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| | ==प्रायश्चित्त का स्वरूप॥ Prayashchitta ka Svaroop== | | ==प्रायश्चित्त का स्वरूप॥ Prayashchitta ka Svaroop== |
| − | धर्मशास्त्रों में प्रायश्चित्त वह कृत्य माना गया है जिसके करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और उसकी आत्मा शुद्ध होती है। प्रायश्चित्त केवल पापमोचन का उपाय नहीं, अपितु आत्मसंयम का साधन भी है।<ref>डॉ० शिखा शर्मा, [https://ia800804.us.archive.org/35/items/PramukhDharmaSutronEvamSmritiyonMeinPrayashchitVidhanShikhaSharma/Pramukh%20Dharma%20Sutron%20Evam%20Smritiyon%20Mein%20Prayashchit%20Vidhan%20-%20Shikha%20Sharma.pdf प्रमुख धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में प्रायश्चित विधान] (२००७), न्यू भारतीय बुक कार्पोरेशन, दिल्ली (पृ० १७)।</ref> धर्मशास्त्रों में स्मृतियों को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है - आचार, व्यवहार, तथा प्रायश्चित्त। इनके विधि-विधान, नियम, और दृष्टांत क्रमशः विभिन्न शास्त्रों में वर्णित हैं। प्रायश्चित्त-प्रकरण में दोषमोचन, तप, और सामाजिक पुनरुत्थान के प्रमाण मिलते हैं।<ref name=":0" /><blockquote>अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति। कामतस्तु कृतं मोहत्प्रायश्चित्तै पृथग्विधैः॥ (मनुस्मृति ११.४६)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%8F%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- ११, श्लोक- ४६।</ref></blockquote>भाषार्थ - अनजाने में किये गये पापों का शमन वेदवचनों के पाठ से होता है और जानबूझकर किये गये पाप विभिन्न प्रयाश्चित्तों से ही नष्ट किये जाते हैं। हरीत कहते हैं कि - <blockquote>प्रयत्नादेवापचितत्सुं कर्म नाशयतीति प्रायश्चित्तमिति। यत्तपः प्रभृतिकं कर्म उपचितं संचतशुभं पापं नाशयतीति। कृततत्कर्मभिः कर्तुः प्रयत्नाद्वा। शुद्धत्वादेव तत्प्रायश्चित्तम्। तथा च पुनर्य हारितः। यथा क्षारोपस्वेदन्यादनप्रक्षालनादिभिःवासांसि शुद्ध्यन्ति एवं तपोदानन्यैः पापकृतः शुद्धिमुपयन्ति। (प्रायश्चित्त तत्त्व पृ. ४६७, प्राय. विवेक पृ. ३)<ref name=":3">डॉ० शिखा शर्मा, प्रमुख धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में प्रायश्चित्त विधान (२००७), न्यू भारतीय बुक कार्पोरेशन, दिल्ली (पृ १८)।</ref></blockquote>'''भाषार्थ -''' मनुष्य के प्रयत्न से भी संचित (जमा हुए) पाप नष्ट हो जाते हैं, यही प्रायश्चित्त का तात्पर्य है। तप आदि श्रेष्ठ कर्म संचित पापों को नष्ट कर देते हैं। कृत (अर्थात् किए जाने वाले) कर्मों में प्रयत्न ही मुख्य है, क्योंकि शुद्धता प्रयत्न से ही प्राप्त होती है और जैसे शरीर पर एकत्रित मल को स्नान आदि क्रियाओं से स्वच्छ किया जाता है, उसी प्रकार तप, दान आदि साधनों द्वारा पापकृत कर्म करने वाला व्यक्ति शुद्धि को प्राप्त होता है।<ref name=":3" /> | + | धर्मशास्त्रों में प्रायश्चित्त वह कृत्य माना गया है जिसके करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और उसकी आत्मा शुद्ध होती है। प्रायश्चित्त केवल पापमोचन का उपाय नहीं, अपितु आत्मसंयम का साधन भी है।