Difference between revisions of "Vedon me vayu samrkshan(वेदो में वायु संरक्षण)"

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== वेदों में वायु संरक्षण ==
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शुद्ध हवा में सांस लिये बिना जीवित रहना हमारे लिए संभव नहीं है, इसलिए वायु के संरक्षण पर ध्यान देना बहुत आवश्यक हेै।
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* वेदों में वायु के महत्व को सतही तौर पर जान पाने में; और
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* वेदों में वायु संरक्षण की मूल भावना को समझ पाने में।
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वायु के महत्व को उल्लेखित करते हुए अथर्ववेद में कहा गया है कि वायु आकाशीय जल को सर्वत्र पहुंचाने में सहायक होती है जिससे अन्नादि में समृद्धि आती है-<blockquote>'''उत्समक्षितं व्यचान्ति ये सदा य आसिक्रचनि रसमोषधीष, पुरो दधे मरुतः पृश्निमात्हस्ते नो मुजञ्चंत्वंहसः।'''</blockquote>'''( अथर्ववेद 4.27.2)'''
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अर्थात्‌ जो वायु सींचने वाले जल को अनेक प्रकार से यहाँ-वहाँ पहुँचाते हैं, जो इसको अन्नादि औषधियों तक ले जाते हैं, छूने योग्य पदार्थो तथा आकाश को नापने वाले उन वायु देवताओं को में सम्मुख रखता हूँ। ऐसे वायु देवता हमें सभी कष्टों से मुक्ति दिलावें।
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चित्र 8.1 वायु द्वारा आकाशीय जल का संरक्षण
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वेदों में वायु को सम्मान देते हुए कहा गया है कि वायु हमारे रक्षा करें-<blockquote>'''त्रायन्तां मरूतां गणः'''
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'''(ऋग्वेद 10.137.5)'''</blockquote>अर्थात्‌, हे वायु गण हमारी रक्षा करो। प्रकृति में हो रहे असंतुलनों में वायु के रौद्र रूप जैसे आँधी, तूफान से होने वाले नुकसान के प्रति वेदों में प्रार्थना की गई है कि हे वायु देवता हमारी प्रार्थना है कि आप हमेशा ही प्राणिमात्र के लिए अनुकूल रहे-<blockquote>'''मरूतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्त प्रेमं वाजं वाजवाते अवन्तु'''
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'''आशूनिव सुयमानद उतये तेवो मुञ्चन्त्वंहसः।।'''
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'''( अथर्ववेद 4.27.1)'''</blockquote>अर्थात्‌, दोषों का नाश करने वाली पवनों का में मन में स्मरण करता हूँ। वे पवन मेरे ऊपर कृपा करें तथा सभी को अन्न के सुख तथा दान देने योग्य बनायें  तेज गतिमान अश्वों के समान सुन्दर नियम वाले पवनों को मैंने अपनी रक्षा के लिए पुकारा है। वे पवन हमें सभी दुखों से मुक्ति प्रदान करें। यहाँ पर ऋषि पवन से कल्याणकारी बने रहने के लिए निवेदन कर रहा है। पर्यावरण सुरक्षा को चिंता को इंगित करते हुए ऋषि कहता हे कि हे पवन! आप अन्नादि (तृणदि), वृक्षादि से युक्त खेतों को नुकसान मत पहुँचाओ-<blockquote>'''यत्मीमन्तं न चूनुय'''
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'''(ऋग्वेद 1.37.6)'''</blockquote>अन्तरिक्ष में होने वाले कई प्रकार के विकारों से हमें वायु बचाती हे। इसलिए ऋग्वेद का ऋषि प्रार्थना करता है कि हे पवन अन्तरिक्ष में होने वाले उपद्रवों से हमें संरक्षित करें- <blockquote>'''“पातु वातो अन्तरिक्षात्‌”'''
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'''(ऋग्वेद 10.158.1)'''</blockquote>अथर्ववेद में वायु को मलीनता नाशक तथा कष्टों का नाशक बताया गया है-<blockquote>'''आपो वायो सविता च दुष्कृतमय रक्षाणि निमिदां च मेघतम्‌।'''
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'''संहयूर्जया सृजयः संकलेन ता नो मुञ्चन्तवंहमः।।'''
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'''( अथर्ववेद 4.25.2)'''</blockquote>अर्थात्‌, हे वायु और सूर्य देवता, आप दोनों मिलकर यहां कि मलीनता को हटा दो। रोगों का निवारण कर दो तथा कष्टों को दूर कर दो क्योंकि आप दोनों ही आत्मिक तृष्टि के साथ मिलाते हो तथा शरीरिक बल से युक्त करते हो। अतः आप हमें कष्टों व दुखों से मुक्ति प्रदान करो।
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इस तरह हम देखते हैं कि आक्सीजन को वेदों में प्राणवायु कहा गया हे तथा आदेशित किया गया हे कि हमें वायु संरक्षण अर्थात्‌ वायु को शुद्ध रूप में बनाये रखने का प्रयास करते रहना चाहिए। हमें वायु को प्रदूषित नहीं करना चाहिए और जो भी कोई ऐसा वायु प्रदूषित करता है तो उसका अपराध अक्षम्य है।
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चित्र 8.1 प्राणवायु
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वायु का महत्व बताते हुए कहा जाता हे कि वायु अन्य सभी वस्तुओं को शुद्धता प्रदान करती है। जल को शुद्ध करती हे। इसलिए वेद हमें निर्देशित करता है कि ऐसा कोई भी कर्म ना करें जिससे वायु अशुद्ध हो। हमें हमारी दैनिक दिनचर्या को इस तरह से रखना चाहिए कि हम वायु को संरक्षित करें तथा लेशमात्र भी वायु प्रदूषण न होने दें।
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अंतरिक्ष में आने वाली पराबेंगनी तथा अन्य जहरीली गैसों से पृथ्वी का बचाव करने कि प्रार्थना वेदों में की गई है। संक्षेप में कह सकते हैं कि वैदिक साहित्य में वायु की पवित्रता बनाये रखने पर अत्यधिक जोर दिया गया हे।
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Latest revision as of 07:29, 29 December 2022

