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मनुष्य को जब परमात्मा ने इच्छाएँ दीं, आवश्यकताएँ निर्माण कीं, तो उन की पूर्ति के लिये भी परमात्मा ने व्यवस्था की है । इस पूर्ति के लिये दो बातें आवश्यक हैं। पहली बात है प्राकृतिक संसाधन । परमात्मा ने प्रचूर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन निर्माण किये हैं। दूसरी बात है क्षमताएँ और कुशलताएँ । इन कुशलताओं के अपेक्षित और आवश्यक विकास की संभावनाएँ हैं ऐसे लोगों को भी परमात्मा ने मनुष्य समाज में निर्माण किया है । इन कुशलताओं में समाज की आवश्यकताओं के अनुसार संतुलन बना रहे इस हेतु से यह कुशलताएं जिन में जन्म से ही हैं ऐसे लोगों को भी परमात्मा ने योग्य अनुपात में पैदा किया । और करता रहता है । इन कुशलताओं का नाम है जाति । इन वर्णों और जातियों (व्यावसायिक कुशलताओं) का अनुपात बिगडने से समाज की आवश्यकताओं की ठीक से पूर्ति नहीं हो पाती । वर्णों का भी संतुलन बनाए रखने के लिये हमारे दृष्टा पूर्वजों ने वर्णों को भी जातियों अर्थात् कुशलताओं के साथ जन्मजात व्यवस्था में बांधा । वर्णों को और जातियों को जन्मगत बनाया । जन्मगत जाति बनाने से समाज के लिये आवश्यक कुशलताओं का संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था बनीं। जाति व्यवस्था के नाम से समाज को चिरंजीवी बनाने के लिये एक और व्यवस्था निर्माण की गई।   
 
मनुष्य को जब परमात्मा ने इच्छाएँ दीं, आवश्यकताएँ निर्माण कीं, तो उन की पूर्ति के लिये भी परमात्मा ने व्यवस्था की है । इस पूर्ति के लिये दो बातें आवश्यक हैं। पहली बात है प्राकृतिक संसाधन । परमात्मा ने प्रचूर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन निर्माण किये हैं। दूसरी बात है क्षमताएँ और कुशलताएँ । इन कुशलताओं के अपेक्षित और आवश्यक विकास की संभावनाएँ हैं ऐसे लोगों को भी परमात्मा ने मनुष्य समाज में निर्माण किया है । इन कुशलताओं में समाज की आवश्यकताओं के अनुसार संतुलन बना रहे इस हेतु से यह कुशलताएं जिन में जन्म से ही हैं ऐसे लोगों को भी परमात्मा ने योग्य अनुपात में पैदा किया । और करता रहता है । इन कुशलताओं का नाम है जाति । इन वर्णों और जातियों (व्यावसायिक कुशलताओं) का अनुपात बिगडने से समाज की आवश्यकताओं की ठीक से पूर्ति नहीं हो पाती । वर्णों का भी संतुलन बनाए रखने के लिये हमारे दृष्टा पूर्वजों ने वर्णों को भी जातियों अर्थात् कुशलताओं के साथ जन्मजात व्यवस्था में बांधा । वर्णों को और जातियों को जन्मगत बनाया । जन्मगत जाति बनाने से समाज के लिये आवश्यक कुशलताओं का संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था बनीं। जाति व्यवस्था के नाम से समाज को चिरंजीवी बनाने के लिये एक और व्यवस्था निर्माण की गई।   
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जातिगत व्यवसायों के माध्यम से समाज समृध्द भी बनता है । जन्मगत कुशलताएँ कुछ भी हों व्यवसाय का चयन दो पध्दति से किया जा सकता है । एक है व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर व्यवसाय का चयन। यह अस्वाभाविक भी हो सकता है । दूसरा है जाति व्यवस्था या आनुवंशिकता के या जन्मजात कुशलताओं के आधार पर व्यवसाय का चयन । वर्तमान व्यक्ति केंद्रित और स्वार्थ प्रेरित शिक्षा और विकृत लोकतंत्र के कारण सामान्यत: बहुतेरे लोग व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर ही व्यवसायों के चयन के पक्ष में दिखाई देते हैं। महाभारत में सत्य की दी हुई व्याख्या है {{Citation needed}} ‘यद्भूत हितं अत्यंत एतत्सत्यमभिधीयते ’। अर्थात् जो सब के हित में है, वही सत्य है। बहुमत से सत्य सिध्द नहीं होता है । वह होता है किस प्रकार के व्यवसाय के चयन से सभी को लाभ होता है इस बात के तथ्यों से। इस विषय में सत्य या तथ्य क्या हैं ? सब का हित किस में है, यह हम आगे दिये बिंदुओं के आधार पर देखेंगे:  
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जातिगत व्यवसायों के माध्यम से समाज समृध्द भी बनता है । जन्मगत कुशलताएँ कुछ भी हों व्यवसाय का चयन दो पद्दति से किया जा सकता है । एक है व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर व्यवसाय का चयन। यह अस्वाभाविक भी हो सकता है । दूसरा है जाति व्यवस्था या आनुवंशिकता के या जन्मजात कुशलताओं के आधार पर व्यवसाय का चयन । वर्तमान व्यक्ति केंद्रित और स्वार्थ प्रेरित शिक्षा और विकृत लोकतंत्र के कारण सामान्यत: बहुतेरे लोग व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर ही व्यवसायों के चयन के पक्ष में दिखाई देते हैं। महाभारत में सत्य की दी हुई व्याख्या है {{Citation needed}} ‘यद्भूत हितं अत्यंत एतत्सत्यमभिधीयते ’। अर्थात् जो सब के हित में है, वही सत्य है। बहुमत से सत्य सिध्द नहीं होता है । वह होता है किस प्रकार के व्यवसाय के चयन से सभी को लाभ होता है इस बात के तथ्यों से। इस विषय में सत्य या तथ्य क्या हैं ? सब का हित किस में है, यह हम आगे दिये बिंदुओं के आधार पर देखेंगे:  
# शिक्षक और शासक यह दो वर्ग समाज को बहुत प्रभावित करते हैं। इन का समाज में संतुलन और उन के श्रेष्ठ गुणों को  बनाए रखना समाज के चिरंजीवी बनने के लिये आवश्यक होता है । जातिगत और वर्णगत वंश परंपरा से यह श्रेष्ठता बनाई और बढ़ाई जा सकती है। व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की पध्दति में ऐसी परंपराएँ बन ही नहीं पातीं।   
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# शिक्षक और शासक यह दो वर्ग समाज को बहुत प्रभावित करते हैं। इन का समाज में संतुलन और उन के श्रेष्ठ गुणों को  बनाए रखना समाज के चिरंजीवी बनने के लिये आवश्यक होता है । जातिगत और वर्णगत वंश परंपरा से यह श्रेष्ठता बनाई और बढ़ाई जा सकती है। व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की पद्दति में ऐसी परंपराएँ बन ही नहीं पातीं।   
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय का चयन जब होता है तब समाज में असंतुलन निर्माण होता है । अधिक लाभ और कम परिश्रम जिस व्यवसाय में है, उन का सभी लोग यथासंभव चयन करते हैं। किन्तु ऐसा करने से बेरोजगारी निर्माण होती है । समाज की कई आवश्यकताओं की पूर्ति खतरे में पड जाती है। वर्तमान का उदाहरण लें । वर्तमान शिक्षा और शासकीय नीतियों के कारण आज किसान नहीं चाहता की उसका बच्चा किसान बने । अन्य व्यावसायिकों का तो दूर रहा किसान भी नहीं चाहता की उस की बेटी किसान के घर की बहू बने । जाति और जातिधर्म की भावना नष्ट करने के कारण अन्न का उत्पादन करने को आज किसान अपना जातिधर्म नहीं मानता । इस के कारण हमारा देश अन्नसंकट की दिशा में तेजी से बढ रहा दिखाई दे रहा है।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय का चयन जब होता है तब समाज में असंतुलन निर्माण होता है । अधिक लाभ और कम परिश्रम जिस व्यवसाय में है, उन का सभी लोग यथासंभव चयन करते हैं। किन्तु ऐसा करने से बेरोजगारी निर्माण होती है । समाज की कई आवश्यकताओं की पूर्ति खतरे में पड जाती है। वर्तमान का उदाहरण लें । वर्तमान शिक्षा और शासकीय नीतियों के कारण आज किसान नहीं चाहता की उसका बच्चा किसान बने । अन्य व्यावसायिकों का तो दूर रहा किसान भी नहीं चाहता की उस की बेटी किसान के घर की बहू बने । जाति और जातिधर्म की भावना नष्ट करने के कारण अन्न का उत्पादन करने को आज किसान अपना जातिधर्म नहीं मानता । इस के कारण हमारा देश अन्नसंकट की दिशा में तेजी से बढ रहा दिखाई दे रहा है।  
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका या रोजगार की आश्वस्ति नहीं दी जा सकती । जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में यह आश्वस्ति जन्म से ही मिल जाती है।   
 
# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति की आजीविका या रोजगार की आश्वस्ति नहीं दी जा सकती । जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में यह आश्वस्ति जन्म से ही मिल जाती है।   
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#* स्वतंत्रता  
 
#* स्वतंत्रता  
 
#* पुरूषार्थ  
 
#* पुरूषार्थ  
<blockquote>व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में व्यक्ति केवल अपने पुरूषार्थ के बल पर बडा होता है। किन्तु ऐसा करते समय वह कितना सुख पाता है यह विवाद का विषय नही है। सब सुखों का त्याग करने के उपरांत ही उसे सफलता प्राप्त होती है। उस की आजीविका सुसाध्य नहीं रहती । व्यावसायिक गलाकाट स्पर्धा का उसे सामना करना पडता है । इस स्पर्धा का सामना करना है तो शांति कैसे मिल सकती है ? किन्तु जातिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में व्यक्ति को अपनी जाति के अंदर ही स्पर्धा का सामना करना पडता है। जातियाँ हजारों होने से इस स्पर्धा की तीव्रता का स्तर हर जाति में तो बहुत ही कम होता है। जातिगत व्यवस्था में परस्परावलंबन होता है। फिर जातिगत अनुशासन भी होता है, जो गलाकाट स्पर्धा होने नहीं देता। इसलिये व्यक्ति के लिये सुखप्राप्ति की संभावनाएं कई गुना बढ जाती हैं।</blockquote>
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# व्यक्तिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में व्यक्ति केवल अपने पुरूषार्थ के बल पर बडा होता है। किन्तु ऐसा करते समय वह कितना सुख पाता है यह विवाद का विषय नही है। सब सुखों का त्याग करने के उपरांत ही उसे सफलता प्राप्त होती है। उस की आजीविका सुसाध्य नहीं रहती । व्यावसायिक गलाकाट स्पर्धा का उसे सामना करना पडता है । इस स्पर्धा का सामना करना है तो शांति कैसे मिल सकती है ? किन्तु जातिगत व्यवसाय के चयन की प्रणाली में व्यक्ति को अपनी जाति के अंदर ही स्पर्धा का सामना करना पडता है। जातियाँ हजारों होने से इस स्पर्धा की तीव्रता का स्तर हर जाति में तो बहुत ही कम होता है। जातिगत व्यवस्था में परस्परावलंबन होता है। फिर जातिगत अनुशासन भी होता है, जो गलाकाट स्पर्धा होने नहीं देता। इसलिये व्यक्ति के लिये सुखप्राप्ति की संभावनाएं कई गुना बढ जाती हैं।  
# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में ‘मुझे अधिक से अधिक सुख प्राप्ति के लिये अधिक से अधिक धन प्राप्त करना है। और अधिक से अधिक धन प्राप्ति के लिये के लिये उत्पादन करना है’ इस भावना से व्यक्ति काम करता है। जब की जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में व्यक्ति 'मैं मेरा कर्तव्य कर रहा हूँ’, मैं परोपकार के लिये उत्पादन कर रहा हूँ, ‘मैं मेरे जातिधर्म का पालन कर रहा हूँ’ इस भावना से उत्पादन करता है। स्वार्थत्याग में मनुष्य कमियों को सहन कर लेता है। किंतु जब वह स्वार्थ के (व्यक्तिगत चयन) लिये काम करता है तो वह कमियों को सहन नहीं कर पाता। वह या तो लाचार हो जाता है या अपराधी बन जाता है।
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# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में ‘मुझे अधिक से अधिक सुख प्राप्ति के लिये अधिक से अधिक धन प्राप्त करना है। और अधिक से अधिक धन प्राप्ति के लिये के लिये उत्पादन करना है’ इस भावना से व्यक्ति काम करता है। जब की जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में व्यक्ति 'मैं मेरा कर्तव्य कर रहा हूँ’, मैं परोपकार के लिये उत्पादन कर रहा हूँ, ‘मैं मेरे जातिधर्म का पालन कर रहा हूँ’ इस भावना से उत्पादन करता है। स्वार्थत्याग में मनुष्य कमियों को सहन कर लेता है। किंतु जब वह स्वार्थ के (व्यक्तिगत चयन) लिये काम करता है तो वह कमियों को सहन नहीं कर पाता। वह या तो लाचार हो जाता है या अपराधी बन जाता है।  
 
