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हिंदुत्ववादी लोगोंं की घोर विरोधक सुश्री ईरावती कर्वे ने भी अपनी ‘धर्म’ नामक पुस्तक में पृष्ठ क्र. ३१ पर यह मान्य किया है। एकात्मता की भावना और उस के आधारपर उसे बुद्धि का उपयोग करने के स्वातंत्र्य का आदर धार्मिक (भारतीय) समाज ने मान्य किया है।
 
हिंदुत्ववादी लोगोंं की घोर विरोधक सुश्री ईरावती कर्वे ने भी अपनी ‘धर्म’ नामक पुस्तक में पृष्ठ क्र. ३१ पर यह मान्य किया है। एकात्मता की भावना और उस के आधारपर उसे बुद्धि का उपयोग करने के स्वातंत्र्य का आदर धार्मिक (भारतीय) समाज ने मान्य किया है।
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स्वामी विवेकानंदजी के शिकागो सर्वधर्मपरिषद में हुए संक्षिप्त और फिर भी विश्वविजयी भाषण में यही कहा गया है। उन्हों ने बचपन से जो श्लोक वह कहते आये थे वही उध्दृत किया था। वह था<ref>शिवमहिम्न: स्तोत्र</ref>: <blockquote>रुचीनां वैचित्र्याद् ऋजुकुटिलनाबापथजुषां। </blockquote><blockquote>नृणामेको गम्य: त्वमसि पयसामर्णव इव।।</blockquote>भावार्थ : समाज में प्रत्येक व्यक्ति को परमात्मा ने बुद्धि का वरदान दिया हुआ है। प्रत्येक की बुद्धि भिन्न होती ही है। किसी की बुद्धि में ॠजुता होगी किसी की बुद्धि में कुटिलता होगी। ऐसी विविधता से सत्य की ओर देखने से हर व्यक्ति की सत्य की समझ अलग अलग होगी। हर व्यक्ति का सत्य की ओर आगे बढने का मार्ग भी भिन्न होगा। कोई सीधे मार्ग से तो कोई टेढेमेढे मार्ग से लेकिन सत्य की ओर ही बढ रहा है।  
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स्वामी विवेकानंदजी के शिकागो सर्वधर्मपरिषद में हुए संक्षिप्त और तथापि विश्वविजयी भाषण में यही कहा गया है। उन्हों ने बचपन से जो श्लोक वह कहते आये थे वही उध्दृत किया था। वह था<ref>शिवमहिम्न: स्तोत्र</ref>: <blockquote>रुचीनां वैचित्र्याद् ऋजुकुटिलनाबापथजुषां। </blockquote><blockquote>नृणामेको गम्य: त्वमसि पयसामर्णव इव।।</blockquote>भावार्थ : समाज में प्रत्येक व्यक्ति को परमात्मा ने बुद्धि का वरदान दिया हुआ है। प्रत्येक की बुद्धि भिन्न होती ही है। किसी की बुद्धि में ॠजुता होगी किसी की बुद्धि में कुटिलता होगी। ऐसी विविधता से सत्य की ओर देखने से हर व्यक्ति की सत्य की समझ अलग अलग होगी। हर व्यक्ति का सत्य की ओर आगे बढने का मार्ग भी भिन्न होगा। कोई सीधे मार्ग से तो कोई टेढेमेढे मार्ग से लेकिन सत्य की ओर ही बढ रहा है।  
 
ऐसी हमारी केवल मान्यता नही है वरन् ऐसी हमारी श्रद्धा है {{Citation needed}}। <blockquote>आकाशात् पतितंतोयं यथा गच्छति सागरं।</blockquote><blockquote>सर्वदेव नमस्कारं केशवं प्रतिगच्छति।</blockquote>जिस प्रकार बारिश का पानी धरतीपर गिरता है। लेकिन भिन्न भिन्न मार्गों से वह समुद्र की ओर ही जाता है उसी प्रकार से शुद्ध भावना से आप किसी भी दैवी शक्ति को नमस्कार करें वह परमात्मा को प्राप्त होगा।
 
