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| | कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -<blockquote>प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारोऽवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/८/३)<ref>वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० १०९)।</ref></blockquote>प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं। | | कौटिल्य कोष-क्षय के कारणों के प्रति अत्यन्त सजग थे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राज्यकर्मचारी विभिन्न रूपों में राजकोष का दुरुपयोग कर सकते हैं। अर्थशास्त्र में कोष-क्षय के आठ प्रमुख कारण बताए गए हैं जिनसे सचेत रहना भी राजा के लिए आवश्यक था जो निम्न हैं -<blockquote>प्रतिबन्धः प्रयोगोव्यवहारोऽवस्तारः परिहायणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः॥ (अर्थशास्त्र २/२४/८/३)<ref>वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० १०९)।</ref></blockquote>प्रतिबन्ध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन और अपहार ये आठ कोषक्षय के प्रमुख कारण हैं। |
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| − | #'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है - '''सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः, तत्र दश-बन्धो दण्डः।''' कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।<ref name=":2">वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २४, अध्याय ८, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ११०)।</ref> | + | #'''प्रतिबंधक (राजकर की अनुचित वसूली एवं संग्रह) -''' अर्थशास्त्र के अनुसार राजकर की वसूली कर उसे अपने अधिकार में न रखना, अधिकार में रखने पर भी उसे राजकोष में जमा न करना अथवा वसूल की गई राशि का अन्यत्र उपयोग करना - ये तीनों स्थितियाँ प्रतिबन्धक क्षय कहलाती हैं। ऐसे कृत्यों द्वारा राजकोष की हानि होती है, क्योंकि कर का नियमानुकूल लेखांकन एवं संग्रह बाधित हो जाता है - सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः, तत्र दश-बन्धो दण्डः। कौटिल्य ने इस प्रकार के कोष-क्षय को गम्भीर अपराध मानते हुए दोषी अध्यक्ष पर क्षतिग्रस्त राशि से दस गुना दण्ड निर्धारित किया है।<ref name=":2">वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २४, अध्याय ८, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ११०)।</ref> |
| − | #'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है - '''कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः।''' इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।<ref name=":2" /> | + | #'''प्रयोग (कोषधन का निजी लेन-देन में प्रयोग)''' - राजकोष के धन से स्वयं लेन-देन कर उसे बढ़ाने का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है। ऐसा कृत्य राज्यधन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है - कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः। इस प्रकार के अपराध में संलिप्त अधिकारी को भी दूना दण्ड दिया जाना आवश्यक बताया गया है।<ref name=":2" /> |
| − | #'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -''' राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है - '''पण्यव्यवहारो व्यवहारः। तत्र फलद्विगुणो दण्डः।''' ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।<ref name=":2" /> | + | #'''व्यवहार (कोष की सम्पत्ति से निजी व्यापार) -''' राजकोष में संचित धन अथवा वस्तुओं से स्वयं व्यापार करना व्यवहार कहा गया है। यह भी कोष के अनुचित उपयोग का रूप है - पण्यव्यवहारो व्यवहारः। तत्र फलद्विगुणो दण्डः। ऐसे कृत्य के लिए दोषी व्यक्ति को दुगुना दण्ड देने का विधान किया गया है।<ref name=":2" /> |
| − | #'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है - '''सिद्ध कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः। तत्र पञ्च-बन्धो दण्डः।''' इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।<ref name=":2" /> | + | #'''अवस्तार (भय अथवा रिश्वत द्वारा धन-संग्रह) -''' जो अधिकारी नियत समय पर कर वसूली न करके, विलम्ब का भय दिखाकर अथवा रिश्वत प्राप्त करने की इच्छा से प्रजा को उत्पीड़ित कर धन एकत्र करता है, उसे अवस्तार कहा गया है - सिद्ध कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः। तत्र पञ्च-बन्धो दण्डः। इस प्रकार की वसूली को अत्यन्त निन्दनीय माना गया है और ऐसे अधिकारी पर हानि की राशि से पाँच गुना दण्ड लगाने का निर्देश दिया गया है।<ref name=":2" /> |
| − | #'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है - '''क्लृप्तमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम्। तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः।''' इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।<ref name=":2" /> | + | #'''परिहरण (आय को घटाकर एवं व्यय को बढ़ाकर कोष-हानि) -''' जो अध्यक्ष अथवा अधिकारी अपने दुष्कृत्यों के कारण राज्य की आय को कम कर देता है तथा व्यय की राशि को अनावश्यक रूप से बढ़ा देता है, उसे परिहरण कहा गया है - क्लृप्तमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम्। तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः। इस प्रकार का आचरण भी कोष को क्षति पहुँचाने वाला माना गया है और इसके लिए चौगुना दण्ड का विधान किया गया है।<ref name=":2" /> |
