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फिर वही मनोवैज्ञानिक समस्या । उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व विश्व जी रहा था । संस्कृति और सभ्यता के अनेक शिखर अनेक प्रजाओं ने सर किये थे । 'बैलगाडी के युग' में सब काम हाथ से करने पडते थे, पैरों से चलना पडता था परन्तु सब
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फिर वही मनोवैज्ञानिक समस्या । उन्नीसवीं शताब्दी से पूर्व विश्व जी रहा था । संस्कृति और सभ्यता के अनेक शिखर अनेक प्रजाओं ने सर किये थे । 'बैलगाडी के युग' में सब काम हाथ से करने पडते थे, पैरों से चलना पडता था परन्तु सब काम अच्छे से होते थे, लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहता था, लोगों को आराम से बैठकर वार्तालाप करने का समय मिलता था।
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बिजली आई, यन्त्र आये, हम काम करना भूल गये, काम करने की क्षमता खो गई । बिजली आई, यन्त्र आये, वाहन बने, गति बढी, मन की चंचलता और उत्तेजना बढी और शरीर और मन का स्वास्थ्य खो गया । इसमें भी मनुष्य सोचविचार कर समझदारी से कोई उपाय करने वाला नहीं है इसलिये दैव का सहारा लेने की नौबत आई है।
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==== प्रश्न १६ जनसंख्या एक समस्या बनी है। विश्व में सब सुखी हों इसलिये जनसंख्या कितनी होनी चाहिये ? जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिये क्या उपाय हो सकते हैं ? ====
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उत्तर
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# देश की भूमि और संसाधनों के अनुपात में जनसंख्या होनी चाहिये । उदाहरण के लिये भारत की भूमि और संसाधनों की तुलना में देखें तो जनसंख्या अधिक है। अमेरिका की भूमि भारत से तीन गना अधिक है और जनसंख्या तीन गुना कम । वास्तविक दृष्टि से भारत से अमेरिका की जनसंख्या नौ गुना कम मानी जानी चाहिये ।
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# जब जनसंख्या अधिक होती है तब अन्न, वस्त्र, औषधि आदि सामग्री का अभाव निर्माण होता है । उस अभाव को भरने का कोई उपाय नहीं होता क्योंकि इनका स्रोत प्राकृतिक संसाधन ही होते हैं ।
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# जनसंख्या कम करने हेतु जनमानस प्रबोधन की बहुत आवश्यकता होती है। भारत जैसे देश में तो कानून भी बनाये गये हैं । गर्भनिरोधक साधनों का प्रचार भी खूब चलता है।
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# ऐसा कहते हैं कि शिक्षा बढती है वेसे बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति कम होती है । अतः शिक्षा व्यवस्था अच्छी करना एक उपाय है।
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# इसी प्रकार से जब मानसिक समस्यायें कम होती है तब भी कामप्रवृत्ति कम होती है जिसका प्रभाव जनसंख्या पर होता है।
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जनसंख्या को लेकर जो सरकारी प्रचार हो रहा है उसका ही प्रभाव सर्वत्र दिखाई देता है । परिस्थिति को समझने के दूसरे भी आयाम होते हैं । जरा इस प्रकार समझें।।
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# ऐसा कहते हैं कि प्रकृति जिसे भी जन्म देती है उसके पोषण की भी व्यवस्था साथ साथ बनाती है। इसलिये जिसने जन्म लिया उसका निभाव होता ही है। ऐसे में यदि कोई भूखों मरता है या अभावग्रस्त होता है तो मानना चाहिये कि हमारी व्यवस्था में कोई कमी है।
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# प्रकृति जिसे भी जन्म देती है उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति तो कर सकती है परन्तु एक व्यक्ति की भी इच्छाओं की पूर्ति करना उसके लिये सम्भव नहीं होता क्योंकि इच्छायें अनन्त होती है और उनकी पूर्ति हो ही नहीं सकती । इस कथन के आधार पर देखें तो जनसंख्या अपने आपमें कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता, प्रश्न व्यवस्था का ही होता है।
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# असविधायें, कष्ट, दारिद्य एक ओर तो इच्छाओं पर संयम नहीं करने के कारण बढे हैं । दसरी ओर मनुष्य की काम करने की वृत्ति और अभ्यास कम हो गये हैं इस कारण से बढे हैं । जब विद्युत, भाप, पेट्रोल आदि नहीं होते तब मनुष्य के हाथ काम करते हैं और पैर गति करते हैं । काम में व्यस्त रहने के कारण इच्छाओं पर अपने आप नियन्त्रण होता है और उत्पादन की मात्रा बढती है । परिणामस्वरूप अभाव कम होते हैं । वास्तव में जनसंख्या यह समस्या नहीं है अपितु सम्पत्ति है।
