शिक्षा पाठ्यक्रम एवं निर्देशिका-संस्कृति

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Contents

प्रस्तावना

मनुष्य अन्य प्राणियों की अपेक्षा अनेक प्रकार से विशिष्ट है[1]। मनुष्य ने अपना जीवन अन्य प्राणियों से भिन्न प्रकार का बनाया है। मनुष्य ने परिवार बनाया, समाज की रचना की, उद्योगों की स्थापना की, शासनव्यवस्था का निर्माण किया, तपस्या की, मोक्ष प्राप्ति की कल्पना की। मनुष्य ने धर्म बनाया, अनेक संप्रदायों की स्थापना की, शास्त्रों की रचना की, ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने का प्रयास किया।

मनुष्य कभी अकेला नहीं रहता है, अकेला रह भी नहीं सकता, उसका संबंध अपने परिवार के साथ है, अपने समाज के साथ है, अपने देश से है, संपूर्ण मानवजाति से है, संपूर्ण सृष्टि से है एवं परमात्मा से भी है।

इन सभी संबंधों में सामंजस्य बना रहे एवं सभी व्यवस्थाएँ तथा समग्र सृष्टि बनी रहे, सुखी रहे, समृद्ध रहे एवं सबका कल्याण हो अतः मनुष्य ने धर्म की रचना की। धर्म अर्थात् संप्रदाय नहीं, धर्म अर्थात् मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च भी नहीं। धर्म के विषय में शास्त्रो में दी गई दो व्याख्याएँ समझने लायक हैं।

१. धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः।

अर्थात् धारण करता हैं अतः उसे धर्म कहते हैं। धर्म प्रजाओं को धारण करता है। धारण करता है अतः टिकाए रखता है। (आज भी टिकाऊ शब्द का बुद्धिजीवी वर्ग बहुत ही आदर करता है। 'टिकाऊपन' को अंग्रेजी में Sustainability कहते हैं।)

२. यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।

जिससे सांसारिक बातों में अत्यंत प्रगति हो एवं मोक्ष की भी प्राप्ति हो वही धर्म है।

इन दोनों व्याख्याओं के अनुसार मनुष्य की व्यक्तिगत तथा सामुदायिक सर्व प्रकार की सुखाकारी के लिए सबसे अधिक उपयोगी यदि कोई बात है तो वह धर्म है। इस धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है संस्कृति। संस्कृति का अर्थ है जीवनशैली, जीवनपद्धति, सुसंस्कृत, सभ्य मनुष्यों की जीवनशैली।

संस्कृति शब्द के विषय में आजकल काफी गलतफहमी फैली है।

गीत, संगीत, नृत्य, नाटक, चित्र, शिल्प, आभूषण इत्यादि को आज संस्कृति कहा जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम अर्थात् गरबा, रास, नाटक इत्यादि कार्यक्रम माने जाते हैं। विदेशों में जब हमारे प्रतिनिधिमंडल के सदस्य जाते हैं तब उनमें गायक, वादक, नर्तक इत्यादि ही होते हैं। परंतु संगीत, नृत्य इत्यादि ही संस्कृति नही है। ये तो संस्कृति का एक भाग हैं, और वह भी कम महत्वपूर्ण। वास्तव में संस्कृति का अर्थ है जीवन जीने के मूल तत्त्व एवं उनके अनुरूप व्यवहार।

उदाहरण के तौर पर:

धार्मिक जीवनशैली के कुछ लक्षण इस प्रकार बताए जा सकते हैं। १. मातापिता का सम्मान करना। २. परिवार के लिए कष्ट सहना, त्याग करना। ३. व्यक्तिगत जीवन में सादगी, सेवा, संयम को अहम स्थान देना। ४. पहले अन्य के बारे में सोचना, बाद में अपने बारे में। ५. अपने सुख के लिए प्रकृति का शोषण नहीं करना। ६. हिंसा नहीं करना। ७. प्राणियों की सेवा करना एवं उनकी रक्षा करना। ८. जड़़चेतन सभी में परमात्मा का वास है वह जानना। ९. समाज के प्रति अपना ऋण चुकाना। १०. समग्र विश्व को अपना परिवार समझना। ११. देशद्रोह नहीं करना। १२. स्त्रियों का आदर करना।

