पुण्यभूमि भारत - सप्त पर्वत

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सप्त पर्वत

जिस प्रकार पीयूष-प्रवाहिनी नदियाँ राष्ट्र की एकात्मता को सुदृढ़ कड़ियाँ हैं वैसे ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित पर्वत और शिखर सर्वत्र सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। एकात्मता-स्तोत्र में वर्णित पर्वतों के नाम हैं-हिमालय, महेन्द्र, मलयगिरी, सहयाद्रि, रैवतक, विंध्याचल तथा अरावली। इनके अतिरिक्त अमरकण्टक, सरगमाथा, अर्बुदांचल, कैलास आदि शिखरऔर बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि पर्वतीय स्थल भी वन्दनीय हैं।

हिमालय

यह विश्व का सर्वोच्च पर्वत है जिसमें अनेक हिमाच्छादित श्रृंग, हिमानियाँ तथा विस्तृत घाटियाँ हैं। यहाँ पर देवी-देवताओं का वास है। अत: महाकवि कालिदास ने इसका देवतात्मा' नाम से उल्लेख किया।

अस्त्युतरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयी नाम नगाधिराज:।

सिन्धु, गँगा, सतलुज, गण्डक, ब्रह्मपुत्र आदि नदियों के उद्गम यहीं हैं। भगवान शिव का प्रिय निवास कैलाश पर्वत हिमालय में ही स्थित है। नर-नारायण का पवित्र स्थान यहीं है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, कलास, मानसरोवर, वैष्णवी देवी, अमरनाथ नामक सैकड़ों पुण्यस्थल हिमालय में हैं। अनेक ऋषि-महात्माओं का यह तप स्थल रहा है। संसार का सबसे ऊँचा पर्वत-शखर सागरमाथा (एवरेस्ट), हिमालय के अन्तर्गत आता है। कंचनजंघा, नन्दादेवी, गौरीशंकर, धौलागिरि आदि में भी हिमालय की अन्य ऊंची चोटियाँ हैं। हिमालय भारत के उत्तरी भाग में २४०० कि. मी. लम्बाई व १५० से ४०० कि.मी. चौड़ाई में विस्तृत है। ऋग्वेद के अनुसार हिमालय ईश्वर की महानता का परिचायक हैं, वह निम्न प्रकार वर्णित हैं:

"यस्येमे हिमवन्तो महित्वा, यस्य समुद्र रसयाहाहु:।

यस्येमे प्रदिशो यस्यबाहू, कस्मै देवाय हविषाविधेम।" (ऋग्वेद १-१२१-४)

हिमालय के प्रांगण में ही राजा भगीरथ ने गंगा के अवतरण के लिए घोर तप किया था। यहीं देवी पार्वती ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने महान् तप से भगवान शिव को पतिरूप में प्राप्त किया। यहीं बद्रीवन में भगवान व्यास ने अनेक महाग्रन्थों का प्रणयन किया। महाभारत के युद्ध के बाद पाण्डवों ने हिमालय-गमन किया था। भारत की पारम्परिक, सांस्कृतिक जीवनगाथा के असंख्य आख्यान हिमालय से जुड़े हुए हैं। यह युगों-युगों से ऋषि-मुनियों, योगियों, तपस्वियों और दार्शनिकों का वासस्थान रहा है।

अरावली

दिल्ली के दक्षिणी सिरे से प्रारम्भ होकर हरियाणा, राजस्थान व गुजरात तक दक्षिण-पश्चिम दिशा में यह पर्वतमाला फैली हुई है। यह विश्व के प्राचीन पर्वतों में से एक है। स्कन्दपुराण व महाभारत में इसका वर्णन आया है।

