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आस्वस्थ्य हों तो दिन में सोने की अनुमति है । स्वस्थ व्यक्ति के लिये भोजन के बाद वामकुक्षी अर्थात्‌ बायीं करवट लेटने की अनुमति है । वह आवश्यक है ।
 
आस्वस्थ्य हों तो दिन में सोने की अनुमति है । स्वस्थ व्यक्ति के लिये भोजन के बाद वामकुक्षी अर्थात्‌ बायीं करवट लेटने की अनुमति है । वह आवश्यक है ।
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१५. वातानुकूलित वाहनों में यात्रा नहीं करना क्योंकि वातानुकूलन से बाहर की गर्मी और भी बढती है, अन्यों के लिये वह अधिक त्रासदायक होती है, हम परपीडा के निमित्त बनते हैं । इसका एक संकेत तो गर्मी सहन करने का है परन्तु दूसरा पर्यायी व्यवस्था निर्माण करने का है । इस दूसरे संकेत को सम्भव बनाने लायक हमारी बुद्धि सृजनशील बनने की आवश्यकता है । यह सम्भव है ऐसा विश्वास उत्पन्न करना चाहिये ।
 
१५. वातानुकूलित वाहनों में यात्रा नहीं करना क्योंकि वातानुकूलन से बाहर की गर्मी और भी बढती है, अन्यों के लिये वह अधिक त्रासदायक होती है, हम परपीडा के निमित्त बनते हैं । इसका एक संकेत तो गर्मी सहन करने का है परन्तु दूसरा पर्यायी व्यवस्था निर्माण करने का है । इस दूसरे संकेत को सम्भव बनाने लायक हमारी बुद्धि सृजनशील बनने की आवश्यकता है । यह सम्भव है ऐसा विश्वास उत्पन्न करना चाहिये ।
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१६. अपनी अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार ब्रत, उपवास, जप. आदि. करना चाहिये । मन की शक्ति बढाने के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है । मन को वश रखने के नित्य नये तरीके भी ढूँढते रहना चाहिये ।
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१६. अपनी अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार व्रत, उपवास, जप. आदि. करना चाहिये । मन की शक्ति बढाने के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है । मन को वश रखने के नित्य नये तरीके भी ढूँढते रहना चाहिये ।
    
१७. बीमार नहीं होना और कमजोर नहीं रहना अत्यन्त आवश्यक है । बीमार होने से सरलता से चल रहे जीवन में व्यवधान निर्माण होते हैं और कमजोर रहने से अनेक काम हम कर ही नहीं सकते हैं ।
 