इस सूची को और भी बढ़ाया जा सकता है।

जीवनशैली के ये आधारभूत मूल्य हैं। यह जीवनशैली हमें परंपरा से विरासत में मिली है। हमें ही इसका जतन करना है। सहेजना है। सहेजने का प्रथम चरण है आचरण। यह सब केवल कहने भर के लिए नहीं परंतु आचरण में आना चाहिए। इसके बारे में केवल जानकारी एकत्र करना नही, पढ़ना नहीं, अपितु उसके अनुसार आचरण करना चाहिए। दूसरे क्रम पर इसकी अहमियत होनी चाहिए। इसके प्रति निष्ठा जागृत होना चाहिए। इसके बाद इसका महत्व बुद्धि से समझना चाहिए। पाँच-सात वर्ष की आयु में ही आचरण की आदतें बनने लगती है। मानस बनने लगता है। अतः उस अवस्था में आचरण एवं निष्ठा दोनों जागृत करने का प्रयास करना चाहिए। तभी हम संस्कृति का जतन कर पाएंगे।

यही सोचकर संस्कृति विषय को पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है।

पाठ्यक्रम

  1. हमारे पूर्वजों का परिचय प्राप्त करना, उनके लिए गर्व की अनुभूति करना एवं उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त करना।
  2. हमारे देश का परिचय प्राप्त करना, इसकी श्रेष्ठता के बारे में जानना, एवं धार्मिक नागरिक होने का गर्व होना।
  3. पर्यावरण की सुरक्षा करना।
  4. प्रकृति का परिचय प्राप्त करना एवं उसके साथ आत्मीय संबंध बनाना।
  5. सामाजिक उत्सवों एवं पर्यों के बारे में जानना एवं उन्हें मनाने में सहभागी बनना।
  6. नृत्य, गीत, संगीत, कला इत्यादि का आनंद लेना एवं उन्हें आत्मसात करने का प्रयास करना।
  7. दान व सेवा के लिए तत्पर रहना।
  8. परिवार के एक सदस्य के रूप में परिवार की सेवा करना।
  9. वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को आत्मसात् करना।
  10. 'हम सब एक हैं' इस सत्य को आत्मसात् करने का प्रयास करना।

विवरण

इस पाठ्यक्रम को देखकर यह तो बहुत कठिन है ऐसी धारणा बनने की संभावना बहुत है। छात्रों की आयु के आधार पर यह सब बहुत जल्दी से लागू कर दिया गया है ऐसा लगेगा।

परंतु थोड़ा सोचने पर समझ में आयेगा कि यदि हम ऐसी इच्छा रखते हैं कि छात्रों के व्यवहार-वाणी में यह सब अनुस्यूत हो जाए, तो हमें यह सब इसी कक्षा से आरम्भ करना होगा। हाँ, उसकी शैली, उसके माध्यम, उसके क्रियाकलाप आदि इस आय के अनुरूप हों यह आवश्यक है।

इस विषय में भौतिक लाभ हो, या कोई व्यवसाय किया जा सकेगा - ऐसा कुछ भी नहीं है। अतः परीक्षा में अंक प्राप्त करने या रैंक बनाने की दृष्टि से इसमें कुछ भी नहीं है। परंतु चरित्रनिर्माण की दृष्टि से एवं देश को समृद्ध एवं श्रेष्ठ बनाने की दृष्टि से बहुत कुछ है जो बहुत अहमियत रखता है। केवल भौतिक मनुष्य के स्थान पर सुसंस्कृत मनुष्य के निर्माण में इसकी बहुत अहमियत है।

पूर्वजों का परिचय

पूर्वजों अर्थात् केवल हमारे परिवार के पूर्वज ही नहीं अपितु एक प्रजा के रूप में, एक राष्ट्र के रूप में हमारे राष्ट्रीय पूर्वज हैं जिन्होंने हमारे देश को, हमारे समाज को तपस्या करके, ज्ञानसाधना करके, रणमैदान में पराक्रम करके, कला-कारीगरी का विकास करके, उद्योगतंत्रों की स्थापना करके अत्यंत उन्नत अवस्था में पहुँचाया है। इन सभी के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करना, उनके वारिस के रूप में गर्व का अनुभव करना, उनसे प्राप्त विरासत का जतन करके उसे और समृद्ध बनाने का प्रयास करना, उनके समान बनने का प्रयास करना, एवं अपने बाद की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्वरूप विरासत छोड़कर जाना, हमारा स्वाभाविक कर्तव्य है।

