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महाभारत में शांतिपर्व १८९.४ और ८ में तथा अनुशासन पर्व में शंकर पार्वती से कहते हैं कि हीन कुल में जन्मा हुआ शूद्र भी यदि आगमसंपन्न याने धर्मज्ञानी हो तो उसे ब्राह्मण मानना चाहिए। इसका अर्थ है यदि वह इतनी योग्यतावाला है तो केवल शूद्र के घर में पैदा हुआ है इसलिए उसे ब्राह्मणत्व नकारना उचित नहीं है। डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर जैसे लोगों के विषय में ही शायद ऐसा कहा होगा ऐसा लगता है।  
 
महाभारत में शांतिपर्व १८९.४ और ८ में तथा अनुशासन पर्व में शंकर पार्वती से कहते हैं कि हीन कुल में जन्मा हुआ शूद्र भी यदि आगमसंपन्न याने धर्मज्ञानी हो तो उसे ब्राह्मण मानना चाहिए। इसका अर्थ है यदि वह इतनी योग्यतावाला है तो केवल शूद्र के घर में पैदा हुआ है इसलिए उसे ब्राह्मणत्व नकारना उचित नहीं है। डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर जैसे लोगों के विषय में ही शायद ऐसा कहा होगा ऐसा लगता है।  
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== वर्ण निश्चिती और वर्ण शिक्षा ==
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== वर्ण निश्चिति और वर्ण शिक्षा ==
प्रत्येक मानव में सत्त्व, रज और तम तीनों गुण होते ही है। लेकिन जो गुण उस में प्रबल होगा उसी प्रकार का मानव उसे माना जाता है। सत्त्व गुण प्रबल होने से सात्त्विक और तमोगुण प्रबल होने से तामसी स्वभाव वाला। उसी प्रकार से प्रत्येक मानव में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के ऐसे चारों वर्णों के गुण और कर्मों के लक्षण तो कम अधिक प्रमाण में होते ही है। लेकिन जब उस में ब्राह्मण वर्ण के गुण प्रबल होंगे तब उसे ब्राह्मण वर्ण वाला माना जाता है। शूद्र वर्ण के गुण प्रबल होंगे तब उसे शूद्र वर्ण वाला ही माना जाता है।
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प्रत्येक मानव में सत्व, रज और तम तीनों गुण होते ही है। लेकिन जो गुण उस में प्रबल होगा उसी प्रकार का मानव उसे माना जाता है। सत्व गुण प्रबल होने से सात्विक और तमोगुण प्रबल होने से तामसी स्वभाव वाला। उसी प्रकार से प्रत्येक मानव में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के ऐसे चारों वर्णों के गुण और कर्मों के लक्षण तो कम अधिक प्रमाण में होते ही है। लेकिन जब उस में ब्राह्मण वर्ण के गुण प्रबल होंगे तब उसे ब्राह्मण वर्ण वाला माना जाता है। शूद्र वर्ण के गुण प्रबल होंगे तब उसे शूद्र वर्ण वाला ही माना जाता है।
ऐसा कहा जाता है की किसी समय गुरूकुलों में वर्ण तय होते थे। गुरूकुलों में प्रवेश से पूर्व घरों में बच्चे की रुचि जानने के प्रयास होते थे। प्राचीन काल से हमारे समाज में बच्चे की वृत्ति शिशु अवस्था में जानने की प्रथा थी। ७,८,९, महिने का बच्चा जब बैठने लग जाता था तो उस के सामने भिन्न भिन्न विकल्प रखे जाते थे। लेखनी / पुस्तक, तलवार / अन्य कोई हथियार, तराजू / बाट और परिचर्या / सेवा के साधन आदि। बच्चा अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ती के अनुसार उन में से एक वस्तू से खेलने लग जाता है। इस प्रकार वर्ण की एकदम मोटी पहचान कर तय किया जाता था की बच्चे को गुरूकुल में प्रवेश किस आयु में देना चाहिये। किस वर्ण के शिशु को गुरूकुल में प्रवेश किस आयु में देना चाहिये यह हम आगे चलकर देखेंगे।
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और भी कहा गया है-
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ऐसा कहा जाता है कि किसी समय गुरूकुलों में वर्ण तय होते थे। गुरूकुलों में प्रवेश से पूर्व घरों में बच्चे की रुचि जानने के प्रयास होते थे। प्राचीन काल से हमारे समाज में बच्चे की वृत्ति शिशु अवस्था में जानने की प्रथा थी। ७,८,९, महीने का बच्चा जब बैठने लग जाता था तो उस के सामने भिन्न भिन्न विकल्प रखे जाते थे। लेखनी / पुस्तक, तलवार / अन्य कोई हथियार, तराजू / बाट और परिचर्या / सेवा के साधन आदि। बच्चा अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के अनुसार उन में से एक वस्तू से खेलने लग जाता है। इस प्रकार वर्ण की एकदम मोटी पहचान कर तय किया जाता था कि बच्चे को गुरूकुल में प्रवेश किस आयु में देना चाहिये। किस वर्ण के शिशु को गुरूकुल में प्रवेश किस आयु में देना चाहिये यह हम आगे चलकर देखेंगे।
