Panchatantra (पंचतंत्र)

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विश्व-साहित्य के लिए भारतीय साहित्य की लोकप्रिय कथा की देन नीति कथा की दृष्टि से विशेष महत्व रखती है। षष्ठ शताब्दी में प्राप्त कथाओं की लोकप्रियता के लिए लोकप्रिय पंचतंत्र अपना एक विशिष्ट स्थान धारण करता है। इन पशु-पक्षियों की एवं मानवपरक छोटी-छोटी कहानियों के सुन्दरतम कलेवर में सामाजिक व्यवहारहारपरक, राजनीतिपरक, सदाचारमूलक एवं लोकनीतिविषयक शिक्षापरक वैशिष्ट्य से मूर्खों को भी व्यवहारकुशल, सदाचार-संपन्न एवं नीतिपटु बनाने वाले हैं।

परिचय

पंचतंत्र में संग्रहीत कथायें अत्यंत प्राचीन हैं। पंचतंत्र के भिन्न-भिन्न शताब्दियों में भिन्न-भिन्न प्रांतों में अनेक संस्करण संपादित हुए, जिनमें चार संस्करण उपलब्ध हैं –

  1. पंचतंत्र का पहलवी अनुवाद
  2. गुणाढ्य की बृहत्कथा में अंतरनिर्दिष्ट
  3. तंत्राख्यायिका
  4. दक्षिणी पंचतंत्र मूलरूप

इस प्रकार पंचतंत्र एक सामान्य ग्रंथ न होकर एक विपुल साहित्य का प्रतिनिधि ग्रंथ है। पंचतंत्र में मित्रभेद, मित्रलाभ, संधि-विग्रह, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षितकारक नामक पांचतंत्र हैं। प्रत्येक तंत्र में एक ही कथा को पुष्ट करने के लिए अनेक गौण कथायें वर्णित की गई हैं। प्रारंभ से ही ग्रंथ में ग्रंथकार का मुख्य उद्देश्य सदाचार और नीति का शिक्षण प्रदान करना रहा है। ग्रंथानुसार दक्षिण के महिलारोप्य नामक नगर में अमरकीर्ति नामक राजा, जिनके तीन पुत्रों को विद्वान् तथा नीति-सम्पन्न बनाने के लिए योग्य शिक्षक की आवश्यकता थी, उन्होंने लोक एवं शास्त्र में पारंगत विष्णु शर्मा नामक योग्य गुरु से प्रार्थना की, जिन्होंने मात्र छः माह में ही राजपुत्रों को व्यवहारकुशल, सदाचार सम्पन्न तथा नीतिनिपुण बना दिया।

पंचतंत्र का महत्व

पंचतंत्र की भाषा सीधी-सादी, मुहावरेदार तथा विनोदप्रियता से परिपूर्ण है। विन्यास में दुरूहता कहीं भी दृष्टिगत नहीं होती है और न भावों के अनुभव करने में दुर्बोधता के दर्शन। कथानक गद्य में उपनिबद्ध किया गया है तथा उपदेशात्मक सूक्तियां पद्य में पिरोयी गई हैं तथा प्रायः अधिकांश पद्य रामायण, महाभारत तथा अन्य विभिन्न नीति-ग्रंथो से संग्रहीत किये गये हैं। विश्वव्यापी प्रभाव से समन्वित पंचतंत्र मात्र भारतीय साहित्य का ही अङ्ग न होकर आज विश्व-साहित्य का एक लोकप्रिय सुप्रसिद्ध महानीय अंग है। पंचतंत्र के पांचों तंत्रों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –[1]