अपने देश का परिचय प्राप्त करना

आजकल ऐसा बहुत देखने को मिलता है कि भारत के लोगोंं को ही भारत का पूरा परिचय नहीं होता है। यह मात्र भौगोलिक या प्राकृतिक परिचय की बात नहीं है। भारत का इतिहास, ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ, भारत का सामर्थ्य, भारत की समृद्धि, भारत की विशेषता-इन सबकी सही, सुयोग्य एवं पर्याप्त सूचना भारत के प्रत्येक नागरिक को होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त धार्मिक होने के नाते चाहे जितनी प्रगति की हो परंतु हम एक तरह की हीनताग्रंथि से पीड़ित रहते हैं। छात्रों के मन में ऐसा हीनताबोध न जगे एवं यदि हो तो यह दूर हो जाए अतः भारत के बारे में सही जानकारी देना एवं छात्रों के मन में गौरव जगाना आवश्यक है।

पर्यावरण की सुरक्षा करना

शायद इस मुद्दे की विशेष समझ देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पर्यावरण का प्रदूषण आज वैश्विक समस्या बन गया है। जमीन, पानी एवं हवा का प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मानसिक या वैचारिक प्रदूषण एव उसके कारण पैदा होने वाली स्वास्थ्य एवं संस्कृति विषयक गंभीर समस्याओं का हम निरंतर सामना कर रहे हैं। इसका उपाय सर्वस्तर पर करने की आवश्यकता है। सर्वस्तर में विद्यालय का समावेश भी हो हो जाता है। पर्यावरण सुरक्षा के क्रियात्मक उपाय विद्यालय में करना इस पाठ्यक्रम में अभिप्रेत हैं।

प्रकृति का परिचय प्राप्त करना

हम भी अपने आसपास फैली प्रकृति के ही अंश है। प्रकृति के कारण ही हमारा जीवन संभव है। सूर्य हमें जीवन देता है। रात्रि विश्रांति प्रदान करती है, चंद्र शीतलता प्रदान करता है, भूमि अन्न, वस्त्र एवं आश्रय तीनों प्रदान करती है, नदी जल प्रदान करती है, पर्वत रक्षण प्रदान करते हैं,समुद्र रत्न प्रदान करते हैं, इत्यादि। इन सभी के प्रति जानकार बनना, कृतज्ञ बनना, इनका रक्षण करना, इनसे प्रेम करना एवं इन्हें अपना समझना सुखी एवं समृद्ध जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज मनुष्य स्वार्थी बन गया है। इन सभी का अपने स्वार्थ के लिए शोषण कर रहा है एवं इन सभी के साथ ही अपने विनाश को भी आमंत्रित कर रहा है। इन विनाश को रोकने के लिए प्रकृति से अपने संबंध को सुधारने की आवश्यकता है। इसके लिए छोटी उम्र से ही छात्रों को तैयार होना पड़ेगा।

सामाजिक उत्सवों एवं पर्वों के बारे में जानना

समाज के सभी सदस्यों का सहजीवन आनंदपूर्ण बने; सबके मध्य आत्मीयता एवं स्नेहभाव बना रहे, निर्बल-सबल सभी एकदूसरे के सहारे जीवन जीते रहें, किसीकी असुरक्षा की समस्या का निर्माण न हो, 'पंच की लकड़ी एक का बोझ' के नाते सबका पोषण हो इस दृष्टि से हमारी समाजव्यवस्था की परंपरा में उत्सवों एवं पर्यों का आयोजन होता आया है। इस उत्सव परंपरा को बनाए रखना चाहिए; उसका सामाजिक एवं वैज्ञानिक रूप जानना चाहिए एवं उसी तरह मनाना भी चाहिए।

