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== सामाजिक संकटो का स्वरूप मनोवैज्ञानिक ==
== सामाजिक संकटो का स्वरूप मनोवैज्ञानिक ==
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समाज जब संकटों से घिरता है तो वे आर्थिक,
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समाज जब संकटों से घिरता है तो वे आर्थिक, ज्ञानात्मक स्वास्थ्य से सम्बन्धित, राजकीय आदि विभिन्न स्वरूपों के होते हैं परन्तु इन सभी संकटों के प्रति समाज मानस का जो स्वरूप होता है वह मनोवैज्ञानिक होता है । इस कारण से इन संकटों के निराकरण के उपाय यदि केवल ज्ञानात्मक रूप में ही किये जाय तो उसमें सफलता प्राप्त
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ज्ञानात्मक स्वास्थ्य से सम्बन्धित, राजकीय आदि विभिन्न
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नहीं होती । उदाहरण के लिये पश्चिमी शैली को आधुनिक शैली मानना, अंग्रेजी को अनिवार्य मानना, चौड़ी संड़कों और अधिक संख्या में वाहनों को विकास का पर्याय मानना आदि समस्यायें मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक हैं । असंख्य अकाट्य तर्क दिये जाय तो भी इन संकटों के स्रोतों का त्याग करने के लिये जनमानस तैयार नहीं होता है। उदाहरण के लिये घर की रसोई में माइक्रोवेवहोना स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त हानिकारक है ऐसा अनेक प्रमाणों से विज्ञान सिद्ध कर दे तो भी माइक्रोवेव का आकर्षक विज्ञापन जनमानस को शिकंजे में ले लेता है।
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स्वरूपों के होते हैं परन्तु इन सभी संकटों के प्रति समाज
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बाजार जनमानस की इस स्थिति का फायदा उठाता है । यही बात सिन्थेटिक कपड़ों, संगणक, फास्टफूड, बाइक की सवारी, बड़े से बड़े यन्त्रों की सहायता से चलने वाले बड़े कारखानों के बारे में है । मनोवैज्ञानिक समस्याओं का हल मनोवैज्ञानिक पद्धति से ही होता है । मनोवैज्ञानिक हल दो प्रकार से होता है । एक तो होता है मन के स्तर पर उतरकर अनिष्ट तत्त्वों की निंदा करना । उदाहरण के लिये “तुम अंग्रेजी बालते हो दूर हटो तुम्हारे मुँह से दुर्गन्ध आती है; तुमने प्लास्टिक के गिलास में पानी दिया है मैं नहीं पिऊँगा, तुमने अनेक लोगों की रोजी छीननेवाला कारखाना शुरू किया है मैं तुमसे बात नहीं करूँगा' कहना मनोवैज्ञानिक उपाय है । यह निन्दा अथवा आलोचना तो बहुत सौम्य है, इससे तीव्र निन्दा भी हो सकती है । सामाजिक स्तर पर ये उपाय बहुत कारगर भी होते हैं । परन्तु वे प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा साथ ही साथ व्यापक स्तर पर भी होने चाहिये ।
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मानस का जो स्वरूप होता है वह मनोवैज्ञानिक होता है ।
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इसका दूसरा आयाम मन को संस्कारित करने का भी है। इसके लिये समाज में श्रद्धय और श्रद्धावान लोग चाहिये । जो श्रद्धय होते हैं वे ही समाजमन को प्रभावित कर सकते हैं । साथ ही समाजमन यदि श्रद्धावान है तो श्रद्धय व्यक्तियों का मार्गदर्शन फलदायी हो सकता है । वे यदि सही पद्धति से सही रूप में समझायें और लोग अच्छे मन से श्रद्धापूर्वक सुनें तो लोकशिक्षा, सम्यक् स्वरूप में हो सकती है । इसलिये लोकशिक्षा का प्रथम चरण तो श्रद्धावान बनाना ही होता है । उसके बाद ही मुख्य संकटों के सम्बन्ध में लोकशिक्षा हो सकती है ।
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इस कारण से इन संकटों के निराकरण के उपाय यदि केवल
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== समाज प्रबोधन को लेकर कठिनाई ==
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टीवी के सभी चैनलों पर चौबीस घण्टे में पचास बार किसी वस्तु का विज्ञापन आता है, रास्ते पर निकलो तो स्थान स्थान पर उसके बड़े बड़े फलक दिखाई देते हैं, अखबारों में विज्ञापन आते हैं जिसके प्रभाव से लोग बच नहीं सकते । वह वस्तु खरीद करने के लिये वे विवश हो जाते हैं, भले ही विज्ञापनों का खर्च उनसे ही वसूल किया जाता हो । किसी एक वस्तु की प्रशंसा दस लोग कर देते हैं तब भी व्यक्ति का मानस परिवर्तन हो जाता है।
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ज्ञानात्मक रूप में ही किये जाय तो उसमें सफलता प्राप्त
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यह तो बहुत छोटी बात है । विचारधाराओं के क्षेत्र में भी यह आतंक चलता है । मुस्लिम युवकों को जन्नत का लालच देकर आतंकवादी बनाया जाता है । साम्यवादी धर्म को अफीम बताकर अनेक लोगों को निधर्मी बना देते हैं । भोंदू धर्माचार्य लोगों को अन्धश्रद्धा और रूढिवादिता के चक्कर में डालदेते हैं । यही नहीं तो अतिशय अत्याचार और आर्थिक बेहाली से लोगों के मन को मार दिया और गुलाम बना दिया जाता है । ब्रिटिशों द्वारा इस मार के साथ शिक्षा के माध्यम से उल्टे पाठ पढ़ाये गये और पूरे भारतीय समाज को मानसिक गुलामी में डाल दिया गया। आज भी भारतीय मानस इस गुलामी से नहीं उबर रहा है। लोकशिक्षा के ये अत्यन्त नकारात्मक उदाहरण हैं ।जब मन दुर्बल होते हैं तब इन बातों का प्रभाव जल्दी होता है और अधिक होता है । विभिन्न उपायों से प्रथम तो लोकमानस को दुर्बल बना दिया जाता है, अथवा विभिन्न कारणों से लोगों के मन दुर्बल हो जाते हैं, बाद में उसे उल्टी पट्टी पढाना सरल होता है ।
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नहीं होती । उदाहरण के लिये पश्चिमी शैली को आधुनिक
