Difference between revisions of "बाल संस्कार - पुण्यभूमि भारत"

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[[File:Bharat man1.jpg|center|thumb]]<blockquote>'''उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्वेश्चेव दक्षिणम्।'''</blockquote><blockquote>'''वर्ष तद्भारत नाम भारती यत्र सन्तति:।'''</blockquote>हिन्द महासागर के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित महान देश भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है, यहाँ का पुत्र रूप समाज भारतीय हैं । प्रत्येक भारतीय को यह देश प्राणों से प्यारा है। क्योंकि इसका कण-कण पवित्र है, तभी तो प्रत्येक सच्चा भारतीय (हिन्दू) गाता है-"कण-कण में सोया शहीद, पत्थर-पत्थर इतिहास है"। इस भूमि पर पग-पग में उत्सर्ग और शौर्य का इतिहास अंकित है। स्वामी विवेकानन्द ने श्रीपाद शिला पर इसका जगन्माता के रूप में साक्षात्कार किया। वह भारत माता हमारी आराध्या है। उसके स्वरूप का वर्णन वाणी व लेखनी द्वारा असंभव है, फिर भी माता के पुत्र के नाते उसके भव्य-दिव्य स्वरूप का अधिकाधिक ज्ञान हमें प्राप्त करना चाहिए। कैलास से कन्याकुमारी, अटक से कटक तक विस्तृत इस महान भारत के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों व धार्मिक स्थानों का वर्णन यहाँ दिया जा रहा हैं ।  
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[[File:Bharat man1.jpg|center|thumb]]<blockquote>'''उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्वेश्चेव दक्षिणम्।'''</blockquote><blockquote>'''वर्ष तद्भारत नाम भारती यत्र सन्तति:।'''</blockquote>हिन्द महासागर के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित महान देश भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है, यहाँ का पुत्र रूप समाज भारतीय हैं । प्रत्येक भारतीय को यह देश प्राणों से प्यारा है। क्योंकि इसका कण-कण पवित्र है, तभी तो प्रत्येक सच्चा भारतीय (हिन्दू) गाता है-"कण-कण में सोया शहीद, पत्थर-पत्थर इतिहास है"। इस भूमि पर पग-पग में उत्सर्ग और शौर्य का इतिहास अंकित है। स्वामी विवेकानन्द ने श्रीपाद शिला पर इसका जगन्माता के रूप में साक्षात्कार किया। वह भारत माता हमारी आराध्या है। उसके स्वरूप का वर्णन वाणी व लेखनी द्वारा असंभव है, तथापि माता के पुत्र के नाते उसके भव्य-दिव्य स्वरूप का अधिकाधिक ज्ञान हमें प्राप्त करना चाहिए। कैलास से कन्याकुमारी, अटक से कटक तक विस्तृत इस महान भारत के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों व धार्मिक स्थानों का वर्णन यहाँ दिया जा रहा हैं ।  
  
इस लेख में पुण्यभूमि भारत की विशेष परिचयों को दर्शाया गया है जिनसे हमारे पुरातन इतिहास को वर्त्तमान की धारा के साथ परिचय बनाया जा सके | इतिहास के शौर्य को भुलाने के कारण आज की पीढ़ी अपने आपको निर्बल और असहाय समझती है |
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इस लेख में पुण्यभूमि भारत की विशेष परिचयों को दर्शाया गया है जिनसे हमारे पुरातन इतिहास को वर्त्तमान की धारा के साथ परिचय बनाया जा सके इतिहास के शौर्य को भुलाने के कारण आज की पीढ़ी अपने आपको निर्बल और असहाय समझती है
  
 
'''पुण्यभूमि भारत का परिचय निम्नलिखित बिन्दुओ द्वारा :-'''  
 
'''पुण्यभूमि भारत का परिचय निम्नलिखित बिन्दुओ द्वारा :-'''  
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# मध्य भारत  
 
# मध्य भारत  
 
# दक्षिण भारत  
 
# दक्षिण भारत  
आइये अब हम सभी इन सभी बिन्दुओ को  विस्तृत रूप से जानने का प्रयास करेंगे |
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आइये अब हम सभी इन सभी बिन्दुओ को  विस्तृत रूप से जानने का प्रयास करेंगे
  
 
= पवित्र नदियाँ =
 
= पवित्र नदियाँ =
 
अनेक पवित्र नदियाँ अपने पवित्र जल से भारत माता का अभिसिंचन करती हैं। सम्पूर्ण देश में इन नदियों को आदर व श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। इनके पवित्र तटों पर विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन किये जाते हैं, प्रत्येक हिन्दू इनके जल में डुबकी लगाकर अपने आपको को धन्य मानता है। ये नदियाँ भारत के उतार-चढ़ाव की साक्षी हैं। हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अंसख्य तीर्थ इन नदियों के तटों पर विकसित हुए।
 
अनेक पवित्र नदियाँ अपने पवित्र जल से भारत माता का अभिसिंचन करती हैं। सम्पूर्ण देश में इन नदियों को आदर व श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। इनके पवित्र तटों पर विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन किये जाते हैं, प्रत्येक हिन्दू इनके जल में डुबकी लगाकर अपने आपको को धन्य मानता है। ये नदियाँ भारत के उतार-चढ़ाव की साक्षी हैं। हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अंसख्य तीर्थ इन नदियों के तटों पर विकसित हुए।
  
