैं-(i) स्वयंवाहक (Automatic), (ii) सकृत्प्रेर्य (प्रथमवार प्रेरित किये गये), (iii) अन्तरितवाय (मध्य-मध्य में प्रेरित), (iv) अदूरवाय (दूर से संचालित (Remote controlled), उपयोग की दृष्टि से यन्त्र मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं-(i) यानयन्त्र (ii) उदक यन्त्र (iii) संग्रामयन्त्र (iv) गृययन्त्र ।

यन्त्र के निम्नलिखित गुण माने गये हैं- यथावबीजसंयोग, सौश्लिष्ट्य, श्लक्ष्णता, अलक्षता, निर्वहण, लघुत्व, शब्दहीनता, अशैथिल्य, अस्खलद्गति, अभीष्टकारित्व, लयतालानुगामिता, सम्यक् संवृत्ति, अनुल्बणत्व, तादूरूप्य (मूल के सदृश रूप), दृढता, मसृणता एवं चिरकालसहत्व ।। ये गुण ही यन्त्रविज्ञान को एक कला के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

धारणमातृका ॥ Dharanamatrka

शास्त्रों के अवबोध एवं स्मरणशक्ति को बढाने वाली विद्याओं का ज्ञान, उनसे अलोकसामान्य धारणाशक्ति की प्राप्ति एवं जीवन में प्रयोग भी एक कला मानी गई है। यशोधर ने धारणशक्ति को बढाने वाली विद्या के पाँच अंग कहे हैं-वस्तु कोशस्तथा द्रव्यं लक्षणं केतुरेव च ।

सम्पाट्यम् ॥ Sampatya

वाचिक कलाओं में से एक है- सम्पाठ्य अर्थात् भली भाँति पढ़ने की कला। यशोधर ने इसे- किसी पढ़े हुये श्लोक को सुनकर ज्यों का त्यों दोहराने या मिलकर पढने की कला कहा है। पाठ्य के साथ जुड़ा हुआ सम् उपसर्ग- भली भाँति और साथ इन दोनों ही अर्थों का बोधक है। प्राचीन भारत में जब मुद्रित ग्रंथ नहीं थे, तब ज्ञान की धारा इस सम्पाठ्य की कला से ही आगे बढ़ी है। वेदों की श्रुति संज्ञा इस कला से ही सार्थक हुई है।

इस कला की प्राचीनता का एक रोचक साक्ष्य हम ऋग्वेद के मण्डूक सूक्त में पाते हैं। सम्पाठ्य का सबसे सुन्दर उदाहरण - काव्यपाठ है। राजशेखर के अनुसार कवि जैसे-तैसे काव्यरचना तो कर लेता है किन्तु काव्यपाठ करना वही जानता है, जिसे सरस्वती सिद्ध होती है पढने में लावण्य-ये पाठक के गुण कहे गये हैं। ललित स्वर से, काकुयुक्त, सुस्पष्ट, अर्थ के अनुसार विराम देते हुये कलमधुर ध्वनि से एक-एक अक्षर को स्पष्ट रूप से पढ़ना प्रशंसनीय कहा गया है। वस्तुतः - पाठसौन्दर्य नैकजन्मविनिर्मितम् है।

मानसीकाव्यक्रिया ॥ Manasikavya kriya

यशोधर के अनुसार इस कला के दो रूप हैं। प्रथम-केवल लिखित व्यंजनों अथवा पद्म, उत्पलादि आकृतियों से श्लोक की रचना करना; द्वितीय प्रकार चित्रकाव्य खड्गबन्ध, मुरजबन्ध आदि में देखा जा सकता है। मानसी काव्य क्रिया में ही काव्यार्थ की कल्पना है। इसका प्रयोजन मनोरंजन और प्रतिस्पर्द्धा है।

क्रियाविकल्पाः ॥ Kriyavikalpa

छलितकयोगाः ॥ Chalitayoga

छलितकयोगा

परातिसंधान (दूसरों को छलने की) विद्या छलितक योग कही जाती है। कूटनीति अथवा राजनीति का यह एक आवश्यक अंग है। इसमें रूपपरिवर्तन, वेशपरिवर्तन आदि उपाय आते हैं। कौटिल्य ने इस कला का उपयोग विशेष रूप से गुप्तचरों के लिये किया है। शूर्पणखा का रूपपरिवर्तन इसी कला का उदाहरण है।