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अतः जो सकारात्मक पद्धति से लोकशिक्षा करना चाहता है उसे इस बात को ध्यान में लेकर प्रथम तो लोकमानस को बलवान और समर्थ बनाना चाहिये । बलवान मन सरलता से श्रद्धावान भी बन सकता है। श्रद्धावान मन को बुद्धिपूर्वक की गई बातें भी जल्दी समझ में आती हैं । यह कार्य धर्माचार्यों का है । घर में संस्कार प्राप्त होते हैं, विद्यालयों में ज्ञान । मातापिता और शिक्षकों को अपनी सन्तानों और अपने विद्यार्थियों को मन की शिक्षा कैसे दी जाती है यह सिखाना चाहिये । घर, विद्यालय और मन्दिर इन तीनों संस्थाओं में समन्वय होना चाहिये । इन सभी संस्थाओं की रक्षा करने का दायित्व राज्य का है ।
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शैली मानना, अंग्रेजी को अनिवार्य मानना, चौड़ी संड़कों
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इस प्रकार किन विषयों को लेकर और किस पद्धति से लोकशिक्षा करना इसका निर्णय करना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है । यदि लोकशिक्षा की सम्यक् व्यवस्था न की जाय तो कुट्म्ब की शिक्षा और विद्यालयीन शिक्षा अपना कार्य परिणामकारी रूप में नहीं कर सकती । इन दोनों से लोकशिक्षा व्यापक भी है और दीर्घ अवधि की भी है।
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और अधिक संख्या में वाहनों को विकास का पर्याय मानना
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आदि समस्यायें मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक हैं । असंख्य
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अकाटूय तर्क दिये जाय तो भी इन संकटों के स्रोतों का
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त्याग करने के लिये जनमानस तैयार
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नहीं होता है । उदाहरण के लिये घर की रसोई में माइक्रोवेव
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होना स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यन्त हानिकारक है ऐसा
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अनेक प्रमाणों से विज्ञान सिद्ध कर दे तो भी माइक्रोवेव का
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आकर्षक विज्ञापन जनमानस को शिकंजे में ले लेता है।
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बाजार जनमानस की इस स्थिति का फायदा उठाता है ।
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यही बात सिन्थेटिक कपड़ों, संगणक, फास्टफूड, बाइक की
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सवारी, बड़े से बड़े यन्त्रों की सहायता से चलने वाले बड़े
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कारखानों के बारे में है । मनोवैज्ञानिक समस्याओं का हल
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मनोवैज्ञानिक पद्धति से ही होता है । मनोवैज्ञानिक हल दो
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प्रकार से होता है । एक तो होता है मन के स्तर पर उतरकर
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अनिष्ट तत्त्वों की Fear करना । उदाहरण के लिये “तुम
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अंग्रेजी बालते हो दूर हटो तुम्हारे मुँह से दुर्गनध आती है
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तुमने प्लास्टिक के गिलास में पानी दिया है मैं नहीं पिऊँगा,
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तुमने अनेक लोगों की रोजी छीननेवाला कारखाना शुरू
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किया है मैं तुमसे बात नहीं करूँगा' कहना मनोवैज्ञानिक
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उपाय है । यह निन््दा अथवा आलोचना तो बहुत सौम्य है,
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इससे तीव्र निन््दा भी हो सकती है । सामाजिक स्तर पर ये
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उपाय बहुत कारगर भी होते हैं । परन्तु वे प्रतिष्ठित व्यक्तियों
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द्वारा साथ ही साथ व्यापक स्तर पर भी होने चाहिये ।
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इसका दूसरा आयाम मन को संस्कारित करने का भी
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है। इसके लिये समाज में श्रद्धय और श्रद्धावान लोग
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चाहिये । जो श्रद्धय होते हैं वे ही समाजमन को प्रभावित
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कर सकते हैं । साथ ही समाजमन यदि श्रद्धावान है तो
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श्रद्धय व्यक्तियों का मार्गदर्शन फलदायी हो सकता है । वे
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यदि सही पद्धति से सही रूप में समझायें और लोग अच्छे
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मन से श्रद्धापूर्वक सुनें तो लोकशिक्षा, सम्यक् स्वरूप में हो
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सकती है । इसलिये लोकशिक्षा का प्रथम चरण तो
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श्रद्धावान बनाना ही होता है । उसके बाद ही मुख्य संकटों
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के सम्बन्ध में लोकशिक्षा हो सकती है ।
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४.समाज प्रबोधन को लेकर कठिनाई