=== गंगा ===
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. गंगा  
गंगा भारत की पवित्रतम नदी है। सूर्यवंशी राजा भगीरथ के प्रयासों से यह भारत-भूमि पर अवतरित हुई। उत्तरप्रदेश के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री शिखर पर गोमुख इसका उद्गम स्थान है। गंगोत्री के हिम से पुण्यसलिला गंगा अनवरत जल प्राप्त करती रहती है। यह गंगा-जल की ही विशेषता है कि अनेक वर्षों तक रखा रहने पर भी यह दूषित नहीं होता। गंगा-जल का एक छींटा पापी को भी पवित्र करने की क्षमता रखता है। गंगा के तट पर हरिद्वार, प्रयाग, काशी, पाटलिपुत्र आदि पवित्र नगर श्रद्धालुजनों को आध्यात्मिक शान्ति प्रदान करते हैं। गंगा भागीरथी, जाह्नवी, देवनदी आदि नामों से भी पुकारी जाती है। यमुना, गण्डक, सोन, कोसी के जल को समेटते हुए गंगा समुद्र में मिलने से लगभग 300 कि मी. पहले ही कई शाखाओं में विभक्त होकर ब्रह्मपुत्र के साथ मिलकर विश्व के सबसे बड़े त्रिभुजाकार तटवर्ती मैदान (डेल्टा) का निर्माण करती, गोमुख गंगोत्री से १४५०  कि.मी. लम्बी यात्रा पूर्ण कर पतितपावनी गंगा गंगासागर में मिल जाती है। लगभग १२५ कि. मी. दक्षिण में गांगासागर नाम का पवित्र स्थल है, यहीं पर कपिल मुनि का आश्रम था जहाँ सगर-पुत्रों की भस्मी को आत्मसात कर गंगा ने उनका उद्धार किया था।  हिन्दू की मान्यता है कि गंगा के किनारे किये गये पुण्य कर्मों का फल कई गुना अधिक हो जाता है। गंगा-तट पर पहुँचकर पापी के हुदय में अच्छे भावों का संचार होने लगता है। आषाढ़, कार्तिक, माघ, वैशाख की पूर्णिमा, ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, माघ शुक्ल सप्तमी तथा सोमवती अमावस्या को गंगा में स्नान करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। ऋग्वेद, महाभारत, भागवत पुराण, रामायण आदि में गंगा का महात्म्य विस्तार से वर्णित है। सच्चाई तो यह है कि गांगा सब तीर्थों का प्राण है। भागवत पुराण के अनुसार गंगावतरण वैशाख शुक्ल तृतीया को तथा हिमालय से मैदान में निर्गम ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हुआ।
 
  
=== '''यमुना''' ===
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२. यमुना
सूर्य-पुत्री यमुना भारत की पवित्रतम नदियों में से एक है। गांगा के स्मरण के साथ-साथ यमुना का भी स्मरण किया जाता है, तभी तो स्नान करते समय इसका आहवान करके पवित्र होने की कामना की जाती है
 
  
'''“गंगे च यमुने चैव गोदावर सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरेि जलेअस्मिन् सन्निधिों कुरू।"'''
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३. सिन्धु
  
यमुना का उद्गम यमुनोत्री शिखर से है। जहाँ देवी यमुना का मन्दिर बना हुआ है। हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में १५० कि.मी. की यात्रा करते हुए यह नदी अनेक छोटे-बड़े स्त्रोतों से जल ग्रहण कर बड़ी नदी बनकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है। गांगा के लगभग समानान्तर बहते हुए यमुना प्रयाग में गंगा में मिल जाती है। मथुरा, वृदांवन, आगरा, इन्द्रप्रस्थ(दिल्ली) आदि प्राचीन नगर इसके किनारे बसे हैं। यमुना को यम की बहिन कहा जाता है। यम द्वितीय (मैयादूज) को यमुना में स्नान करना बड़ा पुण्य-प्रदाता है। कार्तिक मास यमुनास्नान के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
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. सरस्वती
  
=== सिन्धु ===
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. ब्रह्मपुत्र
सिन्धु को केवल भारतवर्ष की वरन विश्व की विशाल नदी होने का श्रेय प्राप्त है। सिन्धु का उद्गम-स्थान तिब्बत में स्थित केंलास-मानसरोवर के पास है। २५० कि. मी. तिब्बत में तथा ५५० कि.मी. जम्मू-कश्मीर राज्य में बहने के बाद यह पाकिस्तान में प्रवेश करती है। कश्मीर में सिन्धु नदी ५२०० मीटर गहरी घाटी में होकर बहती है। पाकिस्तान में सिन्धु नदी में सतलुज तथा सहायक नदियाँ झेलम (वितस्ता), चिनाव(चन्द्रभाग), रावी, व्यास आपस में संगम बनाती हुई मिलती हैं। सिन्धु के समान विशालता के कारण ही इसका नाम सिन्धु पड़ा। इसकी लम्बाई २८८० कि. मी. है। इसका जल-ग्रहण क्षेत्र ११,६६,०००  वर्ग कि.मी. में विस्तृत है। कराची के समीप यह नदी सिन्धुसागर में मिल जाती है। कैलास मानसरोवर, साधुवेला, सक्खर इसी के तट पर स्थित हैं। ऋग्वेद में वर्णित सप्त सिन्धु प्रदेश इसके दोनों ओर पंजाब तक विस्तृत था। महाभारत में इस प्रदेश को सौवीर कहा गया है। वर्तमान पाकिस्तान में सिन्ध प्रान्त इसी नदी के आस-पास स्थित प्रदेश है। वैदिक संस्कृति का विकास यहीं हुआ। मोहन जोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त जानकारी से इस प्रदेश के प्राचीन वैभव का पता चलता है।
 
