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== अभारतीय दृष्टि अनात्मवादी (आसुरी) ==
 
== अभारतीय दृष्टि अनात्मवादी (आसुरी) ==
परन्तु भारतीय और अभारतीय का मुद्दा एक अन्य
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परन्तु भारतीय और अभारतीय का मुद्दा एक अन्य प्रकार से विचारणीय अवश्य है । भारतीयतावादी लोग जब अभारतीय जीवनशैली या जीवनदृष्टि की बात करते हैं तब
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प्रकार से विचारणीय अवश्य है । भारतीयतावादी लोग जब
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अनात्मवादी विचार, पंचमहाभूतों के शोषण की प्रवृत्ति, व्यक्तिकेन्द्री और स्वार्थपरक व्यवहार, भौतिकता का अधिष्ठान आदि की चर्चा करते हैं । आज विश्व पर अमेरीका और यूरोप का प्रभाव छा गया है और वहाँ इस विचारधारा को मान्यता प्राप्त है इसलिये इसे पाश्चात्य या अभारतीय जीवनदृष्टि कहा जाता है । जो लोग भारतीय हैं परन्तु इस विचारधारा को मान्यता देते हैं और उसे अपनाते हैं वे अभारतीय विचारधारा से प्रभावित हैं ऐसा माना जाता है । परन्तु भारत में भी ऐसे लोगों का होना स्वाभाविक माना गया है । श्रीमद भगवद गीता में दैवी और आसुरी सम्पद्‌ की चर्चा की गई है । वहाँ arg aie वाले लोगों का वर्णन ठीक वही है जिसे अभारतीय या पाश्चात्य कहा जाता है । वे भी भौतिकतावादी हैं, वे भी व्यक्तिकेन्ट्री हैं, वे भी जीवन और जगत का विचार समग्रता में नहीं अपितु खण्ड खण्ड में करते हैं ।
 
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अभारतीय जीवनशैली या जीवनदृष्टि की बात करते हैं तब
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अनात्मवादी विचार, पंचमहाभूतों के शोषण की प्रवृत्ति,
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व्यक्तिकेन्द्री और स्वार्थपरक व्यवहार, भौतिकता का अधिष्ठान
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आदि की चर्चा करते हैं । आज विश्व पर अमेरीका और यूरोप
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का प्रभाव छा गया है और वहाँ इस विचारधारा को मान्यता
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प्राप्त है इसलिये इसे पाश्चात्य या अभारतीय जीवनदृष्टि कहा
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जाता है । जो लोग भारतीय हैं परन्तु इस विचारधारा को
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मान्यता देते हैं और उसे अपनाते हैं वे अभारतीय विचारधारा
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से प्रभावित हैं ऐसा माना जाता है । परन्तु भारत में भी ऐसे
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लोगों का होना स्वाभाविक माना गया है । श्रीमद भगवद
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गीता में दैवी और आसुरी सम्पद्‌ की चर्चा की गई है । वहाँ
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arg aie वाले लोगों का वर्णन ठीक वही है जिसे
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समग्रता में नहीं अपितु खण्ड खण्ड में करते हैं ।
      
दम्भोदर्पोडभिमानश्र क्रोध: पारुष्यमेव च ।
 
दम्भोदर्पोडभिमानश्र क्रोध: पारुष्यमेव च ।
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अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्प्रदमासुरीमू ।। १६.४
 
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्प्रदमासुरीमू ।। १६.४
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ऐसी आसुरी सम्पद्‌ बन्धन और विनाश का कारण
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ऐसी आसुरी सम्पद्‌ बन्धन और विनाश का कारण बनती है ऐसा भी श्री भगवान कहते हैं ।
 
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बनती है ऐसा भी श्री भगवान कहते हैं ।
      
एतां दृष्टिमव्टभ्य नष्टात्सानोइल्पबुद्धय: ।
 
एतां दृष्टिमव्टभ्य नष्टात्सानोइल्पबुद्धय: ।
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WHAM: AAT SATA SHAT: ।। १६.९
 
WHAM: AAT SATA SHAT: ।। १६.९
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हमारे यहाँ चार्वाक दर्शन की भी चर्चा होती है । इस
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हमारे यहाँ चार्वाक दर्शन की भी चर्चा होती है । इस दर्शन में भी इंद्रियों के सुखों को प्रधानता दी गई है और पापपुण्य या संयम की आवश्यकता नहीं है ऐसा कहा गया
 
