Hamre sharir ke vibhinn tantra(हमारे शरीर के विभिन्न तंत्र )

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हमारे शरीर के विभिन्न तत्र

पिछले पाठ में आपने शरीर के कुछ अंगों के विषय में पढ़ा। शरीर का हर अंग

अलग-अलग काम करता है। परतु प्रत्येक अंग का कार्य जीव को बनाए रखने

और जीव की प्रजाति को भी बनाए रखने के लिए कार्य करना है।

आप अपने आस-पास होने वाले किसी निर्माण कार्य को देखिए। वहां

कुछ-न-कुछ कूडा-करकट अर्थात अपशिष्ट पदार्थ पड़ा होगा। ऐसा ही शरीर

के साथ होता है। शरीर के ऐसे अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के लिए

उत्सर्जन तंत्र होता हे।




जब बहुत सारे लोग काम करते हैं तो एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत होती है

कि सभी के बीच सामंजस्य बना रहे। शरीर के साथ भी यह लागू होता है।

जहां एक ओर अलग-अलग तंत्र काम कर रहे हैं वहां उनमें कोई अव्यवस्था

न आ जाए। इसके लिए एक समन्वयकारी तंत्र भी होना आवश्यक हे और यह

कार्य प्रधानतः तंत्रिका तंत्र (नियंत्रण तंत्र) द्वारा संपन्न होता है। इस पाठ में हम

उत्सर्जन तंत्र और तंत्रिका तंत्र के बारे में जानेंगे।

इस पाठ का अध्ययन करने के पश्चात्‌ आप :




० मनुष्य के शरीर के लिए उत्सर्जन तंत्र को आवश्यकता समझा सकेगे;

मुक्त बेसिक शिक्षा - भारतीय ज्ञान परम्परा


टिप्पणी

० शरीर के उत्सर्जन तंत्र की कार्य-प्रणाली की व्याख्या कर सकेंगे;

० तंत्रिका तंत्र का अर्थ स्पष्ट कर सकेंगे; और


टिप्पणी | ७ तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली समझा सकेगे।

8.1 उत्सर्जन ततत्र

हमारे शरीर की हर कोशिका में कुछ न कुछ काम होता रहता है, जिसके

कारण कुछ कचरा बनता रहता है। ये पदार्थ हानिकारक होते हैं, जिन्हें शरीर

में एकत्रित न होने देकर बाहर निकालना अति आवश्यक हे। शरीर से

अपशिष्ट/हानिकारक पदार्थो को बाहर निकालने की क्रिया को उत्सर्जन कहते

हैं और उससे जुड़े अंगों के समूह को उत्सर्जन तंत्र कहते हैं।





मूत्राशय

मूत्रवाहिनी

   


प्रोस्टेट ग्रांथि

बल्वो मूत्रमार्ग ग्रांथि -

चित्र 8.1 उत्सर्जन तंत्र


हमारे शरीर में उत्सर्जन तीन प्रकार से होता हे :


1 फेफड़ों द्वारा : सांस लेने में उत्पन्न दूषित हवा-कार्बन डाइआक्साइड को

शरीर से बाहर करना।

विज्ञान, स्तर-'"ख”'

ii.

iii.


त्वचा द्वारा : जब कभी पसीना आता है तो उसमें मौजूद कुछ अनावश्यक

खनिज लवण भी निकल जाते हैं।


मूत्र द्वारा : शरीर में जल होता है। जल की मात्रा का संतुलन अत्यंत

महत्वपूर्ण है यह न तो ज्यादा होना चाहिए और न ही कम। मूत्र

में रासायनिक अपशिष्ट तथा अतिरिक्त जल शरीर से बाहर निकल

जाते है।

मूत्र तंत्र

मूत्र तंत्र में ये भाग आते हैं :

i

गुर्दे (वृक्क) : ये एक जोड़ी सेम के बीज की आकृति के अंग होते हे।

गुर्दे के कार्य

ii.

iii.

iv.