१७. बीमार नहीं होना और कमजोर नहीं रहना अत्यन्त आवश्यक है । बीमार होने से सरलता से चल रहे जीवन में व्यवधान निर्माण होते हैं और कमजोर रहने से अनेक काम हम कर ही नहीं सकते हैं ।
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१८. वयोवृद्ध, कर्तृत्ववृद्ध, अनुभववृद्ध और ज्ञानवृद्ध के प्रति विनयशील होना, उनकी सेवा करना और उनके कृपापात्र बनकर उनसे सीखना छोटी आयु से ही शुरू हो जाना चाहिये । यदि अपने मातापिता और शिक्षकों से यह नहीं सीखे हैं तो होश सम्हालते ही सीखना शुरू करना चाहिये ।
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१८. वयोवृद्ध, कर्तृत्ववृद्ध, अनुभववृद्ध और ज्ञानवृद्ध के प्रति विनयशील होना, उनकी सेवा करना और उनके कृपापात्र बनकर उनसे सीखना छोटी आयु से ही आरम्भ हो जाना चाहिये । यदि अपने मातापिता और शिक्षकों से यह नहीं सीखे हैं तो होश सम्हालते ही सीखना आरम्भ करना चाहिये ।
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१९. हमारा कोई न कोई जीवनकार्य बनना चाहिये । अथर्जिन हेतु किया जाने वाला व्यवसाय भी जीवनकार्य बन सकता है । जिस कार्य में स्वार्थ केन्द्र में नहीं है वही जीवनकार्य होता है । ऐसे जीवनकार्य के प्रति निष्ठा नहीं रही तो वह जीवनकार्य नहीं कहा जाता ।
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१९. हमारा कोई न कोई जीवनकार्य बनना चाहिये । अर्थार्जन हेतु किया जाने वाला व्यवसाय भी जीवनकार्य बन सकता है । जिस कार्य में स्वार्थ केन्द्र में नहीं है वही जीवनकार्य होता है । ऐसे जीवनकार्य के प्रति निष्ठा नहीं रही तो वह जीवनकार्य नहीं कहा जाता ।
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२०. हमारे ध्यान में आयेगा कि भारतीय समाजव्यवस्था में प्रत्येक व्यवसाय को जीवनकार्य का श्रेष्ठ दर्जा ही प्राप्त था । उसे परमात्मा की अर्चना ही माना जाता था । उससे मोक्ष प्राप्त होने की सम्भावना थी । इसलिये उसे छोटा या क्षुद्र नहीं माना जाता था और किसी की उसे छोडने की वृत्ति नहीं बनती थी । भारत की मनीषा की अध्यात्मनिष्ठ व्यवहारबुद्धि का यह विलक्षण उदाहरण है ।
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२०. हमारे ध्यान में आयेगा कि धार्मिक समाजव्यवस्था में प्रत्येक व्यवसाय को जीवनकार्य का श्रेष्ठ दर्जा ही प्राप्त था । उसे परमात्मा की अर्चना ही माना जाता था । उससे मोक्ष प्राप्त होने की सम्भावना थी । इसलिये उसे छोटा या क्षुद्र नहीं माना जाता था और किसी की उसे छोडने की वृत्ति नहीं बनती थी । भारत की मनीषा की अध्यात्मनिष्ठ व्यवहारबुद्धि का यह विलक्षण उदाहरण है ।
    
२१. हमें खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त करना है। यह वैभव ज्ञान, संस्कार, व्यवहार, व्यवस्था और भौतिक समृद्धि का है । यह सब सामाजिक स्तर पर ही प्राप्त हो सकता है, सामाजिकता को अपनाने पर ही हो सकता है । समाज यह सब प्राप्त कर सके इस दृष्टि से व्यक्तिगत स्तर पर हमारा योगदान क्या हो सकता है इसका विचार करने पर जीवनकार्य निश्चित हो सकता
 
२१. हमें खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त करना है। यह वैभव ज्ञान, संस्कार, व्यवहार, व्यवस्था और भौतिक समृद्धि का है । यह सब सामाजिक स्तर पर ही प्राप्त हो सकता है, सामाजिकता को अपनाने पर ही हो सकता है । समाज यह सब प्राप्त कर सके इस दृष्टि से व्यक्तिगत स्तर पर हमारा योगदान क्या हो सकता है इसका विचार करने पर जीवनकार्य निश्चित हो सकता
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३८. जीवन के किसी पडाव पर नौकरी करना अनिवार्य बन गया है तो एक और अनिवार्यता समाप्त करना और दूसरी और नौकरी को सेवा में परिवर्तित करना चाहिये । यद्यपि यह अत्यन्त कठिन काम है परन्तु दिशा तो यही है । यह आचरण व्यक्तिगत है परन्तु उसका प्रभाव सार्वत्रिक है ।
 
३८. जीवन के किसी पडाव पर नौकरी करना अनिवार्य बन गया है तो एक और अनिवार्यता समाप्त करना और दूसरी और नौकरी को सेवा में परिवर्तित करना चाहिये । यद्यपि यह अत्यन्त कठिन काम है परन्तु दिशा तो यही है । यह आचरण व्यक्तिगत है परन्तु उसका प्रभाव सार्वत्रिक है ।
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३९. अथर्जिन हेतु नौकरी नहीं करने का संकल्प यदि शिक्षकों और मातापिता के द्वारा हुई शिक्षा से नहीं बना है तो जबसे हमारा स्वतन्त्र विचार शुरू हुआ है तबसे बनना चाहिये । अथर्जिन प्रारम्भ होने तक उसकी तैयारी करने में हमारी बुद्धि और शक्ति का विनियोग होना चाहिये ।
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३९. अर्थार्जन हेतु नौकरी नहीं करने का संकल्प यदि शिक्षकों और मातापिता के द्वारा हुई शिक्षा से नहीं बना है तो जबसे हमारा स्वतन्त्र विचार आरम्भ हुआ है तबसे बनना चाहिये । अर्थार्जन प्रारम्भ होने तक उसकी तैयारी करने में हमारी बुद्धि और शक्ति का विनियोग होना चाहिये ।
    
