Difference between revisions of "Varnamala (वर्णमाला)"

From Dharmawiki
Jump to navigation Jump to search
(Adding content)
(Added images)
 
(One intermediate revision by the same user not shown)
Line 52: Line 52:
 
श ष स ह - ऊष्म-वर्ण ।
 
श ष स ह - ऊष्म-वर्ण ।
  
* प्रथम-तृतीय-पञ्चम-वर्णऽ & य र ल व - अल्पप्राण-व्यञ्जन ।  
+
* [[File:1 Svara Vidhas.PNG|thumb|335x335px|Svara Vidhas. Copyright: Sridhar Subbanna.]]प्रथम-तृतीय-पञ्चम-वर्णऽ & य र ल व - अल्पप्राण-व्यञ्जन ।  
  
 
द्वितीय-चतुर्थ-वर्णऽ & श ष स ह - महाप्राण-व्यञ्जन ।  
 
द्वितीय-चतुर्थ-वर्णऽ & श ष स ह - महाप्राण-व्यञ्जन ।  
Line 70: Line 70:
  
 
ए ऐ, ओ, औ - These do not have ह्रस्व variation. Therefore 2 *3* 2 = 12 variations each.
 
ए ऐ, ओ, औ - These do not have ह्रस्व variation. Therefore 2 *3* 2 = 12 variations each.
 +
[[File:4 Uccharanasthanas.PNG|thumb|389x389px|Uccharana Sthanas. Copyright: Sridhar Subbanna.]]
  
 
== उच्चारणस्थानम् ॥ Points of Articulation ==
 
== उच्चारणस्थानम् ॥ Points of Articulation ==
Line 154: Line 155:
  
 
Therefore त् ल् are NOT सवर्ण to each other.
 
Therefore त् ल् are NOT सवर्ण to each other.
 +
 +
== Neuroscience & Speech ==
 +
what पाणिनि मुनि says
 +
 +
आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् मनो युङ्क्ते विवक्षया |
 +
 +
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् |
 +
 +
सोदीर्णो मूर्धन्यभिहतो वक्त्रमापाद्य मारुतः ।
 +
 +
वर्णान् जनयते तेषां विभागः पञ्चमा मतः ।
 +
 +
पाणिनीय शिक्षा
 +
 +
the ātma along with the intellect, in contact with outside objects, inspires the mind to speak
 +
 +
the mind kindles the agni within the body. the agni further kindles the vāyu
 +
 +
the vāyu moves in the chest region, passes through the throat to the head (brain), from there it touches the mouth and comes out as Varṇa
 +
 +
the varṇas thus produced are of five types (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठौ)
 +
 +
=== Sandhi ===
 +
• Every single वर्ण that is produced is a result of pure energy in the form of vāyu (प्राण)
 +
 +
• संहितायाम् - the अधिकार सूत्र for all सन्धि सूत्र-s
 +
 +
• Continuous generation/release of energy (one वर्ण after another) while speaking or chanting (पारायण)
 +
 +
• वर्ण १ वर्ण २ वर्ण ३.....
 +
 +
• वर्ण १ (पूर्व निमित्त) वर्ण २ (स्थानी) वर्ण ३ (पर निमित्त)
 +
 +
• वर्णविकार leads to सन्धि but the विकार obeys fundamental laws of nature
 +
 +
• if two or more energies are coming together, the system prefers an energy that is most efficient for that given combination (lowest energy state)
 +
 +
Pronounce to find which is easiest in each set
 +
 +
example 1                example 2                example 3
 +
 +
• गुरु आदेश:             • महा उत्सवः             • वृद्धि: एचि
 +
 +
• गुवदिश:                  • महोत्सव:                • वृद्धिस् एचि
 +
 +
• वृद्धिरेचि
 +
 +
example 4                example 5                example 6
 +
 +
• भगवत गीता            • श्रीधरस्                    • श्रीधर: च
 +
 +
• भगवद्गीता               • श्रीधर:                      • श्रीधरस् च
 +
 +
                                                               श्रीधरश्च
 +
 +
• सन्धि-s exist in the realm of spoken language. They make enormous sense in संहितायाम्
 +
 +
• In the realm of non-recitation i.e just plain text or mental reading, not only is their beauty is lost they may start appearing daunting
 +
 +
• To appreciate and understand सन्धि-s better we need to read aloud संस्कृत passages or recite श्लोक-s, स्तोत्रा-s
  
