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== लेख का उदाहरण ==
== लेख का उदाहरण ==
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इस लेख का ही उदाहरण लें। जो भी पाठक इसे पढ़ते हैं उनके लिए यह अधीति है । पढ़ने के बाद पाठक जब उस पर मनन, चिंतन, चर्चा करेंगे तब वह बोध के पद से गुजर रहा है । ध्यान देने योग्य बात यह है कि कर्मेंद्रिय से होने वाली क्रियाओं के संबंध में पांच पद किस प्रकार व्यवहार में आते हैं यह सरलता से समझ में आता है परंतु अध्ययन केवल कर्मेन्द्रियों से ही नहीं होता है। वह हमेशा क्रिया ही नहीं होता है। उदाहरण के लिए इतिहास, मनोविज्ञान या तत्त्वज्ञान का अध्ययन कर्मेन्द्रियों का विषय नहीं है। विज्ञान और तंत्रज्ञान के सिद्धांत समझना केवल कर्मेन्द्रियों का विषय नहीं है। इनके बारे में पंचपदी का सिद्धांत किस प्रकार लागू होता है?
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इस लेख का ही उदाहरण लें। जो भी पाठक इसे पढ़ते हैं उनके लिए यह अधीति है । पढ़ने के बाद पाठक जब उस पर मनन, चिंतन, चर्चा करेंगे तब वह बोध के पद से गुजर रहा है । ध्यान देने योग्य बात यह है कि कर्मेंद्रिय से होने वाली क्रियाओं के संबंध में पांच पद किस प्रकार व्यवहार में आते हैं यह सरलता से समझ में आता है परंतु अध्ययन केवल कर्मेन्द्रियों से ही नहीं होता है। वह सदा क्रिया ही नहीं होता है। उदाहरण के लिए इतिहास, मनोविज्ञान या तत्त्वज्ञान का अध्ययन कर्मेन्द्रियों का विषय नहीं है। विज्ञान और तंत्रज्ञान के सिद्धांत समझना केवल कर्मेन्द्रियों का विषय नहीं है। इनके बारे में पंचपदी का सिद्धांत किस प्रकार लागू होता है?
इन विषयों में अधीति और बोध तो समझ में आता है परंतु अभ्यास और प्रयोग का पद कैसा होगा ? उत्तर यह है कि बुद्धि से और मन से ग्रहण किए जाने वाले विषयों में पंचपदी का सिद्धांत किस प्रकार काम करता है यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है । अभी हमने देखा कि अधीति और बोध के पद को समझना कठिन नहीं है। अब हम देखें कि एक सिद्धांत हमारे सामने रखा जा रहा है। प्रथम तो हमने पूरा विवेचन आँखों से, मन से, बुद्धि से ग्रहण किया । हमारा ग्रहण करना निर्दोष है, प्रामाणिक है । हमें स्वयं को ही यह बात समझ में आती है। पढ़ लेने के बाद भी वह हमारे मन में रहता है और धीरे धीरे बोध परिपक्व होता है । हमने ठीक समझा कि नहीं उसे परखने के लिए हम अन्य किसीसे प्रश्न भी पूछेगे। हमारा विचार प्रस्तुत भी करेंगे। इस प्रकार अपने अंतःकरण की सहायता से और अन्य लोगों की सहायता से या अन्य ग्रंथों की सहायता से हम सुने हुए सिद्धांतों को ठीक से समझेंगे । इसके बाद अभ्यास का पद आरम्भ होगा। कर्मेन्द्रियों से होने वाली क्रिया का अभ्यास और अंतःकरण से होने वाले अभ्यास में अंतर है। कर्मेन्द्रियों की क्रियाएं देखी जाती हैं, उनका पुनरावर्तन प्रत्यक्ष होता है। अंतःकरण से होने वाला अभ्यास सूक्ष्म होता है। पंचपदी की प्रक्रिया को हम अनेक विषयों को लागू करने का अभ्यास करते हैं ।
इन विषयों में अधीति और बोध तो समझ में आता है परंतु अभ्यास और प्रयोग का पद कैसा होगा ? उत्तर यह है कि बुद्धि से और मन से ग्रहण किए जाने वाले विषयों में पंचपदी का सिद्धांत किस प्रकार काम करता है यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है । अभी हमने देखा कि अधीति और बोध के पद को समझना कठिन नहीं है। अब हम देखें कि एक सिद्धांत हमारे सामने रखा जा रहा है। प्रथम तो हमने पूरा विवेचन आँखों से, मन से, बुद्धि से ग्रहण किया । हमारा ग्रहण करना निर्दोष है, प्रामाणिक है । हमें स्वयं को ही यह बात समझ में आती है। पढ़ लेने के बाद भी वह हमारे मन में रहता है और धीरे धीरे बोध परिपक्व होता है । हमने ठीक समझा कि नहीं उसे परखने के लिए हम अन्य किसीसे प्रश्न भी पूछेगे। हमारा विचार प्रस्तुत भी करेंगे। इस प्रकार अपने अंतःकरण की सहायता से और अन्य लोगों की सहायता से या अन्य ग्रंथों की सहायता से हम सुने हुए सिद्धांतों को ठीक से समझेंगे । इसके बाद अभ्यास का पद आरम्भ होगा। कर्मेन्द्रियों से होने वाली क्रिया का अभ्यास और अंतःकरण से होने वाले अभ्यास में अंतर है। कर्मेन्द्रियों की क्रियाएं देखी जाती हैं, उनका पुनरावर्तन प्रत्यक्ष होता है। अंतःकरण से होने वाला अभ्यास सूक्ष्म होता है। पंचपदी की प्रक्रिया को हम अनेक विषयों को लागू करने का अभ्यास करते हैं ।