Difference between revisions of "Temples mentioned in Kashikhand (काशी खण्डोक्त देवालय)"

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(सुधार जारि)
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गच्क्षता  तिष्ठता वापि  स्वपता जग्रताथवा | काशीत्येष महामन्त्रो येन जप्तः स निर्गम ||
 
गच्क्षता  तिष्ठता वापि  स्वपता जग्रताथवा | काशीत्येष महामन्त्रो येन जप्तः स निर्गम ||
  
जो प्राणी चलते , स्थिर रहते , सोते और जागते हुवे हर समय  ' ' काशी ' इस दो अक्षरों के महामंत्र को जपते रहते है , वे इस कराल संसार मे निर्भय रहते है (अर्थात इस भयानक संसार से मुक्त हो जाते है) ।<blockquote>         योजनानां शतस्थोपी विमुक्तम संस्मरेद्यदि | बहुपातक  पुर्णोःपि पदं  गच्छत्यनामयम  ||</blockquote>काशी विश्वनाथ से एक सौ योजन (1200 किलोमीटर दूर) पर स्थित रहने पर भी जो काशी नगरी का स्मरण करता है । वह पापी होते हुवे भी सभी पापो से मुक्त हो जाता है ।
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जो प्राणी चलते , स्थिर रहते , सोते और जागते हुवे हर समय  ' ' काशी ' इस दो अक्षरों के महामंत्र को जपते रहते है , वे इस कराल संसार मे निर्भय रहते है (अर्थात इस भयानक संसार से मुक्त हो जाते है) ।<blockquote>         योजनानां शतस्थोपी विमुक्तम संस्मरेद्यदि | बहुपातक  पुर्णोःपि पदं  गच्छत्यनामयम  ||</blockquote>काशी विश्वनाथ से एक सौ योजन (1200 किलोमीटर दूर) पर स्थित रहने पर भी जो काशी नगरी का स्मरण करता है । वह पापी होते हुवे भी सभी पापो से मुक्त हो जाता है ।  
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== विश्वेश्वर खण्ड ==
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भगवान विश्वेश्वर की अन्तर्गृह यात्रा का विवरण -
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भगवतः विश्वेश्वरस्यान्तर्गृहयात्राया विवरणम्
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1. मणिकर्णीश्वरः ( मणिकर्णिका घट्टे सी०के० 8/12 )
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2. कम्बलेश्वरः ( तत्रैव 8/14 )
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3. अश्वतरेश्वरः ( तत्रैव )
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4. वासुकीश्वरः ( संकठा देव्या पार्श्वे सी०के० 7/155 )
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5. पर्वतेश्वरः ( तत्रैव सी०के० 7/50 )
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6. गंगाकेशव: ( ललिताघट्टे डी० 2/67 )
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7. ललिता देवी ( तत्रैव )
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8. जरासन्धेश्वर: ( मीरघट्टे डी० 3/79 )
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9. सोमेश्वर: ( मानमन्दिरघट्टे डी० 16/34 )
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10. वाराहेश्वर: ( दशाश्वमेध घट्टे डी० 17/111 )
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11. ब्रह्मेश्वर: ( डी० 33/66-67 )
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12. अगस्तीश्वरः ( अगस्त्यकुण्डापार्श्वे डी० 36/11 )
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13. कश्यपेश्वर: ( जंगमबाड़ीमठे डी० 35/77 )
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14. हरिकेशेश्वरः ( तत्रैव डी० 35/273 )
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16. ध्रुवेश्वरः ( मिसिरपोखरापार्श्वे )
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17. गोकर्णेश्वर: ( डी० 50/34 ए )
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18. घटकेश्वर: ( पुरानीगुड़ीस्थाने )
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19. कीकसेश्वर: ( सी०के 48/45)
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20. भारभूतेश्वरः ( राजादरवाजाक्षेत्रे सी०के० 54/44 )
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21. चित्रगुप्तेश्वरः ( महरहट्टा क्षेत्रे सी०के० 57/77 )
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22. चित्रघण्टा देवी ( सी०के० 23/34 )
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23. पशुपतीश्वरः ( सी०के० 13/66 )
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24. पितामहेश्वरः ( सी०के० 7/92 )
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25. कलेशेश्वरः ( ब्रहमपुरी क्षेत्र सी०के० 7/106 )
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26. चन्द्रेश्वरः  ( सी०के० 7/124 )
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27. आत्मावीरेश्वर ( संकटाघट्टे सी-के- 7/158 )
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28. विद्येश्वरः ( ब्रहमपुरीक्षेत्र सी के  2/41 )
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29. अग्नीश्वर: ( अग्नीश्वरघट्टे सी०के० 2/3 )
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30. नागेश्वरः ( भोसलामन्दिरपार्श्वे सी०के० 1/२१ )
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31. हरिश्चन्द्रेश्वर: ( संकटाघट्टे सी०के० 7/166 )
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32. चिन्तामणिविनायकः ( तत्रैव सी०के० 7/161 )
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33. सेनाविनायकः ( तत्रैव पार्श्वे )
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34. वशिष्ठ: ( तत्रैव सी०के० 7/161 )
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35. वामदेवः ( तत्रैव )
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36. सीमाविनायकः ( तत्रैव )
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37. करुणेश्वर: ( ललिताघट्टस्योपरि सी०के० 34/10 )
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38. त्रिसन्ध्येश्वर: ( तत्रैव डी० 1/40 )
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39. विशालाक्षी देवी( मीरघट्टे डी० 3/85 )
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40. धर्मवर: ( धर्मकूपे डी० 2/21 )
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41. विश्वभुजादेवी ( तत्रैव डी० 2/13 )
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42. आशाविनायकः ( मीरघट्टे डी० 3/79 )
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43. वृ.द्धादित्यः ( मीरघट्टे डी० 3/16 )
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44. चतुर्वक्त्रेश्वरः ( सकरकन्दगलीक्षेत्रे डी० 7/19 )
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45. ब्राह्मीश्वरः ( तत्रैव डी० 7/6 )
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46. मनः प्रकामेश्वरः ( साक्षीविनायकस्यापाश्र्वें डी० 10/50 )
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47 ईशानेश्वरः ( सी०के० 37/69 )
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48. चण्डी - चण्डीश्वर ( कालिकागली क्षेत्रे डी 8/27 )
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49. भवानी शंकर ( अन्नपूणामन्दिरस्यपार्श्वे )
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50. ढुण्डिराजः ( प्रसिद्धोऽयम )
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51. राजराजेश्वर: ( सी०के० 35/33 )
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52. लांगलीश्वर: ( खोवाबाजारक्षेत्रे सी०के० 28/4 )
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53. नकुलीश्वरः ( अक्षयवटे सी०के० 35/20 )
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54. परान्नेश्वर: (दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )
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55. परद्रव्येश्वर: ( दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )
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56. प्रतिग्रहेश्वर: ( दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )
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57. निष्कलकेश्वर: ( दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )
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58. मार्कण्डेयेश्वर: ( सी०के० 16/10. )
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59. अप्सरेश्वर: ( विश्वनाथमन्दिर परिसरे )
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60. गंगेश्वर: ( अधुना लुप्तः )
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61. महाकालेश्वर: ( अधुनालुप्तः श्रीनाथ मन्दिरस्य पार्श्वे नूतनोऽयम )
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62. दण्डपाणि: ( सी०के० 36/10 )
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63. महेश्वर: ( ज्ञानवापीक्षेत्रे )
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64. मोक्षेश्वर ( तत्रैव इदानीं लुप्त )
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65. वीरभद्रेश्वर: ( ज्ञानवापी समीपे लुप्त )
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66. अविमुक्तेश्वर: ( विश्वनाथ मन्दिरक्षेत्रे )
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67. पञ्चविनायक ( सी०के० 31/12. 31/16. 34/60, 35/8, 37/1 )
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68. विश्वेश्वरः ( प्रसिद्धोऽयं ज्योतिर्लिगः )
  
 
== केदार खण्ड ==
 
== केदार खण्ड ==
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125 केदारेश्वरः ( प्रसिद्धः )  
 
125 केदारेश्वरः ( प्रसिद्धः )  
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== ओंकार खण्ड ==
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== श्रीशिवअंगयात्रा ==
 
== श्रीशिवअंगयात्रा ==

Revision as of 23:37, 21 July 2022

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काशी में केदार, विश्वेश्वर और ओंकार ये तीन खण्ड हैं। त्रिशूल के जो तीन नोंक हैं वही काशी के तीन खण्ड हैं।

1 केदार खण्ड ( श्री गौरी केदारेश्वर) केदारनाथ।( उत्तराखंड के प्रतिनिधि)

2 विश्वेश्वर        ( श्री काशी विश्वनाथ)।( काशी के प्रतिनिधि)