<ref>डॉ० शिखा शर्मा, [https://ia800804.us.archive.org/35/items/PramukhDharmaSutronEvamSmritiyonMeinPrayashchitVidhanShikhaSharma/Pramukh%20Dharma%20Sutron%20Evam%20Smritiyon%20Mein%20Prayashchit%20Vidhan%20-%20Shikha%20Sharma.pdf प्रमुख धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में प्रायश्चित विधान] (२००७), न्यू भारतीय बुक कार्पोरेशन, दिल्ली (पृ० १७)।</ref> धर्मशास्त्रों में स्मृतियों को तीन मुख्य भागों में बांटा गया है - आचार, व्यवहार, तथा प्रायश्चित्त। इनके विधि-विधान, नियम, और दृष्टांत क्रमशः विभिन्न शास्त्रों में वर्णित हैं। प्रायश्चित्त-प्रकरण में दोषमोचन, तप, और सामाजिक पुनरुत्थान के प्रमाण मिलते हैं।<ref name=":0" /><blockquote>अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुद्ध्यति। कामतस्तु कृतं मोहत्प्रायश्चित्तै पृथग्विधैः॥ (मनुस्मृति ११.४६)<ref>[https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%83/%E0%A4%8F%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83 मनु स्मृति], अध्याय- ११, श्लोक- ४६।</ref></blockquote>भाषार्थ - अनजाने में किये गये पापों का शमन वेदवचनों के पाठ से होता है और जानबूझकर किये गये पाप विभिन्न प्रयाश्चित्तों से ही नष्ट किये जाते हैं। हरीत कहते हैं कि - <blockquote>प्रयत्नादेवापचितत्सुं कर्म नाशयतीति प्रायश्चित्तमिति। यत्तपः प्रभृतिकं कर्म उपचितं संचतशुभं पापं नाशयतीति। कृततत्कर्मभिः कर्तुः प्रयत्नाद्वा। शुद्धत्वादेव तत्प्रायश्चित्तम्। तथा च पुनर्य हारितः। यथा क्षारोपस्वेदन्यादनप्रक्षालनादिभिःवासांसि शुद्ध्यन्ति एवं तपोदानन्यैः पापकृतः शुद्धिमुपयन्ति। (प्रायश्चित्त तत्त्व पृ. ४६७, प्राय. विवेक पृ. ३)<ref name=":3">डॉ० शिखा शर्मा, [https://archive.org/details/PramukhDharmaSutronEvamSmritiyonMeinPrayashchitVidhanShikhaSharma/page/58/mode/1up प्रमुख धर्मसूत्रों एवं स्मृतियों में प्रायश्चित्त विधान] (२००७), न्यू भारतीय बुक कार्पोरेशन, दिल्ली (पृ १८)।</ref></blockquote>'''भाषार्थ -''' मनुष्य के प्रयत्न से भी संचित (जमा हुए) पाप नष्ट हो जाते हैं, यही प्रायश्चित्त का तात्पर्य है। तप आदि श्रेष्ठ कर्म संचित पापों को नष्ट कर देते हैं। कृत (अर्थात् किए जाने वाले) कर्मों में प्रयत्न ही मुख्य है, क्योंकि शुद्धता प्रयत्न से ही प्राप्त होती है और जैसे शरीर पर एकत्रित मल को स्नान आदि क्रियाओं से स्वच्छ किया जाता है, उसी प्रकार तप, दान आदि साधनों द्वारा पापकृत कर्म करने वाला व्यक्ति शुद्धि को प्राप्त होता है।<ref name=":3" /> |
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| | ==प्रायश्चित्त के प्रकार॥ Types of Prayashchitta== | | ==प्रायश्चित्त के प्रकार॥ Types of Prayashchitta== |
| − | | + | धर्मशास्त्र में विहित पापों के वर्गीकरण पापकर्मों की अधिकता अल्पता अथवा कितना अधिक व कम हानिप्रद है, इसके आधार पर किया गया है। मनु ने पापों का वर्गीकरण इस प्रकार किया है - |