वायु भी पञ्चमहाभूतों में एक महाभूत है। हवा हमें दिखाई नहीं देती। यह, हमारे चारों ओर है इसका अहसास हमें अक्सर होता रहता है, जैसे कि जब आँधी चलती है या जब हमें वायु के विरूद्ध साईकिल चलानी पड़ती हे या फिर जब हम साईकिल या फुटबाल में हवा भरते हैं।

वास्तव में, पृथ्वी के चारों ओर वायु की एक छोटी परत होती है, वायु की मोटी परत को वायुमंडल कहते हैं। पृथ्वी पर जीवन वायु के बिना संभव ही नहीं है। वायु में हम सांस लेते हैं। वायु से ही ईधन जलता हे, जिससे हम अपना खाना पकाते हैं। मौसम के सारे परिवर्तनों का मूल भी वायु ही है।

उद्देश्य

० वायु की संरचना जान पाने में;

० पौधों के लिए वायु की उपयोगिता जान पाने में; और

० स्वस्थ जीवन के लिए वायु को स्वच्छ बनाए रखने में हमारे योगदान को बता पाने में।


वायु रंगहीन, गंधहीन व स्वादहीन होती है। यह कई गैसों का मिश्रण हेै। हम इसके आर-पार देख सकते हैं इनके अलावा वायु के कुछ और गुण भी हैं:

