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शुक्लयजुर्वेद के चतुस्त्रिंशत् (४३) अध्याय के प्रारम्भिक छह मंत्रों को सामूहिक रूप से शिवसंकल्पसूक्त कहा जाता है। ये मंत्र अपनी संरचना, भाववस्तु तथा संदेश की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इस सूक्त में ‘शिवसंकल्प’ का तात्पर्य शुभ, श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी संकल्प से है, जिसे मानव अपने आचरण में धारण करता है। जैसा संकल्प मन में उत्पन्न होता है, वैसा ही आचरण विकसित होता है और उसी के अनुरूप कर्म का स्वरूप निर्धारित होता है। इस प्रकार समस्त कर्मों का मूलाधार मन को स्वीकार किया गया है। सूक्त के प्रत्येक मंत्र के अंत में ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ - अर्थात् मेरा मन शुभ विचारों से युक्त हो - इस भावना की पुनरावृत्ति की गई है। सूक्त में मन के स्वरूप, उसकी प्रवृत्तियों तथा उसके नियंत्रण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया है। आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह सूक्त अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें मानसिक शुद्धता को आचरण की शुद्धता का आधार माना गया है।
== परिचय ==
मन के विषय में वैदिक ऋषियों ने गहन चिंतन किया है। शिवसंकल्पसूक्त के संदर्भ में ऋषि यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य को केवल शारीरिक एवं वाचिक पापों से ही नहीं, अपितु मानसिक दोषों से भी स्वयं को दूर रखना चाहिए। मन में उत्पन्न होने वाले संकल्प यदि शुभ और श्रेयस्कर हों, तभी जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है। मन अत्यन्त चंचल है, अतः उसे वश में रखना दुष्कर कार्य है। इसी कारण ऋषि बार-बार मन को शुभ एवं पवित्र संकल्पों से युक्त रखने की प्रार्थना करते हैं।
== उद्धरण ==
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