  
=== सरस्वती ===
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६. रेवा (नर्मदा)
वेदों में उल्लिखित यह पवित्र नदी हिमालय से निकलकर वर्तमान हरियाणा, राजस्थान, गुजरात प्रदेशों को सींचती हुई सिन्धुसागर में मिलती थी। कालान्तर में भूगर्भित हलचलों के कारण अम्बाला के आस-पास का क्षेत्र ऊंचा हो गया, जिससे इस नदी का जल अन्य सरेिताओं में मिल गया और यह नदी विलुप्त हो गयी। एक अन्य खोज के अनुसार इस नदी का जल रिस-रिसकर पृथ्वी के अन्दर चला गया। आज भी हरियाणा तथा राजस्थान प्रदेशों में पृथ्वी के अन्दर ही अन्दर प्रवाहित हो रही है। गुजरात के कच्छ के रण में विलीन होने वाली लूनी नदी को इसका अवशेष कहा जा सकता है। वेदों की रचना इस नदी के आसपास के प्रदेश (सारस्वत प्रदेश) में हुई। मनु के अनुसार पृथूदक (पेहव) इसी नदी के तट पर बसा था | <blockquote>"सरस्वत्यश्च तीथॉनि तीर्थभ्यश्च पृथूदकम्। </blockquote><blockquote>पृथूदकात् पुण्यतमं नान्यत तीर्थ नरोत्तम।" (महाभारत वनपर्व) </blockquote>ऋग्वेद में सरस्वती का वर्णन केवल नदी के रूप में नहीं , वाणी व विद्या की देवी के रूप में भी हुआ है। यह सत्य तथा अच्छाई की प्रेरणा देती है। गंगा के समान इसके तट पर अनेक तीर्थों का विकास हुआ है। महाभारत, स्कन्द व पद्म पुराण, देवी भागवत आदि ग्रन्थों में इसका वर्णन बड़ी श्रद्धाभक्ति के साथ किया गया है। सरस्वती हिमालय से निकल कर पृथूदक, कुरूक्षेत्र, विराट, पुष्कर, अर्बुदारण्य, सिद्धपुर, प्रभास आदि स्थानों से होते हुए सागर से मिलती है।
 
  
=== गण्डकी ===
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७. गोदावरी
यह पवित्र नदी नेपाल में मुक्तिनाथ से थोड़ा आगे दामोदर कुण्ड से निकलती है। इसे नारायणी तथा शालिग्रामी भी कहते हैं। इस नदी क्षेत्र से प्राकृत और विभिन्न स्वरूप वाले शालिग्राम प्राप्त होते हैं। मुक्तिनाथ इसके तट पर स्थित प्रमुख शक्तिपीठ है। सती का गण्डस्थल यहीं गिरा था जहाँ आज भव्य मन्दिर है। इसी कारण इसे गण्डकी के नाम से पुकारा जाता है। यह नदी बिहार राज्य में प्रवेश करती है और गंगा में मिल जाती हैं ।
 
  
=== ब्रह्मपुत्र ===
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. कृष्णा
सप्त महानदों (पुल्लिंग) में ब्रह्मपुत्र प्रमुख है। इसका उद्गम-स्थान पवित्र मानसरोवर के समीप एक विशाल हिमानी है। तिब्बत में १२०० कि मी. पूर्व की ओर बहते हुए दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़कर भारत में प्रवेश करती है। तिब्बती क्षेत्र में इसे सांपों नाम दिया गया। अरुणाचल व असम में इसे लोहित कहा जाता है। कामाख्या शक्ति-पीठ इसके तट पर स्थित है।अपुनर्भव, भस्मकूट, उर्वशीकुण्ड, मणिकणेश्वर, पण्डुनाथ पर्वत (मधु-कैटभ का वध-स्थल), अश्वकरत्न (कल्कि अवतार से सम्बन्धित) आदि प्रमुख तटवर्ती तीर्थ हैं। तेजपुर, गुवाहाटी, डिब्रूगढ़, शिवसागरआदि समीपवर्ती नगर हैं। भारत में ५०० किमी. से अधिक दूरी तक बहने के बाद यह दक्षिण दिशा की ओर मुड़कर बांग्लादेश में पहुँचती है। बंगाल में गंगा (पद्म) व मेघना से मिलकर विश्वविख्यात सुन्दरवन डेल्टा का निर्माण करती हैं। ब्रह्मपुत्र की लम्बाई २९०० कि.मी. से कुछ अधिक ही है।
 
  
=== रेवा (नर्मदा ) ===
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. कावेरी
अमरकोश के अनुसार रेवा नर्मदा का ही दूसरा नाम है | रेवा को मैकाल - कन्या के नाम से भी पुकारा जाता है क्योंकि मैकाल से इसका एक स्त्रोत प्रारंभ होता है जबकि दूसरा भाग अमरकोटक से उद्भूत होता है और फिर दोनों मिलकर एक हो जाते हैं। नर्मदा मध्य भारत में गंगा के समान वन्दनीय है। अमरकंटक से पश्चिम दिशा में बहते हुए भड़ौच के पास खंभात की खाड़ी के समुद्र में मिल जाती है। नर्मदा के तट के साथ असंख्य तीर्थों का प्रादुर्भाव हुआ है। रुद्र के अंश से उत्पन्न होने के कारण यह जड़-चेतन सबको पवित्र करने में समर्थ है। इसका नाम रुद्र कन्या भी है। इसके तट पर ओंकारेश्वर, मान्धाता, शुक्ल तीर्थ, भेड़ाघाट, जबलपुर, अमरकण्टक, कपिलधारा आदि पावन स्थल व नगर स्थापित हैं। व्यास व शुकदेव ने बरकेल नामक स्थान पर आकर नर्मदा में स्नान किया। बरकेल आज भी सामवेदी ब्राह्मणों के लिए प्रसिद्ध है। यहीं पर व्यासजी का मन्दिर व शुकदेव महादेव के मन्दिर बने हैं। सती अनसूया का मन्दिर भी पास हो बना है। नर्मदा की कुल लम्बाई १३०० कि.मी. है।
 