क. धमनी द्वारा गुर्दे में पहुंचे रक्‍त से उसकी अशुद्धियां जिनमें खास तौर

से यूरिया होता है, छानकर अलग करना।


ख. शरीर में जल और खनिज लवणों का संतुलन बनाए रखना।


मूत्रवाहिनी : प्रत्येक गुर्दे से एक-एक मूत्रवाहिनी निकलती है, जो नीचे

को चलती जाती हुई मूत्राशय में खुलती है। इसका कार्य मूत्र को गुर्दे से

मूत्राशय तक ले जाना होता हे।



मूत्राशय : यह एक लचीली थेले-जैसी सरचना होती है। इसका कार्य

अस्थायी रूप में मूत्र का भंडारण करना होता है।


मूत्रमार्ग : यह एक छोटी पेशियों द्वारा बनी नली होती है, जिसके द्वारा मूत्र

को समय-समय पर बाहर निकाला जाता रहता है।


यदि हमारे दो गुर्दो (वृक्कों) में से एक काम करना बंद कर दे तो दूसरा अधि

क काम करने लग जाता है। यदि दोनों गुर्दे खराब हो जाएं तो आजकल


मुक्त बेसिक शिक्षा - भारतीय ज्ञान परम्परा


टिप्पणी

 

टिप्पणी

चिकित्सा में किसी अन्य व्यक्ति के स्वस्थ गुर्दे का प्रतिरोपण हो सकता है।

यही कारण है कि आजकल लोगों को अंगदान के लिए प्रोत्साहित किया जाता

है।


1. उत्सर्जन किसे कहते हैं?

2. वे कौन सी तीन विधियां हैं जिनके द्वारा उत्सर्जित पदार्थ शरीर से बाहर

निकाले जाते हैं?

3. मूत्र तंत्र क॑ विभिन्न भागों को क्रमवार लिखिए।


4. गुर्दे से मूत्र किस संरचना द्वारा बाहर निकलता है?


5. वह कौन सी संरचना है जो मूत्र के अस्थायी रूप से भंडारण के लिए

कार्य करती है?

8.2 तंत्रिका तंत्र

हमारे चारों ओर जो कुछ हो रहा हे, या केसा हो रहा है, इसका ज्ञान होना

आवश्यक है। भोजन कैसा है-स्वादिष्ट, खाने योग्य या खराब, बदबूदार, न

खाने योग्य? इसका ज्ञान हमें कैसे होता है? हम व्यक्ति को देखते-पहचानते

और उसकी बातें सुनते एवं उसे अपनी बातें सुनाते हैं। चलते-दौड़ते समय कौन

सी पेशियां काम करती हैं, आदि। इस प्रकार की सभी समन्वयकारी क्रियाएं

हमारे मस्तिष्क और तंत्रिकाओं अर्थात्‌ तंत्रिका-तंत्र द्वारा होती है।




1. तंत्रिका-तंत्र के भाग


विभिन्न अंगों के परस्पर मिलकर काम करने से तंत्रिका तंत्र का निर्माण होता

है। तंत्रिका-तंत्र के निम्नलिखित भाग होते हें :

विज्ञान, स्तर-'"ख”'


¡. मस्तिष्क

ii. मेरू रज्जु

iii. तंत्रिकाए टिप्पणी

¡v. संवेदी अंग

¡. मस्तिष्क : मानव मस्तिष्क एक कोमल और नाजुक अंग होता है। वयस्क

मनुष्य में यह लगभग 3 से 5 किलोग्राम का होता हे। यह शीर्ष में कपाल या

खोपडी द्वारा सुरक्षित होता है।

मानव मस्तिष्क सम्पूर्ण जीव सृष्टि में सबसे अधिक आकार वाला हे। इसी में

छिपा है वह रहस्य जिसके द्वारा मनुष्य वे तमाम कार्य कर सकते हैं जो अन्य

जीव नहीं कर सकते।



मस्तिष्क के भाग

¡. प्रमस्तिष्क : यह मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग है। इसका कार्य


चित्र 8.2 मस्तिष्क के भाग

मुक्त बेसिक शिक्षा - भारतीय ज्ञान परम्परा BN 115 |


 