1. वायु स्थान घेरती है

2. वायु में भार होता है,

3. वायु दाब डालती है,

4. वायु को दबा कर उसका आयतन कम किया जा सकता हे।

वायु स्थान घेरती है

पदार्थ स्थान घेरता है। वायु भी एक पदार्थ है। किसी भी दूसरे पदार्थ की तरह वायु भी स्थान घेरती है। आप किसी ऐसे गिलास को देखिए जिसमें कुछ न हो। क्या यह खाली है? वास्तव में यह बिल्कुल खाली नहीं है? इसके अंदर का खाली स्थान हवा से भरा है।

क्रियाकलाप द्वारा सीखे :-

आपको क्या करना है : सिद्ध करना है कि वायु स्थान घेरती है।

आपको क्या चाहिए : एक पारदर्शी बोतल और बाल्टी में पानी।

आपको कैसे करना है : बोतल के मुंह को अंगूठे से बंद कीजिए। अब इसे पूरी तरह पानी में डुबाइए। धीरे से अंगूठा हटाइए। देखिए क्या होता है?

बोतल में से क्या बुलबुले निकल रहे हैं? क्या पानी भी बोतल के भीतर जा रहा है? सोचिए से बुलबुले कहाँ से आ रहे हैं।

निष्कर्ष :

आपने देखा कि बोतल के मुंह को पानी में खोलने पर पानी ने बोतल में प्रवेश किया। वायु का स्थान पानी ने ले लिया। वायु बुलबुलों के रूप में बाहर आई। खाली दिखाई देने वाली बोतल में वायु भरी थी।

आपने सीखा कि खाली दिखाई पड॒ने वाली बोतल में वास्तव में वायु होती है।

वायु में भार होता है

यह सुनिश्चित करने के लिए कि वायु में भार होता है,

क्रियाकलाप द्वारा सीखे :-

आपको क्या करना है : सिद्ध करना है कि वायु में भार है।

आपको क्या चाहिए : साईकिल के पहिये की रबड़ की ट्यूब, कमानीदार तुला, बाट।

आपको कैसे करना है :

1. पहले बिना हवा भरी ट्यूब को कमानीदार तुला में तोलिए तथा भार ज्ञात करिए।

2. अब रबड़ की ट्यूब में हवा भर कर उसे पूरा फुला लीजिए तथा दोबारा भार ज्ञात करिए।

3. क्या अब भार बढ़ जाता हे?

आपने देखा कि हवा में भार होता हे।

वायु दाब डालती है

पृथ्वी के चारों ओर वायु की जो परत हे वह पृथ्वी पर दाब डालती है, जिसे वायुमंडलीय दाब या वायु दाब कहते हैं। आपको मालूम होना चाहिए कि समुद्र-तल पर वायु का दाब सर्वाधिक हे। समुद्र तल से जैसे-जैसे हम ऊपर की ओर जाते हैं, वायु दाब कम होता जाता है। ऐसा इसलिए होता हे क्योंकि ऊँचाई पर वायु की मात्रा कम हो जाती है। वायु सब ओर बराबर दाब डालती है। हमारे दैनिक कार्यकलापों में वायुदाब के अनेक उपयोग हैं जिनके बारे में आप आगे की कक्षाओं में पढ़ेंगे? वायु दाब डालती हे यह सिद्ध करने के लिए

क्रियाकलाप द्वारा सीखे :-

आपको क्या करना है : सिद्ध करना है कि वायु दाब डालती है।

आपको क्या चाहिए : एक काँच का गिलास, एक गते का टुकडा, पानी।

आपको कैसे करना है :

1. काँच के गिलास को लबालब पानी से भरें और इसके ऊपर गत्ते के टुकडे को खिसकाएं।

2. एक हाथ की हथेली से गत्ते को दबाये रखते हुए गिलास को उल्टा करें। यह ध्यान रखिये कि इस प्रक्रिया में गिलास से पानी गिरने न पाये।

3. अब गत्ते पर से हाथ धीरे से हटा लीजिए।

क्या देखा आपने :

यही कि हाथ हटा लेने के बाद भी गत्ते को टुकड़ा गिलास से चिपका रहता हे, नीचे नहीं गिरता।