  
=== गोदावरी ===
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१०. महानदी
१४५० कि.मी. लम्बी गोदावरी दक्षिण भारत की गांगा कहलाती है। महाराष्ट्र प्रान्त के नासिक जिले में एक गाँव है त्रयम्बक। यहीं ब्रह्मगिरि से निकल कर गोदावरी पूर्व की ओर बहती हुई गंगा सागर में मिलती है। इसका एक नाम गौतमी भी है, क्योंकि गौतम ऋषि की तपस्या के कारण यह अवतरित है। त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिग, नासिक(पंचवटी), पैठण, राजमहेन्द्र,भद्राचलमू, नान्देड़ (गुरु गोविन्द सिंह की समाधि), कोटा पल्ली आदि पावन क्षेत्र इसके तट पर हैं। मुस्लिम आक्रान्ताओं ने तीर्थों की पवित्रता को अनेक बार भंग किया। मराठा उत्थान के समय अनेक मन्दिरों का निर्माण व जीणोद्धार किया गया। वधाँ, प्राणहिता, इन्द्रावती, साबरी प्रवरा, वैन गांगा आदि इसकी सहायक नदियाँ हैं।
 
  
=== कृष्णा ===
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'''इन पवित्र नदियों पर यह [[पुण्यभूमि भारत - पवित्र नदियाँ|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
कृष्णा प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख नदी है। यही नदी सहयाद्रि पर्वत-माला में महाबलेश्वर के उत्तर में स्थित कराड नामक स्थान से निकलती है। यह स्थान सिन्धु सागर के ६० किमी. पूर्व में है। वारणा से होते हुए यह दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़कर कर्नाटक में प्रवेश करती है। कृष्ण की दो प्रमुख सहायक नदियाँ भीमा और तुगभद्रा हैं। चन्द्रभागा पण्ढरपुर के समीप भीमा से मिलती है। आन्ध्रप्रदेश के काफी विस्तृत क्षेत्र में बहते हुए कृष्णा महेन्द्र पर्वत-श्रृंखला को काट कर गंगासागर की ओर बढ़ती है और बृहद डेल्टा बनाते हुए सागर में मिल जाती है। इस नदी के तट पर सतारा, सांगली, रायचूर, विजयवाड़ा, नागार्जुन सागर आदि स्थित हैं। नदी की कुल लम्बाई १२८० कि.मी. है।
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= पञ्च सरोवर =
 
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जिस प्रकार भारत के चार कोनों पर चार धाम (उत्तरी सीमा पर बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूर्व में जगन्नाथपुरीतथा पश्चिम में द्वारिका स्थापित कर देश की एकता को सुदृढ़ किया गया।) उसी प्रकार मनीषियों ने पंच सरोवरों की मान्यता देकर समस्त भारतवासियों को प्रान्त व जातिभेद से ऊपर उठकर भारत को एक राष्ट्र के रूप में सुदूढ़ करने की प्रेरणा दी। सभी हिन्दू इनके प्रतिश्रद्धाभाव रखते हैं। ये पांच सरोवर निम्नलिखित हैं  
=== कावेरी ===
 
कावेरी प्रमुख नदियों में सबसे दक्षिण में स्थित है। यह कूर्ग जिले में स्थित है। सहयाद्रि पर्वत के दक्षिणी छोर से निकल कर दक्षिण-पूर्व बहते हुए सागर में मिलती है। मिलने से पूर्व कई शाखाओं में बँट जाती है और उपजाऊ डेल्टा बनाती है। इसकी लम्बाई ८०० कि.मी.है। अग्नि व विष्णु पुराण में कावेरी का वर्णन विस्तार से हुआ है। कावेरी के उद्गम स्थल के पास ही देवी कावेरी का प्राचीन मन्दिर है। कई छोटी-छोटी नदियाँ कावेरी में मिलती हैं। कनकवती, हेमवती, लक्ष्मणतीर्थ प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। यह नदी कहीं पर बहुत चौड़ी व संकरी है। तीन स्थानों पर यह दो शाखाओं में बँटकर पुन:एक हो जाती है। इस प्रकार बीच में तीन पवित्र द्वीप बन गये हैं। आदिरंगमू या श्रीरंगपत्तन, मध्य में शिवसमुद्रम् तथा अन्तरंगम् या श्रीरंगमू में भगवान विष्णु के पवित्र मन्दिर बने हैं। चिदम्बरम् नामक पवित्र शैव तीर्थ तथा प्राचीन जम्बूकेश्वरम् मन्दिर श्रीरंगम के पास स्थित हैं। तंजावूर, कुंभकोणम तथा त्रिचिरापल्ली इसी पवित्र नदी के समीपवर्ती तीर्थ हैं। प्रसिद्ध कम्बारामायण के रचयिता कवि कम्बन का क्षेत्र कावेरी-तट ही हैं।
 
 
 