| − | #'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए [[Penal System (दण्ड व्यवस्था)|दण्ड]] का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है - '''स्वयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः। तत्र रत्नोपभोगे घातः, सारोपभोगे मध्यमः साहसदण्डः, फल्गुकुप्योपभोगे तच्च तावच्च दण्डः।''' यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।<ref name=":2" /> | + | #'''उपभोग (राजकोषीय द्रव्यों का निजी उपभोग)''' - राजकोष में संचित द्रव्यों का स्वयं उपयोग करना अथवा दूसरों को उसका उपयोग करने देना उपभोग कहलाता है। यह कोष-क्षय का गम्भीर अपराध माना गया है। ऐसे अपराध में संलग्न अध्यक्ष के लिए [[Penal System (दण्ड व्यवस्था)|दण्ड]] का निर्धारण उपभोग की वस्तु के अनुसार किया गया है - स्वयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः। तत्र रत्नोपभोगे घातः, सारोपभोगे मध्यमः साहसदण्डः, फल्गुकुप्योपभोगे तच्च तावच्च दण्डः। यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो उस पर प्राणदण्ड का विधान है; साहसिक द्रव्यों के उपभोग की स्थिति में मध्यम साहस दण्ड (250 से 500 पण तक का अर्थदण्ड) निर्धारित किया गया है; तथा यदि फल, कन्द-मूल अथवा अन्य उपभोग्य पदार्थों का उपयोग किया गया हो तो उनसे सम्बन्धित द्रव्य को वापस लेकर उसकी लागत के अनुरूप दण्ड दिया जाना चाहिए।<ref name=":2" /> |
| − | #'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है - '''राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनं, तद् उपभोगेन व्याख्यातम्।''' यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए।<ref name=":2" /> | + | #'''परिवर्तन (राजकोषीय द्रव्यों का परिवर्तन) -''' राजकोष की वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से बदल लेना परिवर्तन कहा जाता है - राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनं, तद् उपभोगेन व्याख्यातम्। यह भी कोष के अनधिकृत उपयोग का ही एक रूप है। इस प्रकार के कृत्य में संलिप्त अध्यक्ष को उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाना चाहिए।<ref name=":2" /> |
| − | #'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना - ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं - '''सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति, प्राप्तां नीवीं विप्रतिजानीत इत्यपहारः। तत्र द्वादशगुणो दण्डः।''' अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।<ref name=":2" /> | + | #'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना - ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं - सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति, प्राप्तां नीवीं विप्रतिजानीत इत्यपहारः। तत्र द्वादशगुणो दण्डः। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।<ref name=":2" /> |
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| | ===कोषाध्यक्ष के दायित्व॥ Duties of the Treasurer=== | | ===कोषाध्यक्ष के दायित्व॥ Duties of the Treasurer=== |
| | कोषाध्यक्ष संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है, जो कोष तथा अध्यक्ष शब्दों से मिलकर बना है। कोष का अर्थ है- राज्य की संचित सम्पत्ति या खजाना, तथा अध्यक्ष का अर्थ है- उसका प्रधान या निरीक्षक। इस प्रकार कोषाध्यक्ष वह अधिकारी होता है जो कोषागार का अधीक्षक एवं संरक्षक होता है। प्राचीन भारतीय प्रशासन व्यवस्था में कोषाध्यक्ष का दायित्व राज्य के खजाने की सुरक्षा, आय–व्यय का नियंत्रण तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था। वह राज्य की आय को संग्रहीत करने, भुगतान की व्यवस्था करने तथा कोष से संबंधित समस्त कार्यों का संचालन करता था। | | कोषाध्यक्ष संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है, जो कोष तथा अध्यक्ष शब्दों से मिलकर बना है। कोष का अर्थ है- राज्य की संचित सम्पत्ति या खजाना, तथा अध्यक्ष का अर्थ है- उसका प्रधान या निरीक्षक। इस प्रकार कोषाध्यक्ष वह अधिकारी होता है जो कोषागार का अधीक्षक एवं संरक्षक होता है। प्राचीन भारतीय प्रशासन व्यवस्था में कोषाध्यक्ष का दायित्व राज्य के खजाने की सुरक्षा, आय–व्यय का नियंत्रण तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था। वह राज्य की आय को संग्रहीत करने, भुगतान की व्यवस्था करने तथा कोष से संबंधित समस्त कार्यों का संचालन करता था। |