अभिधानकोषच्छन्दोज्ञानम् ॥ Abhidhanakosh chanda jnana

शब्दकोष और छन्दों का ज्ञान भी कला मानी गई है। इस नामरूपात्मक जगत् के असंख्य रूपों और उनकी क्रियायों को अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नामों से कहा गया है। इन नामों या पदों के संग्रह तथा इनका अर्थ बताने वाले शास्त्र को ही अभिधानकोश कहते हैं। व्याकरणशास्त्र केवल शब्द का अनुशासन करता है, जबकि अभिधानकोश शब्द और अर्थ दोनों का। अतः यह व्याकरण का सर्वस्व एवं विद्यास्थान है। इस कला का प्राचीनतम उदाहरण निघण्टु नामक वैदिक पदकोश है। अभिधानकोशज्ञान की कला मनुष्य को कवि, मनीषी और वाग्मी बनाने का साधन है।

छन्द कला सृष्टि का मूल है, क्योंकि शिल्प के लिये आवश्यक है- सौन्दर्य, जो लय, संतुलन, अनुपात और सुसंगति से ही साध्य होता है। शिल्पी के मन में रूप का एक ऐसा सजीव छन्द सृजित होता है जो विश्व-व्यापी समष्टिछन्द से मिलकर शब्द, नाद, रेखा, वर्ण, गति और अभिनय से अभिव्यक्त होकर गीत, नृत्य, चित्र आदि कला बन जाता है। विद्या या कला के रूप में छन्द की गणना षड्वेदांगों में होती है। वेदों की स्थिति ओर गति दोनों का कारण ही पादभूत छन्द हैं। छन्दश्शास्त्र का प्राचीन अभिधान छन्दोविचिति है। आचार्य पिङ्गल द्वारा प्रणीत छन्दस्सूत्र इस विद्या का मान्य प्रामाणिक ग्रंथ है। छन्द - विद्या के आद्य प्रवर्तक भगवान् शिव हैं। ऋग्वेद में गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप् आदि छन्दों को अग्नि, सविता, सोम आदि देवों से संबद्ध किया गया है। न केवल काव्यसृष्टि अपितु जीवन को सुन्दर, कलामय बनाने के लिये भी छन्दोज्ञान आवश्यक है। काव्यकरण विधि अर्थात् अलंकारशास्त्र या काव्यशास्त्र को क्रिया-कल्प कहा जाता है। भारतीय काव्यशास्त्र की परम्परा अतिप्राचीन है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से लेकर भामह, वामन, दण्डी, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, राजशेखर, कुन्तक, महिमभट्ट, क्षेमेन्द्र, भोजराज, मम्मट, विश्वनाथ, पण्डितराज जगन्नाथ आदि आचार्यों ने काव्यशास्त्र के साथ ही कला के विविध पक्षों-कलासृष्टि, कला-प्रयोजन, कला-आस्वाद, कला-समीक्षा आदि की भी चर्चा की है। अतः क्रियाकल्प का ज्ञान भी एक कला है।

वस्त्रगोपनानि ॥ Vastragopana

वेश या वस्त्रों का प्रयोजन जहाँ शीत-ताप आदि से शरीर की रक्षा है वहीं अप्रकाश्य का गोपन और त्रुटित का संवरण भी है। वस्त्र से गोपनानि की कला कुत्सित और अश्लील के संगोपनपूर्वक रूप के उन्मीलन की कला है।

द्यूतविशेषः ॥ Dyutavishesha

द्यूतविशेषा-आकर्षक्रीडा

अक्षक्रीड़ा या द्यूतक्रीड़ा और पाशकक्रीड़ा(पासे का खेल) प्राचीन भारत के व्यसनात्मक विनोद रहे हैं। इनकी निन्दा भी हुई है और दुर्निवार आकर्षण शक्ति का वर्णन भी। प्राचीन युग में बहेरे का फल अक्ष रूप में व्यवहृत होता था। शारि-फलक (dice board) को इरिण कहा जाता था। महाभारत के सभापर्व के अन्तर्गत द्यूत पर्व और अनुद्यूत पर्व में पाशकक्रीड़ा के दुष्परिणामों को बताया गया है। व्यसन के रूप में यह क्रीडा हानिकारक होते हुये भी एक विशुद्ध कीड़ा के रूप में मनोविनोद का साधन रही है। विवाह के अवसर पर वधू की सखियाँ वर को द्यूतक्रीडा में नाना प्रकार के पण रखकर छकाने का उपाय करती थीं। स्त्री-पुरुषों के प्रेमद्यूतों में हारना भी जीतने का आनन्द देता था।

आकर्षणक्रीडा ॥ Akarshana kreeda

बालकक्रीडनकानि ॥ Balaka kreedanaka

बच्चों को प्रसन्न करने के लिये बालक्रीडाओं का ज्ञान एवं बालक्रीडनकों की रचना एक कला मानी गई है। क्रीडारस से आनन्द प्राप्त करने की प्रवृत्ति चिरन्तन है। अतः यह कला भी मनोविनोद के लिये है। संस्कृत साहित्य में नानाप्रकार की बालक्रीडाओं का वर्णन हुआ है- यथा कन्दुकक्रीड़ा, पुत्रिका-क्रीड़ा, सैकतवेदिका-रचना, नदियों के बालुकामय तट पर मणियों को छिपाने और ढूँढ़ने का खेल आदि।