ऐसी हमारी केवल मान्यता नही है वरन् ऐसी हमारी श्रद्धा है {{Citation needed}}। <blockquote>आकाशात् पतितंतोयं यथा गच्छति सागरं।</blockquote><blockquote>सर्वदेव नमस्कारं केशवं प्रतिगच्छति।</blockquote>जिस प्रकार बारिश का पानी धरतीपर गिरता है। लेकिन भिन्न भिन्न मार्गों से वह समुद्र की ओर ही जाता है उसी प्रकार से शुद्ध भावना से आप किसी भी दैवी शक्ति को नमस्कार करें वह परमात्मा को प्राप्त होगा।
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वास्तव में देखें तो कर्मसिध्दांत, पाश्चात्य ‘कॉज ऍंड इफेक्ट’ संकल्पना से अत्यंत श्रेष्ठ सिद्धांत है। धार्मिक (भारतीय) विचार में इस ‘कॉज ऍंड इफेक्ट’ संकल्पना को कार्य-कारण सिद्धांत कहा गया है। जगत में कोई भी काम अपने आप नही होता। यदि कोई काम होता है तो उस का कारण होता ही है। इसी प्रकार यदि कारण होगा तो कार्य भी निश्चित रूप से होगा ही। यह है कार्य-कारण सिद्धांत। कार्य कारण संकल्पना में पुनर्जन्म और आत्मतत्व के अविनाशित्व का विचार जुडने से वह मात्र ‘कॉज एण्ड इफेक्ट’ या कार्य-कारण सिद्धांत नहीं रहता। वह अंत तक सिध्द हो सकता है ऐसा, सिद्धांत बन जाता है। अब कर्मसिध्दांत के महत्वपूर्ण सूत्रों को हम समझेंगे:  
 
वास्तव में देखें तो कर्मसिध्दांत, पाश्चात्य ‘कॉज ऍंड इफेक्ट’ संकल्पना से अत्यंत श्रेष्ठ सिद्धांत है। धार्मिक (भारतीय) विचार में इस ‘कॉज ऍंड इफेक्ट’ संकल्पना को कार्य-कारण सिद्धांत कहा गया है। जगत में कोई भी काम अपने आप नही होता। यदि कोई काम होता है तो उस का कारण होता ही है। इसी प्रकार यदि कारण होगा तो कार्य भी निश्चित रूप से होगा ही। यह है कार्य-कारण सिद्धांत। कार्य कारण संकल्पना में पुनर्जन्म और आत्मतत्व के अविनाशित्व का विचार जुडने से वह मात्र ‘कॉज एण्ड इफेक्ट’ या कार्य-कारण सिद्धांत नहीं रहता। वह अंत तक सिध्द हो सकता है ऐसा, सिद्धांत बन जाता है। अब कर्मसिध्दांत के महत्वपूर्ण सूत्रों को हम समझेंगे:  
 
# किये हुए अच्छे कर्म का ( कर्म के प्रमाण में ) अच्छा या बुरे कर्म का  ( कर्म के प्रमाण में ) बुरा फल भोगना ही पडता है। अच्छा और बुरा काम या सत्कर्म और दुष्कर्म का विवेचन हमने पूर्व में देखा है। मान लीजिये आपने किसी व्यक्ति को सहायता करने के लिये रू. ५०००/- दिये। यह आप के हाथ से पुण्य का या अच्छा काम हो गया। इस काम के फलस्वरूप आप को रू ५०००/- कभी ना कभी, आपको आवश्यकता होगी तब अवश्य मिलेंगे। इसी तरह आपने किसी के मन को दुखाया। तो जितना क्लेष उस व्यक्ति को आप की करनी से हुआ है, उतना क्लेष कभी ना कभी आप को भी भोगना पड़ेगा। मान लो आप ने मन में किसी एक या अनेक मनुष्यों के लिये कुछ बुरा सोचा है। तो इस के प्रतिकार में आप के बारे में बुरा सोचनेवाले भी एक या अनेक लोग बन जाएंगे। जैसे वैज्ञानिक सिद्धांत कहता है की हर क्रिया की उस क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया होती ही है। उसी प्रकार से कर्मसिध्दांत में भी फल की मात्रा भी कर्म के प्रमाण में ही रहती है। थोडी कम नहीं या थोडी अधिक नहीं।  
 