  • प्रथम तंत्र-मित्रभेद - प्रथम तन्त्र में मित्रभेद (प्रकार) को आधार बनाकर विभिन्न कथाओं के सच्चे मित्र तथा सच्चे मित्र की सङ्गति से लाभ को विभिन्न कथाओं तथा नीतिपूर्ण श्लोकों से उकेरा गया है तथा इसके विपरीत धोखेबाज मित्र, अगुणी मित्र तथा बुरी सङ्गति से प्राप्त हानि अपमान को भी स्पष्ट किया गया है।
  • द्वितीय तंत्र-मित्रसंप्राप्ति - मित्रसम्प्राप्ति नामक द्वितीय तन्त्र में मित्र पर विशेष बल दिया गया है कि मित्र-संग्रह करना जीवन की सफलता में बड़ा सहायक है तथा विवेकी मनुष्य को सदा मित्र प्राप्ति में प्रयत्नशील रहना चाहिए।
  • तृतीय तंत्र-काकोलूकीय - काकोलूकीय नामक तृतीय तन्त्र है। इस तन्त्र में कौवे तथा उल्लू के स्वाभाविक वैर को आधार बनाकर अनेक कथाऐं रची गयी हैं तथा इन कथाओं के माध्यम से शत्रु के बारे में बताया गया है तथा उनके प्रतिकार के विषय में उपाय बताये गये हैं
  • चतुर्थ तंत्र-लब्धप्रणाश - पञ्चतन्त्र के चतुर्थ तन्त्र लब्धप्रणाशम् है। लब्धप्रणांशम् का अर्थ है प्राप्त होकर नष्ट हो जाना। इस तन्त्र में विभिन्न कथाओं के माध्यम से यह बताया गया है कि प्राणी को लोभवश कोई कार्य नहीं करना चाहिए, अन्यथा उसका परिणाम विपरीत होता है।
  • पंचम तंत्र-अपरीक्षितकारक - पञ्चतन्त्र का अन्तिम तन्त्र अपरीक्षित कारक है। अपरीक्षित का अर्थ है बिना सोचे समझे कार्य करना। इस तन्त्र में विभिन्न कथाओं के द्वारा यह बताया गया है कि बिना सोचे समझे कोई भी कार्य करने से उसका बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है।

पंचतंत्र का वैशिष्ट्य

पंचतंत्र जिन कथाओं का संग्रह है वे भारत में नितांत प्राचीन हैं। पंचतंत्र के भिन्न-भिन्न शताब्दियों में तथा भिन्न भिन्न प्रांतों में अनेक संस्करण हुए। कुछ तो आज भी उपलब्ध हैं। इनमें सबसे प्राचीन संस्करण तंत्राख्यायिका के नाम से विख्यात है जिसका मूल स्थान काश्मीर है।[2]

पंचतंत्र में पांच तंत्र हैं (तंत्र का अर्थ है भाग) – मित्रभेद, मित्रलाभ, संधिविग्रह, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षित कारक। इसमें पांच मुख्य कथाएं हैं प्रत्येक कथा में अनेक उपकथाएं हैं। इनका संयोजन इस प्रकार है -[2]

क्र०सं० तंत्रनाम मुख्यकथा उपकथाएं श्लोक संख्या
1.     मित्रभेद सिंह और बैल की मित्रता तुड़वाने की कथा 23 461
2.     मित्रसंप्राप्ति काक, कूर्म, मृग और चूहे की मित्रता की कथा 7 196
3.     काकोलुकीय कौए और उल्लू की कथा 17 256
4.     लब्धप्रणाश वानर और मगर की कथा 11 80
5.     अपरीक्षितकारकम्  ब्राह्मणी और नेवले की कथा 14 98

पंचतंत्र का संक्षिप्त कथासार

पंचतंत्र के पाँच तंत्र प्राप्त होते हैं। तंत्र शब्द इस ग्रंथ के पांच भागों में विभाजित होने के द्योतक हैं। इसमें नीतियुक्त शासन विधि के पांच विधि (गुण) बताए गए हैं। ग्रंथ के आरंभ में मंगलाचरण के उपरांत मनु, वाचस्पति, शुक्र, पाराशर, व्यास, चाणक्य की स्तुति की गई है।[4] पञ्चतंत्र के लेखक के विषय में भी विद्वान मतैक्य नहीं हैं। पंचतंत्र के लेखक विष्णु शर्मा हैं। पञ्चतंत्र के कथामुख में लेखक ने स्वयं इस बात का उल्लेख किया है, कि – [5]

सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम्। तंत्रैः पञ्चभिरेतच्चकार सुमनोहरं शास्त्रम्॥ (पंचतंत्र कथामुख-3)

अर्थात मै विष्णु शर्मा, संसार में उपलब्ध सभी अर्थशास्त्रों (नीतिशास्त्रों) के तत्वों को भली प्रकार समीक्षा करके पांच तंत्रों से युक्त इस मनोहारी (लोकव्यवहारोपकारी) शास्त्र की रचना कर रहा हूं। प्रथम तंत्र की अंगी कथा के पूर्व राजा अमरशक्ति के पुत्रों का आख्यान है। वह उन्हें विष्णुशर्मा को उनकी प्रतिज्ञा पर सौंप देते हैं कि वह उन्हें छः माह में राजनीति का ज्ञान करा देंगे। तदनंतर –

अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च। न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन॥(पंचतंत्र, मित्रभेद, 1/1)

जो इस नीतिशास्त्र का नित्य अध्ययन करता है अथवा श्रवण करता है वह देवराज इन्द्र से भी कभी पराजित नहीं हो सकता है। इस वाक्य के द्वारा कथामुख समाप्त होता है तत्पश्चात मित्रभेद नामक तंत्र प्रारंभ होता है जो अतिसंक्षेप में प्रस्तुत है।

मित्रभेद    

मित्रभेद नामक इस तंत्र के आद्य श्लोक में ही कथा की जिज्ञासा होती है –

वर्धमानो महान्स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने। पिशुनेनातिलुब्धेन जंबुकेन विनाशितः॥

वन में एक सिंह और एक बैल के बीच अत्यंत गहरी मित्रता थी जिसे अत्यंत लालची और चुगलखोर गीदड़ ने नष्ट कर दिया। मित्रभेद में एक मुख्य कथा तथा इस कथा के अंतर्गत 23 उपकथाएं हैं जो इस प्रकार हैं – [6][3]

  1. मूर्खवानर कथा
  2. शृगाल दुंदुभि कथा
  3. नृपति-दंतिल गोरम्भकथा
  4. दूतीजंबूकाषाढभूति कथा
  5. विष्णुरूपधारी कौलिक जुलाहे की कथा
  6. काकी कृष्णसर्प कथा
  7. बक कर्कटक कथा
  8. सिंह-शशक कथा
  9. मंदविसर्पिणी मत्कुण-कथा
  10. चंडरवशृगाल कथा
  11. उष्ट्र-काक-सिंह-द्वीपि शृगाल कथा
  12. समुद्र और टिट्टिभ कथा
  13. हंसद्वय और कछुए की कथा
  14. मत्स्यत्रय की कथा
  15. चटक-कुंजर कथा
  16. सिंह-शृगाल कथा
  17. सूचीमुख एवं वानरयुथ कथा
  18. चटक दंपती एवं वानर कथा
  19. धर्मबुद्धि पाप बुद्धि कथा
  20. बक नकुल कथा
  21. लोहतुला वणिक पुत्र या जीर्णधन वणिक पुत्र की कथा
  22. नृपसेवक वानर कथा
  23. चैरब्राह्मण कथा।

मित्रसंप्राप्ति

ग्रंथकार कहते हैं – इस लोक में जो मनुष्य अप्रिय लगने वाले (परंतु) हितकर वचन कहते हैं वे ही सच्चे मित्र कहे जाते हैं, और लोग तो नाममात्र के मित्र होते हैं –

अप्रियाण्यपि पथ्यानि ये वदंति नृणामिह। त एव सुहृदः प्रोक्ता अन्ये स्युर्नामधारकाः॥ (पंचतंत्र, मित्रसंप्राप्ति, श्लोक- 167)

उपर्युक्त उक्तियों से प्रतीत होता है कि मित्र संप्राप्ति अर्थात ‘मित्रस्य संप्राप्तिः’ सच्चे मित्र की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। उसके लिए जो भी विधि अपनानी पड़े। अपनाना चाहिए। मित्रसंप्राप्ति में सात कथा हैं जो इस प्रकार हैं –[3]