3 ओंकार     ( श्री ओम्कारेश्वर )।(  ओम्कारेश्वर मध्यप्रदेश के प्रतिनिधि)

विश्वेश्वर खण्ड के प्रधान लिंग श्री काशी विश्वनाथ (ज्योतिर्लिंग) के दर्शन एवं स्पर्श मात्र से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट ऐसे नष्ट  हो जाते है जैसे सूर्योदय के बाद अंधकार। ये पूरे विश्व के नाथ है , और इनका गढ़ काशी है , इसीलिए (त्रिशूल पर टिकी )काशी का कभी विनाश नही होता ।

येन काशी दृढी ध्याता येन काशीः सेविता |  तेनाहं हृदि संध्यातस्तेनाहं  सेवितः सदा॥ काशी यः सेवते जन्तु  निर्विकल्पेन चेतसा |  तमहं  हृदये   नित्यं  धारयामि  प्रयत्नतः ||(#काशी_खण्ड् )

विश्वनाथ जी कहते हैं की जो मनुष्य हृदय में काशी का ध्यान करता है साथ ही जो मनुष्य निर्विकल्प चित से काशी का स्मरण करता है , समझना चाहिए कि उसने मेरा हृदय में ध्यान कर लिया , उससे मैं सदा सेवित रहता हूं तथा मैं नित्य उसे प्रयत्न पूर्वक अपने हृदय में धारण करता हूं ।

नित्यं विश्वेश  विश्वेश विश्वनाथेति यो जपेत् | त्रिसन्ध्यं     तंसुकृतिनं     जपाम्य्ह्म  पिध्रुवं || (#पद्म_पुराण)

जो नित्य विश्वेश्वर विश्वेश्वर , हे विश्वनाथ विश्वनाथ ऐसा जपता है , विश्वनाथ जी कहते है कि तीनों संध्यायो में मैं भी उसे जपता हु अर्थात मै उनको इस संसार से तार देता हूं ।

गच्क्षता  तिष्ठता वापि  स्वपता जग्रताथवा | काशीत्येष महामन्त्रो येन जप्तः स निर्गम ||

जो प्राणी चलते , स्थिर रहते , सोते और जागते हुवे हर समय  ' ' काशी ' इस दो अक्षरों के महामंत्र को जपते रहते है , वे इस कराल संसार मे निर्भय रहते है (अर्थात इस भयानक संसार से मुक्त हो जाते है) ।

         योजनानां शतस्थोपी विमुक्तम संस्मरेद्यदि | बहुपातक  पुर्णोःपि पदं  गच्छत्यनामयम  ||

काशी विश्वनाथ से एक सौ योजन (1200 किलोमीटर दूर) पर स्थित रहने पर भी जो काशी नगरी का स्मरण करता है । वह पापी होते हुवे भी सभी पापो से मुक्त हो जाता है ।

विश्वेश्वर खण्ड

भगवान विश्वेश्वर की अन्तर्गृह यात्रा का विवरण -

भगवतः विश्वेश्वरस्यान्तर्गृहयात्राया विवरणम्

1. मणिकर्णीश्वरः ( मणिकर्णिका घट्टे सी०के० 8/12 )

2. कम्बलेश्वरः ( तत्रैव 8/14 )

3. अश्वतरेश्वरः ( तत्रैव )

4. वासुकीश्वरः ( संकठा देव्या पार्श्वे सी०के० 7/155 )

5. पर्वतेश्वरः ( तत्रैव सी०के० 7/50 )

6. गंगाकेशव: ( ललिताघट्टे डी० 2/67 )

7. ललिता देवी ( तत्रैव )

8. जरासन्धेश्वर: ( मीरघट्टे डी० 3/79 )

9. सोमेश्वर: ( मानमन्दिरघट्टे डी० 16/34 )

10. वाराहेश्वर: ( दशाश्वमेध घट्टे डी० 17/111 )

11. ब्रह्मेश्वर: ( डी० 33/66-67 )

12. अगस्तीश्वरः ( अगस्त्यकुण्डापार्श्वे डी० 36/11 )

13. कश्यपेश्वर: ( जंगमबाड़ीमठे डी० 35/77 )

14. हरिकेशेश्वरः ( तत्रैव डी० 35/273 )

15. वैद्यनाथ: ( डी० 50/20 )

16. ध्रुवेश्वरः ( मिसिरपोखरापार्श्वे )

17. गोकर्णेश्वर: ( डी० 50/34 ए )

18. घटकेश्वर: ( पुरानीगुड़ीस्थाने )

19. कीकसेश्वर: ( सी०के 48/45)

20. भारभूतेश्वरः ( राजादरवाजाक्षेत्रे सी०के० 54/44 )

21. चित्रगुप्तेश्वरः ( महरहट्टा क्षेत्रे सी०के० 57/77 )

22. चित्रघण्टा देवी ( सी०के० 23/34 )

23. पशुपतीश्वरः ( सी०के० 13/66 )

24. पितामहेश्वरः ( सी०के० 7/92 )

25. कलेशेश्वरः ( ब्रहमपुरी क्षेत्र सी०के० 7/106 )

26. चन्द्रेश्वरः ( सी०के० 7/124 )

27. आत्मावीरेश्वर ( संकटाघट्टे सी-के- 7/158 )

28. विद्येश्वरः ( ब्रहमपुरीक्षेत्र सी के 2/41 )

29. अग्नीश्वर: ( अग्नीश्वरघट्टे सी०के० 2/3 )

30. नागेश्वरः ( भोसलामन्दिरपार्श्वे सी०के० 1/२१ )

31. हरिश्चन्द्रेश्वर: ( संकटाघट्टे सी०के० 7/166 )

32. चिन्तामणिविनायकः ( तत्रैव सी०के० 7/161 )

33. सेनाविनायकः ( तत्रैव पार्श्वे )

34. वशिष्ठ: ( तत्रैव सी०के० 7/161 )

35. वामदेवः ( तत्रैव )

36. सीमाविनायकः ( तत्रैव )

37. करुणेश्वर: ( ललिताघट्टस्योपरि सी०के० 34/10 )

38. त्रिसन्ध्येश्वर: ( तत्रैव डी० 1/40 )

39. विशालाक्षी देवी( मीरघट्टे डी० 3/85 )

40. धर्मवर: ( धर्मकूपे डी० 2/21 )

41. विश्वभुजादेवी ( तत्रैव डी० 2/13 )

42. आशाविनायकः ( मीरघट्टे डी० 3/79 )

43. वृ.द्धादित्यः ( मीरघट्टे डी० 3/16 )

44. चतुर्वक्त्रेश्वरः ( सकरकन्दगलीक्षेत्रे डी० 7/19 )

45. ब्राह्मीश्वरः ( तत्रैव डी० 7/6 )

46. मनः प्रकामेश्वरः ( साक्षीविनायकस्यापाश्र्वें डी० 10/50 )

47 ईशानेश्वरः ( सी०के० 37/69 )

48. चण्डी - चण्डीश्वर ( कालिकागली क्षेत्रे डी 8/27 )

49. भवानी शंकर ( अन्नपूणामन्दिरस्यपार्श्वे )

50. ढुण्डिराजः ( प्रसिद्धोऽयम )

51. राजराजेश्वर: ( सी०के० 35/33 )

52. लांगलीश्वर: ( खोवाबाजारक्षेत्रे सी०के० 28/4 )

53. नकुलीश्वरः ( अक्षयवटे सी०के० 35/20 )

54. परान्नेश्वर: (दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )

55. परद्रव्येश्वर: ( दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )

56. प्रतिग्रहेश्वर: ( दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )

57. निष्कलकेश्वर: ( दण्डपाणिसमक्षे सी०के० 35/34 )

58. मार्कण्डेयेश्वर: ( सी०के० 16/10. )

59. अप्सरेश्वर: ( विश्वनाथमन्दिर परिसरे )

60. गंगेश्वर: ( अधुना लुप्तः )

61. महाकालेश्वर: ( अधुनालुप्तः श्रीनाथ मन्दिरस्य पार्श्वे नूतनोऽयम )

62. दण्डपाणि: ( सी०के० 36/10 )

63. महेश्वर: ( ज्ञानवापीक्षेत्रे )

64. मोक्षेश्वर ( तत्रैव इदानीं लुप्त )

65. वीरभद्रेश्वर: ( ज्ञानवापी समीपे लुप्त )

66. अविमुक्तेश्वर: ( विश्वनाथ मन्दिरक्षेत्रे )

67. पञ्चविनायक ( सी०के० 31/12. 31/16. 34/60, 35/8, 37/1 )

68. विश्वेश्वरः ( प्रसिद्धोऽयं ज्योतिर्लिगः )