# किये हुए अच्छे कर्म का ( कर्म के प्रमाण में ) अच्छा या बुरे कर्म का  ( कर्म के प्रमाण में ) बुरा फल भोगना ही पडता है। अच्छा और बुरा काम या सत्कर्म और दुष्कर्म का विवेचन हमने पूर्व में देखा है। मान लीजिये आपने किसी व्यक्ति को सहायता करने के लिये रू. ५०००/- दिये। यह आप के हाथ से पुण्य का या अच्छा काम हो गया। इस काम के फलस्वरूप आप को रू ५०००/- कभी ना कभी, आपको आवश्यकता होगी तब अवश्य मिलेंगे। इसी तरह आपने किसी के मन को दुखाया। तो जितना क्लेष उस व्यक्ति को आप की करनी से हुआ है, उतना क्लेष कभी ना कभी आप को भी भोगना पड़ेगा। मान लो आप ने मन में किसी एक या अनेक मनुष्यों के लिये कुछ बुरा सोचा है। तो इस के प्रतिकार में आप के बारे में बुरा सोचनेवाले भी एक या अनेक लोग बन जाएंगे। जैसे वैज्ञानिक सिद्धांत कहता है की हर क्रिया की उस क्रिया के बराबर प्रतिक्रिया होती ही है। उसी प्रकार से कर्मसिध्दांत में भी फल की मात्रा भी कर्म के प्रमाण में ही रहती है। थोडी कम नहीं या थोडी अधिक नहीं।  
# किये हुए कर्म का फल मुझे कब मिले यह मै सदा तय नहीं कर सकता।  अर्थात् कभी कभी फल क्या मिलेगा हम तय कर सकते है। जैसे हम बाजार जाते है। यह विचार कर के जाते है कि पालक की सब्जी लाएंगे। और पैसे  देकर बाजार से पालक ले आते है। इस में पैसे, हमारा संचित कर्म है। और पालक की सब्जी उस का फल या परिणाम है। किन्तु कभी ऐसा हो जाता है की हम सोचकर निकलते है कि पालक की सब्जी लाएंगे लेकिन पालक की सब्जी हमारे बाजार जाने से पूर्व ही समाप्त हो गई है। यह बात हमारे हाथ में नहीं है। किन्तु हमारे हाथ में जो पैसे हैं  उन से अन्य कोई सब्जी हम अवश्य ला सकते हैं।विज्ञान से संबंधित एक उदाहरण अब हम देखेंगे। बोह्म का सिद्धांत कहता है की पूरी सृष्टि के कण-कण एक दूसरे से अत्यंत निकटता से जुड़े हुए है। अर्थात् धूलि का एक कण हिलाने से पूरी सृष्टि हिलती है। यह तो हुआ वैज्ञानिक  सिद्धांत। अब कल्पना कीजिये आपने भारत में हॉकी का बल्ला चलाया। पूरी सृष्टि जुडी होने से स्पेन में हॉकी की गेंद हिली। अत्यंत संवेदनाक्षम यंत्र से आपने गेंद को हिलते देखा। आप त्रिकालज्ञानी तो है नहीं। इसलिये आप इस गेंद के हिलने को भारत में हिलाए गये बल्ले से तो जोड नहीं सकते। तो आप कहेंगे की जब गेंद हिली है तो कुछ कारण अवश्य हुआ है। उस गेंद के हिलने का और बल्ले के हिलाए जाने का संबंध जोडना संभव नहीं है। फिर भी प्रत्यक्ष में तो यही हुआ है। इसे समझना महत्वपूर्ण है। यहाँ कर्म की धार्मिक (भारतीय) संकल्पना को भी समझ लेना उपयुक्त होगा। कर्म सामान्यत: तीन प्रकार के होते है:  
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# किये हुए कर्म का फल मुझे कब मिले यह मै सदा तय नहीं कर सकता।  अर्थात् कभी कभी फल क्या मिलेगा हम तय कर सकते है। जैसे हम बाजार जाते है। यह विचार कर के जाते है कि पालक की सब्जी लाएंगे। और पैसे  देकर बाजार से पालक ले आते है। इस में पैसे, हमारा संचित कर्म है। और पालक की सब्जी उस का फल या परिणाम है। किन्तु कभी ऐसा हो जाता है की हम सोचकर निकलते है कि पालक की सब्जी लाएंगे लेकिन पालक की सब्जी हमारे बाजार जाने से पूर्व ही समाप्त हो गई है। यह बात हमारे हाथ में नहीं है। किन्तु हमारे हाथ में जो पैसे हैं  उन से अन्य कोई सब्जी हम अवश्य ला सकते हैं।विज्ञान से संबंधित एक उदाहरण अब हम देखेंगे। बोह्म का सिद्धांत कहता है की पूरी सृष्टि के कण-कण एक दूसरे से अत्यंत निकटता से जुड़े हुए है। अर्थात् धूलि का एक कण हिलाने से पूरी सृष्टि हिलती है। यह तो हुआ वैज्ञानिक  सिद्धांत। अब कल्पना कीजिये आपने भारत में हॉकी का बल्ला चलाया। पूरी सृष्टि जुडी होने से स्पेन में हॉकी की गेंद हिली। अत्यंत संवेदनाक्षम यंत्र से आपने गेंद को हिलते देखा। आप त्रिकालज्ञानी तो है नहीं। इसलिये आप इस गेंद के हिलने को भारत में हिलाए गये बल्ले से तो जोड नहीं सकते। तो आप कहेंगे की जब गेंद हिली है तो कुछ कारण अवश्य हुआ है। उस गेंद के हिलने का और बल्ले के हिलाए जाने का संबंध जोडना संभव नहीं है। तथापि प्रत्यक्ष में तो यही हुआ है। इसे समझना महत्वपूर्ण है। यहाँ कर्म की धार्मिक (भारतीय) संकल्पना को भी समझ लेना उपयुक्त होगा। कर्म सामान्यत: तीन प्रकार के होते है:  
 