लालयेत् पंचवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत् प्राप्ते तु षोडषे वर्षे पुत्रंमित्रवदाचरेत् ॥  
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इस सूत्र में भी यही बताया गया है की बच्चे को ५ वर्षतक लाड प्यार से बढाना चाहिये। उसे डाँटना मारना नहीं चाहिये। इन पाँच वर्षों में उस का निरीक्षण करते रहना चाहिये। ऐसा करने से बच्चे की अभिव्यक्ति मुक्त रहेगी। और उसकी रुचि, उस का स्वभाव, उस के गुण और लक्षण समझना सहज और सरल हो जाएगा। इस के उपरांत बच्चे की रुचि, स्वभाव, गुण और लक्षणों के अनुरूप योग्य आयु में गुरूकुल में प्रवेश के लिये ले जाना होता था।
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और भी कहा गया है-<blockquote>लालयेत् पंचवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्</blockquote><blockquote>प्राप्ते तु षोडषे वर्षे पुत्रंमित्रवदाचरेत् ॥</blockquote>इस सूत्र में भी यही बताया गया है कि बच्चे को ५ वर्षतक लाड प्यार से बढाना चाहिये। उसे डाँटना मारना नहीं चाहिये। इन पाँच वर्षों में उस का निरीक्षण करते रहना चाहिये। ऐसा करने से बच्चे की अभिव्यक्ति मुक्त रहेगी। और उसकी रुचि, उस का स्वभाव, उस के गुण और लक्षण समझना सहज और सरल हो जाएगा। इस के उपरांत बच्चे की रुचि, स्वभाव, गुण और लक्षणों के अनुरूप योग्य आयु में गुरूकुल में प्रवेश के लिये ले जाना होता था।<blockquote>गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनयनम् ।</blockquote><blockquote>गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विश: ॥ ( मनुस्मृति २-३६)</blockquote><blockquote>ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पंचमे</blockquote><blockquote>राज्ञो बलार्थिन: षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥ ( मनुस्मृति २-३७)</blockquote><blockquote>आ षोडषाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते ।</blockquote><blockquote>आ द्वाविंशात्क्षत्रबंधोरा चतुर्विशतेर्विश: ॥ ( मनुस्मृति २-३८)</blockquote>अर्थ : ब्राह्मण के गुण लक्षण जिस बच्चे में दिखाई दिये हों ऐसे बच्चे को गर्भधारणा से या प्रत्यक्ष जन्म से ५ वें वर्ष में, क्षत्रिय को छठे वर्ष में और वैश्य को आठवें वर्ष में गुरुकुल में प्रवेश के लिये लाया जाता था ( उपर्युक्त २-३७)।
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनयनम् । गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विश: ॥ ( मनुस्मृति २-३६)
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ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पंचमे राज्ञो बलार्थिन: षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥ ( मनुस्मृति २-३७)
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गुरूकुल प्रवेश के बाद बच्चे को परखा जाता था। उस के उपरांत ही उस का वर्ण निश्चित कर उपनयन किया जाता था। ब्राह्मण के गुण लक्षण जिस में प्रकट हुए है उस का उपनयन आठवें वर्ष में क्षत्रिय का ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य का बारहवें वर्ष में उपनयन होता था। (२-३८)
आ षोडषाद् ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आ द्वाविंशात्क्षत्रबंधोरा चतुर्विशतेर्विश: ॥ ( मनुस्मृति २-३८)
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अर्थ : ब्राह्मण के गुण लक्षण जिस बच्चे में दिखाई दिये हों ऐसे बच्चे को गर्भधारणा से या प्रत्यक्ष जन्म से ५ वें वर्ष में, क्षत्रिय को छठे वर्ष में और वैश्य को आठवें वर्ष में गुरुकुल में प्रवेश के लिये लाया जाता था ( उपर्युक्त २-३७)।  