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टीवी के सभी चैनलों पर चौबीस घण्टे में पचास बार
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किसी वस्तु का विज्ञापन आता है, रास्ते पर निकलो तो
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स्थान स्थान पर उसके बड़े बड़े फलक दिखाई देते हैं,
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अखबारों में विज्ञापन आते हैं जिसके
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प्रभाव से लोग बच नहीं सकते । वह वस्तु खरीद करने के
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लिये वे विवश हो जाते हैं, भले ही विज्ञापनों का खर्च उनसे
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ही वसूल किया जाता हो । किसी एक वस्तु की प्रशंसा दस
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लोग कर देते हैं तब भी व्यक्ति का मानस परिवर्तन हो जाता
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है।
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यह तो बहुत छोटी बात है । विचारधाराओं के क्षेत्र
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में भी यह आतंक चलता है । मुस्लिम युवकों को जन्नत का
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लालच देकर आतंकवादी बनाया जाता है । साम्यवादी धर्म
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को अफीम बताकर अनेक लोगों को निधर्मी बना देते हैं ।
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भोंदू धर्माचार्य लोगों को अन्धश्रद्धा और रूढिवादिता के
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चक्कर में डालदेते हैं । यही नहीं तो अतिशय अत्याचार और
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आर्थिक बेहाली से लोगों के मन को मार दिया और गुलाम
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बना दिया जाता है । ब्रिटिशों द्वारा इस मार के साथ शिक्षा
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के माध्यम से उल्टे पाठ पढ़ाये गये और पूरे भारतीय समाज
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को मानसिक गुलामी में डाल दिया गया। आज भी
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भारतीय मानस इस गुलामी से नहीं उबर रहा है।
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लोकशिक्षा के ये अत्यन्त नकारात्मक उदाहरण हैं ।
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जब मन दुर्बल होते हैं तब इन बातों का प्रभाव जल्दी
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होता है और अधिक होता है । विभिन्न उपायों से प्रथम तो
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लोकमानस को दुर्बल बना दिया जाता है, अथवा विभिन्न
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भारतीय शिक्षा : संकल्पना एवं स्वरूप
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कारणों से लोगों के मन दुर्बल हो जाते हैं, बाद में उसे
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उल्टी पट्टी पढाना सरल होता है ।
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अतः जो सकारात्मक पद्धति से लोकशिक्षा करना
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चाहता है उसे इस बात को ध्यान में लेकर प्रथम तो
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लोकमानस को बलवान और समर्थ बनाना चाहिये ।
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बलवान मन सरलता से श्रद्धावान भी बन सकता है।
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श्रद्धावान मन को बुद्धिपूर्वक की गई बातें भी जल्दी समझ
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में आती हैं । यह कार्य धर्माचार्यों का है ।
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घर में संस्कार प्राप्त होते हैं, विद्यालयों में ज्ञान ।
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मातापिता और शिक्षकों को अपनी सन्तानों और अपने
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विद्यार्थियों को मन की शिक्षा कैसे दी जाती है यह सिखाना
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चाहिये । घर, विद्यालय और मन्दिर इन तीनों संस्थाओं में
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समन्वय होना चाहिये । इन सभी संस्थाओं की रक्षा करने
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का दायित्व राज्य का है ।
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इस प्रकार किन विषयों को लेकर और किस पद्धति
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से लोकशिक्षा करना इसका निर्णय करना एक अत्यन्त
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महत्त्वपूर्ण कार्य है । यदि लोकशिक्षा की सम्यक् व्यवस्था न
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की जाय तो कुट्म्ब की शिक्षा और विद्यालयीन शिक्षा
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अपना कार्य परिणामकारी रूप में नहीं कर सकती । इन
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दोनों से लोकशिक्षा व्यापक भी है और दीर्घ अवधि की भी
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==References==
==References==
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[[Category:पर्व 5: कुटुम्ब शिक्षा एवं लोकशिक्षा]]
[[Category:पर्व 5: कुटुम्ब शिक्षा एवं लोकशिक्षा]]