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#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना- ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।
 
#'''अपहार (लेखा-विवरण में अनियमितता) -''' प्राप्त आय को लेखा-पुस्तकों (रजिस्टर) में अंकित न करना, नियमित व्यय को रजिस्टर में दर्शाने के उपरान्त भी उसका वास्तविक उपयोग न करना, अथवा प्राप्त निधि के सम्बन्ध में छल-कपट करना- ये तीनों प्रकार के कृत्य अपहार की श्रेणी में आते हैं। अपहार के माध्यम से कोष-क्षय करने वाले अध्यक्ष को हुई हानि से बारह गुना दण्ड देने का निर्देश दिया गया है।
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=== कोषाध्यक्ष के दायित्व ===
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=== कोषाध्यक्ष के दायित्व॥ Duties of the Treasurer ===
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कोषाध्यक्ष संस्कृत का एक संयुक्त शब्द है, जो कोष तथा अध्यक्ष शब्दों से मिलकर बना है। कोष का अर्थ है- राज्य की संचित सम्पत्ति या खजाना, तथा अध्यक्ष का अर्थ है- उसका प्रधान या निरीक्षक। इस प्रकार कोषाध्यक्ष वह अधिकारी होता है जो कोषागार का अधीक्षक एवं संरक्षक होता है। प्राचीन भारतीय प्रशासन व्यवस्था में कोषाध्यक्ष का दायित्व राज्य के खजाने की सुरक्षा, आय–व्यय का नियंत्रण तथा वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था। वह राज्य की आय को संग्रहीत करने, भुगतान की व्यवस्था करने तथा कोष से संबंधित समस्त कार्यों का संचालन करता था।
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व्यावहारिक अर्थ में कोषाध्यक्ष को खजांची (Treasurer), भुगतानकर्ता (Paymaster) तथा वित्तीय प्रबंधन से जुड़ा प्रधान अधिकारी माना जाता है। आधुनिक शासन प्रणाली में उसके कार्य और दायित्वों की प्रकृति वित्त मंत्री (Finance Minister) या उच्च वित्तीय अधिकारी से तुलनीय मानी जा सकती है, यद्यपि प्रशासनिक संरचना में पदनाम भिन्न हो सकता है।
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कौटिल्य के अनुसार राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे।
 
कौटिल्य के अनुसार राजकीय कोष का प्रधान अधिकारी सन्निधाता कहलाता था। सन्निधाता का दायित्व था कि वह कोषगृह, पण्यगृह, कोष्ठागार, कुष्ठागार, आयुधागार तथा कारागार आदि की स्थापना कर उनकी समुचित देखरेख करे। कोषगृह आदि की संपूर्ण व्यवस्था उसके अधीन संचालित होती थी तथा कोषाध्यक्ष, पण्याध्यक्ष आदि अन्य अधिकारी उसके निर्देशन में अपने-अपने कार्यों का निर्वहन करते थे।
  
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