क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों हुआ :

ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि गत्ते के टुकडे पर नीचे से ऊपर की ओर वायु का दाब लगता हे।

वायु को दबा कर उसका आयतन कम किया जा सकता है

किसी गैस के अणुओं के बीच नहीं के बराबर आकर्षण बल होता हे। अणु एक दूसरे से काफी दूर-दूर होते हैं। इसलिए गैस को दबाकर उसका आयतन कम करना संभव होता है। वायु, चूंकि एक गैस है, उसको भी दबाकर इसका आयतन कम किया जा सकता है। यह प्रक्रिया संपीडन कहलाती हे। वास्तव में जब आप गुब्बारे में हवा भरते हैं तो हवा हो संपीडित करते हैं क्योंकि बाहर जो हवा काफी बड़े आयतन में फैली थी उसको आप गुब्बारे के थोडे से आयतन में सीमित कर देते हैं।

वायु की संरचना

वायु कई गैसों का एक मिश्रण है, इसमें मुख्य रूप में नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बन-डाईआक्साइड तथा अल्प मात्रा में आर्गन, हीलियम, निन, हाइड्रोजन आदि होते हैं। वायु में धूल, धुएं और जल वाष्य की भी कुछ मात्रा होती है, जिनकी प्रतिशत मात्रा परिवेश के अनुसार बदलती रहती है। वायु में मौजूद गैसें किसी न किसी रूप में हमारे जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। आइये वायु के मुख्य घटकों और जीवन में उनके महत्त्व के बारे में कुछ अधिक विस्तार से जाने।

वायु के विभिन्न घटकों का महत्त्व

- नाइट्रोजन -

पृथ्वी की वायु के कुल आयतन का 78% भाग नाइट्रोजन गैस है। नाइट्रोजन एक गंधहीन व स्वादहीन गैस है। यह न तो स्वयं ज्वलनशील है तथा न ही ज्वलन में सहायक हे।

- ऑक्सीजन -

वायु के कुल आयतन का लगभग 21 प्रतिशत भाग ऑक्सीजन का होता है। ऑक्सीजन को प्राण-वायु भी कहते हैं। इसके बिना तो हम जी ही नहीं सकते। शुद्ध ऑक्सीजन सूंघने में तीखी होती हे। वायु में उपस्थित नाइट्रोइन, इसकी तीक्ष्णता को कम करती है। सभी पौधों और जानवरों को श्वसन के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जब हम सांस लेते हैं तो वायु की ऑक्सीजन भीतर लेते हैं और कार्बन-डाइआक्साइड बाहर निकालते हे। ऑक्सीजन स्वयं ज्वलनशील नहीं है परन्तु ऑक्सीजन ज्वलन में सहायक हें। जलते हुए ईधन को जितनी अधिक ऑक्सीजन मिलती है, उतनी ही तेजी से यह जलता है। क्या आपने कभी विचार किया हे कि जब हम चूल्हे में फँक मारते हैं तो लकडियाँ अधिक तेजी से क्यों जलने लगती हैं? बिना ऑक्सीजन कुछ भी जल नहीं सकता। सोचिए अगर वायु में केवल ऑक्सीजन ही होती

तो क्या होता? एक बार आग लग जाने पर उसको बुझाना मुश्किल हो जाता।

क्रियाकलाप द्वारा सीखे :-

आपको क्या करना है : सिद्ध करना है कि ज्वलन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है।

आपको क्या चाहिए : एक छोटी मोमबत्ती, दियासलाई, एक धातु की तश्तरी, काँच का एक बड़ा गिलास।

आपको कैसे करना है :

1. धातु की तश्तरी के बीच में मोमबत्ती लगाकर उसे जलाएं।

2. मोमबत्ती को गिलास से ढक दें और कुछ देर देखते रहें।

आपने क्या सीखा : यही कि गिलास के ढकने के कुछ देर बाद मोमबत्ती बुझ जाती है।


क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों हुआ?