केदार खण्ड

भगवान गौरीकेदारेश्वर जी के अन्तर्गृह यात्रा का विधान-

1. आदिमणिकर्णिका केदारघट्टे

2. केदारेश्वर: (प्रसिद्धोऽयम)

3. गणपति: (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

4. दण्डपाणि: (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

5. भैरव: (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

6. स्कन्द: (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

7.अन्नपूर्णा (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

8.पार्वती (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

9. दक्षिणामूर्तिः (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

10.चण्डगणः (केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

11. इन्द्रद्युम्नेश्वर. (केदारेश्वर मन्दिरे)

12.कालञ्जर.(केदारेश्वरस्य मन्दिरे)

13.रत्नकेश्वर (केदारेश्वर मन्दिर)

14.दधीचीश्वर: (केदारेश्वर मन्दिरे)

15. नीलकण्ठेश्वर (बी० 9/99)

16 गौरीकुण्ड (केदारघट्टे)

17 हरम्यापतीर्थः (तत्रैव)

हरम्पापेश्वरः (तत्रैव)

18. किरातेश्वरः (लाली घट्टे)

19. लम्बोदरविनायक: (चिन्तामणिविनायकनाम्ना प्रसिद्धः)

20. शत्रुघ्नेश्वरः (हनुमान घट्टे)

21. भरतेश्वर: (हनुमान घट्टे)

22. लक्ष्मणेश्वर: (हनुमान घट्टे)

23. रामेश्वर: (हनुमान घट्टे)

24. सीतेश्वर: (हनुमान घट्टे)

25. हनुमदीश्वरः (हनुमान घट्टे)

26. रुरुभैरव: (हनुमान घट्टे)

27. स्वप्नेश्वर: (बादशाहगजं क्षेत्रे)

28. स्वप्नेश्वरी (तत्रैव)

29. अक्रूरेश्वर: {अक्रूरघट्टे (भदैनी)}

30. चामुण्डादेवी (अक्रूविनायक मन्दिरे)

31. चर्ममुण्डादेवी (तत्रैव लुप्तः)

32. महारुण्डादेवी (तत्रैव लुप्त.)

33. अर्कविनायक (लोलार्कस्य समीपे)

35. पराशरेश्वर: (बी० 2/21)

36. उद्दालकेश्वरः (तत्रैव)

37. अमरेश्वर: (बी० 2/20)

38. कुण्डोदरेश्वर: (अस्सी घट्टे लुप्तः)

39. लोलार्ककुण्ड: (प्रसिद्धोऽयं तीर्थः)

40. लोलार्कादित्यः (लोलार्ककुण्डे)

41. शुष्केश्वर: (दुर्गाकुण्डे)

42. जनकेश्वर: (सुकुलपुरे)

43. असीसंगम: (अस्सी घट्टे.)

44. असीसंगमेश्वर:( बी० 1/177 तत्रैव)

45. सिद्धेश्वर: (बी० 2/282)

46. सिद्धेश्वरी देवी (तत्रैव)

47. स्थाणुः (कुरुक्षेत्रतडागे बी० 2/247)

48.कुरुक्षेत्रतीर्थः (दुर्गाकुण्डस्य समीपे)

49. दुर्गाकुण्डतीर्थः (प्रसिद्धः)

50. दुर्गविनायक (तत्रैव)

51. दुर्गादेवी (तत्रैव)

52 कालरात्री (तत्रैव)

53. चण्डभैरव (तत्रैव)

54. द्वारेश्वर (तत्रैव)

55. शूर्पकर्णेश्वर (तत्रैव)

56. कुक्कुटेश्वरः (तत्रैव)

57. जांगलीश्वरः (तत्रैव)

58. तिलपर्णेश्वरः (तत्रैव)

59. मुकुटेश्वर (मुकुटकुण्ड नवाबगंजक्षेत्रे)

60. बराकादेवी (नबावगंज मुकुरकुण्डे)

61. शखोद्वारतीर्थः (शंखूधाराकुण्डे)

62. द्वारिकानाथः (तत्रैव)

63. दवारकेश्वर (तत्रैव)

64. शंकुकर्णेश्वर (तत्रैव बी० 22/120)

65. वैद्यनाथ: (प्रसिद्ध)

66. कहोलेश्वर (वैजनत्थासमीपे)

67. कामाक्षादेवी (प्रसिद्धाः)

68 क्रोधनभैरवः (प्रसिद्धा:)

69 बटुक भैरव (प्रसिद्धाः)

70. घृष्णेश्वर ( प्रसिद्ध)

71 ब्रह्मपदेश्वरः( प्रसिद्ध )

72. लवेश्वर:( रामकुण्डस्य समीपे डी० 53/4)

73. कुशेश्वरः( तत्रैव )

74. रामकुण्डे ( प्रसिद्धोऽयं )

75. रामेश्वरः ( तत्रैव डी० 54/11)

76. करवीरेश्वर: ( डी० 52/4)

77. महालक्ष्मीश्वरः ( नृसिंहबाबू गृह)

78. लक्ष्मीकुण्ड ( तीर्थ प्रसिद्धः )

79. कूणिताक्षविनायक: ( डी० 52/3)

80. महालक्ष्मी ( डी० 52/40)

81. महाकाली (तत्रैव)

82. महासरस्वती (तत्रैव)

83. शिखिचण्डी ( तत्रैव)

84. उगेश्वः ( तत्रैव 52/40)

85. रूद्रसरोवरतीरः ( गङ्गायां दशाश्वमेधघट्टे )

86. शूलंटकेश्वर ( प्रसिद्धमिदं )

87. दशाश्वमेधतीरः ( दशाश्वमेधघट्टे)

88 बन्दी देवी ( डी 17/10)

89. दशाश्वमधेश्वर: (शीतलाया: मन्दिरे )

90. गोत्ध्रेधेश्वर: (तत्र समीपे )

91. मानधात्रीश्वर: (सी०के० 34/14 )

92. चौसट्ठी देवी (चौसट्ठी घट्टे )

93. वक्रतुण्डविनायकः (डी० 20/14)

94. पातालेश्वरः ( डी० 32/1)

95. सिद्धेश्वरः (तत्र समीपे)

96. नैऋतेश्वर (पुष्पदन्तेश्वरस्य समीपे)

97. हरिश्चन्द्रेश्वरः (तत्रैव)

98. अंगिरसेश्वर: (जंगमबाड़ीमठे)

99. पुष्पदन्तेश्वर: (डी० 32/102)

100. एकदन्तविनायकः (तत्रैव)

101. गरडः (डी० 31/30 देवनाथ पुराक्षेत्रे )

102. गरुडेश्वरः (डी० 31/30 ए देवनाथ पुराक्षेत्रे )

103. सर्वेश्वरः (बबुआ पाण्डेय घट्टे )

104. सोमेश्वरः (तत्र समीपे )

105. नारदेश्वरः ( नारदघट्टे डी० 25/12)

106. भ्राभातेश्वरः ( भ्राभाटकेश्वरनामेन प्रसिद्धोऽयं )

107. अत्रीश्वर: ( डी० 25/11 नारदघट्टे )

108. अनसूया देवी (डी० 25/11 नारदघट्टे )

109 . अनसूयेश्वर: (डी० 25/11 नारदघट्टे )

110. मानसरोवरतीर्थः (इदानीं लुप्तः )

111. मानसरोवरेश्वर: (बी० 14/21 )

112. सुराभाण्डेश्वर: ( तिलभाडेश्वर नाम्ना प्रसिद्धमिदं )

113. विभाण्डेश्वरः (तत्रैव)

114. कहोलेश्वरः (तत्रैव)

115. नर्मदेश्वरः (तत्रैव)

116. सुरेश्वरः ( तत्रैव )

117. पद्मसुरेश्वर (तत्रैव )

118. क्षेमेश्वरः ( क्षमेश्वर घट्टे बी० 14/12)

119. चित्रांगदेश्वरः ( कुमारस्वामीमठे बी० 14/18 )

120. चित्रांगदेश्वरी ( तत्रैव )

121. रुक्मांगदेश्वर ( चौकी घट्टे )

122. अम्बरीषेश्वर ( केदारमन्दिरे )

123. तारकेश्वर ( केदारघट्टे )

124. आदिमणिकर्णिका ( केदारघट्टे )

125 केदारेश्वरः ( प्रसिद्धः )

ओंकार खण्ड

श्रीशिवअंगयात्रा

श्रीविश्वेश्वरस्वरूपात्मकअङ्गयात्रा

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सर्वेषामपि लिङ्गानां मौलित्वं कृत्तिवाससम् । ओंकारेशः शिखा ज्ञेया लोचनानि त्रिलोचनः॥

गोकर्ण भारभुतेशौ  तत्कर्णौ  परिकिर्तितौ। विश्वेश्वरा अविमुक्तौ च द्वावैतौ दक्षिणौकरौ॥