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# जब मनुष्य काम करता है तब जनसंख्या बढने से काम करने वाले हाथ बढते हैं और आर्थिक विकास होता है । जब यन्त्र काम करते हैं तब जनसंख्या बढ़ने से खानेवाले मुँह बढते हैं और दारिद्य बढता है। इससे फिर सिद्ध होता है कि जनसंख्या समस्या नहीं है हमारी शैली ही समस्या है।
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# प्रकृति के अनुकूल रहकर जीवन की व्यवस्था करने से सुख, सन्तोष, सहुलियत, आराम आदि में वृद्धि होती है, मनोविकार पैदा नहीं होते इसलिये फालतू की व्यवस्थायें और फालतू के खर्च भी कम होते हैं। अभाव खटकते नहीं क्योंकि अधिकतर अभाव इच्छाओं को लेकर होते हैं ।
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वास्तव में कौन सी परिस्थिति, कौनसी घटना, कौनसी बात समस्या है या नहीं है यह तय करना पर्याप्त विवेक की अपेक्षा करता है।
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==== प्रश्न १७ मनुष्य का शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा हो इसके क्या उपाय हैं ? आज इसमें कौन कौन से अवरोध हैं ? ====
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उत्तर
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# यह एकदम पाँचवीं सातवीं कक्षा का प्रश्न है। मनुष्य के शरीर स्वास्थ्य हेतु पौष्टिक आहार, पर्याप्त निद्रा, आरामदायक वख, अनुकूल तापमान, शुद्ध पानी, समुचित व्यायाम और काम के अनुपात में आराम की आवश्यकता है। आज का प्रदूषण, अशुद्ध पानी और चारों ओर फैली गन्दगी इसके बडे अवरोध हैं।
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# शरीर स्वास्थ्य के लिये क्या आवश्यक है यह तो सब जानते हैं स्वास्थ्य के अवरोध कौन से हैं यह भी जानते हैं परन्तु कठिनाई यह है कि अवरोध दूर करने के लिये कोई सक्षम नहीं है।
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# आज का आपाधापी का जीवन और वैश्विक तापमान में वृद्धि की बहुत बड़ी समस्या है। रसायणों के कारण भी स्वास्थ्य खराब होता है। बडा अवरोध तो यह है कि शरीर अस्वस्थ हो जाने के बाद औषध सबके लिये सुलभ नहीं है, आराम सुलभ नहीं है।
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# मनुष्य की दिनचर्या और जीवनचर्या अत्यन्त असन्तुलित बन गई है। इस कारण से शरीर का स्वास्थ्य खराब होता है । इसे ठीक करना ही उपाय है।
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ऐसा लगता है कि शरीरस्वास्थ्य के बारे में लोग जानते हैं । स्वास्थ्य ठीक करने हेतु क्या उपाय है यह भी जानते हैं । केवल कुछ बातें जोडने की आवश्यकता है।
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(१) दिनचर्या में सोने, जागने, भोजन करने के समय का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है। (२) भोजन बनाने में सिन्थेटिक पदार्थों या सिन्थेटिक प्रक्रिया से बने पदार्थों का सेवन हानिकारक है। (३) सिन्थेटिक वस्त्र भी शरीर स्वास्थ्य के लिये प्रतिकूलता निर्माण करते हैं । (४) यन्त्र से पानी का शुद्धीकरण, फ्रिज, माइक्रोवेव, मिक्सर, ग्राइण्डर आदि स्वास्थ्य के शत्रु हैं ।
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(५) व्यायाम और श्रम नहीं करना हमारी राष्ट्रीय आपदा बन गई है। जिन्हें करना पडता है वे मजदरी में करते हैं इसलिये उसका लाभ नहीं होता । फिर भी वे काम नहीं करने वालों की अपेक्षा कम अस्वस्थ होते हैं।
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(६) मनोविकार शरीर स्वास्थ्य के महाशत्रु हैं। आज की अनेक बिमारियाँ मनोविकार से ही पैदा हुई हैं। लोभ, लालच, परिग्रह, द्वेष, चिन्ता आदि ये मनोविकार हैं जो शरीर स्वास्थ्य को हानि पहँचाते हैं।
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(७) हमारे घरों, कार्यालयों, विद्यालयों की बेन्च, कुर्सी, सोफा पर बैठने की व्यवस्था खडे खडे भोजन बानाने, करने, भाषण, करने, गाने की व्यवस्था भी घुटने और कमर के दर्द पैदा करने वाली है।
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ऐसी तो अनेक बातें हैं जो हमारी दिनचर्या और जीवनचर्या का अंग बन गई है। इन्हें बदले बिना अथवा दूर किये बिना हमारे शरीर स्वास्थ्यलाभ नहीं कर सकते हैं । शरीर ही अस्वस्थ है तो मन, बुद्धि, चित्त आदि का स्वास्थ्य भी संकट में पड जाता है । इसलिये समझदार प्रजा को शरीरस्वास्थ्य की चिन्ता समझदारी पूर्वक करनी चाहिये ।
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प्रश्न १८ विश्व के समस्त वर्तमान विश्वविद्यालय विश्व के समस्त संकटों के उद्गमस्थान हैं । क्या आप इससे
    
==References==
 
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