टिप्पणी

सोचना-विचारना और याद रखना है। कुल मिलाकर यही भाग बुद्धिमता,

चेतना और इच्छा शक्ति का स्थान है। इनके अलावा बोलना, देखना,

स्वाद तथा गंध आदि के ज्ञान के केन्द्र भी इसी के अलग-अलग क्षेत्र में

होते हैं।

1. अनुमस्तिष्क : यह छोटा भाग है जो प्रमस्तिष्क के नीचे और शीर्ष के

पिछले भाग में स्थित होता हे। इसका कार्य पेशियों की गति को नियंत्रित

करना है।




iii. मेडुला आव्लांगाटा : इसे मस्तिष्क स्तंभ भी कहते हैं। इसका कार्य कुछ

अनैच्छिक गतियों को नियंत्रित करना है जैसे श्वासोच्छवास तथा ह्वदय

गति।

i. मेरू रज्जु : यह एक नली जैसा भाग होता है जो मस्तिष्क से शुरू होकर

पूरी रीढ़ की हड्डी के भीतर-भीतर अंत तक चलता जाता हे। मस्तिष्क से चले

संदेश मेरू रज्जु से गुजरते हुए सारे शरीर में पहुंचते हैं। मेरू रज्जु शरीर को

जल्दी से प्रतिक्रिया करने में सहायता करता हे जैसे, कहीं कांटा चुभ जाये तो

हाथ तुरंत पीछे को खींच लिया जाता है।




iii. तंत्रिकाएं : तंत्रिकाएं चिकनी, सफेद-सफेद धागे-जैसी संरचनाएं होती हैं,

जो मानो बिजली की तरह संदेशों को लाती-ले जाती हैं। मस्तिष्क से निकलने

वाली तंत्रिकाएं, कपाल तंत्रिकाएं और मेरू रज्जु से निकलने वाली तंत्रिकाएं




मेरू तंत्रिकाएं कहलाती हैं।

तंत्रिकाओ के प्रकार

a) संबेदी तंत्रिकाएं : ये संवेदी अंगों से जैसे आंख, नाक, कान आदि से

संदेशों को मस्तिष्क तक ले जाती है।


विज्ञान, स्तर-'"ख”'


b)

प्रेरक तंत्रिकाएं : ये मस्तिष्क से निकल कर गतिशील भागों को जैसे,

आंखों को घुमाने वाली पेशियों को गति के लिए संदेश देती हे।





c) मिश्रित तंत्रिकाएं : ये दोनों कार्यो के लिए होती हैं जो संदेश लाती भी

हैं और ले भी जाती हैं। मेरू रुजु से निकलने वाली ये 31 जोडी

तंत्रिकाएं होती हे।

तंत्रिका तंत्र के कार्य

a) हमारा तंत्रिका तंत्र बाहरी संसार में जो कुछ हो रहा है उसके प्रति होने

वाली प्रतिक्रिया का नियंत्रण करता है।

b) यह शरीर के अन्य सभी तंत्रों को नियंत्रित करता है।

८) यह हमारे शरीर के विभिन्न भागों को जैसा हम चलाना, हिलाना-डुलाना

चाहें, वेसे कराता है।


शरीर की विभिन्न क्रियाओं का समन्वय करने वाले अंग तंत्र का नाम

बताइए।

हमारे तंत्रिका तंत्र के चार प्रमुख भाग क्या-क्या हैं?

हमारा मस्तिष्क कहां स्थित होता है?


मानव मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग कौन-कौन से हैं?


आपके मस्तिष्क का कौन सा भाग आपकी भावनाओं का नियंत्रण करता

है?

हमारे ह्वदय-स्पंदन को नियंत्रित करने वाला केन्द्र कहां स्थित होता

है?


