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नया लेख प्रारंभ - कोष व्यवस्था
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन में राज्य की स्थिरता एवं उन्नति के लिए कोष को केन्द्रीय स्थान प्राप्त है। कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र में कोष को न केवल राज्य का आधार माना गया है, अपितु उसे दण्ड, सेना, प्रशासन और लोककल्याण की शक्ति का मूल स्रोत भी बताया गया है। प्रस्तुत लेख में कोष-संरचना, कोष-वृद्धि के उपाय, कोष-क्षय के कारण तथा कोष में संचित विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों का विश्लेषण किया गया है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि कौटिल्य की कोष-नीति केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं थी, अपितु नैतिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-नियंत्रण और आर्थिक सुरक्षा की समग्र योजना प्रस्तुत करती है।

== परिचय ==
राज्य संचालन का मूलाधार आर्थिक सुदृढ़ता है। प्राचीन धर्मशास्त्रकारों ने राज्य के सप्ताङ्ग सिद्धान्त में कोष को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कौटिल्य भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि समस्त प्रशासनिक क्रियाएँ कोष पर ही आधारित होती हैं। कोष के बिना न तो सेना का संचालन सम्भव है और न ही दण्ड-व्यवस्था की प्रभावशीलता। इसीलिए राजा का प्रथम कर्तव्य कोष की रक्षा एवं वृद्धि बताया गया है।

== उद्धरण ==
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