## एक है संचित कर्म। हमारे अच्छे और बुरे कर्मों का फल हमारे भविष्य के खाते में जमा होता जाता है। यह खाता जन्म-जन्मांतर चलता रहता है।  
 
## एक है संचित कर्म। हमारे अच्छे और बुरे कर्मों का फल हमारे भविष्य के खाते में जमा होता जाता है। यह खाता जन्म-जन्मांतर चलता रहता है।  
 
## दूसरा है प्रारब्ध कर्म। हमारे पिछले जन्म में मृत्यू के समय हमारे जो कर्म के फल इस जन्म में भोगने के लिये पक गए हैं उन कर्मों को प्रारब्ध कर्म कहते है।  
 
## दूसरा है प्रारब्ध कर्म। हमारे पिछले जन्म में मृत्यू के समय हमारे जो कर्म के फल इस जन्म में भोगने के लिये पक गए हैं उन कर्मों को प्रारब्ध कर्म कहते है।  
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दो सगे भाई थे। पिता ने मरने से पूर्व बँटवारा कर दिया था। घर के दो समान हिस्से कर दिये थे। एक में छोटा भाई और दूसरे में बडा भाई रहता था। ऑंगन में भी लकीर खींच दी थी। किन्तु खेती की जमीन छोटी होने से जमीन का बँटवारा नही किया गया था। दीपावली से पूर्व फसल आई। खेत के मजदूरों का, गाँव का ऐसे सब हिस्से निकालने के बाद जो बचा उस के दो हिस्से किये। प्रत्येक भई के हिस्से में १०० बोरी धान आया। दोनों ने धान लाकर अपने ऑंगन में जमाकर रख दिया। रात्रि में बडे भाई की नींद खुली। वह सोचने लगा मेरे घर में तो अब मेरा बेटा भी महनत के लिये उपलब्ध है। मेरा आधा संसार हो चुका है। मेरे भाई का तो अभी विवाह भी नहीं हुआ। विवाह में बहुत सारा खर्चा होगा। फिर बच्चे भी होंगे। छोटे भाई का परिवार बढनेवाला है। खर्चे बढनेवाले हैं। ऐसी स्थिति में यह ठीक नहीं है की मै पूरी फसल का आधा हिस्सा ले लूं। वह रात ही में उठा। अपने हिस्से में से धान की दस बोरियाँ उठाकर उसने ऑंगन के दूसरे हिस्से में अपने छोटे भाई की धान की बोरियों के साथ, भाई को ध्यान में ना आए इस पध्दति से जमाकर रख दी।   
 
दो सगे भाई थे। पिता ने मरने से पूर्व बँटवारा कर दिया था। घर के दो समान हिस्से कर दिये थे। एक में छोटा भाई और दूसरे में बडा भाई रहता था। ऑंगन में भी लकीर खींच दी थी। किन्तु खेती की जमीन छोटी होने से जमीन का बँटवारा नही किया गया था। दीपावली से पूर्व फसल आई। खेत के मजदूरों का, गाँव का ऐसे सब हिस्से निकालने के बाद जो बचा उस के दो हिस्से किये। प्रत्येक भई के हिस्से में १०० बोरी धान आया। दोनों ने धान लाकर अपने ऑंगन में जमाकर रख दिया। रात्रि में बडे भाई की नींद खुली। वह सोचने लगा मेरे घर में