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दर्शन में भी इंद्रियों के सुखों को प्रधानता दी गई है और
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पापपुण्य या संयम की आवश्यकता नहीं है ऐसा कहा गया
      
है।
 
है।
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चार्वाक भारतीय ही है, असुर भारतीय ही हैं, खण्ड
 
चार्वाक भारतीय ही है, असुर भारतीय ही हैं, खण्ड
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खण्ड में विचार करने वाले और उसके अनुसार व्यवहार करने
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खण्ड में विचार करने वाले और उसके अनुसार व्यवहार करने वाले भी भारतीय ही हैं । केवल उन्हें मान्यता नहीं है । हम जब इसे अभारतीय की संज्ञा देते हैं तब हमारा तात्पर्य उसे मान्यता देने वाले देशों के साथ उसे जोड़ने का ही होता है ।
 
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वाले भी भारतीय ही हैं । केवल उन्हें मान्यता नहीं है । हम
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जब इसे अभारतीय की संज्ञा देते हैं तब हमारा तात्पर्य उसे
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मान्यता देने वाले देशों के साथ उसे जोड़ने का ही होता है ।
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परन्तु कभी ऐसा भी विचार कर सकते हैं कि sa gg aT
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स्वरूप भारतीय और अभारतीय का न होकर दैवी और आसुरी
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विचारधारा के विरोध का ही है । अभारतीय को हम पाश्चात्य
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केवल इसलिये कहते हैं क्योकि पाश्चात्य देशों में इसे मान्यता
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है और वे इस मान्यता को पूरे विश्व पर थोपना चाहते हैं ।
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जो लोग इसे आधुनिक कहते हैं या वैश्विक कहते हैं
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वे केवल अज्ञान के कारण ही ऐसा करते हैं । इस अज्ञान को
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कैसे दूर करना इसका विचार हम अलग से करेंगे ।
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इस सन्दर्भ में एक और मुद्दा विचारणीय है । भारत में
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या विश्व में जीवनविषयक जो चर्चा चलती है उसमें किसी एक
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देश के साथ उसे नहीं जोड़ा जाता है । वह ठीक है कि नहीं
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इसका ही विचार किया जाता है । आज अमेरिका और यूरोप
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जिस विचारधारा की बात करते हैं वे भी उसे अमरीकी या
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यूरोपीय नहीं कहते हैं । वे उसे मानवीय ही कहते हैं । भारतीय
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दर्शनों में भी भारतीय या हिन्दू के नाम से चर्चा नहीं की गई
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है । मानवीय दृष्टि से ही की गई है । दोनों ही स्थानों पर एक
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अर्थ में तो वैश्विकता की ही बात की गई है । भारत भी जब
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विचार करता है तब केवल भारत के सन्दर्भ में ही नहीं करता
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है । वह सम्पूर्ण सचराचर सृष्टि के सन्दर्भ में ही विचार करता
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है । पाश्चत्य जगत विचार करता है तब भी सचराचर सृष्टि के
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सन्दर्भ में ही विचार करता है । केवल दोनों विचारधाराओं में
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अन्तर है । भारत इस अन्तर को मूल रूप से दैवी और आसुरी सम्पद का अन्तर कहता है, पाश्चात्य
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जगत इसे आधुनिक और रूढ़िवादी अथवा प्रगत और पिछड़े
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का अन्तर कहता है । वास्तव में हम जिसे अभारतीय कहते
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परन्तु कभी ऐसा भी विचार कर सकते हैं कि sa gg aT स्वरूप भारतीय और अभारतीय का न होकर दैवी और आसुरी विचारधारा के विरोध का ही है । अभारतीय को हम पाश्चात्य केवल इसलिये कहते हैं क्योकि पाश्चात्य देशों में इसे मान्यता है और वे इस मान्यता को पूरे विश्व पर थोपना चाहते हैं ।
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हैं वह सही अर्थों में आसुरी विचारधारा है । इस प्रकार समझने
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जो लोग इसे आधुनिक कहते हैं या वैश्विक कहते हैं वे केवल अज्ञान के कारण ही ऐसा करते हैं । इस अज्ञान को कैसे दूर करना इसका विचार हम अलग से करेंगे ।
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से हम उसके सन्दर्भ में कैसा रुख अपनाना इस विषय में भी
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इस सन्दर्भ में एक और मुद्दा विचारणीय है । भारत में या विश्व में जीवनविषयक जो चर्चा चलती है उसमें किसी एक देश के साथ उसे नहीं जोड़ा जाता है । वह ठीक है कि नहीं इसका ही विचार किया जाता है । आज अमेरिका और यूरोप जिस विचारधारा की बात करते हैं वे भी उसे अमरीकी या यूरोपीय नहीं कहते हैं । वे उसे मानवीय ही कहते हैं । भारतीय दर्शनों में भी भारतीय या हिन्दू के नाम से चर्चा नहीं की गई है । मानवीय दृष्टि से ही की गई है । दोनों ही स्थानों पर एक अर्थ में तो वैश्विकता की ही बात की गई है । भारत भी जब विचार करता है तब केवल भारत के सन्दर्भ में ही नहीं करता है । वह सम्पूर्ण सचराचर सृष्टि के सन्दर्भ में ही विचार करता है । पाश्चत्य जगत विचार करता है तब भी सचराचर सृष्टि के सन्दर्भ में ही विचार करता है । केवल दोनों विचारधाराओं में अन्तर है । भारत इस अन्तर को मूल रूप से दैवी और आसुरी सम्पद का अन्तर कहता है, पाश्चात्य जगत इसे आधुनिक और रूढ़िवादी अथवा प्रगत और पिछड़े का अन्तर कहता है । वास्तव में हम जिसे अभारतीय कहते हैं वह सही अर्थों में आसुरी विचारधारा है । इस प्रकार समझन से हम उसके सन्दर्भ में कैसा रुख अपनाना इस विषय में भी अधिक स्पष्ट हो सकते हैं ।
 