  1. लुब्धक-चित्रग्रीव-हिरण्यक-कथा
  2. हिरण्यक-ताम्रचूड़-बृहत्स्फिक्-कथा
  3. तिलचूर्णविक्रय-कथा
  4. शबरशूकर कथा
  5. वणिक्पुत्र-कथा
  6. मंदभाग्यसोमिलक-कथा
  7. वृषभानुशृगाल-कथा।

काकोलूकीय

इस तंत्र में एक मुख्य कथा तथा 17 उपकथाएं हैं। इसमें विग्रह (युद्ध) तथा संधि का वर्णन है। मुख्य कथा के अंतर्गत कौवों के राजा मेघवर्ण एवं उल्लुओं के राजा अरिमर्दन की कथा है।

काकोलूकीयम् में एक मुख्य कथा तथा उसके अंतर्गत 17 उपकथाएं हैं। सत्रहों उपकथा इस प्रकार हैं –[3]

  1. काकोलूकवैर-कथा
  2. शशक-गजयूथप-कथा
  3. शशक-कपिञ्जल-कथा
  4. धूर्त ब्राह्मण-छग-कथा
  5. पिपीलिका भुजंगम-कथा
  6. ब्राह्मण सर्प-कथा
  7. स्वर्ण हंस-कथा
  8. कपोत-लुब्धक-कथा
  9. चौरवृद्धवणिक्-कथा
  10. ब्राह्मणचौरपिशाच-कथा
  11. बल्मीकोदरस्थसर्प-कथा
  12. रथकारभार्या कथा
  13. मूषिकाविवाह-कथा
  14. सुवर्णपुरीष पक्षी-कथा
  15. बिलवाणी-कथासर्प-मंडूक-कथा
  16. घृतान्धब्राह्मण-कथा

लब्धप्रणाश

काकोलूकीय के बाद चतुर्थ तंत्र लब्धप्रणाश अर्थात “प्राप्त के नाश”। इसमें यह बतलाया गया है कि प्राप्त हुई वस्तु को सम्यक् प्रकार न रखने से वह कैसे विनाश से वह कैसे विनाश को प्राप्त होता है। इसमें वानर एवं मकर ध्वज की मुख्य कथा है। दोनों की कथा इस प्रकार है –

समुत्पन्नेषु कार्येषु बुद्धिर्यस्य न हीयते। स एव दुर्ग तरति जलस्थो वानरो यथा॥ (पंचतंत्र, लब्धप्रणाश, श्लोक-1)[7]

इस तंत्र में वानर-मकरध्वज की मुख्य कथा है तथा इसके अंतर्गत ग्यारह (11) उपकथाएं हैं, जो इस प्रकार है –[3]

  1. मंडूकराज गंगदत्त की कथा
  2. सिंह-लंबकर्ण-कथा
  3. युधिष्ठिर कुम्भकार-कथा
  4. सिंह दंपति शृगालपुत्र-कथा
  5. ब्राह्मणदंपति कथा
  6. नन्द-वररुचि-कथा
  7. व्याघ्रचर्म गर्दभ कथा
  8. नग्निका-हालिकवधू-कथा
  9. घण्टोष्ट्र-कथा
  10. चतुरक-शृगाल कथा
  11. चित्रांगसारमेय-कथा

अपरीक्षितकारक

पंचतंत्र का पांचवा तंत्र अपरीक्षिकारक है। जिसमें मुख्यतया विचारपूर्वक सुपरीक्षित कार्य करने की नीति पर ग्रंथकार ने बल दिया है। इसके नामकरण के कारण का स्पष्टीकरण करते हुए बताया गया है कि बिना भली-भांति विचार किए एवं बिना अच्छी तरह से देखे-सुने गये किसी कार्य को करने वाले व्यक्ति को कार्य में सफलता नहीं प्राप्त होती, बल्कि जीवन के अनेक कठिनाइयों का अनुभव करना पड़ता है। अतः अंधानुकरण करने का फल समुचित नहीं होता है।