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| − | व्यावहारिक अर्थ में कोषाध्यक्ष को खजांची (Treasurer), भुगतानकर्ता (Paymaster) तथा वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा प्रधान अधिकारी माना जाता है। आधुनिक शासन प्रणाली में उसके कार्य और दायित्वों की प्रकृति वित्त मंत्री (Finance Minister) या उच्च वित्तीय अधिकारी से तुलनीय मानी जा सकती है, यद्यपि प्रशासनिक संरचना में पदनाम भिन्न हो सकता है। | + | व्यावहारिक अर्थ में कोषाध्यक्ष को खजांची (Treasurer), भुगतानकर्ता (Paymaster) तथा वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा प्रधान अधिकारी माना जाता है। आधुनिक शासन प्रणाली में उसके कार्य और दायित्वों की प्रकृति वित्त मंत्री (Finance Minister) या उच्च वित्तीय अधिकारी से तुलनीय मानी जा सकती है, यद्यपि प्रशासनिक संरचना में पदनाम भिन्न हो सकता है। कौटिल्य के अनुसार - <blockquote>सन्निधाता कोशगृहं पण्यगृहं कोष्ठागारं कुप्यगृहमायुधागारं बन्धनागारं च कारयेत्। चतुरश्रां वापीमनुदकोपस्नेहां खानयित्वा पृथुशिलाभिरुभयतः पार्श्व मूलं च प्रचित्य सारदारुपञ्जरं भूमिसमत्रितलमनेकविधानं कुट्टिम-देशस्थानतल मेकद्वारं यन्त्रयुक्तसोपानं देवतापिधानं भूमिगृहं कारयेत्। तस्योपर्युभयतोनिषेधं सप्रग्रीवमैष्टकं भाण्डवाहिनीपरिक्षिप्तं कोशगृहं कारयेत्, प्रासादं वा। जनपदान्ते ध्रुवनिधिमापदर्थमभित्यक्तः पुरुषैः कारयेत्॥ (अर्थशास्त्र २१/५/१-२)<ref>वाचस्पति गैरोला, [https://archive.org/details/arthasastraofkautilyachanakyasutravachaspatigairolachowkambha_202002/page/109/mode/1up कौटिल्य अर्थशास्त्र], प्रकरण २१, अध्याय ५, चौखम्भा विद्याभवन, वाराणसी (पृ० ९६)।</ref></blockquote>राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे। |
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| − | कौटिल्य के अनुसार राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे। | |
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| | कोषगृह में विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। कोषगृह के निर्माण के विषय में आचार्य कौटिल्य ने विशेष तकनीकी निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार कोषगृह का निर्माण ऐसे सुरक्षित स्थान पर किया जाना चाहिए जहाँ न जल का प्रवेश हो और न ही आर्द्रता। इसकी दीवारें तथा फर्श सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित हों तथा भीतर लकड़ी के खम्भों के बीच एक पृथक कक्ष बनाया जाए, जिसमें केवल एक द्वार हो। उस कक्ष के मध्य भाग में भूमि को समतल कर उसमें एक गड्ढा बनाया जाए, जिसमें चन्दन की लकड़ी स्थापित हो और उस पर देवता की प्रतिष्ठा की जाए। | | कोषगृह में विविध प्रकार की मूल्यवान वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। कोषगृह के निर्माण के विषय में आचार्य कौटिल्य ने विशेष तकनीकी निर्देश दिए हैं। उनके अनुसार कोषगृह का निर्माण ऐसे सुरक्षित स्थान पर किया जाना चाहिए जहाँ न जल का प्रवेश हो और न ही आर्द्रता। इसकी दीवारें तथा फर्श सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित हों तथा भीतर लकड़ी के खम्भों के बीच एक पृथक कक्ष बनाया जाए, जिसमें केवल एक द्वार हो। उस कक्ष के मध्य भाग में भूमि को समतल कर उसमें एक गड्ढा बनाया जाए, जिसमें चन्दन की लकड़ी स्थापित हो और उस पर देवता की प्रतिष्ठा की जाए। |
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| | ===कोष-संग्रह॥ Treasury Collection === | | ===कोष-संग्रह॥ Treasury Collection === |
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| | आचार्य शुक्र ने कोष को सुखद तथा दुःखद - इन दो प्रकारों में विभाजित किया है। उनके अनुसार जो कोष राजा, प्रजा, सेना तथा धार्मिक कृत्यों के हित में प्रयुक्त होता है, वही सुखद कोष कहलाता है। ऐसा कोष राज्य की समृद्धि, सामाजिक संतुलन तथा लोककल्याण का साधन बनता है। इसके विपरीत, जो कोष अनुचित साधनों से संचित हो, या जिसे केवल व्यक्तिगत सुख, पत्नी–पुत्र अथवा संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाए, वह दुःखद कोष माना जाता है। ऐसा धन न तो वास्तविक सुख प्रदान करता है और न ही स्थायी कल्याण का कारण बनता है, अपितु अंततः कष्ट और पतन का हेतु बनता है - <blockquote>बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसङ्ग्रहः। परत्रेह च सुखदो नृपास्यान्यश्च दुःखदः॥ | | आचार्य शुक्र ने कोष को सुखद तथा दुःखद - इन दो प्रकारों में विभाजित किया है। उनके अनुसार जो कोष राजा, प्रजा, सेना तथा धार्मिक कृत्यों के हित में प्रयुक्त होता है, वही सुखद कोष कहलाता है। ऐसा कोष राज्य की समृद्धि, सामाजिक संतुलन तथा लोककल्याण का साधन बनता है। इसके विपरीत, जो कोष अनुचित साधनों से संचित हो, या जिसे केवल व्यक्तिगत सुख, पत्नी–पुत्र अथवा संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाए, वह दुःखद कोष माना जाता है। ऐसा धन न तो वास्तविक सुख प्रदान करता है और न ही स्थायी कल्याण का कारण बनता है, अपितु अंततः कष्ट और पतन का हेतु बनता है - <blockquote>बलप्रजारक्षणार्थं यज्ञार्थं कोशसङ्ग्रहः। परत्रेह च सुखदो नृपास्यान्यश्च दुःखदः॥ |
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