४०. निष्ठा, सेवा, श्रद्धा और विश्वास के गुण अत्यन्त परिश्रमपूर्वक विकसित करना चाहिये । प्रथम इस गुर्णों का उदय हमारे अन्दर होगा और उसके बाद हम अपने में दूसरों की निष्ठा आदि जाग्रत कर सकेंगे ।
 
४०. निष्ठा, सेवा, श्रद्धा और विश्वास के गुण अत्यन्त परिश्रमपूर्वक विकसित करना चाहिये । प्रथम इस गुर्णों का उदय हमारे अन्दर होगा और उसके बाद हम अपने में दूसरों की निष्ठा आदि जाग्रत कर सकेंगे ।
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४२. इसी प्रकार स्वमान, स्वगौरव, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता का आग्रह भी विकसित होना चाहिये । यह भी ध्यान में रहना चाहिये कि यदि इनकी समझ सही नहीं रही तो ये विकृतियों में परिवर्तित हो जाते हैं और सामाजिकता का नाश करते हैं ।
 
४२. इसी प्रकार स्वमान, स्वगौरव, स्वाधीनता और स्वतन्त्रता का आग्रह भी विकसित होना चाहिये । यह भी ध्यान में रहना चाहिये कि यदि इनकी समझ सही नहीं रही तो ये विकृतियों में परिवर्तित हो जाते हैं और सामाजिकता का नाश करते हैं ।
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४३. बुद्धिमानों के लिये भारतीय शाख्रग्रन्थों को प्रमाण मानने की निष्ठा विकसित होना आवश्यक है । शास्त्रों की समझ नहीं है तो शास्त्र जाननेवालों को आप अर्थात्‌ श्रद्धा के पात्र मानना चाहिये | शास्त्र जानने वालों का चयन विचारपूर्वक करना चाहिये ।
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४३. बुद्धिमानों के लिये धार्मिक शास्त्रग्रन्थों को प्रमाण मानने की निष्ठा विकसित होना आवश्यक है । शास्त्रों की समझ नहीं है तो शास्त्र जाननेवालों को आप अर्थात्‌ श्रद्धा के पात्र मानना चाहिये | शास्त्र जानने वालों का चयन विचारपूर्वक करना चाहिये ।
    
४४. ऐसा चयन यदि नहीं कर सकते तो सन्तों और सजऊ्जनों की शरण में जाना चाहिये । हमारी बुद्धि यदि निःस्वार्थ है तो शासख्त्रज्ञ, सन्त, सज्जन को पहचानना बहुत कठिन नहीं होता है ।
 
४४. ऐसा चयन यदि नहीं कर सकते तो सन्तों और सजऊ्जनों की शरण में जाना चाहिये । हमारी बुद्धि यदि निःस्वार्थ है तो शासख्त्रज्ञ, सन्त, सज्जन को पहचानना बहुत कठिन नहीं होता है ।
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४५. जूते, कपडे तथा अन्य वस्तुयें मनुष्य द्वारा उत्पादित और मनुष्य का स्वामित्व जिसमें बाधित न होता हो ऐसी व्यवस्था से उत्पादित हो ऐसा आग्रह होना चाहिये । उदाहरण के लिये दर्जी द्वारा सीले गये कपडे पहनना चाहिये परन्तु दर्जी जिसमें नौकर है ऐसे कारखानें में बने कपडे नहीं पहनने चाहिये । मोची द्वारा बने जूते पहनना चाहिये परन्तु मोची जहाँ यन्त्र चलाने वाला नौकर है ऐसे कारखाने में बने जूते नहीं पहनने चाहिये ।
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४५. जूते, कपड़े तथा अन्य वस्तुयें मनुष्य द्वारा उत्पादित और मनुष्य का स्वामित्व जिसमें बाधित न होता हो ऐसी व्यवस्था से उत्पादित हो ऐसा आग्रह होना चाहिये । उदाहरण के लिये दर्जी द्वारा सीले गये कपड़े पहनना चाहिये परन्तु दर्जी जिसमें नौकर है ऐसे कारखानें में बने कपड़े नहीं पहनने चाहिये । मोची द्वारा बने जूते पहनना चाहिये परन्तु मोची जहाँ यन्त्र चलाने वाला नौकर है ऐसे कारखाने में बने जूते नहीं पहनने चाहिये ।
    