धर्मेश मणिकर्निकेशौ  द्वौकरौदक्षिणौ करौ। कालेश्वर कर्पर्दीशौ    चरणवति   निर्मलौ॥

जयेष्ठेश्वरो नितम्बश्च   नाभिर्वौ मध्यमेश्वरः। कपर्दोह्स्य महादेवः  शिरो भूषा श्रुतिश्वरः॥

चन्द्रेशो हृदयं तस्य आत्मा विरेश्वरः परः। लिङ्ग तस्य तु केदारः शुकः शुक्रेश्वरं विदुः॥ (स्कन्द पु० काशीखण्ड्)

भावार्थ-1. सम्पूर्ण लिंगो का शिर= कृतिवासेश्वर महादेव। (मृत्युंजय मंदिर से पहले रत्नेश्वर महादेव के पास k46/26 दारा नगर , वाराणसी)

2 .  शिखा= ओम्कारेश्वर महादेव। (छित्तनपुरा , पठानी टोला ,a 33/ 23 विशेसर गंज वाराणसी )

3. दोनों नेत्र= त्रिलोचन महादेव। (त्रिलोचन घाट के ऊपर a 2 /80 मछोदरी , वाराणसी)

4. दोनों कान= भारभूतेश्वर महादेव। (गोविंदपुरा ck 54/ 44 चौक)और #गोकर्ण (कोदई की चौकी , दैलु की गली d 50/33)

5. दोनों दाहिने हाथ= विश्वनाथ और अविमुक्तेश्वर महादेव। (विश्वनाथ मंदिर परिषर)

6. दोनों बायाँ हाथ= धर्मेश्वर और मणिकर्णिकेश्वर महादेव। (मीरघाट  d 2/21 दशस्वमेध के पास) और (गोमठ काका राम की गली ck 8/12 अभय सन्यास आश्रम , मणिकर्णिका घाट , चौक , वाराणसी)।

7. दोनों चरण=कालेश्वर और कपरदीश्वर महादेव। (मृत्युंजय मंदिर परिषर k 52/ 39) और( पिशाच मोचन c 21/ 40 विमल कुंड, वाराणसी)।

8. नितंब (पीछे का हिस्सा)=ज्येष्ठेश्वर महादेव। (काशी पूरा , काशी देवी मंदिर के पास 62/144 सप्तसागर , वाराणसी)।

9. नाभि = मध्यमेश्वर महादेव। ( दारा नगर , मैदागिन, मध्यमेश्वर मोहल्ला , k 53/63 वाराणसी)।

10. कपाल और शिरो भूषण= आदि महादेव और श्रुतिश्वर महादेव। (रत्नेश्वर मंदिर के पास , k 53/40 मृत्युंजय मंदिर मार्ग , वाराणसी)।

11. हृदय= चन्द्रेश्वर महादेव। (सिद्धेश्वरी गली , ck 7/ 124 चौक वाराणसी)

12. शरीर की आत्मा= आत्मविरेश्वर महादेव। ( सिंधिया घाट ck 7/ 158 चौक वाराणसी)।

13. लिंग= श्रीगौरीकेदारेश्वर महादेव। (केदार घाट b 6/102 वाराणसी)।

14. शुक्रभाग= शुक्रेश्वर महादेव। (कालिका गली विश्वनाथ गली में d 9/ 30 वाराणसी)।इस प्रकार के शिव यात्रा के अन्तर्गत शिव अंग सम्पूर्ण होते है।

इस पुनीत यात्रा को करने से व्यक्ति का शिव अंग से सम्बंधित अंग कभी दुर्घटना ग्रस्त हो कर भी कभी खराब नही होता और निरोगी काया प्राप्त होती है ,  ऐसी मान्यता प्राचीन काल से चली आ रही है। जो भी व्यक्ति इस यात्रा को विधिवत तरीके से करता है उसको मोक्ष की प्राप्ति होती है।

शिव अंग यात्रा को स्कन्दपुराण के काशी खण्ड से प्राप्त किया गया है। शिव अंगात्मक लिंग सिर्फ काशी में ही पूर्ण रूप से विद्यमान है, इसीलिए प्रयत्न पूर्वक काशी में आकर रहकर यहां की यात्राएं अवश्य करनी चाहिए यह भाग्य प्रद और मोक्षप्रद होती है।   

काशीखण्डोक्त अनुक्रमयात्रा 

विश्वेशं  माधवं ढूंढिम , दंडपाणि च भैरवं । वंदे काशीं गुहां गङ्गा, भवानी मणिकर्णिकां ।।

1.विश्वेशं = श्री काशी विश्वनाथ

2.माधवं = बिंदु माधव पंचगंगा घाट

3.ढूंढी = ढूंढी राज विनायक। (गेट नंबर 4 से अन्नपूर्णा मंदिर के पहले)

4.दंडपाणि = विश्वनाथ मंदिर। (ज्ञानवापी लेन)

5.भैरव = काल भैरव मंदिर

6.वंदे काशी = काशी देवी मंदिर। (करनघन्टा)

7.गुहां = जैगीषव्य ऋषि का गुफा। (पाताल पूरीमठ, ईश्वरगंगी)

8.गंगा = गंगा दर्शन गंगा स्नान और आदि गंगा। (ईश्वर गंगी पोखरा )

9.भवानी =भवानी गौरी। (अन्नपूर्णा मंदिर में राम दरबार के आंगन में)।

(प्राचीन समय मे यहां भवानी कुंड भी था जो अब लुप्त होगया है । वर्तमान  समय में माता अन्नपूर्णा को भवानी नाम से जाना जाता है और भवानी गौरी को ही आदि अन्नपूर्णा कहा जाता है (दोनों एक ही मानी गयी हैं)।

10.मणिकर्णिकां = मणिकर्णिका घाट पर स्नान कर मणिकर्णिका देवी दर्शन। (सिंधिया घाट के ऊपर आत्मविरेश्वर मंदिर के सामने)

(जो व्यक्ति काशी में अनेक प्रकार की यात्राएं करने में असक्षम है ,वह इस अनुक्रम यात्रा को अवश्य करें) ।

काशीखण्डोक्त शारदीयनवरात्रयात्रा

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

1. शैलपुत्री -

(A40 / 11 मरहिया घाट , वाराणसी सिटी स्टेशन अलईपुरा के पास से रास्ता गया है , शैलपुत्री देवी के लिए)।

2.ब्रह्मचारिणी-

(K 22/ 72 दुर्गा घाट (ब्रह्मा घाट) चौखम्बा सब्जी सट्टी के आगे से काल भैरव मार्ग पर)

3.चंद्रघंटा-

(ck 23/34 चित्रघंटा गली , चौक रोड .

4.कुष्मांडा-

(दुर्गाकुंड प्रसिद्ध)

5.स्कन्द माता -

( j 6/33 जैतपुरा पुलिस स्टेशन के पास )

6 .कात्यायनी -

(सिंधिया घाट , आत्मविरेश्वर मंदिर में ।)

7.कालरात्रि -

(D 8/17 कालिका गली , विश्वनाथ गली )

8.अन्नपूर्णा -

(अन्नपूर्णा मंदिर विश्वनाथ मंदिर)

9.सिद्धिदात्री -

(सिद्धेश्वरी गली , गढ़वासी टोला , चौक ( संकटा माता मंदिर मार्ग )

एक मत यह कहता है कि ब्रह्माजी के दुर्गा कवच में वर्णित नवदुर्गा नौ विशिष्ट औषधियों में हैं।

(1) प्रथम शैलपुत्री (हरड़) : कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है।

(2) ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी) : ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है। इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है।

(3) चन्द्रघण्टा (चन्दुसूर) : यह एक ऐसा पौधा है जो धनिए के समान है। यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं।

(4) कूष्माण्डा (पेठा) : इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है। इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रोगों में यह अमृत समान है।

(5) स्कन्दमाता (अलसी) : देवी स्कन्दमाता औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है।

(6) कात्यायनी (मोइया) : देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका। इसके अलावा इन्हें मोइया भी कहते हैं। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।

(7) कालरात्रि (नागदौन) : यह देवी नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं। यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है।

(8) महागौरी (तुलसी) : तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये रक्त को साफ कर ह्वदय रोगों का नाश करती है।

(9) सिद्धिदात्री (शतावरी) : दुर्गा का नौवाँ रूप सिद्धिदात्री है जिसे नारायणी शतावरी कहते हैं। यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है।