जिसके आश्रय से उत्तर-पश्चिम की ओर से होने वाले परकीय आक्रमणों का प्रतिरोध किया गया। महाराणा प्रताप के उत्सर्ग, शौर्य और कर्तृत्व का साक्षी यह पर्वत उनकी कर्मभूमि रहा है। प्रसिद्ध हल्दीघाटी अरावली की उपत्यकाओं में ही स्थित है। मेवाड़ को विदेशी आक्रान्ताओं से मुक्त कराने का महान व सफल अभियान इसी पर्वत की उपत्यकाओं में फलीभूत हुआ। इस पर्वत की गोद में अनेक प्राचीन पावन तीर्थस्थल तथा ऐतिहासिक नगर विद्यमान हैं। अरावली का सर्वोच्च शिखर आबू (अर्बुदांचल) है। यह जैन तीर्थ के रूप में विख्यात है। सात कुल-पर्वतों में अरावली की गणना की जाती है। पारियात्र इसी का संस्कृत नाम है। सात कुल-पर्वतों की नामावली निम्न श्लोक में दी हुई है:

महेन्द्रो मलय: सहूयो सुक्तिमान् ऋक्षवानपिं।

विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैता: कुलपर्वताः। (मार्कण्डेय पुराण)

विंध्याचल

भारत के मध्यवर्ती भाग में गुजरात से लेकर बिहार व उत्कल तक विस्तृत है। यह पर्वत नर्मदा के उत्तर में ४0,000 वर्गमील क्षेत्र में फैला है। इसकी पूर्व से पश्चिम तक लम्बाई लगभग 1000 कि.मी. है। विंध्याचल की औसत ऊंचाई ७00 मीटर है। केवल कुछ शिखर लगभग १000 मीटर ऊँचे हैं। अम्बा पानी, होरोया, दशारती, सलकनपुर, मृगनाथ, भानुआ भण्ड इस श्रेणी के प्रमुख शिखर हैं। विंध्याचल से मध्य भारत की कई प्रमुख व पवित्र नदियाँ निकलती हैं। चम्बल, बेतवा, केन, क्षिप्रा, बनास, सोन इनमें प्रमुख हैं। नर्मदा नदी का उद्गम-स्थल अमरकण्टक, विंध्याचल व सतपुड़ा श्रृंखला को आपस में मिलाता है। उज्जयिनी, जबलपुर जैसे नगर इस पर्वत की गोद में बसे हैं। नागोद (चूना पत्थर) तथा पन्ना की प्रसिद्ध खानें भी इसी में हैं। कई तीर्थ स्थान जैसे विंध्यवासिनी (मिर्जापुर), महाकाली मन्दिर (काली खोह), अष्टभुजा देवी इसी के अन्तर्गत आते हैं। दुग सप्तशती, देवी भागवत तथा स्कन्द पुराण में इस पर्वत के विषय में उल्लेख मिलता हैं।

अस्युक्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः (कुमारसंभवम्)

विंध्याचल सात कुल-पर्वतों में प्रमुख है। महर्षि अगस्त्य इस पर्वत को पार कर उत्तर व दक्षिण का भेद मिटाने के लिए यात्रा पर निकले तथा कावेरी नदी के तट पर आश्रम बनाकर तपस्यारत हो गये।

रैवतक पर्वत

गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ जिले में यह पर्वत स्थित है। यह पर्वत पावन प्रभास क्षेत्र तक विस्तृत है। जैन सम्प्रदाय के ५ पवित्र तीर्थों में से एक शत्रुजय या पालीताना भी इसी के अन्तर्गत आता है। यह गिरनार के नाम से भी जाना जाता है। माघकवि द्वारा रचित ग्रन्थ शिशुपाल-वध में इसका सुन्दर वर्णन किया गया है। कोटिरुद्र संहिता के अनुसार भगवान शंकर ने यहाँ निवास किया। सोमनाथ नामक ज्योतिर्लिंग यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर विराजमान है। रैवतक पर्वत शिव का प्रिय स्थान है, अत: उन्होंने अन्य देवताओं को भी वहाँ आमन्त्रित कर वहीं वास करने को राजी कर लिया। इस पर्वत पर अनेक पवित्र मन्दिर व पवित्र जलकुण्ड विद्यमान हैं। रैवतक पर्वत का गोरखनाथ शिखर सबसे ऊँचा है। सम्पूर्ण देश से तीर्थयात्री यहाँ आते हैं। जैन सम्प्रदाय के भी अनेक मन्दिर इस पर्वत पर विद्यमान हैं।