मुक्त बेसिक शिक्षा - भारतीय ज्ञान परम्परा


टिप्पणी

CLIC LRH

जिन अंगों से हम किसी चीज की उपस्थिति, पदार्थों या स्वाद आदि महसूस

कर पाते हैं वे संवेगी अंग कहलाते हैं। हम इन अंगों द्वारा ही देख, सुन या

महसूस कर पाते हैं। हमारे पांच संवेदी अंग होते हैं - आंख, कान, नाक, जीभ

और त्वचा।

1) आंख : आंखें हमे पढ़ने और अपने ईर्द-गिर्द की वस्तुओं को देखने के

लिए जरूरी है। जब किसी वस्तु से आ रही प्रकाश-किरणें आंख में प्रवेश

करती हैं तो उनसे आंख के भीतर से निकलती तंत्रिका उत्तेजित होती हे

और संदेशों को मस्तिष्क में पहुंचा देती हैं। मस्तिष्क इन संदेशों को समझ

कर उनसे वस्तु का पूरा चित्र बना लेता है।


टिप्पणी





इस विधि से हम अपने आस-पास की वस्तुओं को देख और समझ सकते

हैं।

¡i1) कान : चेहरे पर उभरे हुए कान कहीं से आने वाली ध्वनि तरंग को भीतर

पहुंचाते हैं जिनसे कान के भीतर वाली संवेदी कोशिकाओं का कम्पन

होता है और फिर इन संदेशों को एक तंत्रिका (श्रवण तंत्रिका) मस्तिष्क

तक ले जाती हैं। कहने में अजीब सा लगता हे मगर यह सही हे कि कान

से हमें शरीर के संतुलन का भी ज्ञान होता है।


ii) नाक : नाक विविध प्रकार की गंधों अर्थात्‌ महक के संदेशों को मस्तिष्क

में पहुंचाती है। स्वादिष्ट व्यंजनों को हम कई बार सूंघकर ही पहचान लेते

हैं।

1५) जीभ : यह हमें विविध प्रकार की खाद्य वस्तुओं को उनके स्वाद के

अनुसार अलग-अलग पहचानने में सहायता करती है, जैसे, मीठा, खट्टा,

गर्म, कड़वा, नमकीन आदि।



IE विज्ञान, स्तर-'ख


४) त्वचा : त्वचा से हमें स्पर्श, पीड़ा, गर्म-ठंडा, कडा-नर्म आदि का ज्ञान

होता है। त्वचा के कुछ स्थानों पर स्पर्श का अधिक ज्ञान होता है, जेसे,

उंगलियों के सिरों पर, कुछ स्थानों पर गर्मी-ठंड का जेसे, गालों पर

इत्यादि।


टिप्पणी


1. हमारे शरीर में कितने संवेदी अंग पाए जाते हैं, सूची बनाइए।


2. हमारी आंखें किसी वस्तु को कैसे पहचान लेती हें?


3. हमारी जीभ कितने मुख्य स्वाद पहचान लेती हे?


4. कान का सुनने के अलावा दूसरा क्या काम हे?

@- आपने क्या सीखा

० शारीरिक क्रियाओं में बनने वाले हानिकारक उत्पादों को शरीर से बाहर

निकालना उत्सर्जन कहलाता है।




० फेफडे, त्वचा और गुर्दे उत्सर्जन में योगदान करते हैं।

०° मुख्यतः उत्सर्जन मूत्र-तंत्र द्वारा होता है। उत्सर्जन तंत्र में दो गुर्दे उनसे

निकलने वाली दो मूत्र वाहिनियां, मूत्राशय तथा मूत्र नली होती है।


० तंत्रिका-तंत्र बाहरी संसार का ज्ञान कराता एवं शरीर के भीतर के

अंग-तंत्रों का समन्वय करता हे।


० तंत्रिका-तंत्र के मुख्य भाग मस्तिष्क, मेरू रज्जु, तंत्रिकाएं तथा संवेदी अंग

होते हैं।

मुक्त बेसिक शिक्षा - भारतीय ज्ञान परम्परा BN 1195 |


० मस्तिष्क में प्रमस्तिष्क चिंतन, बुद्धिमत्ता आदि का केन्द्र है तथा अनुमस्तिष्क

पेशियों की गति को नियंत्रित करता है।

टमी ® मेरू रज्जु रीढ़ में स्थित होता है और शरीर तथा मस्तिष्क के बीच संदेशों

के आवागमन का माध्यम होता है।


तंत्रिकाएं °

० तंत्रिकाएं तीन प्रकार की होती हैं संवेदी , प्रैरक तंत्रिकाएं तथा

मिश्रित तंत्रिकाएं।

० हमारे पांच संवेदी अंग हैं, आंख, नाक, कान, जीभ और त्वचा।