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जो बच्चे इस आयु तक अपने को सिद्ध नहीं कर पाते उन की आगे भी परीक्षा चलती रहती थी। परीक्षा के आधारपर ब्राह्मण को उपनयन का सोलह वर्ष तक, क्षत्रिय को बावीस वर्ष तक और वैश्य को चौबीस वर्ष तक अवसर होता था। (२-३८)।
गुरूकुल प्रवेश के बाद बच्चे को परखा जाता था। उस के उपरांत ही उस का वर्ण निश्चित कर उपनयन किया जाता था। ब्राह्मण के गुण लक्षण जिस में प्रकट हुए है उस का उपनयन आठवें वर्ष में क्षत्रिय का ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य का बारहवें वर्ष में उपनयन होता था। (२-३८)
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जो बच्चे इस आयु तक अपने को सिध्द नहीं कर पाते उन की आगे भी परीक्षा चलती रहती थी। परीक्षा के आधारपर ब्राह्मण को उपनयन का सोलह वर्ष तक, क्षत्रिय को बावीस वर्ष तक और वैश्य को चौबीस वर्ष तक अवसर होता था। (२-३८)।  
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इस आयु तक जो अपने को इन तीन वर्णों के योग्य सिद्ध नहीं कर पाते थे, उन्हें शूद्र वर्ण प्राप्त होता था। अपने को सिद्ध करने का पूरा अवसर मिलने के कारण और अपनी अक्षमता समझ में आने से जिसे शूद्र वर्ण प्राप्त होता था उस में सामान्यत: अन्य वर्णों के लोगों के प्रति असूया का भाव पनपता नहीं था।
इस आयुतक जो अपने को इन तीन वर्णों के योग्य सिध्द नहीं कर पाते थे, उन्हें शूद्र वर्ण प्राप्त होता था। अपने को सिध्द करने का पूरा अवसर मिलने के कारण और अपनी अक्षमता समझ में आने से जिसे शूद्र वर्ण प्राप्त होता था उस में सामान्यत: अन्य वर्णों के लोगों के प्रति असूया का भाव पनपता नहीं था।
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बगैर किसी भेदभाव के हर बच्चे को उस के स्वभाव, गुण, लक्षणों के अनुसार वर्ण की प्राप्ति होती थी। इसलिये एक वर्ण के मानव का दूसरे वर्ण के मानव के साथ कोई द्वेषभाव नहीं रहता था। अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने की दृष्टि से शिक्षण और प्रशिक्षण प्राप्त होने से बच्चा अपने स्वाभाविक कर्मों में और व्यवसाय में भी कुशल बन जाता था। अपनी व्यावसायिक कुशलता का अभिमान संजोता था। अपने व्यवसाय को उसे बोझ नहीं होता था। व्यवसाय के काम में आनंद लेता था और लोगों को भी आनंद ही बाँटता था। बालक के जन्म से वर्ण जानने के और उसे और सुनिश्चित करने के कई उपाय हुवा करते थे। इन में से कुछ तो हर माता पिता को पता होते थे। ऐसे कुछ उपायों का विवरण हम आगे देखेंगे।
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बगैर किसी भेदभाव के हर बच्चे को उस के स्वभाव, गुण, लक्षणों के अनुसार वर्ण की प्राप्ति होती थी। इसलिये एक वर्ण के मानव का दूसरे वर्ण के मानव के साथ कोई द्वेषभाव नहीं रहता था। अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने की दृष्टि से शिक्षण और प्रशिक्षण प्राप्त होने से बच्चा अपने स्वाभाविक कर्मों में और व्यवसाय में भी कुशल बन जाता था। अपनी व्यावसायिक कुशलता का अभिमान संजोता था। अपने व्यवसाय को उसे बोझ नहीं होता था। व्यवसाय के काम में आनंद लेता था और लोगों को भी आनंद ही बाँटता था। बालक के जन्म से वर्ण जानने के और उसे और सुनिश्चित करने के कई उपाय हुआ करते थे। इन में से कुछ तो हर माता पिता को पता होते थे। ऐसे कुछ उपायों का विवरण हम आगे देखेंगे।
आगे गुरूकुलों में केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय की ही शिक्षा होने लगी। वैश्य बच्चों की व्यावसायिक कुशलता की शिक्षा परिवार में और धर्म की शिक्षा लोक-शिक्षा के माध्यम से होने लगी। काल के प्रवाह में आवश्यकता के अनुसार ऐसे परिवर्तन तो हुवे होंगे।
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आगे गुरूकुलों में केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय की ही शिक्षा होने लगी। वैश्य बच्चों की व्यावसायिक कुशलता की शिक्षा परिवार में और धर्म की शिक्षा लोक-शिक्षा के माध्यम से होने लगी। काल के प्रवाह में आवश्यकता के अनुसार ऐसे परिवर्तन तो हुए होंगे।
    