क्योंकि गिलास ने बाहरी हवा से अंदर की हवा का संपक काट दिया। कुछ देर बाद गिलास के अंदर की हवा ने मोमबत्ती को जलाये रखने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन नहीं बची।

आपने क्या सीखा : किसी वस्तु को जलने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

ऑक्सीजन को कृत्रिम श्वसन के लिए प्रयोग में लाते हैं। पर्वतारोही, समुद्री गोताखोर एवं अंतरिक्ष यात्री भी सांस लेने के लिए अपने साथ ऑक्सीजन का सिलिंडर ले जाते हैं। अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलिंडर होते हैं। पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्र हमारी सांस के लिए पर्याप्त नहीं है यद्यपि जल में रहने वाले प्राणियों के लिए यह पर्याप्त है।

- कार्बन-डाई ऑक्साइड -

वायु में कार्बन-डाईआऑक्साइड बहुत कम मात्रा में पाई जाती है फिर भी यह वायु का बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटक है। पौधों एवं जानवरों के श्वसन तथा ईधन जलने की प्रक्रिया में कार्बन-डाईआक्साइड उत्पन्न होती हे। हरे पौधों द्वारा भोजन निर्माण की प्रक्रिया में यह काम में आती है। वायु की कार्बन-डाईऑक्साइड एक निश्चित औसत भूमंडलीय तापक्रम बनाये रखने में भी मदद करती है। यह ज्वलन क्रिया में सहायक नहीं है। यह ज्वलन प्रतिरोधक गैस है। क्या आपने सिनेमाघरों, दुकानों, भवनों की दीवार पर आग बुझाने के लिए लाल रंग के सिलेंडर टंगे हुए देखे हैं? इनमें लगे शीशे को तोडने पर उनमें से कार्बन-डाईऑक्साइड गैस निकलती हे, जो आग को बुझा देती है।

- अन्य गैसे -

वायु में पाई जाने वाली अन्य गैसें भी हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए, ओजोन सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकती है और इस प्रकार हमें उनके दुष्प्रभावों से बचाती हे।

- जल वाष्प -

वायु में पानी की भाप भी पाई जाती हे जो कि पृथ्वी को अलाशय से सूर्य किरणों द्वारा जल का वाष्पीकरण होने पर हवा में आती है क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया हे कि वायु में जलवाष्प की मात्रा हमेश समान नहीं रहती, बरसात में पसीना आसानी से नहीं सूखता। आइये, यह सुनिश्चित करें के वायु में जल वाष्प होती हे।

क्रियाकलाप द्वारा सीखे :-

आपको क्या करना है : सिद्ध करना है कि वायु में जलवाष्प होती है।

आपको क्या चाहिए : एक गिलास या काँच का बर्तन और बर्फ के कुछ टुकडे।

आपको कैसे करना है :

1. काँच के बर्तन में बर्फ के टुकडे डालकर कुछ देर रखें।

2. कुछ देर बाद बर्तन की बाहरी सतह को देखें। टिप्पणी

आपने क्या देखा : बर्तन की बाहरी सतह पर पानी की बूंदें नजर आती हें। क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों हुआ? इसलिए कि गिलास के ठंडा होने पर उसकी बाहरी दीवार के संपक में आने वाली हवा की जलवाष्प संघनित होकर गिलास की बाहरी दीवार पर जम जाती हे।

क्या सीखा आपने : यह, कि वायु में जलवाष्प होती हे।

नोट : यह प्रयोग बरसात में सरलता से स्पष्ट हो जाता है, तब वायु में जल वाष्प काफी मात्रा में होती हे। खुश्क दिन में कदाचित ऐसा होता न दिखायी पड़े। प्रत्येक ऋतु में तथा विभिन्न मौसमों में यह प्रयोग दोहराइए। प्रयोगों से निष्कर्ष भी निकालिए।