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# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में नौकरों (गैर या अल्प जिम्मेदार, लाचार और आत्मविश्वासहीन ) की संख्या बहुत अधिक होती है। मालिकों (जिम्मेदार, स्वाभिमानयुक्त और आत्मविश्वासयुक्त ) की संख्या अत्यल्प होती है। जब की जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में मालिकों की संख्या बहुत अधिक और नौकरों की संख्या कम रहती है। इस कारण सारा समाज जिम्मेदार, स्वाभिमानी और आत्मविश्वासयुक्त बनता है।  
# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में नौकरों (गैर या अल्प जिम्मेदार, लाचार और आत्मविश्वासहीन ) की संख्या बहुत अधिक होती हप्रै। मालिकों (जिम्मेदार, स्वाभिमानयुक्त और आत्मविश्वासयुक्त ) की संख्या अत्यल्प होती है। जब की जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में मालिकों की संख्या बहुत अधिक और नौकरों की संख्या कम रहती है। इस कारण सारा समाज जिम्मेदार, स्वाभिमानी और आत्मविश्वासयुक्त बनता है। १२. व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में लाभ (जितना अधिक से अधिक संभव है उतना) पर आधारित अर्थशास्त्र जन्म लेता है। इसलिये फिर विज्ञापनबाजी, झूठ, फरेब का उपयोग किया जाना सामान्य बन जाता है। सामान्य जन को इस से बचाने के लिये (मँहंगे) न्यायालय का दिखावा होता है। लेकिन वह मुश्किल से शायद एकाध प्रतिशत लोगों को ही न्याय दिला पाता है। केवल व्यक्तिगत चयन आधारित व्यवसाय पर आधारित अर्थव्यवस्था में निम्न प्रकारों से सामाजिक हानी होती हप्रै। क) पूरे समाज के लिये मैं अकेला ही उत्पादन करूँगा, उस से मिलनेवाले लाभ का मैं एकमात्र हकदार बनूँं ऐसी राक्षसी महत्वाकांक्षा सारे समाज में व्याप्त हो जाती है। इस वातावरण और उपजी स्पर्धा में समाज का एक बहुत छोटा वर्ग ही सफल होता है। बाकी सब लोग चूहे की मानसिकता वाले बन जाते हैं। जो अपने से दुर्बल और निश्चेष्ट किसी को भी खाते जाते हैं ख) व्यवसाय व्यक्तिगत और विशालतम बनते जाते हैं। जैसे मायक्रोसॉफ्ट या फोर्ड आदि। आर्थिक दृष्टि से कुछ लोग बहुत बडे बन जाते हैं । अन्य कुछ लोगों की जो बडे बन रहे हैं ऐसे लोगों की एक सीढी बनीं दिखाई देती है। किंतु इस सीढी पर बहुत कम लोग होते हैं। बहुजन तो चींटियों की तरह रेंगने लग जाते हैं । समाज में आर्थिक विषमता बढती है। ग) आर्थिक सत्ता के केंद्रीकरण के कारण पैसे का प्रभाव दिखाई देने लगता है। इस से गुण्डागर्दि, झूठ, फरेब और विज्ञापनबाजी की मदद से भी आर्थिक विकास की सीढी पर शीघ्रातिशीघ्र ऊपर चढने की मानसिकता बनने लगती है। संचार माध्यमों के दुरूपयोग के लिये निमित्त बन जाता है। घ) ज्ञान तो व्यक्ति में अंतर्निहीत ही होता है। उस का विकास वह कर सकता है। ज्ञानप्राप्ति का अधिकार हर व्यक्ति को है। किंतु कुशलता यह हर व्यक्ति की भिन्न होती है। हर व्यक्ति उस की विशिष्ट व्यावसायिक कौशल की विधा और उस विधा के विकास की संभावनाएँ लेकर ही जन्म लेता है। जन्म के उपरांत उस में परिवर्तन की संभावनाएँ बहुत कम होतीं है। परिवर्तन बहुत लम्बे और कठिन तप से ही हो सकता है। यह तप करने की तैयारी सामान्य मनुष्य की नहीं होने से वह असफल हो जाता है। दौड में पीछे रह जाता है। फिर व्यावसायिक तरीके  नहीं अन्य हथकंडे अपनाने लग जाता है। लाचार बन जाता है या निराश हो जाता है। च)  हर बच्चे के कुशलताओं के विकास के स्तर की मर्यादा भिन्न भिन्न होती हैं। जन्मजात कुशलताओं से भिन्न व्यवसाय के चयन के कारण अपने विकास के उच्चतम संभाव्य स्तर तक पहुँचने के लिये व्यक्तिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में अवसर ही नहीं होता। यह अवसर जातिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में सहज ही प्राप्त हो जाता है। छ)  जातिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में माँग के अनुसार उत्पादन होता है। ग्राहक को परमात्मा मानकर ही उत्पादन होता है। झूठ, फरेब और विज्ञापनबाजी से निर्माण की जानेवाली आभासी आवश्यकताओं की संभावना नहीं रहती॥ १३. जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली सर्व सहमति का लोकतंत्र छोडकर अन्य शासन व्यवस्थाओं में चल नहीं सकती। कम से कम वर्तमान अल्पमत-बहुमतवाले लोकतंत्र की प्रणाली में तो संभव ही नहीं है। छोटे भौगोलिक क्षेत्र में सर्वसहमति का लोकतंत्र अन्य किसी भी शासन व्यवस्था से ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के लिये अधिक उपयुक्त होता है। अल्पमत और बहुमत के लोकतंत्र में जातिगत व्यवसाय चयन पध्दति कभी नहीं रह सकती। अल्पमत और बहुमत का लोकतंत्र हर एक मनुष्य को व्यक्तिवादी यानि स्वार्थी बनाता है, सामाजिकता को पनपने नहीं देता है और इस जातिगत व्यवसाय चयन पध्दति को उस के पूरे लाभाप्त के साथ नष्ट कर देता है, जैसे वर्तमान में हो रहा है। जातिगत व्यवसाय चयन पध्दति ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के लिये अधिक उपयुक्त समझमें आती है। १४. अमर्याद व्यक्तिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में अधिक पैसा मिलने की संभावना होनेवाला व्यवसाय करने का प्रयास सब लोग करते   हैं । ऐसी स्थिती में बहुत बडे प्रमाण में लोगों की जन्मगत व्यावसायिक कुशलताओं का मेल उन्होंने स्वीकार किये हुए (अधिक लाभ देनेवाले) व्यावसायिक कुशलता से नहीं बैठ पाता। व्यवसाय उन्हें बोझ लगने लग जाता है। वे आप भी दुखी रहते हैं और औरों में दुख और निराशा संक्रमित करते हैं । जिन लोगों के चयनित व्यावसायिक कुशलता के साथ उन की जन्मगत व्यावसायिक कुशलताएँ मेल खातीं हैं उन्हें व्यवसाय बोझ नहीं लगता। उस व्यवसाय के करने में उन्हें आनंद प्राप्त होता है। ऐसे व्यावसायिक खुद भी आनंद से जीते हैं और औरों को भी आनंद बाँटते रहते हैं। १५. व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में कुशलताओं के विकास के लिये बडे पैमाने पर औपचारिक ढंग से खर्चिले व्यावसायिक शिक्षा के विद्यालय चलाना अनिवार्य हो जाता है। विद्यार्थी को कुशलताओं की प्राप्ति के लिये स्वतंत्र रूप से समय देना पडता है। इन कुशलताओं की प्राप्ति का सीधा संबंध अर्थार्जन से होता है। पेट पालन से होता है। इसलिये प्राथमिकता इस व्यावसायिक कुशलता प्राप्ति को ही देनी पडती है। इस के कारण अच्छा मानव बनने की या सामाजिकता की शिक्षा से व्यक्ति वंचित रह जाता है। इस का नुकसान पूरे समाज को भुगतना पडता है। जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में बच्चा अपने पारिवारिक व्यावसायिक उद्योग में अनायास ही कुशलता संपादित कर लेता है। इस के कारण बचे हुए समय में उसपर अच्छे संस्कार करने की गुंजाईश रहती है। १६. व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में अधिक पैसा देने वाले पाठयक्रमों के कारण एक और समस्या निर्माण होती है। लोग अधिकतम पैसा प्राप्त होनेवाले व्यवसायों का चयन करते हैं । वर्तमान में पढाए जाने वाले समाजशास्त्र, राज्यशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि पाठयक्रम कोई सार्थक हैं ऐसी बात नहीं है। लेकिन वे सार्थक होते तब भी इन पाठयक्रमों के लिये विद्यार्थी उपलब्ध नहीं होते। और जो होते हैं वे बहुत ही सामान्य बुध्दि रखनेवाले होते हैं । सब से अधिक हानी शिक्षा के क्षेत्र की होती है। निम्न स्तर की क्षमता और बुध्दि रखनेवाले लोग शिक्षक बनते हैं और समाज का पीढी दर पीढी पतन होता जाता है। सामाजिकता के क्षेत्र में प्रतिभा का संकट निर्माण होता है और राजनीति में चालाक लोग घुसकर बुध्दिमानोंपर शासन करते हैं । १७. जातिगत व्यवसाय चयन के अनुसार जब सेना में या सुरक्षा बलों में क्षत्रिय वृत्ति के लोग काम करते हैं तब वे उस व्यवस्था को श्रेष्ठ बनाते हैं । क्षत्रियों की मानसिकता, उन का प्राण की बाजी लगाने का स्वभाव, उन की शारीरिक बलोपासना स्वास्थ्य रक्षण और युध्द आदि कार्यों के अनुरूप होते हैं । कितु जब बलपूर्वक सेना में भरती होती है तब सैनिक की उस काम में अनास्था होती है। उस का मन ठीक से सहयोग नहीं करता। दूसरी ओर कुछ लोग अन्य कुछ भी काम नहीं आता इसलिये सेना और रक्षा बलों में भरती होते हैं । इन में क्षत्रिय के गुण और लक्षण नहीं होने के कारण इन महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता की ठीक