काशी खण्डोक्त छप्पनविनायकयात्रा

प्रथम दिवस-प्रथम आवरण के अष्ट विनायकों का दर्शन

१-श्री अर्क विनायक-तुलसी घाट

२-दुर्ग विनायक -दुर्गा कुण्ड

३-भीमचण्ड-भीमचण्डी

४-देहली विनायक-भाऊपुर

५-उद्दण्ड विनायक-रामेश्वर

६-पाशपाणि विनायक-सदर बाजार

७-खर्व विनायक-आदि- केशव घाट

८-सिद्धिविनायक-मणिकर्णिका घाट

द्वितीय दिवस -द्वितीय आवरण के अष्ट विनायकों का दर्शन

१-श्री लम्बोदर विनायक-केदार घाट गली

२-कूटदन्त विनायक-कीनाराम स्थल

३-शालटंक विनायक-मडुआडीह पोखरा

४-कूष्माण्ड विनायक-फुलवरियां

५-मुण्ड विनायक-सदर बाजार

६-विकटदन्त विनायक-धूपचण्डी

७-राजपुत्र विनायक-बसन्ता कालेज

८-प्रणव विनायक -आदि महादेव त्रिलोचन घाट

तृतीय दिवस-तृतीय आवरण के अष्ट विनायकों का दर्शन

१-वक्रतुण्ड विनायक-चौसट्टी घाट

२-एकदन्त विनायक-पातालेश्वर गली

३-त्रिमुख विनायक- सिगरा टीला

४-पंचमुख विनायक-पिशाच मोचन

५-ह्येरम्ब विनायक- बाल्मीकी टीला

६-विघ्नराज विनियक-धूपचण्डी

७-वरद विनायक- प्रह्लाद घाट

८- मोदकप्रिय विनायक जी-त्रिलोचन घाट

चतुर्थ दिवस-चतुर्थावरण के अष्ट विनायकों का दर्शन

१-श्रीअभयप्रद विनायक-प्रयाग घाट

२-श्रीसिंहतुण्ड विनायक-खालिसपुरा

३-श्रीकुणिताक्ष विनायक-लक्ष्मी कुण्ड

४-श्रीक्षिप्रप्रसाद विनायक-पितरकुण्डा

५-श्रीचिन्तामणि विनायक-ईश्वरगंगी कुण्ड

६-श्रीदन्तहस्त विनायक-लोहटिया

७-श्रीपिचण्डिल विनायक-गाय घाट

८-श्रीउद्दण्डमुण्ड विनायक जी-त्रिलोचन मन्दिर मछोदरी

पंचम दिवस-पंचमावरण के अष्ट विनायकों का दर्शन

१-श्री स्थूलदन्त विनायक-मान मन्दिर घाट

२-कलिप्रिय विनायक-विश्वनाथ गली

३-चतुर्दन्त विनायक-सनातन धर्म इण्टर काॅलेज नई सड़क

४-द्विमुख विनायक-सूरज (सूर्य) कुण्ड

५-ज्येष्ठ विनायक-वन्देकाशी देवी मन्दिर के पीछे भूत भैरव गली मे सप्तसागर

६-गज विनायक-भारभूतेश्वर मन्दिर मे राजा दरवाजा

७-काल विनायक- राम घाट की सीढ़ियों के बगल मे पेड़ के नीचे

८-नागेश विनायक- भोसले घाट के ऊपर नागेश्वर मन्दिर मे।

षष्ठ दिवस- षष्ठावरण के विनायकों का दर्शन

१-श्रीमणिकर्णिका विनायक-मणिकर्णिका घाट

२- श्री आशा विनायक - मीर घाट निकट विशालाक्षी मन्दिर

३-श्री सृष्टि विनायक- कालिका गली निकट शुक्रेश्वर मन्दिर

४-श्री यक्ष विनायक-ढुण्ढिराज गली

५-श्री गजकर्ण विनायक- शापुरी माल बांसफाटक ईशानेश्वर मन्दिर मे

६-चित्रघंट विनायक-चौक से कचौड़ी गली ना जा कर सीधे

७-श्री मंगल विनायक- मंगला गौरी मंन्दिर मे

८-श्री मित्र विनायक- सिन्धिया घाट- वीरेश्वर मन्दिर मे मंगलेश्वर के निकट

आज बाबा विश्वनाथ सहित अन्नपूर्णा के दिव्य दर्शन सहित

सप्तम दिवस -समस्तावरण विनायकों का दर्शन

१-श्री मोद विनायक- भीमाशंकर मन्दिर नेपाली खपड़ा

२- श्री प्रमोद विनायक- कारीडोर मे-बंधक

३-श्री सुमुख विनायक-कारीडोर मे- बंधक

४-श्री दुर्मुख विनायक-

५-श्री गणनाथ विनायक

६-श्री ज्ञान विनायक-लांगलीश्वर मन्दिर मे खोवा बाजार

७-श्री द्वार विनायक-ढुण्ढिराज के पीछे नकुलेश्वर मन्दिर मे

८-श्री अविमुक्त विनायक ढुण्ढिराज गली मे थे अब मुक्त किये जा चुके है।

सभी विनायकों के मध्य विराजित श्री ढुण्ढिराज विनायक तथा निकट साक्षी विनायक जी के दर्शन मात्र से यात्रा मे कोई त्रुटि हो वह पूर्ण हो जाती है और साक्षी विनायक यात्रा के साक्षी हो जाते है।

नवग्रह यात्रा (कार्तिक अक्षय नवमी )

धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी के निर्देशानुसार आज के दिन काशी में आंवला के पेड़ के पूजा के पश्च्यात नवग्रह की यात्रा करने का विधान है ।

इसी विधान के अंतर्गत सर्वपथम

1. चन्द्रेश्वर

2. अंगारेश्वर (मंगल)

3. बुधेश्वर

4. बृहस्पतिश्वर

5. शुक्रेश्वर

6. शनिश्वर

7. गभस्तीश्वर( सूर्य)

8. राह्वीश्वर कामलेश्वतरेश्वर(राहु)

9. केतविश्वर अश्वतरेश्वर (केतु)

सभी काशी खण्डोक्त लिंग हैं। काशी में नवग्रहों ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए लिंग स्थापन के साथ उग्र तपस्या की थी , तत्पश्चात शिव जी ने सभी को दर्शन दे कर उचित वरदान दिया और ग्रहत्व का भार प्रदान किया था।

योगिनी यात्रा (काशी_खण्डोक्त)

काशी में कुल चौसठ योगिनी के नाम

इन चौसठ योगिनियो के नाम लेने मात्र से ही यह देवियाँ उसकी रक्षा करने पर आतुर होजाती है ।

यह सभी योगिनिया माता काली की ही रूप है जो योगसाधना की सिद्धि भी देती है , अश्विन मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक इनका नाम लेना और दर्शन करना और झबेर के (सिक्के बराबर गोली से ) गुग्गुल की गोली घी के साथ , प्रणव के सहित , इनका नाम लेकर अग्नि में हवन करने से , डाकिनी शाकिनी कुष्मांडा राक्षस प्रेतादि बाधा रोग बाल ग्रहादि सब उपद्रव नष्ट करके गर्भ रक्षा करती है । काशी में चौसट्टी देवी के पूजा से ही सम्पूर्ण फल मिल जाता है ।

1. गजाननायै नमः = राणा महल घाट सरस्वती विनायक के बगल मे d 21/ 22.

2. सिंहमुख्यै नमः = मन्दिर लुप्त होगया है

3.गृध्रास्यायै नमः = मन्दिर लुप्त

4. काकतुण्डीकायै नमः = लुप्त

5. उष्ट्रग्रीवायै नमः = लुप्त

6. हयग्रीवायै नमः = आनन्द मयी अस्पताल के बगल मे, b 3 / 25, भदैनी, अस्सी, varanasi

7. वराह्यै( वाराहये ) नमः = मानमन्दिर घाट d 16 / 84.

8. शरभाननायै नमः = मान मन्दिर लुप्त

9. उलूकीकायै नमः = लुप्त

10. शिवा शवायै नमः = लुप्त

11. मयुर्यै नमः = राणा महल चौसट्टीघाट की सीढ़ी पर दाहिने दीवाल में , d 22 / 16 . दूसरा स्थान लक्ष्मी कुंड पर लक्ष्मी देवी मंदिर में मयूरी देवी ।

12. विकटाननायै नमः ( कात्यायनी देवी) = सिंधिया घाट के ऊपर आत्मविरेश्वर मंदिर में ck 7 / 158 ।

अश्विन शुक्ल पक्ष षष्टि तिथि को इन्ही के दर्शन का विधान है ।

13. अष्टवक्रायै नमः = लुप्त

14. कोटराक्ष्यै नमः = लुप्त

15. कुन्जायै नमः = लुप्त

16. विकट लोचनायै नमः = मैदागिन , दारा नगर , मध्यमेश्वर महादेव मंदिर में k 53 / 63 .

17. शुष्कोदर्यै नमः = कृतिवासेश्वर मन्दिर के पास.