पूर्व में बताए गए अनुसार नृत्य, गीत, संगीत इत्यादि स्वयं में संस्कृति नहीं हैं अपितु संस्कृति के अंग के समान हैं। अतः संस्कृति के विषय में उनका समावेश स्वाभाविक है। नृत्य, गीत, संगीत इत्यादि उत्सव पर्व, अच्छे शुभ प्रसंग का एक अहम् हिस्सा बन जाता हैं। अतः ऐसे सभी कार्यक्रमों का आयोजन करके उसमें सभी को सहभागी बनाना चाहिए। ये सभी कार्यक्रम विकृत न बन जाएँ एवं उनमें भद्दापन प्रदर्शित न हो इसकी सावधानी रखना आवश्यक है। उन सभी का शुद्ध सांस्कृतिक रूप बनाए रखना, उन्हें सुरूचिपूर्ण बनाना, वर्तमान समय में प्रयासपूर्वक करनेवाली बात बन चुकी है। आज के दूरदर्शन के प्रभाव के कारण ही यह खतरा पैदा हुआ है। उसके सामने हमें अपनी नई पीढ़ी के संस्कार एवं मानसिकता का जतन करने की एक बहुत बड़ी चुनौती पैदा हुई है। इसे खूब अहमियत देकर घर घर में एवं विद्यालय में करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ का ध्यान में रखकर ही ये क्रियाकलाप करने चाहिए।

दान एवं सेवा के लिए तत्पर रहना

दान एवं सेवा हमारी ऐसी सामाजिक परंपरा है जिसके कारण आज हजारों वर्षों से हमारा समाज टिका हुआ है। परंतु दान एवं सेवा करने के लिए स्वार्थ का त्याग करना पड़ता है एवं परिश्रम भी करना पड़ता है। यह सद्गुणविकास है। हमारे समाज को यदि टिकाए रखना हो तो उसके आधाररूप दान एवं सेवा की वृत्ति एवं प्रवृत्ति का विकास हो ऐसा आयोजन पाठ्यक्रम में करना ही पड़ेगा।

परिवार की सेवा

समाजव्यवस्था की मूल ईकाई परिवार है। आज समग्र विश्व मनोवैज्ञानिक समस्याओं एवं उसके कारण निर्मित हिंसा, बलात्कार आदि से त्रस्त हो गया है। उसके उपाय के रूप में धार्मिक समाजव्यवस्था की ओर आशाभरी निगाहों से विश्व देख रहा है। हमें भी अपनी परिवार व्यवस्था का मूल्य जानना चाहिए एवं उसकी संभाल करना चाहिए। इस दृष्टि से तीन बातें अहम हैं:

  1. परिवार भावना : परिवार भावना अर्थात् आत्मीयता। आत्मीयता अर्थात्अ पनापन। जहां अपनापन होता है वहीं प्रेम होता है, समर्पण होता है। एकदूसरे के सुखदुःख में लोग सहभागी बनते हैं। एकदूसरे की सहायता करते हैं। ऐसी परिवार भावना का विकास छात्रों में बचपन से ही करना चाहिए।
  2. परिवार की व्यवस्था : परिवार यदि साथ में रहता है तो साथ मिलकर ही उन्हें सब काम करने होते हैं। ऐसे कार्यों को परिवार के सभी लोगोंं को मिलजुलकर करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर भोजन बनाना, घर की स्वच्छता करना, बीमार की परवरिश करना, अतिथिसेवा करना इत्यादि । घर के ऐसे सभी काम घर के सभी सदस्यों को आना चाहिए, एवं आवश्यकता पड़ने पर उन्हें करने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। हमें यह भी ख्याल रखना आवश्यक है कि प्रत्येक बालिका को बड़ी होकर पत्नी, गृहिणी एवं माता बनना है। प्रत्येक बालक को बड़ा होकर पति, गृहस्थ एवं पिता बनना है। दोनों को मिलकर घर चलाना, अपने सामाजिक दायित्व को निभाना एवं नई पीढ़ी को भी तैयार करना होता है। इस दृष्टि से वर्तमान समय में परिवार व्यवस्था का अपनी आयु के अनुरूप क्रियात्मक अनुभव प्राप्त होना आवश्यक है।
  3. परिवार की परंपरा एवं परिचय : हम कई लोगोंं को कहते हुए सुनते हैं कि हमारे घर में तो ऐसा होता है। या ऐसा नहीं होता। यह वंशपरंपरा से हमारे परिवारों में विरासत के रूप में उतरता है। कुछ रिवाज, कुछ पद्धतियाँ, कुछ कौशल (रोग, रंग, रूप, ढाँचा इत्यादि भी) वंशानुगत होते हैं। इनमें से अच्छी बातों को सीख लेना चाहिए, उन्हें और अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। बुरी बातों को छोड़ देना वर्तमान पीढ़ी को करना चाहिए। इसके अतिरिक्त पारिवारिक संबंध भी जानने का विषय है। अतः इन बातों का भी पाठ्यक्रम में समावेश होना चाहिए। यह सब जानना, समझा, मानना एवं करना ही परिवार की सेवा है।

वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को आत्मसात करना

हम सब एक हैं अतः मेरा विश्व के मानवमात्र के प्रति जो कर्तव्य है उस कर्तव्य को निभाना मुझे सीखना है। ऐसी भावना छात्रों में जगाने के लिए इस मुद्दे का पाठ्यक्रम में समावेश किया गया है। सारी सृष्टि एक ही है एवं सभी एक ही तत्त्व के अलग अलग रूप हैं इसका अनुभव भी मानवजीवन में होना ही चाहिए। तभी हमारी विकास की संकल्पना को पूर्णता प्राप्त होगी।

क्रियाकलाप, कार्यक्रम एवं प्रकल्प

इन सभी उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए जो क्रियाकलाप, कार्यक्रम एवं प्रकल्प हो सकते हैं वे इस प्रकार हैं -

क्रियाकलाप

कहानी सुनना

पूर्वजों, महापुरुषों, भारत की उपलब्धियों इत्यादि के बारे में कहानी सुनना बहुत ही आनंददायक एवं उपयोगी क्रियाकलाप है। इसके लिए शिक्षक के पास कहानियों का खजाना होना चाहिए। विद्यालय के पुस्तकालय में इस विषय पर आधारित पुस्तकें होनी चाहिए।

चित्रप्रदर्शन

इसी विषय में संबंधित सुंदर, अर्थपूर्ण चित्रों का संग्रह विद्यालय में होना चाहिए। समय समय पर ऐसे चित्रों का प्रदर्शन भी होना चाहिए। पुस्तकालय में बैठकर चित्र देखने के लिए अलग से समय की व्यवस्था करना चाहिए। यहाँ चित्रकथाएँँ भी बहुत उपयोगी सिद्ध होती हैं।

चित्रपुस्तिकाएँ तैयार करना

छात्र स्वयं भी चित्र एकत्र करें एवं अपनी अपनी पुस्तिका तैयार करें।

पर्यटन

अपने ही गाँव या शहर के सांस्कृतिक केन्द्र की भेंट लेकर उसके विषय में सूचनाएँ एकत्र करें।

गीत व नाटक

सांस्कृतिक विषयों से संबधित गीत गाना एवं नाटक खेलना भी उपयोगी क्रियाकलाप है।

कार्यक्रम

रंगमंच कार्यक्रम

रास, नृत्य, नाटक, वेशभूषा इत्यादि से युक्त सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जा सकता है। संस्कृति से संबंधित वस्तुओं के प्रदर्शन का कार्यक्रम भी हो सकता है। उत्सव, पर्व, जन्मजयंति आदि मनाने के कार्यक्रम भी हो सकते हैं। जन्मदिनोत्सव, यज्ञ, सरस्वतीपूजन, सूर्यपूजन जैसे कार्यक्रम भी हो सकते हैं।

वृक्षारोपण

पर्यावरणीय दृष्टि से वृक्षारोपण का कार्यक्रम सबसे अहम है।

ज्ञान के स्रोत समान ग्रंथों का प्रदर्शन एवं पूजा

ज्ञान के क्षेत्र में भारत को विश्वगुरु के पद पर स्थापित किया गया है। ज्ञान शास्त्रग्रंथों में संग्रहित (रक्षित) है । इन ग्रंथों की शोभायात्रा, इनका पूजन एवं उनके नाम जानने एवं देखने के कार्यक्रम भी हो सकते हैं।

शस्त्र एवं पाटी की पूजा

विजयादशमी के दिन पाटी की पूजा करना, शस्त्रों की पूजा करना एवं विद्वानों का सम्मान करने का कार्यक्रम भी हो सकता है।