वायु के घटकों का संतुलन

आप पहले ही पढ़ चुके हैं कि वायु में विभिन्न गैसें विभिन्न मात्राओं में पाई जाती हैं। हमारे चारों ओर का वातावरण स्वस्थ बना रहे, इसके लिए इन गैसों में संतुलन बना रहना चाहिए। प्रकृति इस संतुलन को बनाये रखती हे।

चित्र में दर्शाए गए कार्बन चक्र का अध्ययन कीजिए। इससे स्पष्ट होता है कि किस प्रकार पौधे और जीव-जन्तु ऑक्सीजन को श्वसन क्रिया में प्रयोग करते हैं और किस प्रकार वायु में ऑक्सीजन व कार्बन डाईआऑक्साइड का संतुलन बना रहता हे। इस चक्र से प्रकृति में ऑक्सीजन और कार्बन डाईऑक्साइड की मात्राएं जितनी हैं उतनी केसे बनी रहती हें। इसी तरह के कुछ अन्य चक्र जैसे नाइट्रोजन चक्र, ऑक्सीजन चक्र आदि वायुमंडल में दूसरी गैसों का अनुपात अपरिवर्तनीय बनाये रखते हैं।

प्रकृति तो संतुलन बनाए रखती है परन्तु, जीव-मंडल का निराला सदस्य मानव, प्रकृति का यह संतुलन बिगाड़ रहा है। मानव द्वारा उद्योगों, कृषि, शहरों एवं आवासीय व्यवस्थाओं में किए जा रहें तेज विकास के परिणाम स्वरूप प्रकृति में असंतुलन आ गया है। हमारे विचारहीन कार्यकलापों एवं प्राकृतिक साधनों के अतिरिक्त दोहन के कारण वायु, जल एवं मिट्टी की प्रकृति में बहुत से अवांछित परिवर्तन आ रहे हैं। यह प्रदूषण कहलाता है। प्रदूषण के कारण मानवीय जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड रहा है।

चित्र 7.2 प्राकृतिक कार्बन चक्र

जो पदार्थ अथवा कारक प्रदूषण फैलाते हैं प्रदूषक कहलाते हैं। आमतौर पर हम चार तरह के प्रदूषकों की बात करते हैं-वायु, जल, मृदा एवं शोर-प्रदूषण। आइये, वायु-प्रदूषण और इसके प्रभावों के बारे में जानें।

वायु-प्रदूषण

जीवन के लिए हानिकारक गैसों या पदार्थ-कणों का हवा में मिलना वायु प्रदूषण का कारण बनता है। वायु प्रदूषण न सिर्फ हमारे स्वास्थ के लिए खतरनाक है, बल्कि यह हमारे वातावरण को भी खराब करता है। वायु प्रदूषण के बहुत से कारण हैं, जिनमें से कुछ यहाँ बताये गये हें।

वायु प्रदूषण के कारण

हमारे चारों ओर की वायु कई प्रकार से प्रदूषित हो सकती है कारखानों से निकले धुंऐ से भी वायु प्रदूषित हो जाती हे। इसीलिए यह हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता हे। क्या आपको मालूम है कि कई राज्यों की सरकारों ने सभी सिनेमाघरों, बसों, सभागारों, स्कूलों तथा कालजों, दफ्तरों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट व बीड़ी पीना दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया हे?