अपरीक्षितकारक में कुल 15 कथाएं हैं, जिनका शीर्षक एवं संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –[3]

  1. क्षपणक-कथा
  2. ब्राह्मणी नकुल-कथा
  3. लोभाविष्ट-चक्रधर कथा
  4. सिंह कारक मूर्खब्राह्मण-कथा
  5. मूर्खपंडित-कथा
  6. मत्स्य-मंडूक-कथा
  7. रासभ-शृगाल-कथा
  8. मंथर-कौलिक-कथा
  9. सोमशर्मा-पितृ-कथा
  10. चंद्रभूति-कथा
  11. विकाल-वानर-कथा
  12. अंधक-कुब्जक-त्रिस्तनी-कथा
  13. राक्षस गृहीत-ब्राह्मण-कथा
  14. भारुण्डपक्षि-कथा
  15. ब्राह्मण-कर्कटक-कथा

पंचतंत्र में सामाजिक व्यवस्था

पञ्चतन्त्र की कथाओं में भारतीय समाज का पूरा प्रतिबिम्ब झलकता है। इन कथाओं के माध्यम से भारतीय जनसामान्य जीवन की ऐसी अनेक झांकियाँ मिलती हैं। पञ्चतन्त्र की कथा यद्यपि आकार में लघुकाय है, फिर भी उनमें व्यापक परिवेश समाहित है। भारतीय समाज को योजनाबद्ध व्यवस्थित और सुसंगठित सामाजिक संस्थाओं (वर्णव्यवस्था, वर्णाश्रम-व्यवस्था, संस्कार) के द्वारा संतुलित किया गया है। इन सामाजिक संस्थाओं का विकास उस समय भारतीय समाज को सुनियोजित कर रहा था।[4] वर्णव्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, जन-जीवन, ग्रामीण-नगरीय व्यवस्था, कृषि व्यापार एवं यातायात आदि विषयों का विशद वर्णन किया गया है।

पंचतंत्र में राजनीतिक व्यवस्था

किसी भी देश समाज की राजनीति वहाँ के लोगों के सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करती है। यथा राजा तथा प्रजा जैसी अनेक उक्तियाँ प्रख्यात है। प्रजा को राजा का अनुगमन करना पडता है। अतीत का सम्पूर्ण इतिहास तथा प्रत्येक व्यक्ति का जीवन क्रम में इस बात को प्रमाणित करता है कि जिस प्रकार के विचार धर्म, नीति से सम्बद्ध शासक होता है। प्रजा को उसके अनुकूल ढलना ही पडता है। उसके विपरीत आचरण करने वालों को उसके शासन में संकुचित होकर रहना पडता है। पञ्चतन्त्र का काल पूर्णरूप से राजतन्त्र का काल था। अतः पञ्चतन्त्र में राजा के महत्व पर विशेष बल दिया गया है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि बिना शासक के प्रजा की स्थिति बिना नाविक के सागर में फँसी नाव की तरह होती है -[5]

यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजा। अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव॥ (पञ्चतन्त्र, काकोलूकीय, १/७२)

इस प्रकार पञ्चतन्त्र के सर्वांगीण समीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि इसमें राजनीतिक तत्त्वों का समावेश पूर्णरूपेण हुआ है, जो एक सुव्यवस्थित राज्य, कुशल प्रशासक तथा योग्य प्रजा के लिए अत्यन्त उपयुक्त है।[6]