=== महानदी ===
 
उत्कल (उड़ीसा) राज्य की यह प्रमुख नदी मध्यप्रदेश के रायपुर जिले के दक्षिण पूर्व में सिहाँवा पर्वत श्रेणी से निकलकर उड़ीसा में कटक के पास सागर में मिलती है। नदी का कुल बहाव ८६० कि.मी. है। बहाव की आधी दूरी छत्तीसगढ़ के रायपुर, बस्तर, बिलासपुर तथा रायगढ़ जिलों में कोयना, पंचगंगा, घटप्रभा, मल्लप्रभा आदि लघु सरिताओं का जल समेटे तय करती है। शिवनाथ, जोंक, हस्दों इसकी सहायक नदियाँ हैं। महानदी का जल सिंचाई व विद्युत-निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है। विश्व का सबसे लम्बा बांध हीराकुण्ड महानदी पर ही बना है। उपर्युक्त प्रमुख नदियों के अतिरिक्त निम्न नदियों का भी स्मरण बड़ी श्रद्धाभक्ति के साथ किया जाता है। इनमें स्नान करने पर शाप-ताप शान्त हो जाते हैं तथा मानव देवत्व की ओर अग्रसर होता हैं। ये नदियाँ हैं महेन्द्रतनया, वेत्रिवती, क्षिप्रा, भीमा, ताप्ती, चम्बल, गोमती, चर्मण्वती आदि।
 
 
 
= पॉच सरोवर =
 
जिस प्रकार भारत के चार कोनों पर चार धाम (उत्तरी सीमा पर बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूर्व में जगन्नाथपुरीतथा पश्चिम में द्वारिका स्थापित कर देश की एकता को सुदृढ़ किया गया। उसी प्रकार मनीषियों ने पंच सरोवरों की मान्यता देकर समस्त भारतवासियों को प्रान्त व जातिभेद से ऊपर उठकर भारत को एक राष्ट्र के रूप में सुदूढ़ करने की प्रेरणा दी। सभी हिन्दू इनके प्रतिश्रद्धाभाव रखते हैं। ये पॉच सरोवर निम्नलिखित हैं)
 
  
 
१. विन्दु सरोवर  
 
१. विन्दु सरोवर  
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४. पुष्कर झील  
 