=== बालक के जन्म से या विविध आयु की अवस्थाओं में वर्ण जानने के उपाय ===
 
=== बालक के जन्म से या विविध आयु की अवस्थाओं में वर्ण जानने के उपाय ===
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== वर्ण परिवर्तन ==
 
== वर्ण परिवर्तन ==
भारतीय समाज की व्यवस्थाओं की विशेषता यह रही है की यह पर्याप्त लचीली रही है । बालक के जन्म से वर्ण जानने की और उसे सुनिश्चित करने की, वर्ण के अनुसार संस्कार और शिक्षा की व्यवस्था क्षीण हो जानेसे वर्ण व्यवस्था को आनुवांशिक बनाया गया होगा। या शायद आनुवांशिक वर्ण व्यवस्था में त्रुटियाँ आ जाने से वर्ण के अनुसार शिक्षा और संस्कार की गुरुकुलों की योजना चलाई गयी होगी। दोनों ही व्यवस्थाओं में अपवाद तो होंगे ही। यह जानकर वर्ण परिवर्तन की भी व्यवस्था रखी गई थी। हम देखते है कि वेश्यापुत्र जाबालि को गुरूकुल की ओर से उस के गुण लक्षण ध्यान में लेकर ब्राह्मण वर्ण प्राप्त हुवा था।
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भारतीय समाज की व्यवस्थाओं की विशेषता यह रही है की यह पर्याप्त लचीली रही है । बालक के जन्म से वर्ण जानने की और उसे सुनिश्चित करने की, वर्ण के अनुसार संस्कार और शिक्षा की व्यवस्था क्षीण हो जानेसे वर्ण व्यवस्था को आनुवांशिक बनाया गया होगा। या शायद आनुवांशिक वर्ण व्यवस्था में त्रुटियाँ आ जाने से वर्ण के अनुसार शिक्षा और संस्कार की गुरुकुलों की योजना चलाई गयी होगी। दोनों ही व्यवस्थाओं में अपवाद तो होंगे ही। यह जानकर वर्ण परिवर्तन की भी व्यवस्था रखी गई थी। हम देखते है कि वेश्यापुत्र जाबालि को गुरूकुल की ओर से उस के गुण लक्षण ध्यान में लेकर ब्राह्मण वर्ण प्राप्त हुआथा।
 
प्रत्यक्ष में भी जो अपने जन्म से प्राप्त वर्ण के अनुसार विहित कर्म नहीं करते थे उन के वर्ण बदल जाते थे। महाभारत में लिखा है -  
 
प्रत्यक्ष में भी जो अपने जन्म से प्राप्त वर्ण के अनुसार विहित कर्म नहीं करते थे उन के वर्ण बदल जाते थे। महाभारत में लिखा है -  
 
शूद्रो राजन् भवति ब्रह्मबंधुर्दुश्चरित्रो यश्च धर्मादपेत: । ( महाभारत शांतिपर्व ६३-४)
 
शूद्रो राजन् भवति ब्रह्मबंधुर्दुश्चरित्रो यश्च धर्मादपेत: । ( महाभारत शांतिपर्व ६३-४)
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आगे और कहा है-
 
आगे और कहा है-
 
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छुद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मण: ॥ ( महाभारत शांतिपर्व १९८-८)
 