४६. सम्पूर्ण समाज की व्यवस्था बनी रहे इस दृष्टि से भिन्न भिन्न व्यक्तियों को भिन्न भिन्न काम करने होते हैं । इन कामों के विभिन्न स्तर और प्रकार होते हैं । व्यक्ति को समझ लेना आवश्यक है कि स्वयं जो काम कर रहा है या करना चाहता है उसका समाजव्यवस्था में क्या स्थान है। उस स्थान के अनुसार अपनी मनोभूमिका बनाना उसका कर्तव्य है ।
 
४६. सम्पूर्ण समाज की व्यवस्था बनी रहे इस दृष्टि से भिन्न भिन्न व्यक्तियों को भिन्न भिन्न काम करने होते हैं । इन कामों के विभिन्न स्तर और प्रकार होते हैं । व्यक्ति को समझ लेना आवश्यक है कि स्वयं जो काम कर रहा है या करना चाहता है उसका समाजव्यवस्था में क्या स्थान है। उस स्थान के अनुसार अपनी मनोभूमिका बनाना उसका कर्तव्य है ।
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५१. सादगी, सेवा और तप भी व्यक्तिगत जीवन का अंग बनना अपेक्षित है । उसके साथ ही सौन्दर्यबोध, रसिकता और उच्च स्तर का उपभोग भी अपेक्षित है । यह समझ भी बननी चाहिये कि ये सब एकदूसरे के विरोधी नहीं है ।
 
५१. सादगी, सेवा और तप भी व्यक्तिगत जीवन का अंग बनना अपेक्षित है । उसके साथ ही सौन्दर्यबोध, रसिकता और उच्च स्तर का उपभोग भी अपेक्षित है । यह समझ भी बननी चाहिये कि ये सब एकदूसरे के विरोधी नहीं है ।
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५१. विदेशी भाषा, विदेशी रहनसहन, विदेशी वस्तुओं के मोह में नहीं फैँसना चाहिये । विदेशों में हमारी पहचान एक सच्चे भारतीय के नाते कैसी बने इसकी स्पष्ट कल्पना बननी चाहिये ।
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५१. विदेशी भाषा, विदेशी रहनसहन, विदेशी वस्तुओं के मोह में नहीं फैँसना चाहिये । विदेशों में हमारी पहचान एक सच्चे धार्मिक के नाते कैसी बने इसकी स्पष्ट कल्पना बननी चाहिये ।
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५२. एक व्यक्ति के नाते स्वकेन्द्री बनकर दुनिया का विचार नहीं करना चाहिये । दुनिया मेरे लिये कितनी उपयोगी हो सकती है यह अभारतीय विचार है, मैं दुनिया के लिये कितना उपयोगी बन सकता हूँ यह भारतीय विचार है । अपने व्यक्तिगत जीवन की रचना इस सूत्र पर आधारित होनी चाहिये ।
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५२. एक व्यक्ति के नाते स्वकेन्द्री बनकर दुनिया का विचार नहीं करना चाहिये । दुनिया मेरे लिये कितनी उपयोगी हो सकती है यह अधार्मिक विचार है, मैं दुनिया के लिये कितना उपयोगी बन सकता हूँ यह धार्मिक विचार है । अपने व्यक्तिगत जीवन की रचना इस सूत्र पर आधारित होनी चाहिये ।
    
५३. जात-पाँत का भेद नहीं रखना चाहिये । सभी जातियों का सम्मान करना चाहिये |
 
५३. जात-पाँत का भेद नहीं रखना चाहिये । सभी जातियों का सम्मान करना चाहिये |
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६१. कर्तव्य के या सेवा के रूप में किये गये काम का कोई हिसाब नहीं रखा जाता । उसकी किसी भी प्रकार से, किसी भी रूप में कीमत चुकाई जानी चाहिये ऐसी अपेक्षा करना सेवाभाव को क्षीण करना है |
 
