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{{One source|date=March 2021}}
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{{One source|date=March 2021}}इस विषय पर [[Interrelationship in Srishti (सृष्टि में परस्पर सम्बद्धता)|यह लेख]] भी देखें।
    
== वर्तमान सन्दर्भ ==
 
== वर्तमान सन्दर्भ ==
 
विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले विभिन्न विषयों का प्रयोजन क्या होता है, इस विषय में व्यापक सन्दर्भ में पुनर्विचार करने की आवश्यकता निर्माण हुई है<ref>धार्मिक शिक्षा : संकल्पना एवं स्वरूप (धार्मिक शिक्षा ग्रन्थमाला १): पर्व ६, प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे</ref>। ऐसा विचार करते हैं तब ध्यान में आता है कि शिक्षा से जुड़े विभिन्न पक्ष शिक्षा को और किसी एक विषय को भिन्न भिन्न दृष्टि से देखते हैं और उसके ही अनुसार भिन्न भिन्न तरीके से पेश आते हैं ।
 
विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले विभिन्न विषयों का प्रयोजन क्या होता है, इस विषय में व्यापक सन्दर्भ में पुनर्विचार करने की आवश्यकता निर्माण हुई है<ref>धार्मिक शिक्षा : संकल्पना एवं स्वरूप (धार्मिक शिक्षा ग्रन्थमाला १): पर्व ६, प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखन एवं संपादन: श्रीमती इंदुमती काटदरे</ref>। ऐसा विचार करते हैं तब ध्यान में आता है कि शिक्षा से जुड़े विभिन्न पक्ष शिक्षा को और किसी एक विषय को भिन्न भिन्न दृष्टि से देखते हैं और उसके ही अनुसार भिन्न भिन्न तरीके से पेश आते हैं ।
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इस भिन्नता का वर्गीकरण कुछ इस प्रकार से किया
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इस भिन्नता का वर्गीकरण कुछ इस प्रकार से किया जा सकता है:
 
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# छात्र के लिये दो प्रेरक तत्त्व होते हैं । एक होता है रुचि (अथवा जिज्ञासा) । दूसरा होता है अर्थार्जन के अवसरों की उपलब्धि की आकांक्षा । इनके अनुरूप मानसिक और बौद्धिक क्षमता है कि नहीं यह एक अन्य निर्णायक कारक भी है। रुचि, जिज्ञासा और अर्थार्जन की आकांक्षा जब परस्पर अनुकूल होते हैं तब छात्र की शिक्षा व्यक्तिगत रूप से ही सही, परन्तु अर्थपूर्ण होती है । जब वे एक दूसरे के अनुकूल नहीं होते तब शिक्षा यान्त्रिक बन जाती है । रुचि, जिज्ञासा और अर्थार्जन जब परस्पर अनुकूल और अनुरूप नहीं होते हैं तब सही और उपयुक्त प्रेरक तत्त्व रुचि और जिज्ञासा होने चाहिये, न कि अर्थार्जन की आकांक्षा । परन्तु वर्तमान में वह अर्थार्जन की आकांक्षा ही बनकर रह गया है । इसके भी कई कारण हैं, परन्तु उनकी चर्चा इस लेख का विषय नहीं है ।
जा सकता है
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# छात्र के मातापिता और परिवार के लिये विषय निर्धारण के प्रेरक तत्त्व तीन प्रकार के होते हैं । एक होता है छात्र का ज्ञानात्मक विकास, दूसरा होता है छात्र को अर्थार्जन के अवसरों की उपलब्धि और तीसरा होता है छात्र की, और उसके कारण से परिवार की समाज में प्रतिष्ठा । इसमें भी छात्र के ज्ञानात्मक विकास के कारण समाज में प्रतिष्ठा यह परिवार और समाज दोनों के लिये
 
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(१) छात्र के लिये प्रेरक तत्त्व दो होते हैं । एक होता
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है रुचि और जिज्ञासा । दूसरा होता है अथर्जिन के अवसरों
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की उपलब्धि की आकांक्षा । इनके अनुरूप मानसिक और
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बौद्धिक क्षमता है कि नहीं यह एक अन्य निर्णायक कारक
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भी है। रुचि, जिज्ञासा और अआअधथर्जिन की आकांक्षा जब
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परस्पर अनुकूल होते हैं तब छात्र की शिक्षा व्यक्तिगत रूप
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से ही सही, परन्तु अर्थपूर्ण होती है । जब वे एक दूसरे के
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अनुकूल नहीं होते तब शिक्षा यान्त्रिक बन जाती है । रुचि,
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नहीं होते हैं तब सही और उपयुक्त प्रेरक तत्त्व रुचि और
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जिज्ञासा होने चाहिये, न कि अथर्जिन की आकांक्षा । परन्तु
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वर्तमान में वह अथर्जिन की आकांक्षा ही बनकर रह गया
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है । इसके भी कई कारण हैं, परन्तु उनकी चर्चा इस लेख
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का विषय नहीं है ।
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(२) छात्र के मातापिता और परिवार के लिये विषय
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निर्धारण के प्रेरक तत्त्व तीन प्रकार के होते हैं । एक होता है
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छात्र का ज्ञानात्मक विकास, दूसरा होता है छात्र को
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अथर्जिन के अवसरों की उपलब्धि और तीसरा होता है
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छात्र की, और उसके कारण से परिवार की समाज में
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प्रतिष्ठा । इसमें भी छात्र के ज्ञानात्मक विकास के कारण
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समाज में प्रतिष्ठा यह परिवार और समाज दोनों के लिये
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सही और उपयुक्त स्थिति है। परन्तु हम देखते हैं कि
 
सही और उपयुक्त स्थिति है। परन्तु हम देखते हैं कि
  

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