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छुद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मण: ॥ ( महाभारत शांतिपर्व १९८-८)
अर्थ है ब्राह्मण के गुण यदि शूद्र में दिखाई देते है तो वह शूद्र नहीं (ब्राह्मण है) और शूद्र के गुण यदि ब्राह्मण में दिखाई देते है तो वह ब्राह्मण नहीं (शूद्र है)। महर्षि वेदव्यास, वल्मिकी जेसे इस के कई उदाहरण हम जानते है। इन का जन्म ब्राह्मण कुल में नहीं हुवा था। मछुआरे के कुल में जन्म लेकर भी जैसे ही ‘वाल्या मछुआरे’ ने ब्राह्मण के गुण और लक्षण व्यक्त किये, उसे ब्राह्मण वर्ण प्राप्त हुआ। वह वाल्मिकी बन गये। लेकिन वाल्या से वाल्मिकी वह अकस्मात नहीं बने। इस के लिये उन्हें भी दीर्घ तप करना पडा। ब्राह्मण वर्ण का सा व्यवहार कई वर्षों तक करते रहने के उपरांत ही उन्हें ब्राह्मण का सम्मान प्राप्त हुवा था। उन में ब्राह्मण वर्ण के गुण लक्षण तो जन्म से हीं रहे होंगे, जो सूप्तावस्था में थे। महर्षि नारद के उपदेश से वही उभरकर प्रकट हो गये।     
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अर्थ है ब्राह्मण के गुण यदि शूद्र में दिखाई देते है तो वह शूद्र नहीं (ब्राह्मण है) और शूद्र के गुण यदि ब्राह्मण में दिखाई देते है तो वह ब्राह्मण नहीं (शूद्र है)। महर्षि वेदव्यास, वल्मिकी जेसे इस के कई उदाहरण हम जानते है। इन का जन्म ब्राह्मण कुल में नहीं हुआथा। मछुआरे के कुल में जन्म लेकर भी जैसे ही ‘वाल्या मछुआरे’ ने ब्राह्मण के गुण और लक्षण व्यक्त किये, उसे ब्राह्मण वर्ण प्राप्त हुआ। वह वाल्मिकी बन गये। लेकिन वाल्या से वाल्मिकी वह अकस्मात नहीं बने। इस के लिये उन्हें भी दीर्घ तप करना पडा। ब्राह्मण वर्ण का सा व्यवहार कई वर्षों तक करते रहने के उपरांत ही उन्हें ब्राह्मण का सम्मान प्राप्त हुआथा। उन में ब्राह्मण वर्ण के गुण लक्षण तो जन्म से हीं रहे होंगे, जो सूप्तावस्था में थे। महर्षि नारद के उपदेश से वही उभरकर प्रकट हो गये।     
 
जब ब्राह्मण वर्ण के माता पिता बच्चे को उस का वर्ण जाने बिना ही ब्राह्मण वर्ण के संस्कार करते है। लेकिन उस के स्वभाव, गुण लक्षण जो वह बच्चा अपने जन्म से ही लेकर आया है वह वैश्य वर्ण के है। उस स्थिति में वह बच्चा न तो अच्छा ब्राह्मण बनेगा और न ही अच्छा वैश्य बनगा।
 
जब ब्राह्मण वर्ण के माता पिता बच्चे को उस का वर्ण जाने बिना ही ब्राह्मण वर्ण के संस्कार करते है। लेकिन उस के स्वभाव, गुण लक्षण जो वह बच्चा अपने जन्म से ही लेकर आया है वह वैश्य वर्ण के है। उस स्थिति में वह बच्चा न तो अच्छा ब्राह्मण बनेगा और न ही अच्छा वैश्य बनगा।
 
यह व्यवस्था बौद्ध काल में भी चलती आई थी। बौद्ध साहित्य में भी इस के प्रमाण मिलते है। कहा है-
 
यह व्यवस्था बौद्ध काल में भी चलती आई थी। बौद्ध साहित्य में भी इस के प्रमाण मिलते है। कहा है-
 
न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो । कम्मणा वसलो होति, कम्मणा होति ब्राह्मणा ॥
 
न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो । कम्मणा वसलो होति, कम्मणा होति ब्राह्मणा ॥
 