६१. कर्तव्य के या सेवा के रूप में किये गये काम का कोई हिसाब नहीं रखा जाता । उसकी किसी भी प्रकार से, किसी भी रूप में कीमत चुकाई जानी चाहिये ऐसी अपेक्षा करना सेवाभाव को क्षीण करना है |
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६२. बुद्धि, रूप, धन, कुशलता आदि का अहंकार करने और दूसरों के समक्ष उसे प्रकट करते रहने से हमारा सामर्थ्य और प्रभाव कम होते हैं । उससे हमेशा बचना चाहिये ।
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६२. बुद्धि, रूप, धन, कुशलता आदि का अहंकार करने और दूसरों के समक्ष उसे प्रकट करते रहने से हमारा सामर्थ्य और प्रभाव कम होते हैं । उससे सदा बचना चाहिये ।
    
६३. परिवार में और समाज में हमारी विशिष्ट भूमिका होती है । उस भूमिका के अनुरूप हमारा व्यवहार बने इस दृष्टि से अपने आपको बहुत कुछ सिखाना होता है । हम स्वयं अपने शिक्षक बनकर यह सब सिखायें यह अपेक्षित है ।
 
६३. परिवार में और समाज में हमारी विशिष्ट भूमिका होती है । उस भूमिका के अनुरूप हमारा व्यवहार बने इस दृष्टि से अपने आपको बहुत कुछ सिखाना होता है । हम स्वयं अपने शिक्षक बनकर यह सब सिखायें यह अपेक्षित है ।
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आवश्यक है उतना ही असत्य, अज्ञान, अन्याय और अधर्म का विरोध करना भी आवश्यक है ।
 
आवश्यक है उतना ही असत्य, अज्ञान, अन्याय और अधर्म का विरोध करना भी आवश्यक है ।
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६६. हम सीखते जाते हैं और अनुभव प्राप्त करते जाते हैं । तब हमें सिखाने की भी इच्छा होती है और अपने चरित्र तथा व्यवहार से अनेक लोगों को अनेक बातें सिखाते भी हैं । उनका कल्याण होता है । फिर एक समय ऐसा आता है जब सिखाने की इच्छा भी नहीं रहती और हम प्रयास भी नहीं करते । तो भी लोग हम से सीखते ही है ।
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६६. हम सीखते जाते हैं और अनुभव प्राप्त करते जाते हैं । तब हमें सिखाने की भी इच्छा होती है और अपने चरित्र तथा व्यवहार से अनेक लोगोंं को अनेक बातें सिखाते भी हैं । उनका कल्याण होता है । फिर एक समय ऐसा आता है जब सिखाने की इच्छा भी नहीं रहती और हम प्रयास भी नहीं करते । तो भी लोग हम से सीखते ही है ।
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६७. नदी किसी को पोनी देने के लिये नहीं बहती फिर भी लोगों को नदी से पानी मिलता ही है उसी प्रकार लोग हमसे सीखते ही है । ऐसी अवस्था को पहुँचना हमारा लक्ष्य है कि नहीं इसका विचार करना चाहिये । शिक्षा इसी के लिये होती है ।
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६७. नदी किसी को पोनी देने के लिये नहीं बहती तथापि लोगोंं को नदी से पानी मिलता ही है उसी प्रकार लोग हमसे सीखते ही है । ऐसी अवस्था को पहुँचना हमारा लक्ष्य है कि नहीं इसका विचार करना चाहिये । शिक्षा इसी के लिये होती है ।
    
६८. हमारा शरीर बहुत ही अच्छा आज्ञाकारी चाकर है, बहुत ही कुशल यन्त्र है । उसे हम मन का चाकर बनाते हैं या बुद्धि का यह समझ लेना चाहिये । यदि वह मन का चाकर है तो उसे उससे मुक्त कर बुद्धि के अधीन बनाना चाहिये ।
 