 
== References ==
 
== References ==
 
[[Category:Vyakarana]]
 
[[Category:Vyakarana]]

Latest revision as of 12:25, 15 September 2022

माहेश्वरसूत्राणि ॥

अ इ उ ण् । ऋ लृ क्। ए ओ ङ् । ऐ औ च्।

ह य व र ट् । ल ण् । ञ म ङ ण न म् ।

झ भ ञ् । घ ढ ध ष् । ज ब ग ड द श् ।

ख फ छ ठ थ च ट त व् । क प य् ।

श ष स र् । ह ल् ।

वर्णमाला ॥

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋृ लृ ए ऐ ओ औ - स्वर

अं अः - अयोगवाह

व्यञ्जन

क ख ग घ ङ - कवर्ग -  कुँ

च छ ज झ ञ - चवर्ग - चुँ

ट ठ ड ढ ण  - टवर्ग - टुँ

त थ द ध न - तवर्ग - तुँ

प फ ब भ म - पवर्ग - पुँ

य र ल व श ष स ह - अवर्गीय-व्यञ्जन

व्यञ्जन-विभागाः ॥

क ख ग घ ङ ।

 च छ ज झ ञ ।

ट ठ ड ढ ण  ।

त थ द ध न ।

प फ ब भ म ।

य र ल व श ष स ह ।

  • प्रथम-द्वितीय-वर्णs & श ष स - कर्कश-व्यञ्जन ।

तृतीय-चतुर्थ-पञ्चम-वर्णs & य र ल व ह - मृदु-व्यञ्जन ।

  • क - म - स्पर्श-वर्ण ।

य र ल व - अन्तस्थ-वर्ण ।

श ष स ह - ऊष्म-वर्ण ।

  • Svara Vidhas. Copyright: Sridhar Subbanna.
    प्रथम-तृतीय-पञ्चम-वर्णऽ & य र ल व - अल्पप्राण-व्यञ्जन ।  

द्वितीय-चतुर्थ-वर्णऽ & श ष स ह - महाप्राण-व्यञ्जन ।  

  • य यँ र ल लँ व वँ श ष स ह ।

पञ्चमवर्णs & यँ लँ वँ - अनुनासिकवर्ण ।

All other वर्णs - अननुनासिकवर्ण ।

स्वर-विधाः ॥

Number of variations in स्वरs

अ, इ, उ, ऋ - 3 * 3 * 2= 18 variations each.

लृ-does not have दीर्घ Variation. Therefore लृ - 2 *3* 2 = 12 Variations.

ए ऐ, ओ, औ - These do not have ह्रस्व variation. Therefore 2 *3* 2 = 12 variations each.

Uccharana Sthanas. Copyright: Sridhar Subbanna.

उच्चारणस्थानम् ॥ Points of Articulation

  • अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः - अ, कुँ, ह्, :
  • इचुयशानां तालु - इ, चुँ, य्, श्
  • उपूपध्मानीयानां ओष्ठौ - उ, पुँ , उपध्मानीयः (पिकःपिकः)
  • ऋटुरषाणां मूर्धा - ऋ, टुँ, र्, ष्
  • लृतुलसानां दन्तः - लृ, तुँ, ल्, स्
  • ञमङणनानां नासिका च - ञ् , म् , ङ्, ण्, न्
  • एदैतोः कण्ठतालु - ए, ऐ
  • ओदौतोः कण्ठोष्ठम् - ओ , औ
  • वकारस्य दन्तोष्ठम् - व्
  • जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् - जिह्वामूलीय काकःकाकः, :ख
  • नासिका अनुस्वारस्य - = अनुस्वारः

प्रयत्न

There are two types of प्रयत्न . Might loosely translate as effort

० आभ्यन्तर-प्रयत्न (internal effort)

० बाह्य-प्रयत्न (external effort)

आभ्यन्तर-प्रयत्न (internal effort)

There are five types of आभ्यन्तर-प्रयत्न -

० स्पृष्ट-प्रयत्न -क to म (कादयो मावसानाः स्पर्शाः, स्पृष्टः स्पर्शानाम् )

० ईषद्-स्पृष्ट-प्रयत्न -य र ल व (यरलवा अन्तस्थाः, ईषत्-स्पृष्टः अन्तस्थानाम् )