धुएं में बहुत छोटे-छोटे कार्बन के कण होते हैं, जो पौधों की पत्तियों पर बैठ कर प्रकाश-संश्लेषण और श्वसन की प्रक्रियाओं में व्यवधान पैदा करते हैं। यदि धूल और कार्बन के ये कण मानव शरीर में प्रवेश कर जायें तो तपेदिक (टी.बी.) , ब्रॉंकाइटिस जैसे सांस के रोग पैदा कर देते हैं। वर्षा के जल में सल्फर डाईआऑक्साइड के मिलने से वह अम्लीय हो जाता है और इस प्रकार अम्लीय-वर्षा होती हे। अम्लीय वर्षा पौधों और इमारतों को नुकसान पहुँचाती है और जानवरों में त्वचा के रोग उत्पन्न कर देती है। क्लोरोफ्लोरो कार्बनों ( ), जो रेफ्रिजरेटर के द्रव एवं सुगंध फैलाने वाले स्प्रे में प्रयोग किए जाते हैं, वायु प्रदूषण में इनका भी योगदान है। ये वायु कीम ओजोन से क्रिया करके इसे खत्म कर देते हैं और इसके कारण ओजोन परत में छेद बनने लगा है। ओजोन परत में हुए छिद्र में से होकर बड़ी मात्रा में सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँच जाती हैं, जो पौधों को नुकसान पहुँचाती हैं और जानवरों में त्वचा का कैसर पैदा कर देती हैं।

जब वायु में कार्बन मोनोऑक्साइड एवं कार्बन डाईआऑक्साइड कौ मात्रा बढ़ जाती है तो वायु अधिक ऊष्मा अपने अंदर बनाये रखती है। इस कारण पृथ्वी का औसत ताप बढ़ने लगता हे। यह प्रक्रिया भूमण्डलीय तापन कहलाती है।

वायु प्रदूषण हम कैसे रोक सकते हैं?

एक बार प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है तो इसे सुधारना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए हमें वायु प्रदूषण रोकना चाहिए। निम्नलिखित तरीकों से हम वायु को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।

1. जहाँ भी संभव हो पेड लगाए जाएं।

2. प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को शहर से दूर लगाया जाए।

3. वही वस्तुएं उपयोग में लाएं जो पर्यावरण को बिगाडें नहीं।

4. उद्योगों की चिमनियों में वायु छानक लगाएं।

5. वाहनों में पर्यानुकूल, संपीडित प्राकृतिक गैस का उपयोग करें।

6. मशीनों की उचित देखभाल करें ताकि ये अधिक प्रदूषण न फैलाएं।

7. क्लोरोफ्लोरो कार्बनों का उपयोग बंद कर दें।

वेदों में वायु संरक्षण

शुद्ध हवा में सांस लिये बिना जीवित रहना हमारे लिए संभव नहीं है, इसलिए वायु के संरक्षण पर ध्यान देना बहुत आवश्यक हेै।

  • वेदों में वायु के महत्व को सतही तौर पर जान पाने में; और
  • वेदों में वायु संरक्षण की मूल भावना को समझ पाने में।

वायु के महत्व को उल्लेखित करते हुए अथर्ववेद में कहा गया है कि वायु आकाशीय जल को सर्वत्र पहुंचाने में सहायक होती है जिससे अन्नादि में समृद्धि आती है-

उत्समक्षितं व्यचान्ति ये सदा य आसिक्रचनि रसमोषधीष, पुरो दधे मरुतः पृश्निमात्हस्ते नो मुजञ्चंत्वंहसः।

( अथर्ववेद 4.27.2)


अर्थात्‌ जो वायु सींचने वाले जल को अनेक प्रकार से यहाँ-वहाँ पहुँचाते हैं, जो इसको अन्नादि औषधियों तक ले जाते हैं, छूने योग्य पदार्थो तथा आकाश को नापने वाले उन वायु देवताओं को में सम्मुख रखता हूँ। ऐसे वायु देवता हमें सभी कष्टों से मुक्ति दिलावें।


चित्र 8.1 वायु द्वारा आकाशीय जल का संरक्षण


वेदों में वायु को सम्मान देते हुए कहा गया है कि वायु हमारे रक्षा करें-

त्रायन्तां मरूतां गणः (ऋग्वेद 10.137.5)