  • राजधर्म - पञ्चतन्त्र में एक सार्वभौमिक सम्राट की कल्पना की गयी है। एक ही राजा समस्त पृथ्वी पर हित करने में समर्थ होता है। अनेक राजाओं के होने से परस्पर द्वेष होने के कारण प्रजा का उच्छेद हो जाता है। राज्य की स्थिरता, सम्पन्नता तथा प्रजा की रक्षा करने के लिए, जिन उपायों या नियमों का विधान किया है उसे ही राजधर्म संज्ञा से कहा गया है। जिसका पालन करके प्रत्येक राजा राज्य की उन्नति, प्रगति कर सकता है।
  • कूटनीति या उपाय का महत्व - आचार्य विष्णु शर्मा उपायों के महत्व को स्वीकार करते हुए उसका वर्णन करते हुए कहते हैं कि शक्ति का विकास, समृद्धि, शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए उपायों का होना आवश्यक है अर्थात जिनके पास कूटनीति है वह स्वल्प शरीर वाला होते हुए भी वीरों द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय और अनतर्राष्ट्रीय शक्ति के विकास के लिए राजा के पास तीन माध्यम होना आवश्यक है - शक्ति, बल, उपाय या नीति।
  • राज्य संरक्षण के उपाय - राज्य की एकता, अखण्डता एवं संप्रभुता की रक्षा के लिए निम्नलिखित नीतियाँ अपनायी जा सकती हैं - साम नीति, दाम नीति, भेद नीति, दण्ड नीति। अर्थात् विजिगीषु राजा को जहाँ तक सम्भव हो शत्रुओं को साम आदि चारों उपायों से अपने अधीन कर लेना चाहिए।
  • षाड्गुण्य - संधि, विग्रह, आसन, यान, संश्रय, द्वैधी भाव इस प्रकार षाड्गुण्य के ये छः अंग बताये गये हैं। राजनीतिक स्थिति में षाड्गुण्य की नीति महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। दूसरे देश या दूसरे राज्यों के बीच आपसी सम्बन्धों को बनाये रखने के लिए षाड्गुण नीति अपनानी चाहिए।
  • अमात्य - पञ्चतन्त्र में राज्य हेतु योग्य अमात्यों को अत्यन्त आवश्यक बताया गया है। अमात्य वर्ग को अत्यन्त उच्च स्थान प्राप्त था एवं अमात्य को राज्य रूपी रथ की धुरी माना है।
  • गुप्तचर - पञ्चतन्त्र में गुप्तचर एवं दूत में कोई भेद नहीं है। दूत भी गुप्तचर का कार्य करते थे। गुप्तचरों को अधिक महत्ता दी गयी है। इन्हें राजा का चक्षु कहा गया है। गुप्तचर के विषय में कहा गया है कि गाय आदि पशु गन्ध के द्वारा वस्तुओं का पता लगा लेते हैं। उसी प्रकार राजा गुप्तचरों से दूसरे राष्ट्र की गुप्त बात जान लेते हैं।
  • दुर्ग - प्राचीन काल में युद्ध के साधन आजकल के साधनों से सर्वथा भिन्न थे। उस समय की सेना के मुख्य अस्त्र-शस्त्रों में धनुष, बाण, तलवार आदि ही होते थे। यही कारण है कि उस समय दुर्ग आदि का महत्व बहुत ही अधिक रहता था। राजधानी पर शत्रु के अधिकार से गम्भीर भय उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि वहीं भोज्य पदार्थ एकत्र रहता है। वहीं प्रमुख तत्त्व एवं सैन्य बल का आयोजन रहता है। राजधानी ही शासन यन्त्र की धुरी है, राजधानी देश की सम्पत्ति का दर्पण है और यदि वह ऊँची दीवारों से सुदृढ रहती है तो सुरक्षा का कार्य भी करती है। अतः पञ्चतन्त्र में दुर्ग को आवश्यक सामग्रियों से युक्त होना बतलाया गया है।

इस प्रकार पञ्चतन्त्र के सर्वांगीण समीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि इसमें राजनीतिक तत्वों का समावेश पूर्णरूपेण हुआ है, जो एक सुव्यवस्थित राज्य, कुशल प्रशासक तथा योग्य प्रजा के लिए अत्यन्त उपयुक्त है।

पंचतंत्र में निहित सांस्कृतिक तत्व

संस्कार वैयक्तिक और जातीय होते हैं। इन्हीं जातीय संस्कारों की समाप्ति का नाम ही संस्कृति है। संस्कृति जीवन जीने की एक शैली है, जो किसी देश, प्रान्त और परिच्छेद का विशेष परिचायक है।