| − | *अतिपातक | + | *'''महापातक -''' ब्रह्महत्या, सुरापान, स्तेय (चोरी), गुरु पत्नी गमन और महापापियों का संसर्ग (इन चार प्रकार के पापकर्मों में लिप्त व्यक्ति के साथ संबंध रखने वाला)। |
| − | *महापातक | + | *'''उपपातक -''' गोवध, अयाज्य याजन, परस्त्रीगमन, आत्मविक्रय, गुरु,माता और पिता सेवा शुश्रूषा त्याग आदि इन सब पाप कर्मों को मनु ने उपपातक के रूप में माना है। <ref>मनु स्मृति, अध्याय ११, श्लोक ५९-६६।</ref> |
| − | *अनुपातक | + | *'''जातिभ्रंशकर -''' ज्ञानी को पीडित करना, नहीं सूँघने योग्य वस्तु को सूँघना, मद्य को सूंघना, कुटिलता और अप्राकृतिक मैथुन करना, ये प्रत्येक कर्म जातिभ्रष्ट करने वाले होते हैं।<ref>मनु स्मृति, अध्याय ११, श्लोक ६७।</ref> |
| − | * उपपातक | + | *'''संकरीकरण -''' मनु के अनुसार जो कर्म वर्ण संकर उत्पन्न करते है, वे कर्म इस प्रकार हैं - गधा,कुत्ता, मृग, हाथी, बकरी, भेड, मछली, सांप और भैंसा इनमें से प्रत्येक को मारना भी मनुष्य को संकरीकरण कारक पाप कहलाता है।<ref>मनु स्मृति, अध्याय ११, श्लोक ६८।</ref> |
| − | *जातिभ्रंशकर | + | *'''अपात्रीकरण -''' मनु के अनुसार जिस व्यक्ति से दान नहीं लेना चाहिए उससे दान लेना, उससे व्यापार करना, अयोग्य की सेवा करना और असत्य बोलना, ये सभी कर्म मनुष्य को अपात्र बनाते हैं।<ref>मनु स्मृति, अध्याय ११, श्लोक ६९।</ref> |
| | + | *'''मलिनीकरण -''' मनु के अनुसार मलिनीकरण कारक कर्म इस प्रकार हैं। जैसे कि कृमि, कीट तथा पक्षियों का वध करना, मद्य (शराब) के साथ लाये पदार्थों का भोजन, फल, फूल और लकड़ी को चुराना, ये सभी कर्म मनुष्य को मलिन करने वाले माने गए हैं।<ref>मनु स्मृति, अध्याय ११, श्लोक ७०।</ref> |
| | {| class="wikitable" | | {| class="wikitable" |
| | !श्रेणी<ref name=":2">डॉ० हिमा गुप्ता, [https://www.exoticindiaart.com/book/details/atonement-law-in-ancient-india-uaf610/ प्राचीन भारत में प्रायश्चित्त विधान], ईस्टर्न बुक लिंकर्स, दिल्ली (पृ० ४९)।</ref> | | !श्रेणी<ref name=":2">डॉ० हिमा गुप्ता, [https://www.exoticindiaart.com/book/details/atonement-law-in-ancient-india-uaf610/ प्राचीन भारत में प्रायश्चित्त विधान], ईस्टर्न बुक लिंकर्स, दिल्ली (पृ० ४९)।</ref> |
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| | |सामान्य प्रायश्चित्त | | |सामान्य प्रायश्चित्त |
| − | |प्राणी वध - क्षत्र वध, शूद्र वध, अवकृष्ट वध, स्त्री वध, गर्भ वध, गोवध, वृक्षादि छेदन | + | | प्राणी वध - क्षत्र वध, शूद्र वध, अवकृष्ट वध, स्त्री वध, गर्भ वध, गोवध, वृक्षादि छेदन |
| | |- | | |- |
| | |निषिद्ध भक्षण प्रायश्चित्त | | |निषिद्ध भक्षण प्रायश्चित्त |
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| | |प्रमुख धर्मसूत्र | | |प्रमुख धर्मसूत्र |
| − | | गौतमधर्मसूत्र | + | |गौतमधर्मसूत्र |
| | |२८ अध्यायों में से १० अध्याय प्रायश्चित्त पर | | |२८ अध्यायों में से १० अध्याय प्रायश्चित्त पर |
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| − | | याज्ञवल्क्य स्मृति | + | |याज्ञवल्क्य स्मृति |