६८. हमारा शरीर बहुत ही अच्छा आज्ञाकारी चाकर है, बहुत ही कुशल यन्त्र है । उसे हम मन का चाकर बनाते हैं या बुद्धि का यह समझ लेना चाहिये । यदि वह मन का चाकर है तो उसे उससे मुक्त कर बुद्धि के अधीन बनाना चाहिये ।
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७८. स्वस्थ शरीर, सज्जन मन और विवेकशील बुद्धि व्यक्ति की सच्ची सम्पत्ति है। ऐसे सम्पन्न व्यक्ति समाज की सच्ची सम्पत्ति है । ऐसा सम्पन्न समाज ही भारत को अपेक्षित है । इस अपेक्षा को पूर्ण करना व्यक्ति का दायित्व है, उसकी शिक्षा का सार है ।
 
७८. स्वस्थ शरीर, सज्जन मन और विवेकशील बुद्धि व्यक्ति की सच्ची सम्पत्ति है। ऐसे सम्पन्न व्यक्ति समाज की सच्ची सम्पत्ति है । ऐसा सम्पन्न समाज ही भारत को अपेक्षित है । इस अपेक्षा को पूर्ण करना व्यक्ति का दायित्व है, उसकी शिक्षा का सार है ।
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७९. यह सब करना धर्म का पालन करना है । धर्म का पालन करने से ही धर्म की रक्षा होती है । शिक्षा धर्म सिखाती है । भारतीय शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु व्यक्तिगत स्तर पर यह सब करणीय कार्य है ।
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७९. यह सब करना धर्म का पालन करना है । धर्म का पालन करने से ही धर्म की रक्षा होती है । शिक्षा धर्म सिखाती है । धार्मिक शिक्षा की पुनर्प्रतिष्ठा हेतु व्यक्तिगत स्तर पर यह सब करणीय कार्य है ।
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८०. कुशलता के कितने काम अधिक से अधिक मात्रा में हम कर सकते हैं इसका ध्यान रखना चाहिये । बहुत छोटे से कामों से शुरू कर बडे बडे और कठिन कामों
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८०. कुशलता के कितने काम अधिक से अधिक मात्रा में हम कर सकते हैं इसका ध्यान रखना चाहिये । बहुत छोटे से कामों से आरम्भ कर बडे बडे और कठिन कामों
    
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को करने की कुशलता प्राप्त करनी चाहिये । ध्यान में रहे कि न केवल परिवार की अपितु देश की समृद्धि का आधार भी इस बात पर है ।
 
को करने की कुशलता प्राप्त करनी चाहिये । ध्यान में रहे कि न केवल परिवार की अपितु देश की समृद्धि का आधार भी इस बात पर है ।
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८१. अनेक प्रकार से सोचसमझकर खरीदी करने का कौशल विकसित करना चाहिये । खरीदी के बाद उपभोग केवल हम करते होंगे परन्तु परिणाम अनेक लोगों पर होता है यह समझ भी विकसित होना आवश्यक है ।
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८१. अनेक प्रकार से सोचसमझकर खरीदी करने का कौशल विकसित करना चाहिये । खरीदी के बाद उपभोग केवल हम करते होंगे परन्तु परिणाम अनेक लोगोंं पर होता है यह समझ भी विकसित होना आवश्यक है ।
    
८२. बुद्धि मानों में ही ऐसी समझ का विकास होता है इसलिये अपनी बुद्धि का विकास हो इसलिये नित्य प्रयासरत रहना चाहिये ।  
 
८२. बुद्धि मानों में ही ऐसी समझ का विकास होता है इसलिये अपनी बुद्धि का विकास हो इसलिये नित्य प्रयासरत रहना चाहिये ।  
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८३. स्तोत्र, मंत्र, भोजन आदि न आते हों यह कल्पना भी नहीं बननी चाहिये । संस्कृत के ही स्तोत्र आदि आते हों तो अच्छा ही है परन्तु अनिवार्य नहीं है । अपनी भाषा के आना अनिवार्य है । इनका पाठ करना भी जरूरी है ।
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८३. स्तोत्र, मंत्र, भोजन आदि न आते हों यह कल्पना भी नहीं बननी चाहिये । संस्कृत के ही स्तोत्र आदि आते हों तो अच्छा ही है परन्तु अनिवार्य नहीं है । अपनी भाषा के आना अनिवार्य है । इनका पाठ करना भी आवश्यक है ।
    