तो अब मेरा बेटा भी महनत के लिये उपलब्ध है। मेरा आधा संसार हो चुका है। मेरे भाई का तो अभी विवाह भी नहीं हुआ। विवाह में बहुत सारा खर्चा होगा। फिर बच्चे भी होंगे। छोटे भाई का परिवार बढनेवाला है। खर्चे बढनेवाले हैं। ऐसी स्थिति में यह ठीक नहीं है की मै पूरी फसल का आधा हिस्सा ले लूं। वह रात ही में उठा। अपने हिस्से में से धान की दस बोरियाँ उठाकर उसने ऑंगन के दूसरे हिस्से में अपने छोटे भाई की धान की बोरियों के साथ, भाई को ध्यान में ना आए इस पध्दति से जमाकर रख दी।   
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योगायोग से उसी रात थोडी देर बाद छोटे भाई की भी नींद खुली। उस ने सोचा। मै कितना स्वार्थी हूं। मै अकेला और बडे भैया के घर में चार लोग खानेवाले। फिर भी मैने धान का आधा हिस्सा ले लिया। यह ठीक नहीं है। वह रात में उठा। अपने हिस्से में से दस बोरियाँ धान उठाकर, ऑंगन के दूसरे हिस्से में बडे भाई के हिस्से के साथ, ध्यान में ना आए इस ढंग से जमाकर रखीं और सो गया। दूसरे दिन दोनों भाई उठे। दातौन करते ऑंगन में आए। धान की बोरियाँ देखने लगे। दोनों ही हिस्से समान देखकर दोनों चौंक उठे। दोनों के ध्यान में आया की जैसे मैंने अपने हिस्से की दस बोरियाँ दूसरे के हिस्से में रखीं थीं वैसे ही दूसरे भाई ने भी किया है। दोनों एक दूसरे की ओर देखने लगे। प्यार उमड आया। दोनों गले मिले। ऑंगन की रेखा मिटा दी गई। दोनों एक हो गए। अपने भाई के प्रति के कर्तव्यबोध के कारण ही यह हुआ था।  
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योगायोग से उसी रात थोडी देर बाद छोटे भाई की भी नींद खुली। उस ने सोचा। मै कितना स्वार्थी हूं। मै अकेला और बडे भैया के घर में चार लोग खानेवाले। तथापि मैने धान का आधा हिस्सा ले लिया। यह ठीक नहीं है। वह रात में उठा। अपने हिस्से में से दस बोरियाँ धान उठाकर, ऑंगन के दूसरे हिस्से में बडे भाई के हिस्से के साथ, ध्यान में ना आए इस ढंग से जमाकर रखीं और सो गया। दूसरे दिन दोनों भाई उठे। दातौन करते ऑंगन में आए। धान की बोरियाँ देखने लगे। दोनों ही हिस्से समान देखकर दोनों चौंक उठे। दोनों के ध्यान में आया की जैसे मैंने अपने हिस्से की दस बोरियाँ दूसरे के हिस्से में रखीं थीं वैसे ही दूसरे भाई ने भी किया है। दोनों एक दूसरे की ओर देखने लगे। प्यार उमड आया। दोनों गले मिले। ऑंगन की रेखा मिटा दी गई। दोनों एक हो गए। अपने भाई के प्रति के कर्तव्यबोध के कारण ही यह हुआ था।  
    