से पूर्ति नहीं हो पाती। उन का स्तर घट जाता है। यह संकट वर्तमान में सभी शिक्षा, सैनिक / पुलिस / अर्धसैनिक सामाजिक सुरक्षा और राजनीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनुभव किया जा सकता है। १८. व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली पारिवारिक भावना और परिवार व्यवस्था को सेन्ध लगाती है। पारिवारिक व्यवसायों को तोडती है। पारिवारिक अर्थव्यवस्था को हटाकर आर्थिक बकासुरी (कारपोरेट) कारखानों और नौकरशाही की अर्थव्यवस्था स्थापित होती है। करोडों परिवारों में सुवितरित संपत्ति उन से छीनकर चंद बकासुरी (कारपोरेट) कारखानों तक ले जाती है। समाज पारिवारिक व्यवसायों को सामाजिक आवश्यकता के अनुसार समाज नियन्त्रित करता है। जब की बकासुरी (कारपोरेट) कारखाने अपनी आर्थिक आसुरी सत्ता के जरिये, नौकरशाही के माध्यम से अनैतिक, आक्रमक, भ्रामक, विज्ञापनबाजी से समाज का नियन्त्रण और शोषण करते हैं । १९. व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली समाज को पगढीला बनाती है। पगढीले लोगों की संख्या एक प्रमाण से अधिक बढने से समाज की संस्कृति धीरे धीरे नष्ट हो जाती है। जिस तरह शीत जल के पात्र में रखा मेंढक जल धीरे धीरे गरम करनप्र से मर जाता है लेकिन बाहर निकलने के प्रयास नहीं करता या कर पाता। उसी तरह संस्कृति धीरे धीरे नष्ट हो जाती है और पता भी नहीं चलता।   २०. जातिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में पूरे समाज की जातियों के लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अन्य जातियोंपर निर्भर रहते हैं। इस तरह परस्परावलंबन, के कारण समाज संगठित हो जाता है। समाज के विरोध में या राष्ट्र विरोधी गुट इस प्रणाली में पनप नहीं सकते। २१. जिस समाज की प्रजा ओजस्वी और तेजस्वी होती है वह समाज अन्यों से श्रेष्ठ होता है। जब स्त्री और पुरूष विवाह में कोइ बंधन नहीं रहता तब स्वैराचार पनपता है। हर सुन्दर लड़की की चाहत हर युवक को और हर सुन्दर और सुडौल युवक की चाहत हर लड़की को होती है। इसमें लडके और लड़की का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं भी बनता तब भी इस चाहत के कारण होनेवाले चिंतन के कारण दोनों के ब्रह्मचर्य की हानी तो होती ही है। संयम के लिए कुछ मात्रा में लोकलाज ही बंधन रह जाता है। वर्त्तमान के मुक्त वातावरण के कारण लडकों और लड़कियों के सम्बन्ध भी मुक्त होने लग गए हैं। ब्रह्मचर्य पालन यह मजाक का विषय बन गया है। लेकिन जब विवाहों को जातियों का बंधन होता है तो युवक और युवातियों की दिलफेंकू वृत्ती को लगाम लग जाती है। इससे युवा वर्ग शारीरिक और मानसिक दृष्टी से अधिक संयमी बनाता है। समाज का स्वास्थ्य सुधरता है। समाज सुसंस्कृत बनता है। २२. भारत अब भी भारत है, इस का एकमात्र कारण है की भारत में हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। लगभग ३०० वर्षों के मुस्लिम और १९० वर्षों के अंग्रेजी शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है, इस का एक  कारण है, हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था। धर्मपालजी ‘भारत का पुनर्बोंध’ में पृष्ठ क्र.१४ पर लिखते हैं, ‘अंग्रेजों के लिये जाति एक  बडा प्रश्न था। … इसलिये नहीं कि वे जातिरहित या वर्गव्यवस्था के अभाववाली पध्दति में मानते थे, किन्तु इसलिये कि यह जाति व्यवस्था उन के भारतीय समाज को तोडने के कार्य में विघ्नस्वरूप थी’। भारत के अलावा अन्य किसी भी देश में जब मुस्लिम शासन रहा उसने २५-५० वर्षों में स्थानीय समाज को पूरा का पूरा मुसलमान बना दिया था । ५०० वर्षों के मुस्लिम शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था इस का मुख्य कारण है। जाति व्यवस्था के ढेर सारे लाभ हैं । काल के प्रवाह में जाति व्यवस्था में दोष भी निर्माण हुए हैं। उन्हें दूर करना ही होगा। इस के ढेर सारे लाभ दुर्लक्षित नहीं किये जा सकते* धर्मपालजी ‘भारत का पुनर्बोंध’ में पृष्ठ क्र.१४ पर और लिखते हैं ‘आज के जातिप्रथा के विरूध्द आक्रोश के मूल में अंग्रेजी शासन ही है’*
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# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में लाभ (जितना अधिक से अधिक संभव है उतना) पर आधारित अर्थशास्त्र जन्म लेता है। इसलिये फिर विज्ञापनबाजी, झूठ, फरेब का उपयोग किया जाना सामान्य बन जाता है। सामान्य जन को इस से बचाने के लिये (मँहंगे) न्यायालय का दिखावा होता है। लेकिन वह मुश्किल से शायद एकाध प्रतिशत लोगों को ही न्याय दिला पाता है। केवल व्यक्तिगत चयन आधारित व्यवसाय पर आधारित अर्थव्यवस्था में निम्न प्रकारों से सामाजिक हानि होती है:
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## पूरे समाज के लिये मैं अकेला ही उत्पादन करूँगा, उस से मिलनेवाले लाभ का मैं एकमात्र हकदार बनूँं ऐसी राक्षसी महत्वाकांक्षा सारे समाज में व्याप्त हो जाती है। इस वातावरण और उपजी स्पर्धा में समाज का एक बहुत छोटा वर्ग ही सफल होता है। बाकी सब लोग चूहे की मानसिकता वाले बन जाते हैं। जो अपने से दुर्बल और निश्चेष्ट किसी को भी खाते जाते हैं   
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## व्यवसाय व्यक्तिगत और विशालतम बनते जाते हैं। जैसे मायक्रोसॉफ्ट या फोर्ड आदि। आर्थिक दृष्टि से कुछ लोग बहुत बडे बन जाते हैं । अन्य कुछ लोगों की जो बडे बन रहे हैं ऐसे लोगों की एक सीढी बनीं दिखाई देती है। किंतु इस सीढी पर बहुत कम लोग होते हैं। बहुजन तो चींटियों की तरह रेंगने लग जाते हैं । समाज में आर्थिक विषमता बढती है।  
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## आर्थिक सत्ता के केंद्रीकरण के कारण पैसे का प्रभाव दिखाई देने लगता है। इस से गुण्डागर्दी, झूठ, फरेब और विज्ञापनबाजी की मदद से भी आर्थिक विकास की सीढी पर शीघ्रातिशीघ्र ऊपर चढने की मानसिकता बनने लगती है। संचार माध्यमों के दुरूपयोग के लिये निमित्त बन जाता है।
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## ज्ञान तो व्यक्ति में अंतर्निहीत ही होता है। उस का विकास वह कर सकता है। ज्ञानप्राप्ति का अधिकार हर व्यक्ति को है। किंतु कुशलता यह हर व्यक्ति की भिन्न होती है। हर व्यक्ति उस की विशिष्ट व्यावसायिक कौशल की विधा और उस विधा के विकास की संभावनाएँ लेकर ही जन्म लेता है। जन्म के उपरांत उस में परिवर्तन की संभावनाएँ बहुत कम होतीं है। परिवर्तन बहुत लम्बे और कठिन तप से ही हो सकता है। यह तप करने की तैयारी सामान्य मनुष्य की नहीं होने से वह असफल हो जाता है। दौड में पीछे रह जाता है। फिर व्यावसायिक तरीके  नहीं अन्य हथकंडे अपनाने लग जाता है। लाचार बन जाता है या निराश हो जाता है।  
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## हर बच्चे के कुशलताओं के विकास के स्तर की मर्यादा भिन्न भिन्न होती हैं। जन्मजात कुशलताओं से भिन्न व्यवसाय के चयन के कारण अपने विकास के उच्चतम संभाव्य स्तर तक पहुँचने के लिये व्यक्तिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में अवसर ही नहीं होता। यह अवसर जातिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में सहज ही प्राप्त हो जाता है।  
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## जातिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में माँग के अनुसार उत्पादन होता है। ग्राहक को परमात्मा मानकर ही उत्पादन होता है। झूठ, फरेब और विज्ञापनबाजी से निर्माण की जानेवाली आभासी आवश्यकताओं की संभावना नहीं रहती॥
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# जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली सर्व सहमति का लोकतंत्र छोडकर अन्य शासन व्यवस्थाओं में चल नहीं सकती। कम से कम वर्तमान अल्पमत-बहुमतवाले लोकतंत्र की प्रणाली में तो संभव ही नहीं है। छोटे भौगोलिक क्षेत्र में सर्वसहमति का लोकतंत्र अन्य किसी भी शासन व्यवस्था से ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के लिये अधिक उपयुक्त होता है। अल्पमत और बहुमत के लोकतंत्र में जातिगत व्यवसाय चयन पद्दति कभी नहीं रह सकती। अल्पमत और बहुमत का लोकतंत्र हर एक मनुष्य को व्यक्तिवादी यानि स्वार्थी बनाता है, सामाजिकता को पनपने नहीं देता है और इस जातिगत व्यवसाय चयन पद्दति को उस के पूरे लाभाप्त के साथ नष्ट कर देता है, जैसे वर्तमान में हो रहा है। जातिगत व्यवसाय चयन पद्दति ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ के लिये अधिक उपयुक्त समझमें आती है।  