नगाधिराज-तनया पार्वती, अपनी सखियों के साथ इन बालक्रीडाओं का आनन्द लेते हुये वर्णित हुई हैं। मगधराजकन्या पद्मावती का प्रिय खेल कन्दुकक्रीड़ा है तो अलकापुरी की यक्षकन्याओं का मणियों को छिपाने ढूँढ़ने का खेल । कन्दुकक्रीड़ा की कला का चरमपरिपाक राजकुमारी कन्दुकावती के कन्दुकनृत्य में देखा जाता है।

वैनायिकीनां विद्यानां ज्ञानम् ॥ Vainaayiki vidya jnana

वैनयिकीनां विद्यानां ज्ञानम्

यह वैनयिकीविद्या - अर्थात् विनय का आधान करने वाली विद्याओं के ज्ञान से स्व एवं पर को विनीत बनाने की कला है । विनय एक ऐसा आंतरिक गुण है जो न केवल मनुष्य के वैदुष्य को शोभित करता है अपितु सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ही उद्भासित करता हुआ जीवन-पथ को सुगम बना देता है। इस विद्या के अन्तर्गत नीतिशास्त्र या आचारशास्त्र आता है। कौटिल्य विनय का हेतु इन्द्रियजय को मानते हैं -

विद्याविनयहेतुरिन्द्रियजयः।

विद्या-वृद्धों का नित्यसंयोग भी विनय की वृद्धि करता है। विद्याविनीत राजा ही प्रजा को विनीत करता हुआ लोकमंगल का साधक होता है।

विद्याविनीतो राजा हि प्रजानां विनये रतः। अनन्यां पृथिवीं भुङ्क्ते सर्वभूतहिते रतः॥

इस कला के अन्तर्गत हस्तिशिक्षा, अश्वशिक्षा आदि का ज्ञान भी परिगणित होता है जिसके द्वारा इन पशुओं को नियंत्रित किया जाता है। कौटिल्य ने विद्याध्ययन काल में दिन का पूर्वभाग इन विद्याओं की शिक्षा के लिये नियत किया है।

वैजयिकीनां विद्यानां ज्ञानम् ॥ Vaijayiki vidya jnana

सभी कलाएँ, शिल्प और शास्त्र जीवन-संग्राम में मानव को विजयी बनाने के लिये हैं, तथापि यशोधर ने इन विद्याओं को दो प्रकार का माना है (1) दैवी और (2) मानुषी। अपराजिता आदि दैवी विद्यायें हैं। संग्रामविद्या, युद्धकौशल और शस्त्रविद्या मानुषी विद्यायें हैं। इनका ज्ञान भी एक कला है। विक्रमोर्वशीय के एक सन्दर्भ के अनुसार देवगुरु बृहस्पति के द्वारा अपराजिता विद्या की शिक्षा उर्वशी को दी गई थी। विश्वामित्र ने बला और अतिबला नामक दिव्य विद्याओं की शिक्षा श्रीराम को प्रदान की थी।

वैतालिकीनां विद्यानां ज्ञानम्  ॥ Vaitaliki vidya jnana

व्यायामिकीनां विद्यानां ज्ञानम्

मृगया, मल्लविद्या आदि व्यायामिकी विद्याओं आदि का ज्ञान भी एक कला है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिये इस विद्या का ज्ञान आवश्यक है। मृगया की प्रशंसा करते हुये महाकवि कालिदास कहते हैं-

मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः सत्त्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः। उत्कर्षः स च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग् विनोदः कुतः ।।

कादम्बरी में स्नान से पूर्व महाराज शूद्रक द्वारा व्यामामशाला में व्यायाम किये जाने वर्णन हुआ है। इस प्रकार स्वास्थ्य और सौन्दर्य, आत्मोत्कर्ष और विजय, इन सभी उपर्युक्त तीन विद्याओं से साधा जाता था। परमानन्द की उपलब्धि को ही जीवन का चरम लक्ष्य मानने वाली भारतीय संस्कृति चतुःषष्टि कलाओं के माध्यम से दैनन्दिन जीवन में भी आनन्द की उपासना करती रही है, क्योंकि महाशिव की आद्याशक्ति महामाया इस जगत् को प्रपञ्चित करती हैं, सदानन्द ही जिनका आहार है। ललितास्तवराज में कहा गया है-