महेन्द्र पर्वत

उत्कल (उड़ीसा) का यह प्रमुख पर्वत गांजाम जिले में फैला हुआ है। भारत के पूर्वी तट पर स्थित पूर्वी घाट पर्वतमाला का यह उत्तरी छोर तथा उच्च पर्वत है। समुद्र-तल से इसकी ऊँचाई लगभग १५00 मीटर है। पुराणों में वर्णित सात कुल-पर्वतों में इसका भी स्थान है। रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थों में इसका श्रद्धा के साथ उल्लेख आता है। कालिदास ने रघुदिग्विजय प्रसंग में इस पर्वत का तीर्थ तथा मनोरम स्थल के रूप में वर्णन किया है। यहाँ पर अनेक प्राचीन व भव्य मन्दिर बने हैं। गोकर्णीश्वर मन्दिर यहाँ का सबसे प्रमुख मन्दिर है। राजेन्द्र चोल ने अपनी विजय की स्मृति में एक स्तंभ का निर्माण कराया। उड़िया कवि राधानाथ राय ने महेन्द्र पर्वत की सुरम्यता व शान्त वातावरण का सजीव चित्रण किया है। महेन्द्रतनय नामक स्रोत का प्रादुर्भाव यहीं से है। सप्त चिरंजीवियों में से एक भगवान परशुराम का आवास इसी पर्वत पर है।

मलयपर्वत

कर्नाटक के दक्षिणी भाग तथा तमिलनाडु राज्य में मलय पर्वत का विस्तार है। भारतीय वाडमय में मलयगिरेि का वर्णन अनेक कवियों ने किया है। यहाँ पर चन्दन के सघन वन हैं। सुवासित ओषधियाँ तथा मसालों की कृषि भी इसके ढालों पर की जाती है। नीलगिरि इसका अन्य नाम है। कई ऋषियों ने यहाँ तपस्या की। उनसे सम्बन्धित स्थान व तीर्थ स्थान इस पर्वत पर आज भी विद्यमान हैं।

सह्याद्री

भारत के पश्चिमी तट के गुजरात महाराष्ट्र तथा कर्नाटक राज्य में सह्याद्रि पर्वतमाला का विस्तार है। दक्षिण भारत की प्रमुख नदियों (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) के उद्गम-स्थान इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। त्रयम्बकेश्वर, महाबलेश्वर, भीमशंकर, ब्रह्मगिरि, भगवती भवानी, बौद्ध चैत्य प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र इसी पर्वत-श्रेणी में विराजमान हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज से सम्बन्धित कई दुर्ग (शिवनेरी, पन्हालगढ़, प्रतापगढ़, चाकन, रायगढ़) और शिवाजी महाराज की समाधि इस पर्वत की ऐतिहासिक धरोहर हैं। सह्याद्रि उत्तर-दक्षिण खड़ी दीवार के रूप में है। तटीय क्षेत्र में जाने के लिए थाल घाट, भोरघाट, नाना दरी, पालघाट होकर रेल व सड़क मार्ग बनाये गये हैं। सूरत, मुम्बई, रत्नागिरि, पजिम, मंगलौर आदि नगर इसके पश्चिम में समुद्र की ओर स्थित हैं। भगवान विष्णु यहाँ पर अतिबलेश्वर, ब्रह्मा कोटीश्वर तथा शंकर महाबलेश्वर के रूप में विराजमान होकर आज भी प्रतिष्ठित हैं।

References