अब इसी कहानी में ‘मेरे अधिकार’ का पहलू आने से क्या होगा इस की थोडी कल्पना करें। बडा भाई न्यायालय की सीढीयाँ चढता है। परिवार के घटक अधिक होने से, कानून के अनुसार घर के बडे हिस्से पर अधिकार मांगता है। खेती में भी बडा हिस्सा माँगता है। छोटा भाई नहीं देता। दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति घृणा का, शत्रुता का भाव निर्माण होता है। दोनों अच्छे से अच्छे वकील की सेवा लेते है। मुकदमा चलता है। दोनों धीरे धीरे कंगाल हो जाते है। घर, खेत गिरवी रखते है। दोनों का सर्वनाश होता है।  
 
अब इसी कहानी में ‘मेरे अधिकार’ का पहलू आने से क्या होगा इस की थोडी कल्पना करें। बडा भाई न्यायालय की सीढीयाँ चढता है। परिवार के घटक अधिक होने से, कानून के अनुसार घर के बडे हिस्से पर अधिकार मांगता है। खेती में भी बडा हिस्सा माँगता है। छोटा भाई नहीं देता। दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति घृणा का, शत्रुता का भाव निर्माण होता है। दोनों अच्छे से अच्छे वकील की सेवा लेते है। मुकदमा चलता है। दोनों धीरे धीरे कंगाल हो जाते है। घर, खेत गिरवी रखते है। दोनों का सर्वनाश होता है।  
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=== १५ कृण्वंतो विश्वमार्यंम् ===
 