पञ्चतन्त्र में पुरुषार्थ - भारतीय संस्कृति का पोषक पुरुषार्थ चतुष्टय की जो परिकल्पना हमारे ऋषि-महर्षियों ने की है, इसी परंपरा का पालन आचार्य विष्णु ने अपने ग्रन्थ, पञ्चतंत्र में करते हुए कहते हैं - परोपकार करना ही पुण्य है और दूसरों को दुख देना ही पाप है। अतः दूसरों को कष्ट न देते हुए सदैव परोपकार में ही संलग्न रहना चाहिए। जो कार्य अपने लिए अहितकर प्रतीत हो उन्हें दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। पञ्चतन्त्र में वर्णित तथ्यों से यह विदित होता है कि आचार्य विष्णु शर्मा, पञ्चतन्त्र की कथाओं में सम्बन्धित पात्रों द्वारा पुरुषार्थ चतुष्टय का सम्यक निर्वाह कराया है।

संगीत - पञ्चतंत्रकार प्राचीन संगीत शास्त्र की सम्पूर्ण विद्याओं से परिचित थे। पंचतंत्र के काल के समय में लोगों की संगीत के प्रति विशेष अभिरुचि थी। संगीत शास्त्र का निदर्शन प्रथम तन्त्र से आरम्भ होकर पंचम तन्त्र तक दृष्टिगत होता है।

खान-पान - वैदिक काल से ही पाकशास्त्र प्रसिद्ध है। भोजन निर्माणमें जो प्रक्रिया विधिपूर्वक अपनायी जाती है, उसे ही पाकशास्त्र के नाम से जाना जाता है। पञ्चतंत्र में खान-पान के अनेक विवरण प्राप्त होते हैं - मन्दविसर्पिणी मत्कुल कथा में राजा अनेक प्रकार के सुन्दर व्यंजनों का उपभोग करते थे। आचार्य विष्णुशर्मा षड्रस-युक्त होने की परिचर्या में लिखते हैं कि तत्कालीन व्यक्ति के भोजन में षड्रस विद्यमान था।

अतिथि-सत्कार - अतिथि-सत्कार समाज का अभिन्न अंग है। वैदिक काल से ही यह परम्परा निर्बाध रूप से प्रवाहमान है। भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार का बहुत महत्त्व है। अतिथि धर्म का सम्यक् रूप से विवेचन पञ्चतन्त्र में मिलता है - मित्रभेद के 'उष्ट्र-काक-सिंह-द्वीपि-शृगालकथा' में क्रथनक नामक उष्ट्र, मदोत्कट नामक सिंह के पास आता है, यद्यपि क्रथनक उसका भोजन भी है, लेकिन मदोत्कट ने कहा तुम मेरे अतिथि हो और मेरे घर आये अतिथि को मैं मारता नहीं हूँ। क्योंकि घर आये अतिथि स्वरूप शत्रु को भी मारना नहीं चाहिए। यदि गृह आये हुए अतिथि पर किसी प्रकार का विपत्ति हो तो उसकी रक्षा प्राण देकर भी करना चाहिए।

वृक्षपूजन - भारतीय संस्कृति में वृक्ष भी पूजनीय माने गये हैं। वृक्षों का पूजन अनादिकाल से चला आ रहा है। आचार्य विष्णुशर्मा कहते हैं कि वृक्ष हमें आश्रय देते हैं। धूप से निवृत्ति के लिए हम वृक्षों का आश्रय लेते हैं। वृक्ष के पत्ते तथा उनके फूलों का भी धार्मिक प्रयोग होता है। मित्रसम्प्राप्ति में व्याध वर्षा और शीत से बचने के लिए वृक्ष का ही आश्रय ग्रहण करता है।

वस्त्राभूषण - पञ्चतन्त्र में विभिन्न वस्त्रों के उपयोग का वर्णन प्राप्त होता है। यदि कथा में गरीब पात्र है तो जीर्ण वस्त्रों का चित्रण किया गया है। कथा के प्रसंगों में अनुकूल वस्त्र भी दृष्टिगोचर होते हैं।