अर्थात्‌, हे वायु गण हमारी रक्षा करो। प्रकृति में हो रहे असंतुलनों में वायु के रौद्र रूप जैसे आँधी, तूफान से होने वाले नुकसान के प्रति वेदों में प्रार्थना की गई है कि हे वायु देवता हमारी प्रार्थना है कि आप हमेशा ही प्राणिमात्र के लिए अनुकूल रहे-

मरूतां मन्वे अधि मे ब्रुवन्त प्रेमं वाजं वाजवाते अवन्तु

आशूनिव सुयमानद उतये तेवो मुञ्चन्त्वंहसः।।

( अथर्ववेद 4.27.1)

अर्थात्‌, दोषों का नाश करने वाली पवनों का में मन में स्मरण करता हूँ। वे पवन मेरे ऊपर कृपा करें तथा सभी को अन्न के सुख तथा दान देने योग्य बनायें तेज गतिमान अश्वों के समान सुन्दर नियम वाले पवनों को मैंने अपनी रक्षा के लिए पुकारा है। वे पवन हमें सभी दुखों से मुक्ति प्रदान करें। यहाँ पर ऋषि पवन से कल्याणकारी बने रहने के लिए निवेदन कर रहा है। पर्यावरण सुरक्षा को चिंता को इंगित करते हुए ऋषि कहता हे कि हे पवन! आप अन्नादि (तृणदि), वृक्षादि से युक्त खेतों को नुकसान मत पहुँचाओ-

यत्मीमन्तं न चूनुय (ऋग्वेद 1.37.6)

अन्तरिक्ष में होने वाले कई प्रकार के विकारों से हमें वायु बचाती हे। इसलिए ऋग्वेद का ऋषि प्रार्थना करता है कि हे पवन अन्तरिक्ष में होने वाले उपद्रवों से हमें संरक्षित करें-

“पातु वातो अन्तरिक्षात्‌” (ऋग्वेद 10.158.1)

अथर्ववेद में वायु को मलीनता नाशक तथा कष्टों का नाशक बताया गया है-

आपो वायो सविता च दुष्कृतमय रक्षाणि निमिदां च मेघतम्‌।

संहयूर्जया सृजयः संकलेन ता नो मुञ्चन्तवंहमः।।

( अथर्ववेद 4.25.2)

अर्थात्‌, हे वायु और सूर्य देवता, आप दोनों मिलकर यहां कि मलीनता को हटा दो। रोगों का निवारण कर दो तथा कष्टों को दूर कर दो क्योंकि आप दोनों ही आत्मिक तृष्टि के साथ मिलाते हो तथा शरीरिक बल से युक्त करते हो। अतः आप हमें कष्टों व दुखों से मुक्ति प्रदान करो।

इस तरह हम देखते हैं कि आक्सीजन को वेदों में प्राणवायु कहा गया हे तथा आदेशित किया गया हे कि हमें वायु संरक्षण अर्थात्‌ वायु को शुद्ध रूप में बनाये रखने का प्रयास करते रहना चाहिए। हमें वायु को प्रदूषित नहीं करना चाहिए और जो भी कोई ऐसा वायु प्रदूषित करता है तो उसका अपराध अक्षम्य है।

चित्र 8.1 प्राणवायु

वायु का महत्व बताते हुए कहा जाता हे कि वायु अन्य सभी वस्तुओं को शुद्धता प्रदान करती है। जल को शुद्ध करती हे। इसलिए वेद हमें निर्देशित करता है कि ऐसा कोई भी कर्म ना करें जिससे वायु अशुद्ध हो। हमें हमारी दैनिक दिनचर्या को इस तरह से रखना चाहिए कि हम वायु को संरक्षित करें तथा लेशमात्र भी वायु प्रदूषण न होने दें।

अंतरिक्ष में आने वाली पराबेंगनी तथा अन्य जहरीली गैसों से पृथ्वी का बचाव करने कि प्रार्थना वेदों में की गई है। संक्षेप में कह सकते हैं कि वैदिक साहित्य में वायु की पवित्रता बनाये रखने पर अत्यधिक जोर दिया गया हे।