अर्थ है जन्म से कोई वैश्य या ब्राह्मण नहीं होता। वह होता है उस के कर्मों से। इस में यह समझना ठीक होगा कि यहाँ ' जन्म से ' का अर्थ ( किसी विशिष्ट वर्ण जैसे ) ब्राह्मण वर्ण के पिता से या ब्राह्मण कुल में केवल जन्म लेने से वह ब्राह्मण नहीं होता, इस बात से है। किंतु स्वभाव, गुण लक्षण तो हर बच्चा अपने जन्म से ही लेकर आता है। इस बात को अमान्य नहीं किया है। अर्थात् ब्राह्मण कुल में क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र वर्ण या स्वभाव और गुण लक्षणों वाला बच्चा जन्म ले सकता है।   
 
अर्थ है जन्म से कोई वैश्य या ब्राह्मण नहीं होता। वह होता है उस के कर्मों से। इस में यह समझना ठीक होगा कि यहाँ ' जन्म से ' का अर्थ ( किसी विशिष्ट वर्ण जैसे ) ब्राह्मण वर्ण के पिता से या ब्राह्मण कुल में केवल जन्म लेने से वह ब्राह्मण नहीं होता, इस बात से है। किंतु स्वभाव, गुण लक्षण तो हर बच्चा अपने जन्म से ही लेकर आता है। इस बात को अमान्य नहीं किया है। अर्थात् ब्राह्मण कुल में क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र वर्ण या स्वभाव और गुण लक्षणों वाला बच्चा जन्म ले सकता है।   
यह तो हुवा जो जन्म (कुल) से मिले वर्ण के अनुसार कर्म नहीं करता है उस की अवस्था का वर्णन। किंतु कुछ ऐसे भी लोग थे जो आनुवांशिकता के कारण किसी वर्ण के माने गये थे। किंतु अपने गुण कर्मों से उन्हों ने अपने वास्तविक स्वभाव के अनुसार वर्ण को प्राप्त किया। यह लचीलापन व्यवस्था में रखा गया था।
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यह तो हुआजो जन्म (कुल) से मिले वर्ण के अनुसार कर्म नहीं करता है उस की अवस्था का वर्णन। किंतु कुछ ऐसे भी लोग थे जो आनुवांशिकता के कारण किसी वर्ण के माने गये थे। किंतु अपने गुण कर्मों से उन्हों ने अपने वास्तविक स्वभाव के अनुसार वर्ण को प्राप्त किया। यह लचीलापन व्यवस्था में रखा गया था।
 
शनकैस्तु क्रियालोपादिमा: क्षत्रियजातय: । वृशलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥    ( मनुस्मृति १०-४३)
 
शनकैस्तु क्रियालोपादिमा: क्षत्रियजातय: । वृशलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥    ( मनुस्मृति १०-४३)
 
आनुवांशिकता का महत्व ध्यान में रखकर दीर्घकालीन विशेष प्रयासों के बाद वर्ण परिवर्तन को मान्यता मिलती थी। मन में आने मात्र से वर्ण परिवर्तन नहीं किया जा सकता। विश्वामित्र को ब्राह्मण वर्ण की प्राप्ति के लिये २४ वर्ष की साधना करनी पडी थी।
 
आनुवांशिकता का महत्व ध्यान में रखकर दीर्घकालीन विशेष प्रयासों के बाद वर्ण परिवर्तन को मान्यता मिलती थी। मन में आने मात्र से वर्ण परिवर्तन नहीं किया जा सकता। विश्वामित्र को ब्राह्मण वर्ण की प्राप्ति के लिये २४ वर्ष की साधना करनी पडी थी।
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== यत् पिंडे तत् ब्रह्माण्डे ==
 