18. लोलज्जिहवाय नमः = लुप्त

19.शवदष्ट्र्यायै नमः = लुप्त

20. वानराननायै नमः = लुप्त

21. ऋक्षाक्ष्यै नमः = लुप्त्

22. केकराक्ष्यै नमः = लुप्त

23. बृहतुण्डायै नमः = लुप्त

24. सुराप्रियायै नमः = लुप्त

25. कपाल हस्तायै नमः = लुप्त

26. रक्ताक्ष्यै नमः = लुप्त

27. शुकिश्येन्यै नमः = ड्योधिया वीर के पास b 19 / 68.

28. कपोतिकायै नमः = लुप्त

29. पाशहस्तायै नमः = लुप्त

30. प्रचण्डायै नमः = लुप्त

31. दण्डहस्तायै नमः = लुप्त

32. चण्ड विक्रमायै नमः = लुप्त

33. शिशुध्न्यै नमः = लुप्त

34. पापहन्त्र्यै नमः = लुप्त

35. काल्यै नमः (कालरात्रि कालिका गली d 9 / 17

36. रुधिरपाण्ये नमः = लुप्त

37. वसाधर्यायै नमः = लुप्त

38. गर्भभक्षायै नमः = लुप्त

39. शवहस्तायै नमः = लुप्त

40. अन्त्रमालिन्यै नमः = लुप्त

41. स्थुलकेश्यै नमः = लुप्त

42. बृहत्कुक्ष्यै नमः = लुप्त

43. सर्पास्यायै नमः = लुप्त

44. प्रेतवाहनाये नमः = लुप्त

45. दन्तशूकरायै नमः = लुप्त

46. क्रोंच्यै नमः = लुप्त

47. मृगशिर्षाये नमः = लुप्त

48. वृषाननायै नमः = लुप्त

49. व्यात्तास्यायै नमः = लुप्त

50. घूमनिश्वासायै नमः = लुप्त

51. व्योमैकचर्णायै नमः = लुप्त

52.उधर्वदृक्यै नमः = ऊर्धरेबा फ़ुल्वरिया, मण्डूआ डीह कुश्माण्ड विनायक के बगल मे

53. तापिन्यै नमः = कालिका गली, कालिका देवी के पास

54. शोषनदृषटयै नमः = लुप्त

55. कोर्टर्यै नमः = लुप्त

56. स्थुलनासिकायै नमः = लुप्त

57. विद्युत्प्रभायै नमः = लुप्त

58. वलाकास्यायै नमः = लुप्त

59. मार्जार्यै नमः = लुप्त

60. कठपुतनायै नमः = लुप्त

61. अट्टातहसायै नमः = लुप्त

62. कामाक्षायै नमः = कमक्षा देवी b 21 / 123.

63. मृगाक्ष्यै नमः = लुप्त

64. सृगलोचनायै(पिशाच घण्ट ) = ललिता घाट कोरिडोर मे लुप्त

अब प्रायः लोग चौसट्टी घाट पर ही चौसट्टी देवी का दर्शन कर लेते है जिसमे कि चौसठ योगिनियो के दर्शन का फल मिल जाता है , पर काशी में चौसठ योगिनियो का स्थान अलग अलग था ।

इन चौसठ योगिनियो में से कात्यायनी और कालरात्रि इनका स्थान नौ देवियों में है ।

वार्षिक यात्रा(काशी खण्डोक्त)

कंबलाश्वतरेश्वर महादेव(राहु रूपात्मक शिव लिंग)

अश्वतरेश्वर महादेव (केतु रूपात्मक शिव लिंग)

पता - ck8/13 गोमठ काका राम की गली,गढ़वासी टोला, चौक, वाराणसी।

कंबलाश्वतरेश्वर जिनको बहुत से लोग राह्वीश्वर और अश्वतरेश्वर को केतविश्वर के रूप में भी जानते है । स्थानीय लोगों के मत अनुसार यह दोनों लिंग त्रेतायुग कालीन है , इनके दर्शन से राहु और केतु ग्रह की शांति और इनसे सम्बंधित अनुकूल फल मिलने लगते है ।

काशी में नवग्रह लिंग यात्रा में (यात्रा के जानकर लोग) राहु केतु के रुप में इन्ही का दर्शन कर के लाभ ग्रहण करते आये है।

विश्वभुजा गौरी (काशी खण्डोक्त)

नवरात्रि यात्रा आदि अन्नपूर्णा

अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिप्रदा से नवमी तक

यह मंदिर आदि अन्नपूर्णा नाम से भी जाना जाता है। काशी खण्ड पुस्तक के अनुसार काशी वाशियो को क्षेम कुशल के लिए यहां नवरात्रि के पूरे नौ दिन तक यात्रा करनी चाहिए ।

मुने विश्वभुजा गौरी विशालाक्षी पुरेः स्थिता | सहंरन्ति महाविघ्नम् क्षेत्रभक्तिजुषां सदा ||

शारदं नवरात्रं च कार्या यात्रा प्रयत्नतः | देव्या विश्वभुजया वै सर्वकाम समृध्यये ||

यो न विश्वभुजां देवीं वारणास्यां नमेन्नरः |कुतो महोपसर्गेभ्यस्तस्य् शान्तिदुरात्मनः ||

यस्तु विश्वभुजा देवी वारणास्यां स्तुताःर्चिता | न हि तान् विघ्नसंघातो बाधते सुकृतात्मनः ||

विशालाक्षी के सन्मुख ही विश्वभुजा गौरी स्थित है , जो क्षेत्र के भक्तिमान लोगो के बड़े बड़े विघ्नों का सदैव संहार करती रहती है ।

अश्विन मास के शारदीय नवरात्र भर उनकी यात्रा बड़े परिश्रम से करनी चाहिए , क्योंकि विश्वभुजा गौरी ही सभी कामनाओं को सम्पन्न करती है ।

जो मनुष्य काशी में विश्वभुजा देवी को प्रणाम नही करता , भला उस दुरात्मा के बड़े भारी पापों की शांति कैसे हो सकती है।

जो पुण्यात्मा वाराणासी पूरी में विश्वभुजा देवी की स्तुति और पूजा कर सकते है उनको कभी भी विघ्न समूह कोई बाधा नही पहुँचा सकते ।

अन्नपूर्णा माता के भी पहले से ही यह आदि अन्नपूर्णा माँ जो कि विश्वभुजा गौरी ही है , काशी में अन्न की और काशीवासियो के समस्त कामनाओं की पूर्ति कर रही है ।

इसीलिए इनका दर्शन विश्वनाथ जी के दर्शन के साथ ही करना चाहिए ।

इनकी प्राचीनता इतनी है कि काशी के राजा दिवोदास ने भी इन्ही के सन्मुख दिवोदासेश्वर नामक शिव लिंग की स्थापना की थी और साथ ही चतुरलिंगात्मक नामक चार लिंगो में शिव जी खुद यहां वास करते है ।

इस शक्ति पीठ के ठीक सामने ही धर्मपीठ (धर्म कूप) है और धर्म राज़द्वारा धर्मेश्वर नामक लिंग भी स्थापित है ।

पता - विशालाक्षी मंदिर के पास वाली गली में , मीरघाट

मनप्रकामेश्वर महादेव वा धनकामेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त लिंग)

अश्विन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी यात्रा

काशी के प्रकांड विद्वान करपात्री जी के शिष्य श्री डंडी स्वामी शिवानंद सरस्वती जी के पुस्तक दिव्य_काशी_दर्शन के अनुसार आज त्रयोदशी के दिन मनप्रकामेश्वर शिव लिंग के दर्शन करने से सभी प्रकार के मनोरथ पूर्ण होते है ।

और धनकामेश्वर के दर्शन करने से धन का आवगमन अच्छे से बना रहता है ।

यह दोनों लिंग अत्यंत ही प्राचीन है और स्थानीय लोगो के कथन के अनुसार यहाँ रुद्राभिषेक करने से सभी प्रकार की मानशिक अशांति और धन के संबंधित दिक्कतें दूर होने लगती है ।

पता - विश्वनाथ गली में साक्षी विनायक मंदिर के पास d 10 / 50

उपशांतेश्वर महादेव वा उपशांत शिव ( काशी खण्डोक्त लिंग)

शांति यात्रा

काशी में अनादि काल से ही सभी प्रकार की शांति को देने के लिए यहां पर उपशान्त शिव विराजमान हुवे है । जो व्यक्ति मानसिक रूप में परेशान चल रहे हो या मन अशांत चल रहा है वह लोग यहां दर्शन पूजन कर के विशेष लाभ ले सकते है ।

मंदिर प्रांगण में उपस्थित होते ही असीम शांति एवं ऊर्जा मिलती है और अक्सर यहाँ विशेष प्रकार के पूजा हवन (अनुष्ठान) होते रहते है जिसमें मूढ़शांति, कालसर्पदोष शांति, मंगलदोष शांति, मारकग्रह शान्ति आदि अनेक प्रकार के अनुष्ठान होते है जिससे कुंडली मे बन रहे दोष शांत हो जाते है ।