४. पुष्कर झील  
  
, मान सरोवर  
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. मान सरोवर  
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'''इन सरोवरों पर यह [[पुण्यभूमि भारत - पञ्च सरोवर|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= सप्त पर्वत =
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जिस प्रकार पीयूष-प्रवाहिनी नदियाँ राष्ट्र की एकात्मता को सुदृढ़ कड़ियाँ हैं वैसे ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित पर्वत और शिखर सर्वत्र सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। एकात्मता-स्तोत्र में वर्णित पर्वतों के नाम हैं-हिमालय, महेन्द्र, मलयगिरी, सहयाद्रि, रैवतक, विंध्याचल तथा अरावली। इनके अतिरिक्त अमरकण्टक, सरगमाथा, अर्बुदांचल, कैलास आदि शिखरऔर बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि पर्वतीय स्थल भी वन्दनीय हैं।
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'''इन पर्वतों पर यह [[पुण्यभूमि भारत - सप्त पर्वत|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= चार धाम =
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भारत वर्ष अनादि काल से एक इकाई के रूप में विद्यमान रहा है। भारत की एकात्मता चारों दिशाओं में स्थित चार धामों के द्वारा और अधिक पुष्ट हुई है। जातिबन्धन से मुक्त होकर पूजा-अर्चना के लिए इनकी यात्रा का विधान है । देश के सभी प्रान्तों के निवासी इनकी यात्रा कर स्वयं को धन्य मानते है ।   
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'''इन धामों पर यह [[पुण्यभूमि भारत - चार धाम|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= मोक्षदायिनी सप्त पुरी =
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<blockquote>'''अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका।''' </blockquote><blockquote>'''पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिक:।''' </blockquote>अयोध्या, मथुरा हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम् अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा द्वारिका, ये सात मोक्षदायिनी पुरियाँ है। ये पुरियाँ सम्पूर्ण देश में अलग-अलग क्षेत्र व दिशा में स्थित होने के कारण राष्ट्र की एकात्मता की सुदूढ़ कड़ियाँ हैं। प्रत्येक भारतीय, भले ही वह किसी भी जाति, पंथ या प्रान्त का हो, श्रद्धा के साथ इन (सप्तपुरियों) की यात्रा के लिए लालायित रहता है।
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'''इन मोक्ष्दयानी सप्त पुरियों पर यह [[पुण्यभूमि भारत - सप्त पुरी|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= द्वादश ज्योतिर्लिंग =
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अनादि काल से भारत एक इकाई के रूप में विकसित हुआ है। यहाँ विकसित सभी मत-सम्प्रदायों के तीर्थ-स्थान सम्पूर्ण देश में फैले हैं। शैव मत के अनुयायियों के लिए पूज्य १२ शिव-मन्दिरों के शिवलिंगों को द्वादश ज्योतिर्लिंग नाम से अभिहित किया गया है। ये सम्पूर्ण देश में फैले होने के कारण राष्ट्र की एकात्मता के भी प्रतीक हैं।   
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'''इन द्वादश ज्योतिर्लिंग पर यह [[पुण्यभूमि भारत - द्वादश ज्योतिर्लिंग|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= शक्तिपीठ =
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भारतवर्ष भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से एक रहा है । समय - समय पर विकसित उपासना पद्धतियों से इसकी एकात्मता अधिक पुष्ट हुई है । विभिन्न पन्थो के पवित्र तीर्थ समस्त राष्ट्र में फैले हुए है । सम्पूर्ण भारत भूमि उनके लिए पवित्र है । शैव मतावलम्बियों के प्रमुख तीर्थ सभी दिशाओं में फैले है । शक्ति के उपासको के पूज्य तीर्थ शक्तिपीठ भी इसी प्रकार सर्व दूर एकात्मता का सन्देश देते है । इनकी संख्या ५१ है । तंत्र - चूड़ामणि में ५३ शक्ति पीठो का वर्णन किया गया है , परन्तु वामगंड (बाएं कपोल ) के गिरने की पुनरुक्ति हुई है , अतः ५२ शक्ति पीठ रह जाते है । प्रसिद्धि ५१ शक्तिपीठो की ही है । शिव - चरित्र , दाक्षायणीतंत्र एवं योगिनीहृदय - तंत्र में इक्यावन ही गिनाये गये है ।
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'''इन शक्तिपीठों पर यह [[पुण्यभूमि भारत - शक्तिपीठ|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= उत्तर- पश्चिम एवं उत्तर भारत =
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उत्तर - पश्चिम एवं उत्तर भारत ऐतिहासिक दृष्टि से एवं अनादीकाल के प्रवास से अध्यात्म एवं वैदिक कालखंड के बहुत से धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल इस क्षेत्र में उपस्थित है इसलिए लोग अध्यात्मिक एवं पुरातन इतिहास की खोज में यहाँ पधारते है |
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'''उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर भारत पर यह [[उत्तर - पश्चिम एवं उत्तर भारत|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= पूर्वोत्तर एवं पूर्वी भारत =
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सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से अति समृद्ध यह क्षेत्र बंगाल, असम,अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर व त्रिपुरा तक विस्तृत है।आज का बर्मा (मायन्मार) सांस्कृतिक भारत का ब्रह्मा देश है। अति बलिष्ठ हाथियों (ऐरावत) के लिए प्रसिद्ध इरावती (ऐरावती) नदी इसी क्षेत्र में बहती है।
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'''पूर्वोत्तर एवं पूर्वी भारत पर यह [[पुर्वोत्तेर एवं पूर्वी भारत|विस्तृत लेख]] देखें ।'''
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= मध्य भारत =
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भारतभूमि के उत्तर-पश्चिमी, उत्तरी तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के महत्त्वपूर्ण स्थलों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करने के उपरांत अब हम मध्यभारत (उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात) में स्थित प्रमुख स्थलों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व धार्मिक परिदृश्य को हरदयंगम करने का प्रयत्न करेंगे।
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'''मध्य भारत पर [[पुण्यभूमि भारत - मध्य भारत|विस्तृत लेख]] यहाँ देखे |'''
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== दक्षिण भारत ==
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दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों के पुण्यस्मरण से यह बात और अधिक पुष्ट होगी। दक्षिण भारत में पवित्र तीर्थों की परम्परा अक्षुण्ण रही है। आध्यात्मिक ज्ञान की गांग यहाँ अविरल बहती रही है। मध्य भारत का वर्णन करने के बाद हम आन्ध्र, तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक प्रदेश के तथा पाण्ड्यचेरी, द्वीप समूह व श्रीलंका के स्थलों की झलक प्राप्त कर लें।
  
=== विन्दु सरोवर ===
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'''दक्षिण भारत पर [[पुण्यभूमि भारत - दक्षिण भारत|विस्तृत लेख]] यहाँ देंखे |'''
विन्दु सरोवर दो हैं : 1. भुवनेश्वर के मुख्य बाजार में स्थित 2. विन्दु सरोवर सिद्धपुर। देश की एकात्मता की दृष्टि सेपूर्व दिशा स्थित भुवनेश्वर का विन्दुसरोवर अधिक महत्वपूर्ण है। यह एक सुविस्तृत सरोवर है। सरोवर के मध्य एकविशाल मन्दिरहै। इसमेंभगवान् नारायण,शिव-पार्वती, गणेश की सुन्दर प्रतिमाएँ हैं। सरोवर केचारों ओर बहुत सेमन्दिरबने हैं। इस सरोवर में समस्त तीथों का जल लाकर डाला हुआ है,अतः यह परम पवित्र माना जाता हैं। भारतवर्ष में पितृश्राद्ध के लिए गया प्रसिद्ध है तो मातृश्राद्ध के लिए सिद्धपुर स्थित विन्दुसरोवर की मान्यता है। इसे मातृगया भी कहा जाता है| प्राचीन नाम श्रीस्थल है। पवित्र सरस्वती से लगभग डेढ़-दो किलोमीटर दूरएक सरोवरहै। लगभग 12 मीटर लम्बा व 12मीटरचौड़ा यह सरोवर कर्दम ऋषि, कपिल मुनि, समुद्र-मन्थन औरभगवान परशुराम की कथाओं से सम्बद्ध है। सरोवर के पास गोविन्द माधव मन्दिर विद्यमान है। तीर्थयात्री सरोवरमें स्नान कर मातृ-श्राद्ध करते हैं। दक्षिणी छोरपर बने मन्दिर में महर्षि कर्दम, देवहूति और महर्षि कपिल की मूर्तियाँ हैं। इसके अतिरिक्त राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, सिद्धेश्वरमहादेव के मन्दिर,ज्ञानवापी(बावली) तथा वल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक यहाँ विद्यमान है।जाटण श्लोवाट कच्छ के रनों का यह अति प्राचीन तीर्थ क्षेत्र है। यहाँ स्वच्छ जल काएक पवित्र तालाब है।इसका निर्माण नारायण भगवान् ने गांगोत्री से पवित्रजल लाकर किया।स्वयं नाराण यहाँपर कुछ काल रहे। सरोवर के पासआदि नारायण, गोवर्द्धननाथ और टीकम जी के सुन्दर मन्दिर बने हैं। श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक भी नारायण सरोवर के पास है। नारायणसरोवर से लगभग 3 कि.मी. दूर कोटेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर है।कार्तिक पूर्णिमा केअवसर परयहाँ एक मेला लगता है। तीर्थ-यात्रियों कीसुविधा के लिए यहाँ कईधर्मशालाएँ बनी हुई हैं।
 