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# अमर्याद व्यक्तिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में अधिक पैसा मिलने की संभावना होनेवाला व्यवसाय करने का प्रयास सब लोग करते हैं। ऐसी स्थिति में बहुत बडे प्रमाण में लोगों की जन्मगत व्यावसायिक कुशलताओं का मेल उन्होंने स्वीकार किये हुए (अधिक लाभ देनेवाले) व्यावसायिक कुशलता से नहीं बैठ पाता। व्यवसाय उन्हें बोझ लगने लग जाता है। वे आप भी दुखी रहते हैं और औरों में दुख और निराशा संक्रमित करते हैं । जिन लोगों के चयनित व्यावसायिक कुशलता के साथ उन की जन्मगत व्यावसायिक कुशलताएँ मेल खातीं हैं उन्हें व्यवसाय बोझ नहीं लगता। उस व्यवसाय के करने में उन्हें आनंद प्राप्त होता है। ऐसे व्यावसायिक खुद भी आनंद से जीते हैं और औरों को भी आनंद बाँटते रहते हैं।
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# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में कुशलताओं के विकास के लिये बडे पैमाने पर औपचारिक ढंग से खर्चिले व्यावसायिक शिक्षा के विद्यालय चलाना अनिवार्य हो जाता है। विद्यार्थी को कुशलताओं की प्राप्ति के लिये स्वतंत्र रूप से समय देना पडता है। इन कुशलताओं की प्राप्ति का सीधा संबंध अर्थार्जन से होता है। पेट पालन से होता है। इसलिये प्राथमिकता इस व्यावसायिक कुशलता प्राप्ति को ही देनी पडती है। इस के कारण अच्छा मानव बनने की या सामाजिकता की शिक्षा से व्यक्ति वंचित रह जाता है। इस का नुकसान पूरे समाज को भुगतना पडता है। जातिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में बच्चा अपने पारिवारिक व्यावसायिक उद्योग में अनायास ही कुशलता संपादित कर लेता है। इस के कारण बचे हुए समय में उसपर अच्छे संस्कार करने की गुंजाईश रहती है।  
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# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली में अधिक पैसा देने वाले पाठयक्रमों के कारण एक और समस्या निर्माण होती है। लोग अधिकतम पैसा प्राप्त होनेवाले व्यवसायों का चयन करते हैं । वर्तमान में पढाए जाने वाले समाजशास्त्र, राज्यशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि पाठयक्रम कोई सार्थक हैं ऐसी बात नहीं है। लेकिन वे सार्थक होते तब भी इन पाठयक्रमों के लिये विद्यार्थी उपलब्ध नहीं होते। और जो होते हैं वे बहुत ही सामान्य बुध्दि रखनेवाले होते हैं । सब से अधिक हानि शिक्षा के क्षेत्र की होती है। निम्न स्तर की क्षमता और बुध्दि रखनेवाले लोग शिक्षक बनते हैं और समाज का पीढी दर पीढी पतन होता जाता है। सामाजिकता के क्षेत्र में प्रतिभा का संकट निर्माण होता है और राजनीति में चालाक लोग घुसकर बुध्दिमानोंपर शासन करते हैं ।  
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# जातिगत व्यवसाय चयन के अनुसार जब सेना में या सुरक्षा बलों में क्षत्रिय वृत्ति के लोग काम करते हैं तब वे उस व्यवस्था को श्रेष्ठ बनाते हैं । क्षत्रियों की मानसिकता, उन का प्राण की बाजी लगाने का स्वभाव, उन की शारीरिक बलोपासना स्वास्थ्य रक्षण और युध्द आदि कार्यों के अनुरूप होते हैं । कितु जब बलपूर्वक सेना में भरती होती है तब सैनिक की उस काम में अनास्था होती है। उस का मन ठीक से सहयोग नहीं करता। दूसरी ओर कुछ लोग अन्य कुछ भी काम नहीं आता इसलिये सेना और रक्षा बलों में भरती होते हैं । इन में क्षत्रिय के गुण और लक्षण नहीं होने के कारण इन महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता की ठीक से पूर्ति नहीं हो पाती। उन का स्तर घट जाता है। यह संकट वर्तमान में सभी शिक्षा, सैनिक / पुलिस / अर्धसैनिक सामाजिक सुरक्षा और राजनीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनुभव किया जा सकता है।  
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# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली पारिवारिक भावना और परिवार व्यवस्था को सेन्ध लगाती है। पारिवारिक व्यवसायों को तोडती है। पारिवारिक अर्थव्यवस्था को हटाकर आर्थिक बकासुरी (कारपोरेट) कारखानों और नौकरशाही की अर्थव्यवस्था स्थापित होती है। करोडों परिवारों में सुवितरित संपत्ति उन से छीनकर चंद बकासुरी (कारपोरेट) कारखानों तक ले जाती है। समाज पारिवारिक व्यवसायों को सामाजिक आवश्यकता के अनुसार समाज नियन्त्रित करता है। जब की बकासुरी (कारपोरेट) कारखाने अपनी आर्थिक आसुरी सत्ता के जरिये, नौकरशाही के माध्यम से अनैतिक, आक्रमक, भ्रामक, विज्ञापनबाजी से समाज का नियन्त्रण और शोषण करते हैं ।  
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# व्यक्तिगत व्यवसाय चयन की प्रणाली समाज को पगढीला बनाती है। पगढीले लोगों की संख्या एक प्रमाण से अधिक बढने से समाज की संस्कृति धीरे धीरे नष्ट हो जाती है। जिस तरह शीत जल के पात्र में रखा मेंढक जल धीरे धीरे गरम करने से मर जाता है लेकिन बाहर निकलने के प्रयास नहीं करता या कर पाता। उसी तरह संस्कृति धीरे धीरे नष्ट हो जाती है और पता भी नहीं चलता।  
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# जातिगत व्यवसाय चयन प्रणाली में पूरे समाज की जातियों के लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अन्य जातियोंपर निर्भर रहते हैं। इस तरह परस्परावलंबन, के कारण समाज संगठित हो जाता है। समाज के विरोध में या राष्ट्र विरोधी गुट इस प्रणाली में पनप नहीं सकते।
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# जिस समाज की प्रजा ओजस्वी और तेजस्वी होती है वह समाज अन्यों से श्रेष्ठ होता है। जब स्त्री और पुरूष विवाह में कोइ बंधन नहीं रहता तब स्वैराचार पनपता है। हर सुन्दर लड़की की चाहत हर युवक को और हर सुन्दर और सुडौल युवक की चाहत हर लड़की को होती है। इसमें लडके और लड़की का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं भी बनता तब भी इस चाहत के कारण होनेवाले चिंतन के कारण दोनों के ब्रह्मचर्य की हानि तो होती ही है। संयम के लिए कुछ मात्रा में लोकलाज ही बंधन रह जाता है। वर्त्तमान के मुक्त वातावरण के कारण लडकों और लड़कियों के सम्बन्ध भी मुक्त होने लग गए हैं। ब्रह्मचर्य पालन यह मजाक का विषय बन गया है। लेकिन जब विवाहों को जातियों का बंधन होता है तो युवक और युवातियों की दिलफेंकू वृत्ती को लगाम लग जाती है। इससे युवा वर्ग शारीरिक और मानसिक दृष्टी से अधिक संयमी बनाता है। समाज का स्वास्थ्य सुधरता है। समाज सुसंस्कृत बनता है।  
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# भारत अब भी भारत है, इस का एकमात्र कारण है कि भारत में हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। लगभग ३०० वर्षों के मुस्लिम और १९० वर्षों के अंग्रेजी शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है, इस का एक  कारण है, हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था।  
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<blockquote>धर्मपालजी लिखते हैं<ref>धर्मपाल, ‘भारत का पुनर्बोंध’ पृष्ठ क्र. 14 </ref>, "‘अंग्रेजों के लिये जाति एक  बडा प्रश्न था। … इसलिये नहीं कि वे जातिरहित या वर्गव्यवस्था के अभाववाली पद्दति में मानते थे, किन्तु इसलिये कि यह जाति व्यवस्था उन के भारतीय समाज को तोडने के कार्य में विघ्नस्वरूप थी"।</blockquote><blockquote>भारत के अलावा अन्य किसी भी देश में जब मुस्लिम शासन रहा उसने २५-५० वर्षों में स्थानीय समाज को पूरा का पूरा मुसलमान बना दिया था । ५०० वर्षों के मुस्लिम शासन के उपरांत भी हिन्दू समाज अब भी बहुसंख्या में है। हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था इस का मुख्य कारण है। जाति व्यवस्था के ढेर सारे लाभ हैं । काल के प्रवाह में जाति व्यवस्था में दोष भी निर्माण हुए हैं। उन्हें दूर करना ही होगा। इस के ढेर सारे लाभ दुर्लक्षित नहीं किये जा सकते</blockquote><blockquote>धर्मपालजी लिखते हैं<ref>धर्मपाल ‘भारत का पुनर्बोंध’ पृष्ठ क्र. 14</ref> ‘आज के जातिप्रथा के विरूध्द आक्रोश के मूल में अंग्रेजी शासन ही है’*</blockquote>
    