८४. किसी भी रूप में, किसी भी भाषा में श्रीमदू भगवदूगीता न पढ़ी और न समझी हो यह भी किसी के लिये सम्भव नहीं होना चाहिये ।
 
८४. किसी भी रूप में, किसी भी भाषा में श्रीमदू भगवदूगीता न पढ़ी और न समझी हो यह भी किसी के लिये सम्भव नहीं होना चाहिये ।
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८५. रामायण, महाभारत, भागवत आदि की कथाओं का श्रवण करने का प्रारम्भ बचपन से शुरू हो जाना चाहिये । जैसे जैसे आयु बढती जाती है उनका विस्तार और उनका मर्म समझने की क्षमता भी विकसित होनी चाहिये । उनमें कथा के अलावा और शाख््र हैं उनका परिचय होना चाहिये और कथा सुनाने की वृत्ति और क्षमता भी प्राप्त होनी चाहिये ।
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८५. रामायण, महाभारत, भागवत आदि की कथाओं का श्रवण करने का प्रारम्भ बचपन से आरम्भ हो जाना चाहिये । जैसे जैसे आयु बढती जाती है उनका विस्तार और उनका मर्म समझने की क्षमता भी विकसित होनी चाहिये । उनमें कथा के अलावा और शाख््र हैं उनका परिचय होना चाहिये और कथा सुनाने की वृत्ति और क्षमता भी प्राप्त होनी चाहिये ।
    
८६. अपनी भाषा बोलना हर व्यक्ति को आना ही चाहिये । पढ़ना या लिखना न भी आता हो तो इतना नुकसान नहीं है परन्तु सुनना और बोलना आना ही चाहिये । सुनने का अर्थ कानों से सुनना नहीं है, सुनकर समझना है और बोलने का अर्थ सुनकर तोते जैसा बोलना नहीं है, समझकर किसी को समझाने हेतु बोलना है ।
 
८६. अपनी भाषा बोलना हर व्यक्ति को आना ही चाहिये । पढ़ना या लिखना न भी आता हो तो इतना नुकसान नहीं है परन्तु सुनना और बोलना आना ही चाहिये । सुनने का अर्थ कानों से सुनना नहीं है, सुनकर समझना है और बोलने का अर्थ सुनकर तोते जैसा बोलना नहीं है, समझकर किसी को समझाने हेतु बोलना है ।
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९३. घर में, समाज में, व्यवसाय में, किसी भी आयोजन में हमें प्राप्त भूमिका के कर्तव्यों और अधिकारों को ठीक से समझकर उसके लायक बनना हर व्यक्ति से अपेक्षित है ।
 
९३. घर में, समाज में, व्यवसाय में, किसी भी आयोजन में हमें प्राप्त भूमिका के कर्तव्यों और अधिकारों को ठीक से समझकर उसके लायक बनना हर व्यक्ति से अपेक्षित है ।
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९४. संस्कृत नहीं जानना भारतीय जीवनविचार के ज्ञान की दृष्टि से बडी कमी है । किसी भी आयु में उसका ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये ।
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९४. संस्कृत नहीं जानना धार्मिक जीवनविचार के ज्ञान की दृष्टि से बडी कमी है । किसी भी आयु में उसका ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये ।
    
९५. हमारी पहचान विचारशील, बुद्धिमान, कर्तव्य परायण, सेवाभावी व्यक्ति के रूप में है या उसके विपरीत इसका पता हमें चलना चाहिये ।
 
९५. हमारी पहचान विचारशील, बुद्धिमान, कर्तव्य परायण, सेवाभावी व्यक्ति के रूप में है या उसके विपरीत इसका पता हमें चलना चाहिये ।
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१०२. विश्व में हमारे देश की क्या स्थिति है और क्या भूमिका है इसका आकलन होना भी आवश्यक है । उसके साथ हमारे व्यवहार का उचित समायोजन होना चाहिये ।
 