क्रीडा ते लोकरचना सखा ते चिन्मयः शिवः । आहारस्ते सदानन्दो वासस्ते हृदये सताम् ।।

निष्कर्ष॥ Discussion

प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति के चार प्रमुख कर्तव्यों को सुगम बनाना था। धर्म (धार्मिकता), अर्थ (आजीविका), काम (पारिवारिक जीवन) और मोक्ष (शाश्वत शांति की प्राप्ति) परंपरा 18 प्रमुख विद्याओं (सैद्धांतिक विषयों), और 64 कलाओं (व्यावसायिक विषयों / शिल्प) की बात करती है। इन "कलाओं" का लोगों के दैनिक जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है और अधिकांश यह ध्यान रखना प्रमुख है कि ये कला अभी भी आजीविका के महत्वपूर्ण साधन हैं। इन कलाओं का सामान्य जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत की परंपरा में "कला" और "शिल्प" के बीच कोई विरोध नहीं है। शिल्पकारों के लिए शिल्प उनकी आजीविका ही नहीं उनकी पूजा भी है। ये शिल्प सिखाया गया था, अभी भी सिखाया जाता है, एक शिक्षक द्वारा अपने शिष्यों को, एक शिल्प सीखने के लिए शिक्षक को काम पर देखने की आवश्यकता होती है, शिक्षक द्वारा सौंपे गए अजीब, छोटे काम और फिर लंबे अभ्यास से शुरू करना, अपने आपमें बहुत अनुभव के बाद ही शिक्षार्थी अपनी कला को परिष्कृत करता है और फिर स्वयं को स्थापित कर सकता है।

यह हम आज भी भरत के नृत्य, संगीत और यहां तक ​​कि वाहन-मरम्मत में भी देख सकते हैं। यही एक कारण है कि शिल्पकार को साधक के रूप में उच्च सम्मान दिया जाता है।एक भक्त जिसका मन बड़ी श्रद्धा से अपनी वस्तु के प्रति आसक्त हो जाता है। उनका प्रशिक्षण तप (तपः) का एक रूप है, एक समर्पण और उन्हें प्राप्त करने वाला प्राथमिक गुण एकाग्रता है। भारत की परंपरा शिल्प के लिए भी ग्रंथों से भरी हुई है, जो व्यावहारिक अनुशासन हैं। प्रत्येक अनुशासन में स्कूल हैं; प्रत्येक स्कूल में विचारक और ग्रंथ होते हैं।वस्तुतः ग्रन्थ तीन प्रकार के होते हैं - प्राथमिक ग्रंथ (शास्त्र) जो मूलभूत सिद्धांतों को निर्धारित करते हैं, समग्र ग्रंथ (उस अनुशासन में सभी विद्यालयों का संग्रह) और टिप्पणी / प्रदर्शनी ये तीन प्रकार के ग्रंथ अधिकांश विषयों में उपलब्ध हैं - इस तरह ज्ञान को व्यवस्थित और शिक्षाशास्त्र के उद्देश्यों के लिए प्रस्तुत किया जाता है। किन्तु शिल्प के मामले में यह सच है जैसे विद्या के मामले में यह सच है कि ज्ञान गुरु में रहता है। यह भारत की परंपरा में गुरुओं से जुड़ी महान श्रद्धा का मूल है क्योंकि वे ज्ञान के दिए गए क्षेत्र में स्रोत और अंतिम अधिकार हैं।

उद्धरण॥ References

  1. आचार्य श्री बलदेव उपाध्याय, संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास, अष्टादश(प्रकीर्ण)खण्ड,संस्कृतवाङ्मय में कलाशास्त्र, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान सन् २०१७ पृ० ३१/३३।
  2. आचार्य श्री बलदेव उपाध्याय, संस्कृत वाङ्मय का बृहद् इतिहास, अष्टादश(प्रकीर्ण)खण्ड,संस्कृतवाङ्मय में कलाशास्त्र, उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान सन् २०१७ पृ० ३६/३७।
  3. Vachaspatyam
  4. Shabdakalpadruma
  5. श्री मद्भागवत महापुराण, (द्वितीय खण्ड) हिन्दी टीका सहित,स्कन्ध १०,अध्याय ४५ , श्लोक ३६, हनुमान प्रसाद् पोद्दार,गोरखपुर गीता प्रेस सन् १९९७ पृ०४१२।
  6. श्रीमत् शुक्राचार्य्यविरचितः शुक्रनीतिसारः, १८९०: कलिकाताराजधान्याम्, द्वितीयसंस्करणम् ।
  7. B.D.Basu, The Sacred Books of the Hindus, Vol XIII The Sukraniti, Allahabad: The Panini Office, Bhuvaneshwari Asrama, 1914. Pg.no.157