मकरसंक्रांति के दिन गाय को बाजरा खिलाना एवं गरीबों को दान देने का कार्य

यह कार्य भी छात्र कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षक अपनी कल्पना से अन्य कार्यक्रमों का आयोजन भी कर सकते हैं।

प्रकल्प

  1. मुष्टि धान्य योजना : पूरा वर्ष अनाज एकत्रित करके मकरसंक्रांति के दिन गरीबों को बाँटने का प्रकल्प विद्यालय में चला सकते हैं। (इस विषय में अधिक जानकारी उद्योग विषय में दी जा चुकी है।)
  2. सार्वजनिक प्रदर्शन : संस्कृति विषय पर एवं पर्यावरण विषय पर एक छोटा सा जानकारियों से भरपूर प्रदर्शन तैयार करके सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।
  3. नृत्य, गीत, संगीत का आधे घण्टे का कार्यक्रम तैयार करके मंदिर, पुस्तकालय, समाचारपत्र आदि में प्रदर्शित किया जा सकता है। इसका विषयवस्तु संस्कृति परिचय का एवं भारत परिचय का होना चाहिए। (अन्य प्रकल्प शिक्षक अपनी कल्पना से आयोजित कर सकते हैं।)
  4. व्यवस्थाएँ:
    1. पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से विद्यालय में कुछ व्यवस्थाएँ भी करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर"
      1. प्लास्टिक का उपयोग कम करें या न करें।
      2. पानी बचाएँ। नल खुले न रखें।
      3. बगीचे में रासायनिक खाद का प्रयोग न करें।
      4. विद्यालय की स्वच्छता के लिए डिटरजन्ट का उपयोग न करें।
      5. सूती गणवेश पहनें।
      6. कूड़े के योग्य निकाल की व्यवस्था करें। सिन्थेटिक एवं प्राकृतिक कूडे को अलग अलग रखें।
      7. विद्यालय के भवनों की रचना इस तरह से करवाएँ कि कूलर, पंखा इत्यादि का कम से कम उपयोग करना पड़े या न करना पड़े।
      8. भूमिगत पानी के निकास की व्यवस्था (अन्डरग्राउन्ड ड्रेनेज) हो सके तो न करके सारे गंदे पानी का उपयोग हो सके ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए।
      9. वर्षा के पानी के संग्रह की व्यवस्था करनी चाहिए।
      10. शौचालय वगैरह की स्वच्छता का खास ख्याल रखना चाहिए।
    2. संस्कृति परिचय के लिए कुछ व्यवस्थाओं पर विचार हो सकता है।
      1. भोजन व अध्ययन के लिए जमीन पर बैठने की व्यवस्था करें।
      2. भोजन को पवित्र मानकर उसे बुहारकर कूडेदान में डालने के बजाय गाय को खिलाने की व्यवस्था करे।
      3. विद्यालय में नित्य यज्ञ की व्यवस्था होना चाहिए।
      4. विद्यालय में चित्र, ध्वनिमुद्रिकाओं की व्यवस्था सांस्कृतिक दृष्टि से करें।
      5. ध्वनिप्रदूषण न हो इसका ख्याल रखें।
      6. जूते पहनकर पढ़ाई नहीं करनी चाहिए ऐसी व्यवस्था का भावात्मक रूप से स्वीकार करें। जैसे जैसे विषय ध्यान में आता है त्यों त्यों शिक्षकों, अभिभावकों एवं व्यवस्थापकों को अनेक नई नई कल्पनाएँ आती हैं। उसीके अनुसार स्वाभाविक रूप से सभी व्यवस्थाएँ होती जाएँ यह अपेक्षित है।

विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह सब केवल विद्यालय में ही नहीं अपितु घर में भी होना चाहिए। अभिभावकों को विद्यालय की व्यवस्थाओं को समझना चाहिए एवं उनका स्वीकार करना चाहिए। इन व्यवस्थाओं को बनाये रखने में विद्यालय को सहयोग देना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर विद्यालय को भी मातापिता को सहयोग देना चाहिए। मुख्यरूप से देखा जाए तो घर ही संस्कृति रक्षा का केन्द्र है।

References

  1. प्रारम्भिक पाठ्यक्रम एवं आचार्य अभिभावक निर्देशिका - अध्याय ४, प्रकाशक: पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, लेखिका: श्रीमती इंदुमती काटदरे