  
 
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[[Category:बाल-शिक्षा पाठ्यक्रम]]
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[[Category: पुण्यभूमि भारत ]]

Latest revision as of 21:49, 23 June 2021

Bharat man1.jpg

उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्वेश्चेव दक्षिणम्।

वर्ष तद्भारत नाम भारती यत्र सन्तति:।

हिन्द महासागर के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित महान देश भारतवर्ष के नाम से जाना जाता है, यहाँ का पुत्र रूप समाज भारतीय हैं । प्रत्येक भारतीय को यह देश प्राणों से प्यारा है। क्योंकि इसका कण-कण पवित्र है, तभी तो प्रत्येक सच्चा भारतीय (हिन्दू) गाता है-"कण-कण में सोया शहीद, पत्थर-पत्थर इतिहास है"। इस भूमि पर पग-पग में उत्सर्ग और शौर्य का इतिहास अंकित है। स्वामी विवेकानन्द ने श्रीपाद शिला पर इसका जगन्माता के रूप में साक्षात्कार किया। वह भारत माता हमारी आराध्या है। उसके स्वरूप का वर्णन वाणी व लेखनी द्वारा असंभव है, तथापि माता के पुत्र के नाते उसके भव्य-दिव्य स्वरूप का अधिकाधिक ज्ञान हमें प्राप्त करना चाहिए। कैलास से कन्याकुमारी, अटक से कटक तक विस्तृत इस महान भारत के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों व धार्मिक स्थानों का वर्णन यहाँ दिया जा रहा हैं ।

इस लेख में पुण्यभूमि भारत की विशेष परिचयों को दर्शाया गया है जिनसे हमारे पुरातन इतिहास को वर्त्तमान की धारा के साथ परिचय बनाया जा सके । इतिहास के शौर्य को भुलाने के कारण आज की पीढ़ी अपने आपको निर्बल और असहाय समझती है ।

पुण्यभूमि भारत का परिचय निम्नलिखित बिन्दुओ द्वारा :-

  1. पवित्र नदियाँ
  2. पंच सरोवर
  3. सप्त पर्वत
  4. चार धाम
  5. मोक्षदायिनी सप्तपुरी
  6. द्वादश ज्योतिलिंग
  7. शक्तिपीठ
  8. उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर भारत
  9. पूर्वोत्तर एवं पूर्वी भारत
  10. मध्य भारत
  11. दक्षिण भारत

आइये अब हम सभी इन सभी बिन्दुओ को विस्तृत रूप से जानने का प्रयास करेंगे ।

पवित्र नदियाँ

अनेक पवित्र नदियाँ अपने पवित्र जल से भारत माता का अभिसिंचन करती हैं। सम्पूर्ण देश में इन नदियों को आदर व श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। इनके पवित्र तटों पर विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन किये जाते हैं, प्रत्येक हिन्दू इनके जल में डुबकी लगाकर अपने आपको को धन्य मानता है। ये नदियाँ भारत के उतार-चढ़ाव की साक्षी हैं। हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अंसख्य तीर्थ इन नदियों के तटों पर विकसित हुए।

१. गंगा

२. यमुना

३. सिन्धु

४. सरस्वती

५. ब्रह्मपुत्र

६. रेवा (नर्मदा)

७. गोदावरी

८. कृष्णा

९. कावेरी

१०. महानदी

इन पवित्र नदियों पर यह विस्तृत लेख देखें ।

पञ्च सरोवर

जिस प्रकार भारत के चार कोनों पर चार धाम (उत्तरी सीमा पर बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूर्व में जगन्नाथपुरीतथा पश्चिम में द्वारिका स्थापित कर देश की एकता को सुदृढ़ किया गया।) उसी प्रकार मनीषियों ने पंच सरोवरों की मान्यता देकर समस्त भारतवासियों को प्रान्त व जातिभेद से ऊपर उठकर भारत को एक राष्ट्र के रूप में सुदूढ़ करने की प्रेरणा दी। सभी हिन्दू इनके प्रतिश्रद्धाभाव रखते हैं। ये पांच सरोवर निम्नलिखित हैं

१. विन्दु सरोवर

२. नारायण सरोवर

३. पम्पा सरोवर

४. पुष्कर झील

५. मान सरोवर

इन सरोवरों पर यह विस्तृत लेख देखें ।

सप्त पर्वत

जिस प्रकार पीयूष-प्रवाहिनी नदियाँ राष्ट्र की एकात्मता को सुदृढ़ कड़ियाँ हैं वैसे ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित पर्वत और शिखर सर्वत्र सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। एकात्मता-स्तोत्र में वर्णित पर्वतों के नाम हैं-हिमालय, महेन्द्र, मलयगिरी, सहयाद्रि, रैवतक, विंध्याचल तथा अरावली। इनके अतिरिक्त अमरकण्टक, सरगमाथा, अर्बुदांचल, कैलास आदि शिखरऔर बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि पर्वतीय स्थल भी वन्दनीय हैं।