== जाति व्यवस्था पर किये गये दोषारोपों की वास्तविकता ==
 
== जाति व्यवस्था पर किये गये दोषारोपों की वास्तविकता ==
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दोष ४ : जाति व्यवस्था से जातिवाद पैदा होता है : जातिवाद अंग्रेजों का निर्माण किया हुआ दोष है। धर्मपाल कहते हैं कि हिंदुओं के ईसाईकरण में जाति व्यवस्था रोडा थी इसलिये अंग्रेजों ने इसे बदनाम किया। जातियों में दुष्मनी निर्माण की। ऐसे सुधारकों को समर्थन और प्रोत्साहन दिया।
 
दोष ४ : जाति व्यवस्था से जातिवाद पैदा होता है : जातिवाद अंग्रेजों का निर्माण किया हुआ दोष है। धर्मपाल कहते हैं कि हिंदुओं के ईसाईकरण में जाति व्यवस्था रोडा थी इसलिये अंग्रेजों ने इसे बदनाम किया। जातियों में दुष्मनी निर्माण की। ऐसे सुधारकों को समर्थन और प्रोत्साहन दिया।
 
दोष ५ : जाति व्यवस्था गतिशीलता की विरोधी है : समाज में परिवर्तन की एक गति होती है। आज तकनीकी की गति के पीछे समाज घसीटा जा रहा है। समाज स्वास्थ्य नष्ट हो रहा है। समाज जीवन का साध्य गति है या सामाजिक सुख, स्वास्थ्य यह हम पहले तय करें। तब उसका स्वाभाविक उत्तर आएगा की यह ठीक नहीं हो रहा। एक जाति से दूसरी जाति में विवाह को मान्यता नहीं थी। इसे भी समाज की गतिशीलता में रोडा माना जा रहा है। किंतु आज आर्थिक दृष्टि से, सैनिक पार्श्वभूमि के, व्यापारी, सरकारी अधिकारी आदि ऐसे वर्ग बन गये हैं जिन्हें बिरादरी कहते हैं। उन के बाहर विवाह नहीं हो ऐसा आग्रह होता है, उसका तो विरोध कोई करता दिखाई नहीं देता। लेकिन जो अत्यंत शास्त्रीय है ऐसे सवर्ण, सजातीय विवाह को गालियाँ दीं जातीं हैं। इसका कारण तो यही समझ में आता है कि वर्तमान समान वर्ग के विवाह यह पश्चिमी समाज का रिवाज है। ये तथाकथित गुलामी की मानसिकता वाले सुधारकों से या समाजशास्त्रियों से इसके विरोध की अपेक्षा करना भी ठीक नहीं है।  
 
दोष ५ : जाति व्यवस्था गतिशीलता की विरोधी है : समाज में परिवर्तन की एक गति होती है। आज तकनीकी की गति के पीछे समाज घसीटा जा रहा है। समाज स्वास्थ्य नष्ट हो रहा है। समाज जीवन का साध्य गति है या सामाजिक सुख, स्वास्थ्य यह हम पहले तय करें। तब उसका स्वाभाविक उत्तर आएगा की यह ठीक नहीं हो रहा। एक जाति से दूसरी जाति में विवाह को मान्यता नहीं थी। इसे भी समाज की गतिशीलता में रोडा माना जा रहा है। किंतु आज आर्थिक दृष्टि से, सैनिक पार्श्वभूमि के, व्यापारी, सरकारी अधिकारी आदि ऐसे वर्ग बन गये हैं जिन्हें बिरादरी कहते हैं। उन के बाहर विवाह नहीं हो ऐसा आग्रह होता है, उसका तो विरोध कोई करता दिखाई नहीं देता। लेकिन जो अत्यंत शास्त्रीय है ऐसे सवर्ण, सजातीय विवाह को गालियाँ दीं जातीं हैं। इसका कारण तो यही समझ में आता है कि वर्तमान समान वर्ग के विवाह यह पश्चिमी समाज का रिवाज है। ये तथाकथित गुलामी की मानसिकता वाले सुधारकों से या समाजशास्त्रियों से इसके विरोध की अपेक्षा करना भी ठीक नहीं है।  
सवर्ण, सजातीय और भिन्न गोत्र में विवाह यह तो शास्त्रों का कथन है। आधुनिक मानव वंशशास्त्र भी इस का समर्थन करता है। लेकिन विपरीत शिक्षा, विपरीत (अभारतीय) प्रतिमानीय सोच और वर्तमान में बन रहे चित्रपटों के कारण अत्यंत हानीकारक ऐसे प्रेम विवाह की प्रतिष्ठा हो रही है। पुरा चित्रपट क्षेत्र मानो प्रेमविवाह को प्रतिष्ठित करने के लिये ही निर्माण हुवा है।   
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सवर्ण, सजातीय और भिन्न गोत्र में विवाह यह तो शास्त्रों का कथन है। आधुनिक मानव वंशशास्त्र भी इस का समर्थन करता है। लेकिन विपरीत शिक्षा, विपरीत (अभारतीय) प्रतिमानीय सोच और वर्तमान में बन रहे चित्रपटों के कारण अत्यंत हानिकारक ऐसे प्रेम विवाह की प्रतिष्ठा हो रही है। पुरा चित्रपट क्षेत्र मानो प्रेमविवाह को प्रतिष्ठित करने के लिये ही निर्माण हुवा है।   
 
दोष ६ राष्ट्रीय एकता में बाधक : इतिहास गवाह है कि जाति व्यवस्था कभी भी राष्ट्रीय एकता में बाधक नहीं बनीं। उलटे आज के लोकतंत्रीय राजनीति में ही ऐसे गुट (कम्यूनिस्टों जैसे, या नक्सलियों जैसे या मजहबों जैसे) निर्माण हुए हैं जिन्होने राष्ट्रीय एकता में सेंध लगाई है। विडम्बना तो यह है कि इस वर्तमान लोकतंत्र के कारण ‘राष्ट्र’ क्या होता है, यह स्पष्टता से कहने की कोई हिम्मत नहीं करता।  
 