=== १५ कृण्वंतो विश्वमार्यंम् ===
कृण्वंतो विश्वमार्यंम् का अर्थ है हम समूचे विश्व को आर्य बनाएंगे। हमें पढाए जा रहे विकृत इतिहास के अनुसार आर्य यह जाति है। ऐसा सिखाना ना केवल गलत है अपितु देश के अहित का भी है। वास्तव में आर्य का अर्थ है श्रेष्ठ। प्राचीन और मध्यकालीन पूरे धार्मिक (भारतीय) साहित्य में आर्य शब्द का प्रयोग ' विचार और व्यवहार से श्रेष्ठ ' इसी अर्थ से किया गया मिलेगा। किन्तु भारत में भिन्न भिन्न कारणों से फूट डालने के अंग्रेजी षडयंत्र के अनुसार आर्य को जाति बनाकर प्रस्तुत किया गया। इसे हिन्दुस्तान पर आक्रमण करनेवाली जाति बताया गया। आर्य अनार्य, आर्य-द्रविड ऐसा हिन्दू समाज को तोडने का काफी सफल प्रयास अंग्रेजों ने किया। इसी कारण आज भी, जब यह निर्विवाद रूप से सिध्द हो गया है की आर्य ऐसी कोई जाति नहीं थी, फिर भी यही पढ़ाया जा रहा है।  
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कृण्वंतो विश्वमार्यंम् का अर्थ है हम समूचे विश्व को आर्य बनाएंगे। हमें पढाए जा रहे विकृत इतिहास के अनुसार आर्य यह जाति है। ऐसा सिखाना ना केवल गलत है अपितु देश के अहित का भी है। वास्तव में आर्य का अर्थ है श्रेष्ठ। प्राचीन और मध्यकालीन पूरे धार्मिक (भारतीय) साहित्य में आर्य शब्द का प्रयोग ' विचार और व्यवहार से श्रेष्ठ ' इसी अर्थ से किया गया मिलेगा। किन्तु भारत में भिन्न भिन्न कारणों से फूट डालने के अंग्रेजी षडयंत्र के अनुसार आर्य को जाति बनाकर प्रस्तुत किया गया। इसे हिन्दुस्तान पर आक्रमण करनेवाली जाति बताया गया। आर्य अनार्य, आर्य-द्रविड ऐसा हिन्दू समाज को तोडने का काफी सफल प्रयास अंग्रेजों ने किया। इसी कारण आज भी, जब यह निर्विवाद रूप से सिध्द हो गया है की आर्य ऐसी कोई जाति नहीं थी, तथापि यही पढ़ाया जा रहा है।  
    
यहाँ एक बात की ओर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। आर्य जाति के लोग उत्तर ध्रुव से आये। ये लोग लंबे तगडे, मजबूत और गेहुं रंग के थे। उन्होंने यहाँ के निवासी द्रविडों को दक्षिण में खदेड दिया। ऐसा लिखा इतिहास आज भी अधिकृत माना जाता है। इस प्रमाणहीन सफेद झूठ को सत्य मान लिया गया है। तर्क के लिये मान लीजिये कि आर्य यह जाति थी। तो कृण्वंतो विश्वमार्यम् का अर्थ होगा ठिगने लोगोंं को उंचा बनाना, काले या पीले रंग के लोगोंं को गेहुं रंग के बनाना। इतनी मूर्खतापूर्ण बात और कोई नहीं हो सकती। किन्तु अंग्रेजों की मानसिक गुलामी करनेवाले लोगोंं को आर्य-अनार्य, आर्य-द्रविड, आदिवासी-अन्य ऐसे शब्दों को रूढ कर धार्मिक (भारतीय) समाज में फूट डालने की अंग्रेजों की चाल अब भी समझ में नहीं आ रही। चमडी का रंग, उंचाई यह बातें आनुवंशिक और भाप्रगोलिक कारणों से होतीं है। यह सामान्य ज्ञान की बात है। किन्तु इसे प्रमाणों के आधार पर भी गलत सिध्द करने के उपरांत भी 'साहेब वाक्यं प्रमाणम्' माननेवाले तथाकथित इतिहास विशेषज्ञों की फौज विरोध में खडी हो जाती है।   
 