== यत् पिंडे तत् ब्रह्माण्डे ==
जो बातें एक छोटी इकाई में पायी जातीं है वैसीं हीं बातें बडी इकाई में भी पायी जातीं है। जो गुणधर्म धातु के एक छोटे कण में पाये जाते है वही गुणधर्म एक बडे धातुखण्ड में भी पाए जाते है। उसी प्रकार जो गुणधर्म एक छोटी जीवंत इकाई में पाये जाते है वही गुणधर्म बडी और विशाल ऐसी जीवंत इकाई में भी पाये जाते है। जैसे जन्म, शैशव, यौवन, जरा और मरण सभी जीवंत इकाई में स्वाभाविक बातें है। यह सिध्दांत की बात है। उसी तरह हम सब के अनुभव की भी बात है। एक परिवार में भी ऐसी चार वृत्तियों के काम होते ही है।   
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जो बातें एक छोटी इकाई में पायी जातीं है वैसीं हीं बातें बडी इकाई में भी पायी जातीं है। जो गुणधर्म धातु के एक छोटे कण में पाये जाते है वही गुणधर्म एक बडे धातुखण्ड में भी पाए जाते है। उसी प्रकार जो गुणधर्म एक छोटी जीवंत इकाई में पाये जाते है वही गुणधर्म बडी और विशाल ऐसी जीवंत इकाई में भी पाये जाते है। जैसे जन्म, शैशव, यौवन, जरा और मरण सभी जीवंत इकाई में स्वाभाविक बातें है। यह सिद्धांत की बात है। उसी तरह हम सब के अनुभव की भी बात है। एक परिवार में भी ऐसी चार वृत्तियों के काम होते ही है।   
 
इस दृष्टि से भारतीय जाति व्यवस्था में एक जाति में भी उन्हीं गुणधर्मों का होना जो एक जीवंत इकाई जैसे मनुष्य या एक जीवंत बडी इकाई समाज या राष्ट्र में पाये जाते है, उन का होना यह स्वाभाविक ही है। इस का कारण है कि जाति यह भी एक जीवंत इकाई है। भारतीय मान्यता के अनुसार समाज की कल्पना एक विराट समाज पुरूष के रूप में की गयी है। जैसे एक सामान्य मनुष्य के भिन्न भिन्न अंग मनुष्य के लिए भिन्न भिन्न क्रियाएं करते है। इसी तरह यह कहा गया कि समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों के लोग हर समाज में होते ही है। यह केवल भारतीय समाज में होते है ऐसी बात नहीं है। जिन समाजों में वर्णव्यवस्था नहीं है ऐसे विश्व के सभी समाजों का निरीक्षण करने से यह ध्यान में आ जाएगा कि उन में भी ऐसी चार वृत्तियों के लोग पाये जाते है। उन समाजों में वर्णव्यवस्था नहीं है लेकिन वर्ण तो हैं ही।
 
इस दृष्टि से भारतीय जाति व्यवस्था में एक जाति में भी उन्हीं गुणधर्मों का होना जो एक जीवंत इकाई जैसे मनुष्य या एक जीवंत बडी इकाई समाज या राष्ट्र में पाये जाते है, उन का होना यह स्वाभाविक ही है। इस का कारण है कि जाति यह भी एक जीवंत इकाई है। भारतीय मान्यता के अनुसार समाज की कल्पना एक विराट समाज पुरूष के रूप में की गयी है। जैसे एक सामान्य मनुष्य के भिन्न भिन्न अंग मनुष्य के लिए भिन्न भिन्न क्रियाएं करते है। इसी तरह यह कहा गया कि समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों के लोग हर समाज में होते ही है। यह केवल भारतीय समाज में होते है ऐसी बात नहीं है। जिन समाजों में वर्णव्यवस्था नहीं है ऐसे विश्व के सभी समाजों का निरीक्षण करने से यह ध्यान में आ जाएगा कि उन में भी ऐसी चार वृत्तियों के लोग पाये जाते है। उन समाजों में वर्णव्यवस्था नहीं है लेकिन वर्ण तो हैं ही।
 
इस तर्क के आधारपर यदि कहा जाए कि हर जाति एक जीवंत इकाई होने के कारण इस में भी ऐसी ही चार वृत्तियों के लोगों का होना अनिवार्य है, स्वाभाविक है तो इस तर्क को गलत नहीं कहा जा सकता । अर्थात् हर जाति में चार वर्णों के लोग होते ही है, इसे मान्य करना होगा। कोई भी शास्त्र इसे नकारता नहीं है।  
 
इस तर्क के आधारपर यदि कहा जाए कि हर जाति एक जीवंत इकाई होने के कारण इस में भी ऐसी ही चार वृत्तियों के लोगों का होना अनिवार्य है, स्वाभाविक है तो इस तर्क को गलत नहीं कहा जा सकता । अर्थात् हर जाति में चार वर्णों के लोग होते ही है, इसे मान्य करना होगा। कोई भी शास्त्र इसे नकारता नहीं है।  
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