उपशांतेश्वर महिमा

तस्य लिङ्गष्य संस्प्शार्त्परां शान्तिं समृछति | उप शान्तशिवं लिङ्गं दृष्ट्वा जन्मशतार्जितम ||

त्यजेदश्रेयसोराशीं श्रेयोराशिं च विदन्ति |

इस लिंग के स्पर्श करते ही परम शांति आजाती है एवं उस उपशान्त नामक शिवलिंग के दर्शन करने मात्र से सैकड़ो जन्मों के बटोरे हुवे पापुंज तत्काल नष्ट होजाते है और व्यक्ति मंगल राशि को प्राप्त होजाता है ।

पता - 2/4पटनी टोला , भोसला घाट , चौक , वाराणसी (संकठा गली से भोसला घाट मार्ग पर प्रसिद्ध मंदिर)

पितृरेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त)

पितृपक्ष दर्शन यात्रा

काशीखण्ड के कथा अनुसार जो भी व्यक्ति पितृपक्ष के दिन पितृकुण्ड में स्नान कर के श्राद्ध तर्पण करने के बाद पितृरेश्वर महादेव के दर्शन करता है तोह उसके पित्र उसपर प्रसन्न (संतुष्ट) होजाते है । स्कन्दपुराण में पितृकुंड को काशी गया के नाम से संबोधन किया गया है ।

पता-पितरकुंडा , वाराणसी

संसार में जल से अधिक किसी भी दान को बड़ा नहीं बताया गया है। भलाई चाहने वाला मनुष्य प्रतिदिन जल का दान करे। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि “जल सर्वदेव मय है। अधिक क्या कहें यह मेरा स्वरूप है। पवित्रता के लिए भूमि की शुद्धि जल से करें।

पितरों के तर्पण में जल की प्रधानता हैं क्योंकि बिना जल के तर्पण सम्भव नही होता , वही श्री हरि विष्णु का नारायण नाम भी नार=जल , आयन= स्थान ( नारायण = जल का स्थान) है

श्राद्ध प्रकरण

आयुः प्रजां विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च | प्रयछन्ति तथा राज्य पितरः श्राद्ध तपिर्ता || (#वृहद_सनातन_मार्तंड)

श्राद्ध करने से पित्र तृप्त होकर श्राद्ध करने वाले अपने संतान को दीर्घायु , संतान , धन , विद्या , सुख , राज्य , स्वर्ग , तथा मोक्ष प्रदान करते है ।

जीवतो वाक्य कर्णान्न मृताहे भूरि भोजनात | गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता || (#देवीभागवत )

माता पिता गुरु और गुरुजनों की वृद्धावस्था में उनकी सेवा का और आज्ञा का पालन करने से और उनके मार जाने पर दैहिक संस्कार कर ब्राह्मण भोजन कराने से तथा काशी में और गया तीर्थ में जाकर पिण्ड दान करने से पुत्र का पुत्रत्व पूर्ण सिद्ध होता है(पुत्र होने का फर्ज निभता है)

काशी में अपने पितरों के नाम से किसी भी देव देवालय , लिंग , देवी दर्शन , विग्रह दर्शन करने से पूर्ण फल पितरों को मिल जाता है , दैनिक यात्रा से लेकर पंचकोशी और चौरासी कोशी यात्रा भी अगर अपने पितरों के नाम से करते है तोह सम्पूर्ण फल पित्रो को मिलता है ।

ललिता गौरी (काशी खण्डोक्त)

ललिता गौरी वार्षिक दर्शन अश्विन कृष्ण पक्ष द्वितीया



स्नात्वा च ललितातीर्थे ललितांप्रणि पत्य वै | अश्विन कृष्ण द्वितीयायां ललिताम्प्रिपुज्य वै ||

नारी वा पुरषो वापि लभते वांछितम्पदम | सा च पूज्या प्रयत्नेन सर्व सम्पत् समृध्ये ||

ललितापुजकाना जातु विघ्नो न जायते |(#काशी_खंड)

अश्विन कृष्ण द्वितीया तिथि के दिन ललिता देवी की पूजा करने से नर , नारी के वांछित सभी मनोरथ पूर्ण होते है । मनुष्यो को भी संपत्ति प्राप्त करने के लिए ललिता गौरी की प्रयत्न पूर्वक पूजा करनी चाहिए । जो मनुषय ललिता देवी की पूजा करते है उन्हें कभी भी काशी में विघ्न नही प्राप्त होते है , साथ राज राजेश्वरी ललिता यह दश महाविद्याओं में से है इनका भी दर्शन करना चाहिए ।

विश्वकरमेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

विश्वकर्मा जयंती दर्शन यात्रा (भाद्र शुक्ल पक्ष एकादशी)

विश्वकर्मा जी ब्रह्मा जी के पुत्र त्वष्टा के यहां जन्म लिए थे, बचपन से ही हर कार्य मे निपुण होने के कारण उनका नाम विश्वकर्मा पड़ा, बाल्यकाल में ही यज्ञोपवित होजाने के कारण वह केवल भिक्षा द्वारा ही भोजन करते थे ।

गरुकुल में पढ़ाई के साथ साथ अपने गुरु के आज्ञा को ही सर्वोपरि मान कर कार्य किया करते थे ,

एक बार वर्षा ऋतु में उनके गुरु ने उनसे ऐसा घर बनाने को कहा जो सदा नया और मजबूत रहे ।

गुरु माता ने भी ऐसे वस्त्रों की मांग की जो कभी खराब न हो और हमेशा उज्ज्वल रहे ।

गुरु पुत्र ने कभी न टूटने वाली पादुका (चप्पल) की मांग की जो बिना चमड़े की हो और पानी मे भी चल पाए ।

गुरु कन्या में हाथी दांत के खिलौने , सोने के कर्णफूल (झुमके) कभी न टूटने वाले बर्तन , और कुछ बड़े बर्तन भी जो बिना धोए ही साफ रहे ।

इनको बनाने की विद्या से अनभिज्ञ होने पर भी विश्वकर्मा ने यह सब बनाने का संकल्प ले लिया और कुछ दिन सोच में पड़े रहने के बाद , वह निर्जन जंगल मे चले गए और चिंता में कहने लगे कि मैं। "" क्या करूँ? किसकी शरण मे जाऊ ? जो गरुकुल कि प्रतिज्ञा पूरी नही करता वह नरक में जाता है ।

इतने में ही एक वृद्ध सन्यासी उनकी बातों को सुन कर उनकी काशी में विश्वनाथ की आराधना और शिव लिंग स्थापित करने को कहा और शिव ही तुम्हारी सभी इक्षाओ को पूर्ण कर सकते है इतना बोल कर वह अंतर ध्यान हो गए । (बाद में विश्वकर्मा को ज्ञात हुआ कि यह स्वयं शिव ही थे) ।

काशी में उन्होंने शिव लिंग स्थापित कर के 3 वर्षों तक लगातार कन्द मूल फल के भोग करते हुवे पुष्पों द्वारा उनका पूजन किया जिससे शिव जी उसी लिंग से प्रकट होकर बोले कि , ""मैं तुम्हारी इस दृढ़ भक्ति से प्रसन्न हो तुम्हे वर देता हूं - "गुरु कुटुंब की सबके अभिलाषा अनुसार वस्तु तुम बना दोगे , और स्वर्ण धातु , पत्थर , लकड़ी , मणी रत्नादि समस्त संसारी और स्वर्गीय प्रदार्थो से यथेप्सित देवालय , भूषणआदि , विमान आदि सब बना सकोगे । इंद्रजाल विद्या तुम्हारे अधीन रहेगी , त्रयलोक के सभी कर्म पूर्ण करने में तुम सक्षम रहोगे । विश्व भर के कार्य कर लेने में सक्षम होने के कारण तुम्हारा नाम विश्वकर्मा होगा और यह लिंग विश्वकरमेश्वर नाम से जाना जाएगा ।

इसी प्रकार से शिवलिंग स्थापन और शिव पूजा से ही आज विश्वकर्मा के विद्या से ही विश्व भर में समस्त निर्माण कार्य होते चले आरहे है ।

पता- सिंधिया घाट पर , आत्मविरेश्वर मंदिर में पीछे कुवे के बगल में ।

महालक्ष्मीश्वर सोहरहिया महादेव (काशी खण्डोक्त )

सोहरहिया मेला दर्शन

महालक्ष्मी देवी के द्वारा पूजित लिंग

कुण्ड श्रीकण्ठसंज्ञितं तत्र कुण्डे नरः स्नात्वा। दाता नृप प्रभावातः

महालक्ष्मिश्वर लिङ्गं तस्य कुण्डस्य सन्निधो महालक्षमीं समभ्यचर्य स्नातस्तत्कुण्ड्वारिषु चामरासक्त हस्ता भिर्दिदिव्यस्त्रीभिस्च विज्यते।