१०२. विश्व में हमारे देश की क्या स्थिति है और क्या भूमिका है इसका आकलन होना भी आवश्यक है । उसके साथ हमारे व्यवहार का उचित समायोजन होना चाहिये ।
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१०३, साधु और सन्त असली भी होते हैं और नकली भी । असली सन्त समाज का उपकार करते हैं, नकली अपकार । असली और नकली की परख होना प्रथम आवश्यकता है और नकली से लोगों को सावधान करना और बचाना दूसरी आवश्यकता है ।
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१०३, साधु और सन्त असली भी होते हैं और नकली भी । असली सन्त समाज का उपकार करते हैं, नकली अपकार । असली और नकली की परख होना प्रथम आवश्यकता है और नकली से लोगोंं को सावधान करना और बचाना दूसरी आवश्यकता है ।
    
१०४. हमारे देश में आज कौन से संकट हैं इसकी जानकारी हमें होनी चाहिये । इन संकटों के कारण और परिणाम क्या हैं इसका भी आकलन होना चाहिये । ऐसा आकलन होने के लिये केवल बुद्धि की नहीं तो हृदय की आवश्यकता होती है ।
 
१०४. हमारे देश में आज कौन से संकट हैं इसकी जानकारी हमें होनी चाहिये । इन संकटों के कारण और परिणाम क्या हैं इसका भी आकलन होना चाहिये । ऐसा आकलन होने के लिये केवल बुद्धि की नहीं तो हृदय की आवश्यकता होती है ।
Line 226: Line 226:  
१०५, हमारा इस जन्म का जीवन कैसा है इसको पहचान कर हमारा पूर्वजन्म कैसा होगा इसका और हमारा अगला जन्म कैसा होगा इसका भी अनुमान लगाना चाहिये, क्योंकि हमारा इस जन्म का जीवन पूर्वजन्म का परिणाम है और अगला जन्म इस जन्म का परिणाम होगा ।
 
१०५, हमारा इस जन्म का जीवन कैसा है इसको पहचान कर हमारा पूर्वजन्म कैसा होगा इसका और हमारा अगला जन्म कैसा होगा इसका भी अनुमान लगाना चाहिये, क्योंकि हमारा इस जन्म का जीवन पूर्वजन्म का परिणाम है और अगला जन्म इस जन्म का परिणाम होगा ।
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१०६, एक भारतीय हमेशा मोक्ष चाहता है । मोक्ष का अर्थ है मुक्ति । हम किन किन बातों से मुक्ति चाहते हैं इसकी ही प्रथम तो स्पष्टता कर लेनी चाहिये । वह चाह कितनी स्थिर है यह भी देखना चाहिये । यह चाह कितनी उचित है इसका भी विवेक होना चाहिये । इसके बाद मुक्ति की चाह पूर्ण कैसे होगी उसका विचार होगा और उसे प्राप्त करने हेतु प्रयास भी होगा ।
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१०६, एक धार्मिक सदा मोक्ष चाहता है । मोक्ष का अर्थ है मुक्ति । हम किन किन बातों से मुक्ति चाहते हैं इसकी ही प्रथम तो स्पष्टता कर लेनी चाहिये । वह चाह कितनी स्थिर है यह भी देखना चाहिये । यह चाह कितनी उचित है इसका भी विवेक होना चाहिये । इसके बाद मुक्ति की चाह पूर्ण कैसे होगी उसका विचार होगा और उसे प्राप्त करने हेतु प्रयास भी होगा ।
    
=== कौशलविकास ===
 
=== कौशलविकास ===
    
१०७. समझदार लोग कहते हैं कि समाज में सक्रिय दुर्जनों के कारण जितने संकट पैदा होते हैं उसकी अपेक्षा निष्क्रिय सज्जनों से अधिक होते हैं । इसलिये सज्जन होने के साथ साथ सक्रिय भी होना चाहिये और सामर्थ्यवान भी ।
 
१०७. समझदार लोग कहते हैं कि समाज में सक्रिय दुर्जनों के कारण जितने संकट पैदा होते हैं उसकी अपेक्षा निष्क्रिय सज्जनों से अधिक होते हैं । इसलिये सज्जन होने के साथ साथ सक्रिय भी होना चाहिये और सामर्थ्यवान भी ।
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