इस प्रकार पञ्चतंत्र तत्कालीन भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था का भली-भाँति विवेचन करता है। इन वर्णनों के माध्यम से कहा जा सकता है कि उस समय समाज एवं संस्कृति में गीत-संगीत, खान-पान, अतिथि-सत्कार, वृक्षपूजन, वस्त्राभूषण आदि का व्यवहार अपनी उन्नतदशा में था। पञ्चतंत्र की धार्मिक सहिष्णुता तो आज के समाज के लिए सर्वथा अनुकरणीय है।

पञ्चतंत्रकार-आचार्य विष्णुशर्मा

पंचतन्त्र के लेखक के विषय में भी विद्वान् मतैक्य नहीं हैं। पञ्चतन्त्र के लेखक विष्णु शर्मा हैं। पञ्चतन्त्र के कथामुख में लेखक ने स्वयं इस बात का उल्लेख किया है, कि -[7]

सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम्। तन्त्रैः पञ्चभिरेतच्चकार सुमनोहरं शास्त्रम्॥

अर्थात् मैं विष्णु शर्मा, संसार में उपलब्ध सभी अर्थशास्त्रों (नीतिशास्त्रों) के तत्वों को भली प्रकार समीक्षा करके पांच तन्त्रों से युक्त इस मनोहारी (लोकव्यवहारोपकारी) शास्त्र की रचना कर रहा हूँ।

प्राचीन समय से ही संस्कृत के कवियों की लेखकों की यह परम्परा रही है कि प्रायः वे अपने जीवन के विषय में कुछ नहीं लिखते थे। सम्भवतः पञ्चतन्त्र के लेखक विष्णु शर्मा ने भी इसी मत का आश्रय लिया है। पञ्चतन्त्र के कथा मुख से हमें लेखक के विषय में कुछ जानकारी प्राप्त होती है -

तद्यथाऽनुश्रूयते अस्ति दक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम्। तत्र सकलार्थिकल्पद्रुमः प्रवरमुकुटमणिमरीचिमञ्जरीचर्चित चरणयुगलः सकलकलापारंगतोऽमरशक्तिर्नाम राजा बभूव। तस्य त्रयः पुत्राः परमदुर्मेधसोबहुशक्तिरुग्रशक्तिरनन्तशक्तिश्चेतिनामानो बभूवुः। (पञ्चतंत्र, कथामुख, गद्यभाग, पृ० ३)

सारांश

उद्धरण

  1. शोधगंगा - डॉ० नमिता, पंचतन्त्र एवं हितोपदेश में निहित शैक्षिक विचारों का तुलनात्मक अध्ययन एवं वर्तमान सन्दर्भ में उनकी उपादेयता, सन- २०१५, शोधकेन्द्र - राजा बलवन्त सिंह महाविद्यालय, आगरा (पृ० ३४)।
  2. डॉ० कपिलदेव द्विवेदी, संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास, (पृ० ५७८)।
  3. 3.0 3.1 3.2 3.3 3.4 https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/431831/5/05_chapter1.pdf
  4. https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/431831/7/07_chapter3.pdf
  5. शोधगंगा-विनोद कुमार सिंह, पञ्चतन्त्र में निहित सांस्कृतिक एवं आयुर्वेदीय तत्वों का अध्ययन, सन् २०२१, शोधकेन्द्र-काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (पृ० १५५)।
  6. शोध गंगा-विनोद कुमार सिंह, पञ्चतन्त्र में निहित सांस्कृतिक एवं आयुर्वेदीय तत्वो का अध्ययन, सन् २०२१, शोध केन्द्र - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, (पृ० १३६)।
  7. शोधगंगा-अनूप कुमार द्विवेदी, पञ्चतन्त्र में प्रतिपादित लोक संस्कृति, सन् २०२२, शोधकेन्द्र-काशी हिन्दू विशविद्यालय, वाराणसी (पृ० ३)।