यहाँ एक बात की ओर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। आर्य जाति के लोग उत्तर ध्रुव से आये। ये लोग लंबे तगडे, मजबूत और गेहुं रंग के थे। उन्होंने यहाँ के निवासी द्रविडों को दक्षिण में खदेड दिया। ऐसा लिखा इतिहास आज भी अधिकृत माना जाता है। इस प्रमाणहीन सफेद झूठ को सत्य मान लिया गया है। तर्क के लिये मान लीजिये कि आर्य यह जाति थी। तो कृण्वंतो विश्वमार्यम् का अर्थ होगा ठिगने लोगोंं को उंचा बनाना, काले या पीले रंग के लोगोंं को गेहुं रंग के बनाना। इतनी मूर्खतापूर्ण बात और कोई नहीं हो सकती। किन्तु अंग्रेजों की मानसिक गुलामी करनेवाले लोगोंं को आर्य-अनार्य, आर्य-द्रविड, आदिवासी-अन्य ऐसे शब्दों को रूढ कर धार्मिक (भारतीय) समाज में फूट डालने की अंग्रेजों की चाल अब भी समझ में नहीं आ रही। चमडी का रंग, उंचाई यह बातें आनुवंशिक और भाप्रगोलिक कारणों से होतीं है। यह सामान्य ज्ञान की बात है। किन्तु इसे प्रमाणों के आधार पर भी गलत सिध्द करने के उपरांत भी 'साहेब वाक्यं प्रमाणम्' माननेवाले तथाकथित इतिहास विशेषज्ञों की फौज विरोध में खडी हो जाती है।   
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सरस्वती शोध संस्थान ने आर्यों का मूल भारत ही है यह सप्रमाण सिध्द कर दिया है। फिर भी हमने इतिहास में 'आर्यों का आक्रमण ' सिखाना नहीं छोडा है। मेकॉले शिक्षा का परिणाम कितना गहरा है यही इस से स्थापित होता है।   
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सरस्वती शोध संस्थान ने आर्यों का मूल भारत ही है यह सप्रमाण सिध्द कर दिया है। तथापि हमने इतिहास में 'आर्यों का आक्रमण ' सिखाना नहीं छोडा है। मेकॉले शिक्षा का परिणाम कितना गहरा है यही इस से स्थापित होता है।   
    
केवल तत्वज्ञान श्रेष्ठ होना या सर्वहितकारी होना पर्याप्त नहीं होता। उस तत्वज्ञान के पीछे व्यवहार के आधार पर जब तक शक्ति खडी नहीं की जाती विश्व उस तत्वज्ञान को स्वीकार नहीं करती। सत्यमेव जयते यह अर्धसत्य है। सत्य के पक्ष में जब शक्ति होती है तब ही सत्य की विजय होती है। इतिहास के अनुसार यही पूर्ण सत्य है। अर्थात् केवल कृण्वंतो विश्वमार्यम् कहना पर्याप्त नहीं है। सर्वप्रथम हमें ही विचार और व्यवहार से आर्य बनना होगा। ऐसे सज्जन आर्यों को संगठित करना होगा। दुर्जनों के मन में डर पैदा करनेवाली और सज्जनों को आश्वस्त करनेवाली शक्ति के रूप में खडा होना होगा। तब ही विश्व भी आर्य बनने का प्रयास करेगी।     
 
केवल तत्वज्ञान श्रेष्ठ होना या सर्वहितकारी होना पर्याप्त नहीं होता। उस तत्वज्ञान के पीछे व्यवहार के आधार पर जब तक शक्ति खडी नहीं की जाती विश्व उस तत्वज्ञान को स्वीकार नहीं करती। सत्यमेव जयते यह अर्धसत्य है। सत्य के पक्ष में जब शक्ति होती है तब ही सत्य की विजय होती है। इतिहास के अनुसार यही पूर्ण सत्य है। अर्थात् केवल कृण्वंतो विश्वमार्यम् कहना पर्याप्त नहीं है। सर्वप्रथम हमें ही विचार और व्यवहार से आर्य बनना होगा। ऐसे सज्जन आर्यों को संगठित करना होगा। दुर्जनों के मन में डर पैदा करनेवाली और सज्जनों को आश्वस्त करनेवाली शक्ति के रूप में खडा होना होगा। तब ही विश्व भी आर्य बनने का प्रयास करेगी।     

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