दोष ६ राष्ट्रीय एकता में बाधक : इतिहास गवाह है कि जाति व्यवस्था कभी भी राष्ट्रीय एकता में बाधक नहीं बनीं। उलटे आज के लोकतंत्रीय राजनीति में ही ऐसे गुट (कम्यूनिस्टों जैसे, या नक्सलियों जैसे या मजहबों जैसे) निर्माण हुए हैं जिन्होने राष्ट्रीय एकता में सेंध लगाई है। विडम्बना तो यह है कि इस वर्तमान लोकतंत्र के कारण ‘राष्ट्र’ क्या होता है, यह स्पष्टता से कहने की कोई हिम्मत नहीं करता।  
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महाभारत के युध्द के बाद निर्माण हुई सामाजिक अव्यवस्था को दूर करने के लिये जो विद्वत परिषद नप्रमिषारण्य में हुयी थी उस का नेतृत्व सूत मुनी ने किया था । वे सूत जाति के ज्ञानवान ( ब्राह्मणों के गुण और लक्षणों वाले ) मनुष्य थे । इस से भी यह अनुमान लगाया जा सकता है की हर जाति में चार वर्ण होते है ।   
 
महाभारत के युध्द के बाद निर्माण हुई सामाजिक अव्यवस्था को दूर करने के लिये जो विद्वत परिषद नप्रमिषारण्य में हुयी थी उस का नेतृत्व सूत मुनी ने किया था । वे सूत जाति के ज्ञानवान ( ब्राह्मणों के गुण और लक्षणों वाले ) मनुष्य थे । इस से भी यह अनुमान लगाया जा सकता है की हर जाति में चार वर्ण होते है ।   
 
‘भारतीय समाजशास्त्र’ इस पुस्तक में (वरदा प्रकाशन, सेनापति बापट मार्ग, पुणे 16) पृष्ठ 142 पर लेखक डॉ श्रीधर व्यंकटेश केतकर लिखते हैं - ब्राह्मणांचा सर्वत्र प्रचार होण्यापूर्वी समाजाला असे स्वरूप होते कि प्रत्येक जातीत चातुरर््वण्य होते म्हणजे शेतकरी, पुजारी, व्यापारी, आणि सेवक वर्ग होते'। अर्थात् ब्राह्मणों का सर्वत्र प्रचार होने से पूर्व प्रत्येक जाती में किसान, पुजारी, व्यापारी और सेवक ऐसे चार वर्ण थे।
 
‘भारतीय समाजशास्त्र’ इस पुस्तक में (वरदा प्रकाशन, सेनापति बापट मार्ग, पुणे 16) पृष्ठ 142 पर लेखक डॉ श्रीधर व्यंकटेश केतकर लिखते हैं - ब्राह्मणांचा सर्वत्र प्रचार होण्यापूर्वी समाजाला असे स्वरूप होते कि प्रत्येक जातीत चातुरर््वण्य होते म्हणजे शेतकरी, पुजारी, व्यापारी, आणि सेवक वर्ग होते'। अर्थात् ब्राह्मणों का सर्वत्र प्रचार होने से पूर्व प्रत्येक जाती में किसान, पुजारी, व्यापारी और सेवक ऐसे चार वर्ण थे।
ऐसा कहते हैं कि १९११ की जन-गणना तक भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह जातियाँ ही नहीं थीं। जातियाँ तो थीं। लेकिन उन्हे वर्ण से जोडा हुवा नहीं था। हर जाति में चारों वर्णों के बच्चे पैदा होते थे और अपने जन्मगत स्वभाव (वर्ण) के अनुसार अपने परिवार के काम में सहायक बनते थे। इस जन-गणना में अंग्रेजों ने जतियों को वर्णों में बाँटा। कई जातियों ने उन का वर्गीकरण किस वर्ण में करना चाहिये इस के लिये जन-गणना अधिकारियों और अंग्रेज सरकार के साथ चर्चाएँ कीं तथा छुटपुट आंदोलन भी चलाये थे। तब से पूरी जाति ही किसी वर्ण की कहलाई जाने लग गयी थी। यह तो भारतीय वर्ण की मान्यता से पूर्णत: भिन्न व्यवस्था थी। अ-प्राकृतिक थी। अस्वीकार्य थी। किंतु इस विषय को संवेदनशील बना देने के कारण इस विषय पर कोई बहस होती है तो जाति व्यवस्था को गालियाँ देने के लिये ही होती है। जाति व्यवस्था के तत्त्व को या मर्म को समझने के लिये नहीं होती। इस कारण से जातियों का चार वर्णों में बँट जाना यह बात पिछली ५ पीढियों में सर्वमान्य बन गयी है। वास्तव में तो वर्ण की वास्तविक कल्पना के अनुसार शूद्र जाति होती ही नहीं है। पशू हत्या से जुडे कर्मों के कारण या अन्य कुछ कारणों से हो, कुछ जातियाँ अछूत कहलाईं। कितु वे शूद्र जातियाँ नहीं थीं। हर जाति में सेवक का काम करने वाले लोग शूद्र वर्ण के ही माने जाते थे। इन शूद्रों में कुछ तो जन्म से ही शूद्र के गुण-कर्म लेकर आते हैं इस लिये शूद्र होते हैं तो दूसरे मनुस्मृति में कहे अनुसार अपने कर्मों से शूद्र बन जाते हैं तो तीसरे कुछ लोग परिस्थिती के कारण शूद्र (सेवक कर्म) करने के लिये बाध्य हो जाते हैं। हालाँ कि समाज के त्रिवर्ण का कोई शूद्र (सेवक)कर्म करने को बाध्य हो जाये, यह नहीं तो उस व्यक्ति के और ना ही समाज के हित में होता है।
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ऐसा कहते हैं कि १९११ की जन-गणना तक भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह जातियाँ ही नहीं थीं। जातियाँ तो थीं। लेकिन उन्हे वर्ण से जोडा हुवा नहीं था। हर जाति में चारों वर्णों के बच्चे पैदा होते थे और अपने जन्मगत स्वभाव (वर्ण) के अनुसार अपने परिवार के काम में सहायक बनते थे। इस जन-गणना में अंग्रेजों ने जतियों को वर्णों में बाँटा। कई जातियों ने उन का वर्गीकरण किस वर्ण में करना चाहिये इस के लिये जन-गणना अधिकारियों और अंग्रेज सरकार के साथ चर्चाएँ कीं तथा छुटपुट आंदोलन भी चलाये थे। तब से पूरी जाति ही किसी वर्ण की कहलाई जाने लग गयी थी। यह तो भारतीय वर्ण की मान्यता से पूर्णत: भिन्न व्यवस्था थी। अ-प्राकृतिक थी। अस्वीकार्य थी। किंतु इस विषय को संवेदनशील बना देने के कारण इस विषय पर कोई बहस होती है तो जाति व्यवस्था को गालियाँ देने के लिये ही होती है। जाति व्यवस्था के तत्त्व को या मर्म को समझने के लिये नहीं होती। इस कारण से जातियों का चार वर्णों में बँट जाना यह बात पिछली ५ पीढियों में सर्वमान्य बन गयी है। वास्तव में तो वर्ण की वास्तविक कल्पना के अनुसार शूद्र जाति होती ही नहीं है। पशू हत्या से जुडे कर्मों के कारण या अन्य कुछ कारणों से हो, कुछ जातियाँ अछूत कहलाईं। कितु वे शूद्र जातियाँ नहीं थीं। हर जाति में सेवक का काम करने वाले लोग शूद्र वर्ण के ही माने जाते थे। इन शूद्रों में कुछ तो जन्म से ही शूद्र के गुण-कर्म लेकर आते हैं इस लिये शूद्र होते हैं तो दूसरे मनुस्मृति में कहे अनुसार अपने कर्मों से शूद्र बन जाते हैं तो तीसरे कुछ लोग परिस्थिति के कारण शूद्र (सेवक कर्म) करने के लिये बाध्य हो जाते हैं। हालाँ कि समाज के त्रिवर्ण का कोई शूद्र (सेवक)कर्म करने को बाध्य हो जाये, यह नहीं तो उस व्यक्ति के और ना ही समाज के हित में होता है।
 
भारत के इतिहास में कई बार ब्राह्मण जाति का मनुष्य राजा बना। सम्राट यशोधर्मा, पुष्यमित्र आदि ब्राह्मण जाति के  ही तो थे। शूद्र राजा भी कई हुए है। ये सब उन जातियों के क्षत्रिय वर्ण के लोग ही थे। क्षत्रिय राजा मनु द्वारा प्रस्तुत की गई 'मनुस्मृति’ हजारों वर्षोंतक भारत में सबसे अधिक मान्यता प्राप्त स्मृति रही है। क्या मनु को ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है? इसी तरह क्या बाबासाहब अंबेडकर को ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है?
 