० विवृत-प्रयत्न- स्वराः (अचः स्वराः, विवृतः स्वराणां च )

० ईषद्-विवृत-प्रयत्न-श ष स ह (शषसह ऊष्माणः, ईषद्विवृतः ऊष्मणाम् )

० संवृत - ह्र​स्वस्य अवर्णस्य प्रयोगे संवृतम्

बाह्य-प्रयत्न

There are eleven types of बाह्य-प्रयत्न -

० संवार - (हश् वर्णाः)

० विवार (खर् वर्णाः)

० नाद (हश् वर्णाः)

० घोष (हश् वर्णाः)

० श्वास (खर् वर्णाः)

० अघोष (खर् वर्णाः)

० अल्पप्राण (प्रथम-तृतीय-पञ्चम-वर्णाः यरलवाः)

० महाप्राण (द्वितीय-चतुर्थ-वर्णाः शषसहाः)

० उदात्त (उच्चैरुदात्तः)

० अनुदात्त (नीचैरनुदात्तः)

० स्वरित (समाहरस्वरितः)

सवर्ण

तुल्यास्य-प्रयत्नं सवर्णम् (१-१-९)

The two varnas that are having same स्थान and आभ्यन्तर-प्रयत्न are called सवर्ण to each other.

Eg:

० अ - स्थानं - कण्ठः, आभ्यन्तर-प्रयत्नः = विवृतः

आ - स्थानं - कण्ठः, आभ्यन्तर-प्रयत्नः = विवृतः

Therefore, अ , आ are सवर्ण to each other.

० त् - स्थानं - दन्तः, आभ्यन्तर-प्रयत्नः = स्पृष्टः

ध् - स्थानं - दन्तः, आभ्यन्तर-प्रयत्नः = स्पृष्टः

Therefore त, ध are सवर्ण to each other.

० त् - स्थानं - दन्तः, आभ्यन्तर-प्रयत्नः = स्पृष्टः

ल् - स्थानं - दन्तः, आभ्यन्तर-प्रयत्नः = ईषत्स्पृष्टः

Therefore त् ल् are NOT सवर्ण to each other.

Neuroscience & Speech

what पाणिनि मुनि says

आत्मा बुद्ध्या समेत्यार्थान् मनो युङ्क्ते विवक्षया |

मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् |

सोदीर्णो मूर्धन्यभिहतो वक्त्रमापाद्य मारुतः ।

वर्णान् जनयते तेषां विभागः पञ्चमा मतः ।

पाणिनीय शिक्षा

the ātma along with the intellect, in contact with outside objects, inspires the mind to speak

the mind kindles the agni within the body. the agni further kindles the vāyu

the vāyu moves in the chest region, passes through the throat to the head (brain), from there it touches the mouth and comes out as Varṇa

the varṇas thus produced are of five types (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठौ)

Sandhi

• Every single वर्ण that is produced is a result of pure energy in the form of vāyu (प्राण)

• संहितायाम् - the अधिकार सूत्र for all सन्धि सूत्र-s

• Continuous generation/release of energy (one वर्ण after another) while speaking or chanting (पारायण)

• वर्ण १ वर्ण २ वर्ण ३.....

• वर्ण १ (पूर्व निमित्त) वर्ण २ (स्थानी) वर्ण ३ (पर निमित्त)

• वर्णविकार leads to सन्धि but the विकार obeys fundamental laws of nature

• if two or more energies are coming together, the system prefers an energy that is most efficient for that given combination (lowest energy state)

Pronounce to find which is easiest in each set

example 1                example 2                example 3

• गुरु आदेश:             • महा उत्सवः             • वृद्धि: एचि

• गुवदिश:                  • महोत्सव:                • वृद्धिस् एचि

• वृद्धिरेचि

example 4                example 5                example 6

• भगवत गीता            • श्रीधरस्                    • श्रीधर: च

• भगवद्गीता               • श्रीधर:                      • श्रीधरस् च

                                                              श्रीधरश्च

• सन्धि-s exist in the realm of spoken language. They make enormous sense in संहितायाम्

• In the realm of non-recitation i.e just plain text or mental reading, not only is their beauty is lost they may start appearing daunting

• To appreciate and understand सन्धि-s better we need to read aloud संस्कृत passages or recite श्लोक-s, स्तोत्रा-s

References