| | |अध्याय ३ के १००९ श्लोकों में से १२२ श्लोक (३।२०५-३२७) | | |अध्याय ३ के १००९ श्लोकों में से १२२ श्लोक (३।२०५-३२७) |
| | |- | | |- |
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| − | | अंगिरा स्मृति | + | |अंगिरा स्मृति |
| | |१६८ श्लोक केवल प्रायश्चित्त सम्बन्धी | | |१६८ श्लोक केवल प्रायश्चित्त सम्बन्धी |
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| | |२७४ श्लोक प्रायश्चित्त सम्बन्धी | | |२७४ श्लोक प्रायश्चित्त सम्बन्धी |
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| − | | पुराण | + | |पुराण |
| | |अग्नि पुराण | | |अग्नि पुराण |
| | |अध्याय १६८-१७४ | | |अध्याय १६८-१७४ |
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| − | | प्रायश्चित्तमयूख (नीलकंठ), प्रायश्चित्तप्रकाश, प्रायश्चित्तेन्दुशेखर (नागोजिभट्ट लिखित) | + | |प्रायश्चित्तमयूख (नीलकंठ), प्रायश्चित्तप्रकाश, प्रायश्चित्तेन्दुशेखर (नागोजिभट्ट लिखित) |
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| | *वसिष्ठ धर्मसूत्र के मुद्रित ३० अध्यायों में से ९ अध्याय (२०-२८ तक) प्रायश्चित्त सम्बन्धी हैं। | | *वसिष्ठ धर्मसूत्र के मुद्रित ३० अध्यायों में से ९ अध्याय (२०-२८ तक) प्रायश्चित्त सम्बन्धी हैं। |
| | *मनु के ग्यारहवें अध्याय के ४४ से लेकर २६५ (कुल २२२) श्लोक प्रायश्चित्तों के विषय में ही हैं। | | *मनु के ग्यारहवें अध्याय के ४४ से लेकर २६५ (कुल २२२) श्लोक प्रायश्चित्तों के विषय में ही हैं। |
| − | * याज्ञवल्क्य स्मृति के अध्याय ३ के १००९ श्लोकों में १२२ श्लोक (३।२०५-३२७) इसी विषय के हैं। | + | *याज्ञवल्क्य स्मृति के अध्याय ३ के १००९ श्लोकों में १२२ श्लोक (३।२०५-३२७) इसी विषय के हैं। |
| − | * अंगिरा स्मृति के १६८ श्लोक, अत्रि के १ से ८ तक के अध्याय, देवल के ९० श्लोक, बृहद् यम के १८२ श्लोक, शातातपस्मृति के २७४ श्लोक केवल प्रायश्चित्त-सम्बन्धी हैं। | + | *अंगिरा स्मृति के १६८ श्लोक, अत्रि के १ से ८ तक के अध्याय, देवल के ९० श्लोक, बृहद् यम के १८२ श्लोक, शातातपस्मृति के २७४ श्लोक केवल प्रायश्चित्त-सम्बन्धी हैं। |
| | *बहुत-सी स्मृतियाँ एवं कतिपय पुराण, जैस- अग्नि (अध्याय १६८-१७४), गरुड (५२), कूर्म (उत्तरार्ध ३०-३४), वराह (१३१-१३६), ब्रह्माण्ड (उपसंहार पाद, अध्याय ९), विष्णुधर्मोत्तर (२/७३, ३-२३४-२३७) बहुत से श्लोकों में प्रायश्चितों का वर्णन करते हैं। | | *बहुत-सी स्मृतियाँ एवं कतिपय पुराण, जैस- अग्नि (अध्याय १६८-१७४), गरुड (५२), कूर्म (उत्तरार्ध ३०-३४), वराह (१३१-१३६), ब्रह्माण्ड (उपसंहार पाद, अध्याय ९), विष्णुधर्मोत्तर (२/७३, ३-२३४-२३७) बहुत से श्लोकों में प्रायश्चितों का वर्णन करते हैं। |
| | *टीकामों में मिताक्षरा, अपरार्क, पराशरमाधवीय आदि एवं निबन्धों में मदनपारिजात (पृ० ६९१-९९४) आदि ने विस्तार के साथ प्रायश्चित्तों का उल्लेख किया है। | | *टीकामों में मिताक्षरा, अपरार्क, पराशरमाधवीय आदि एवं निबन्धों में मदनपारिजात (पृ० ६९१-९९४) आदि ने विस्तार के साथ प्रायश्चित्तों का उल्लेख किया है। |