भारत के इतिहास में कई बार ब्राह्मण जाति का मनुष्य राजा बना। सम्राट यशोधर्मा, पुष्यमित्र आदि ब्राह्मण जाति के  ही तो थे। शूद्र राजा भी कई हुए है। ये सब उन जातियों के क्षत्रिय वर्ण के लोग ही थे। क्षत्रिय राजा मनु द्वारा प्रस्तुत की गई 'मनुस्मृति’ हजारों वर्षोंतक भारत में सबसे अधिक मान्यता प्राप्त स्मृति रही है। क्या मनु को ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है? इसी तरह क्या बाबासाहब अंबेडकर को ब्राह्मणत्व नकारा जा सकता है?
 
राजा के सलाहकार कैसे हों इस विषय में बताया गया है कि राजा को विद्वान सलाहकार मंत्रियों की मदद से राज्य चलाना चाहिये। 3 ब्राह्मण, 8 क्षत्रिय, 21 वैष्य और 3 शूद्र मंत्रियों का मंत्रिमंडल रहे। मनुस्मृति के अनुसार यह मंत्री श्रेष्ठ परंपराओं के वाहक, शास्त्र को जाननेवाले, बहादुर, ध्येयवादी, अच्छे कुलों के ऐसे होने चाहिये। उपर्युक्त मंत्रियों में से जो तीन शूद्र मंत्री है क्या उन से ब्राह्मण मंत्री की तरह ही अपेक्षाएं नहीं थीं । मंत्री के लिये अपेक्षित इन गुणों की अपेक्षा तो केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैष्य जाति के ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्ण के लोगों से ही की जा सकती है।     
 
राजा के सलाहकार कैसे हों इस विषय में बताया गया है कि राजा को विद्वान सलाहकार मंत्रियों की मदद से राज्य चलाना चाहिये। 3 ब्राह्मण, 8 क्षत्रिय, 21 वैष्य और 3 शूद्र मंत्रियों का मंत्रिमंडल रहे। मनुस्मृति के अनुसार यह मंत्री श्रेष्ठ परंपराओं के वाहक, शास्त्र को जाननेवाले, बहादुर, ध्येयवादी, अच्छे कुलों के ऐसे होने चाहिये। उपर्युक्त मंत्रियों में से जो तीन शूद्र मंत्री है क्या उन से ब्राह्मण मंत्री की तरह ही अपेक्षाएं नहीं थीं । मंत्री के लिये अपेक्षित इन गुणों की अपेक्षा तो केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैष्य जाति के ब्राह्मण या क्षत्रिय वर्ण के लोगों से ही की जा सकती है।     
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छुआछूत का चलन यह जाति व्यवस्था में निर्माण हुवा गंभीर दोष है। यदि जाति व्यवस्था को बनाए रखना हो तो छुआछूत विहीन जाति व्यवस्था का ही विकास करना होगा।  
 
छुआछूत का चलन यह जाति व्यवस्था में निर्माण हुवा गंभीर दोष है। यदि जाति व्यवस्था को बनाए रखना हो तो छुआछूत विहीन जाति व्यवस्था का ही विकास करना होगा।  
 
प्रकृति में पेड के दो पत्ते एक जैसे नहीं होते। दो मनुष्य भी एक जैसे नहीं हो सकते। इसलिये श्रेष्ठता और कनिष्ठता तो रहेगी ही। यह प्राकृतिक ही है। किंतु मानव होने के नाते समानता आवश्यक है, इस तत्त्व का नयी जाति व्यवस्था में समावेष अनिवार्य है। जाति या वर्ण जो भी हो, मानवता का व्यवहार तो हर मानव से हो यह अनिवार्य है। समाज के प्रत्येक सदस्य को उस के कर्मों के आधारपर श्रेष्ठता या कनिष्ठता प्राप्त होगी। ऐसा होने से किसी के मन में कडवाहट नहीं रहेगी।
 
प्रकृति में पेड के दो पत्ते एक जैसे नहीं होते। दो मनुष्य भी एक जैसे नहीं हो सकते। इसलिये श्रेष्ठता और कनिष्ठता तो रहेगी ही। यह प्राकृतिक ही है। किंतु मानव होने के नाते समानता आवश्यक है, इस तत्त्व का नयी जाति व्यवस्था में समावेष अनिवार्य है। जाति या वर्ण जो भी हो, मानवता का व्यवहार तो हर मानव से हो यह अनिवार्य है। समाज के प्रत्येक सदस्य को उस के कर्मों के आधारपर श्रेष्ठता या कनिष्ठता प्राप्त होगी। ऐसा होने से किसी के मन में कडवाहट नहीं रहेगी।
कुछ लोगों की पक्की धारणा है कि जाति व्यवस्था मूलत: ही दोषपूर्ण थी। इन में जो विचारशील लोग हैं उन्हें समझाना होगा। और नयी व्यवस्था के पक्ष में लाना होगा। जो लोग समझते हैं कि जाति व्यवस्था कभी ठीक रही होगी। लेकिन वर्तमान में तो यह अप्रासंगिक हो गई है। ऐसे लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वर्तमान जाति व्यवस्था को तोडने से पहले वे एक सशक्त वैकल्पिक व्यवस्था की प्रस्तुति करें। वैकल्पिक व्यवस्था के प्रयोग कर यह सिध्द करें कि उन के द्वारा प्रस्तुत की हुई व्यवस्था वर्तमान जाति व्यवस्थाओं के सभी लाभों को बनाए रखते हुए इस के दोषों का निवारण करती है। ऐसी परिस्थिती में उन के द्वारा प्रस्तुत व्यवस्था का स्वीकार करना हर्ष की ही बात होगी। किंतु ऐसी किसी वैकल्पिक व्यवस्था की योजना के बगैर ही वर्तमान व्यवस्था को तोडने के प्रयास को बुध्दिमानी नहीं कहा जा सकता। ऐसा विकल्प जबतक नहीं मिल जाता, वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखते हुए उस के दोषों का निवारण करने के प्रयास करने होंगे।
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कुछ लोगों की पक्की धारणा है कि जाति व्यवस्था मूलत: ही दोषपूर्ण थी। इन में जो विचारशील लोग हैं उन्हें समझाना होगा। और नयी व्यवस्था के पक्ष में लाना होगा। जो लोग समझते हैं कि जाति व्यवस्था कभी ठीक रही होगी। लेकिन वर्तमान में तो यह अप्रासंगिक हो गई है। ऐसे लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वर्तमान जाति व्यवस्था को तोडने से पहले वे एक सशक्त वैकल्पिक व्यवस्था की प्रस्तुति करें। वैकल्पिक व्यवस्था के प्रयोग कर यह सिध्द करें कि उन के द्वारा प्रस्तुत की हुई व्यवस्था वर्तमान जाति व्यवस्थाओं के सभी लाभों को बनाए रखते हुए इस के दोषों का निवारण करती है। ऐसी परिस्थिति में उन के द्वारा प्रस्तुत व्यवस्था का स्वीकार करना हर्ष की ही बात होगी। किंतु ऐसी किसी वैकल्पिक व्यवस्था की योजना के बगैर ही वर्तमान व्यवस्था को तोडने के प्रयास को बुध्दिमानी नहीं कहा जा सकता। ऐसा विकल्प जबतक नहीं मिल जाता, वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखते हुए उस के दोषों का निवारण करने के प्रयास करने होंगे।
 
जिन्हें शास्त्र के अनुसार व्यवहार नही करना है उन का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में दिया है -  
 
जिन्हें शास्त्र के अनुसार व्यवहार नही करना है उन का वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में दिया है -  
 
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ॥
 
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ॥
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