इन पर्वतों पर यह विस्तृत लेख देखें ।

चार धाम

भारत वर्ष अनादि काल से एक इकाई के रूप में विद्यमान रहा है। भारत की एकात्मता चारों दिशाओं में स्थित चार धामों के द्वारा और अधिक पुष्ट हुई है। जातिबन्धन से मुक्त होकर पूजा-अर्चना के लिए इनकी यात्रा का विधान है । देश के सभी प्रान्तों के निवासी इनकी यात्रा कर स्वयं को धन्य मानते है ।

इन धामों पर यह विस्तृत लेख देखें ।

मोक्षदायिनी सप्त पुरी

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका।

पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिक:।

अयोध्या, मथुरा हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम् अवन्तिका (उज्जयिनी) तथा द्वारिका, ये सात मोक्षदायिनी पुरियाँ है। ये पुरियाँ सम्पूर्ण देश में अलग-अलग क्षेत्र व दिशा में स्थित होने के कारण राष्ट्र की एकात्मता की सुदूढ़ कड़ियाँ हैं। प्रत्येक भारतीय, भले ही वह किसी भी जाति, पंथ या प्रान्त का हो, श्रद्धा के साथ इन (सप्तपुरियों) की यात्रा के लिए लालायित रहता है।

इन मोक्ष्दयानी सप्त पुरियों पर यह विस्तृत लेख देखें ।

द्वादश ज्योतिर्लिंग

अनादि काल से भारत एक इकाई के रूप में विकसित हुआ है। यहाँ विकसित सभी मत-सम्प्रदायों के तीर्थ-स्थान सम्पूर्ण देश में फैले हैं। शैव मत के अनुयायियों के लिए पूज्य १२ शिव-मन्दिरों के शिवलिंगों को द्वादश ज्योतिर्लिंग नाम से अभिहित किया गया है। ये सम्पूर्ण देश में फैले होने के कारण राष्ट्र की एकात्मता के भी प्रतीक हैं।

इन द्वादश ज्योतिर्लिंग पर यह विस्तृत लेख देखें ।

शक्तिपीठ

भारतवर्ष भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से एक रहा है । समय - समय पर विकसित उपासना पद्धतियों से इसकी एकात्मता अधिक पुष्ट हुई है । विभिन्न पन्थो के पवित्र तीर्थ समस्त राष्ट्र में फैले हुए है । सम्पूर्ण भारत भूमि उनके लिए पवित्र है । शैव मतावलम्बियों के प्रमुख तीर्थ सभी दिशाओं में फैले है । शक्ति के उपासको के पूज्य तीर्थ शक्तिपीठ भी इसी प्रकार सर्व दूर एकात्मता का सन्देश देते है । इनकी संख्या ५१ है । तंत्र - चूड़ामणि में ५३ शक्ति पीठो का वर्णन किया गया है , परन्तु वामगंड (बाएं कपोल ) के गिरने की पुनरुक्ति हुई है , अतः ५२ शक्ति पीठ रह जाते है । प्रसिद्धि ५१ शक्तिपीठो की ही है । शिव - चरित्र , दाक्षायणीतंत्र एवं योगिनीहृदय - तंत्र में इक्यावन ही गिनाये गये है ।

इन शक्तिपीठों पर यह विस्तृत लेख देखें ।

उत्तर- पश्चिम एवं उत्तर भारत

उत्तर - पश्चिम एवं उत्तर भारत ऐतिहासिक दृष्टि से एवं अनादीकाल के प्रवास से अध्यात्म एवं वैदिक कालखंड के बहुत से धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल इस क्षेत्र में उपस्थित है इसलिए लोग अध्यात्मिक एवं पुरातन इतिहास की खोज में यहाँ पधारते है |

उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर भारत पर यह विस्तृत लेख देखें ।

पूर्वोत्तर एवं पूर्वी भारत

सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से अति समृद्ध यह क्षेत्र बंगाल, असम,अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर व त्रिपुरा तक विस्तृत है।आज का बर्मा (मायन्मार) सांस्कृतिक भारत का ब्रह्मा देश है। अति बलिष्ठ हाथियों (ऐरावत) के लिए प्रसिद्ध इरावती (ऐरावती) नदी इसी क्षेत्र में बहती है।

पूर्वोत्तर एवं पूर्वी भारत पर यह विस्तृत लेख देखें ।

मध्य भारत

भारतभूमि के उत्तर-पश्चिमी, उत्तरी तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के महत्त्वपूर्ण स्थलों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करने के उपरांत अब हम मध्यभारत (उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात) में स्थित प्रमुख स्थलों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व धार्मिक परिदृश्य को हरदयंगम करने का प्रयत्न करेंगे।

मध्य भारत पर विस्तृत लेख यहाँ देखे |

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों के पुण्यस्मरण से यह बात और अधिक पुष्ट होगी। दक्षिण भारत में पवित्र तीर्थों की परम्परा अक्षुण्ण रही है। आध्यात्मिक ज्ञान की गांग यहाँ अविरल बहती रही है। मध्य भारत का वर्णन करने के बाद हम आन्ध्र, तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक प्रदेश के तथा पाण्ड्यचेरी, द्वीप समूह व श्रीलंका के स्थलों की झलक प्राप्त कर लें।

दक्षिण भारत पर विस्तृत लेख यहाँ देंखे |

References