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अधिक स्पष्ट हो सकते हैं ।
      
== भारतीय दृष्टि आत्मवादी (दैवी ) ==
 
== भारतीय दृष्टि आत्मवादी (दैवी ) ==
पुन: एक बार कहें तो अभारतीय विचारधारा वही है
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पुन: एक बार कहें तो अभारतीय विचारधारा वही है जो भारत में आसुरी के नाम से जानी जाती है परन्तु यूरोप और अमेरिका में जिसे समर्थन प्राप्त है । ऐसी विचारधारा का प्रभाव भारत में बढ़ रहा है और उसे समर्थन प्राप्त हो रहा है यही हमारी चिन्ता का विषय है ।
 
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जो भारत में आसुरी के नाम से जानी जाती है परन्तु यूरोप
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और अमेरिका में जिसे समर्थन प्राप्त है । ऐसी विचारधारा का
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प्रभाव भारत में बढ़ रहा है और उसे समर्थन प्राप्त हो रहा है
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यही हमारी चिन्ता का विषय है ।
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और भी स्पष्ट करना है तो आज के सन्दर्भ में हम कह
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सकते हैं कि अभारतीय का अर्थ है आसुरी और भारतीय का
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अर्थ है दैवी । आसुरी का अर्थ है विनाशक और दैवी का
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अर्थ है उद्घारक । विनाशक का अर्थ है त्याज्य और दैवी का
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अर्थ है स्वीकार्य । आसुरी का त्याग करने के लिये और दैवी
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को अपनाने के लिये हरेक को साधना करनी होती है । इसे
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प्राप्त करना ही जीवन विकास है ।
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भारत के सम्बन्ध में जो भी बातें हैं वे भारतीय हैं ।
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भारत का स्वभाव जिसमें झलकता है वह भारतीय है ।
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उदाहरण के लिये भारतीय मानस ऐसा एक शब्द है । भारत
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के लोग किसी भी घटना या पदार्थ को जिस प्रकार देखते हैं
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उसे भारतीय मानस कहा जाता है । हम छोटे बच्चों को
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चन्दामामा, बिछिमौसी, चिडियारानी कहकर पशुपक्षियों का
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परिचय करवाते हैं और सबके प्रति आत्मीयता और प्रेम के
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संस्कार देते हैं यह भारतीय मानस का लक्षण है । आचार्य
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और भी स्पष्ट करना है तो आज के सन्दर्भ में हम कह सकते हैं कि अभारतीय का अर्थ है आसुरी और भारतीय का अर्थ है दैवी । आसुरी का अर्थ है विनाशक और दैवी का अर्थ है उद्घारक । विनाशक का अर्थ है त्याज्य और दैवी का अर्थ है स्वीकार्य । आसुरी का त्याग करने के लिये और दैवी को अपनाने के लिये हरेक को साधना करनी होती है । इसे प्राप्त करना ही जीवन विकास है । भारत के सम्बन्ध में जो भी बातें हैं वे भारतीय हैं । भारत का स्वभाव जिसमें झलकता है वह भारतीय है ।
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और छात्र का सम्बन्ध पिता पुत्र जैसा है ऐसा कहते हैं तब
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उदाहरण के लिये भारतीय मानस ऐसा एक शब्द है । भारत के लोग किसी भी घटना या पदार्थ को जिस प्रकार देखते हैं उसे भारतीय मानस कहा जाता है । हम छोटे बच्चों को चन्दामामा, बिछिमौसी, चिडियारानी कहकर पशुपक्षियों का परिचय करवाते हैं और सबके प्रति आत्मीयता और प्रेम के संस्कार देते हैं यह भारतीय मानस का लक्षण है । आचार्य और छात्र का सम्बन्ध पिता पुत्र जैसा है ऐसा कहते हैं तब वह भारतीयता का लक्षण है । अर्थात भारत जिस विशिष्ट पद्धति से पेश आता है वह भारतीय पद्धति है । इस दृष्टि से भारतीय शिक्षा का अर्थ क्या है इसे भी हम स्पष्ट कर लें ।
 
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वह भारतीयता का लक्षण है । अर्थात भारत जिस विशिष्ट
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पद्धति से पेश आता है वह भारतीय पद्धति है । इस दृष्टि से
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भारतीय शिक्षा का अर्थ क्या है इसे भी हम स्पष्ट कर लें ।
      
भारतीय शिक्षा के विषय में जानना अर्थात ....
 
भारतीय शिक्षा के विषय में जानना अर्थात ....
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भारत में शिक्षा का अर्थ कया है यह जानना ।
 
भारत में शिक्षा का अर्थ कया है यह जानना ।
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भारत में शिक्षा के प्रति किस दृष्टि से देखा जाता है यह
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भारत में शिक्षा के प्रति किस दृष्टि से देखा जाता है यह समझना |
 
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समझना |
      
भारत में शिक्षा की क्या व्यवस्था रही है यह जानना ।
 
भारत में शिक्षा की क्या व्यवस्था रही है यह जानना ।
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भारत में शिक्षा व्यवस्था का इतिहास जानना ।
 
भारत में शिक्षा व्यवस्था का इतिहास जानना ।
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भारत में शिक्षा के क्षेत्र में क्या चिन्तन विकसित हुआ
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भारत में शिक्षा के क्षेत्र में क्या चिन्तन विकसित हुआ है यह जानना ।
 
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है यह जानना ।
      
भारत के महान शिक्षकों के विषय में जानना ।
 
भारत के महान शिक्षकों के विषय में जानना ।
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भारतीय शिक्षा का सैद्धान्तिक अधिष्ठान क्या है यह
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भारतीय शिक्षा का सैद्धान्तिक अधिष्ठान क्या है यह समझना ।
 
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समझना ।
      
भारतीय शिक्षा की श्रेष्ठता किसमें है यह जानना ।
 
भारतीय शिक्षा की श्रेष्ठता किसमें है यह जानना ।
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भारत की शिक्षा के मूल तत्त्वों और व्यवहार के विषय
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भारत की शिक्षा के मूल तत्त्वों और व्यवहार के विषय में जानना ।
 
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में जानना ।
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इनके सम्बन्ध में जानने के साथ साथ आज भारत में
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शिक्षा की क्या अवस्था है, उसके कारण और परिणाम कौनसे
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हैं, आज यदि शिक्षा की दुरवस्था है तो उसे ठीक करने के
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क्या उपाय हैं यह भी हमें समझना होगा । इसके बाद योजना
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का भी विचार करना होगा । अर्थात यह एक व्यापक प्रयास
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है जो हमें धैर्यपूर्वक करना है। चिन्तन से शुरु कर
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कार्ययोजना तक का हमारा व्याप है ।
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इनके सम्बन्ध में जानने के साथ साथ आज भारत में शिक्षा की क्या अवस्था है, उसके कारण और परिणाम कौनसे हैं, आज यदि शिक्षा की दुरवस्था है तो उसे ठीक करने के क्या उपाय हैं यह भी हमें समझना होगा । इसके बाद योजना का भी विचार करना होगा । अर्थात यह एक व्यापक प्रयास है जो हमें धैर्यपूर्वक करना है। चिन्तन से शुरु कर कार्ययोजना तक का हमारा व्याप है ।
    
== शिक्षा का व्यक्ति जीवन में स्थान ==
 
== शिक्षा का व्यक्ति जीवन में स्थान ==

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