जो व्यक्ति श्रीकंठ (लक्ष्मीकुंड) नामक कुंड में स्नान करता है वह लक्ष्मी जी की कृपा से राजा के तरह बहुत भारी दाता होजाता है ।

उस कुंड के समीप महालक्ष्मीश्वर(सोहरहिया महादेव) नामक शिव लिंग है , उस कुंड में नहाकर जो उस लिंग का दर्शन करता है वह स्वर्ग में दिव्यात्माओं द्वारा चामर से बिजित होता है ।

स्वर्ग वासी देवता लोग जब भी काशी में मत्योदरी तीर्थ और ओम्कारेश्वर के दर्शन को आते है वह इस कुंड में स्नान और श्री महालक्ष्मीश्वर के दर्शन करते हुवे इसी मार्ग से जाते है ।

पता - लक्ष्मीकुंड के पास सोहरहिया महादेव नाम से प्रसिद्ध।

श्री महालक्ष्मी देवी (काशीखण्डोक्त)

सोरहिया मेला यात्रा काशी वार्षिक यात्रा

लक्खा मेला

महालक्ष्मी के पूजन और व्रत का नाम सोरहिया इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें 16 के अंक का विशेष महत्व है और यह मेला और व्रत 16 दिनों तक चलता है। 16 दिनाें तक व्रत रखने वाली महिलाओं ने मां को 16 गांठ का धागा अर्पित करती है । 16 दाना चावल की 16 पुड़िया और 16 दूर्वा अर्पित करके महिलाओं ने माता के स्वरूप की 16 परिक्रमा कर विधान पूर्ण किया जाता है । माता पार्वती ने महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए काशी में यह पूजन किया था। उन्होंने 16 कलश स्थापित करके पूजन किया और महालक्ष्मी प्रसन्न हुई थीं। उन्होंने माता पार्वती को पुत्रवती होने का वरदान दिया और कहा कि जो भी यह 16 दिनों का व्रत अनुष्ठान करेगा उसको धन-धान्य, सौभाग्य और पुत्र की प्राप्ति होगी।

माहात्म्य

स्नात्वा श्रीकुण्डतिर्थे तु समचर्या जग्दम्बिका। पित्रन संतपर्य विधिवतीर्थे श्रीकुण्डसंज्ञिते॥

दत्वा दानानि विधिवन्न लक्ष्म्या परिमुच्येते॥

लक्ष्मी कुंड में नहा कर महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए , तथा उस जल से लक्ष्मी कुंड नामक तीर्थ में विधिपूर्वक पितरों का तर्पण और विविध तरह के दान के करने से मनुष्य सदैव लक्ष्मीवान बना रहता है ।

लक्ष्मीक्षेत्रं महापिठं साधकस्येव सिद्धिदम। साधकस्तत्र मन्त्राश्च नरः सिद्धिमवाप्युनात॥

साधकों का परमसिद्धिप्रद लक्ष्मीक्षेत्र नामक महापीठ है, जो मनुष्य वहां पर मन्त्रो की साधना करता है, वह अनायास ही सिद्धि को पा जाता है ।

सन्ति पीठान्यकानि काश्यां सिद्धिकरण्यपि।महालक्ष्मीपीठसमं नान्यल्क्ष्मीकरं परम॥

महालक्ष्म्यष्टमीं प्राप्य तत्र यात्राकृतां नृणां।संपुजिते विधिवत् पद्मा सद्म न मुच्चति॥

काशीपूरी में सिद्धि देने वाले अनेक पीठ है, पर महालक्ष्मी के समान परमलक्ष्मीकारक दूसरा कोई नही है। (कुआर वदी) महालक्ष्मी की अष्टमी पर वहां की यात्रा करने वालो के घर को विधिवत पूजित होने से महालक्ष्मी देवी काशी में कभी नही छोड़ती ।

पता - D52/40 luxa laxmi kund

संतानेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

भाद्रशुक्ल सप्तमी संतान सप्तमी यात्रा

लोलार्क षष्टि के ठीक दूसरे दिन सप्तमी तिथि में संतानेश्वर महादेव के दर्शन का विधान प्राचीन काल से ही चला आरहा है। आज के दिन यहां दर्शन करने से संतान की रक्षा होती है साथ ही संतान की वृद्धि होती है ।

काशी खण्ड पुस्तक के अनुसार यदि किसी शादी शुदा दंपति को शादी के सालों बाद भी संतान उत्पत्ति नही हो रही हो तोह यहां संतानेश्वर महादेव की पूजा अर्चना करने से संतान प्राप्ति अवश्य होती है , ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जिन्होंने यहां पूजा कर संतान की मनोकामना को प्राप्त किया है ।

मंदिर प्रांगण में अमृतेश्वर महादेव लिंग भी है जो दर्शनार्थियों को जीवन दान देने में पूर्णरूप से सक्षम है

काल_माधव का दर्शन हर एकादशी को करने से तमाम तरह की शारीरिक व्याधियां नष्ट होती है

साथ ही अमृत सिद्धि गणेश तमाम तरह की सिद्धियो के साथ निरोगता प्रदान करते है ।

पता- k 34 / 4 चौखम्बा भैरोनाथ मार्ग पर

लोलार्क आदित्य लोलार्क़ेश्वर महादेव (काशी खण्ड)

भाद्रशुक्ल पक्ष षष्टी रविवार यात्रा(लोलार्क षष्टी )

आज के विशेष दिन में संतानहीन लोग आज के तिथि में लोलार्क कुंड में श्रद्धा के डुबकी लगाते है , फलस्वरूप उनको संतान की प्राप्ति होती है , बहुत दूर दूर से लोग यहां अपनी मंन्नत मांगने आज के दिन यहां स्नान करने आते है ।

वैसे काशी में कुल 12 आदित्य हैं-

अरुण आदित्य

द्रौपद आदित्य

गंगा आदित्य

केशव आदित्य

खखोलक आदित्य

लोलार्क आदित्य

मयूख आदित्य

साम्ब आदित्य

उत्तार्क आदित्य

विमल आदित्य

वृद्ध आदित्य

यम आदित्य

पर आज के तिथि में काशी खण्ड पुस्तक के अनुसार लोलार्क आदित्य और लोलरकेश्वर महादेव का विशेष दर्शन होता है ।

वाराणसी में असी गंगा संगम के पास लोलार्क कुंड पर स्थित है। काशी में लोलार्क कुंड को बहुत महत्व दिया गया है। लोलार्क आदित्य को वाराणसी के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया है और यह माना जाता है कि वे काशी के मूल निवासियों के कल्याण का ध्यान रखते हैं। असी संगम पर होने के कारण जहां लोलार्क कुंड का पानी गंगा नदी के पानी से मिलता है और फिर वाराणसी के अन्य तीर्थों तक पहुंचता है, इसे वाराणसी के प्रमुख तीर्थों में से एक माना जाता है।

काशी खंड में उल्लिखित एक कहानी के अनुसार, भगवान शिव ने सूर्यदेव को आदेश दिया कि वे अपनी शक्तियों से काशी के तत्कालीन राजा दिवोदास के शासन की खामियों को खोजे और उनकी शक्तियों को नष्ट करदे। सूर्यदेव ने भगवान शिव की आज्ञा का पालन किया और काशी चले गए।

काशी पहुंचने पर, सूर्यदेव मोक्ष देने वाले शहर का पता लगाने के लिए उत्साहित हो गए। बाद में, सूर्यदेव ने शहर में आंतरिक और बाहरी जांच की, लेकिन राजा के खिलाफ कोई अधर्म नहीं पाया। अंत में, सूर्यदेव ने मंदराचल नहीं लौटने का निर्णय लिया और अपनी बारह मूर्तियों के रूप में काशी में स्थापित हो गए। क्योंकि भगवान आदित्य काशी की सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गए थे, इसलिए उन्हें यहाँ लोलार्क कहा जाता था।

ऐसा माना जाता है कि अगर कोई अगहन माह के रविवार को लोलार्क जाता है तो वह अपने सभी पापों से छुटकारा पा सकता है। जो भक्त आसी संगम में डुबकी लगाता है, और अपने पूर्वजों का श्राद्ध करता है, उसे पितृ-ऋण से मुक्त किया जाता है। जनवरी-फरवरी के शुक्ल सप्तमी पर, यदि कोई व्यक्ति लोलार्क कुंड में गंगा नदी और असि के संगम में पवित्र डुबकी लगाता है, तो वह अपने सात जन्मों के अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

पता- अस्सीघाट के पास भदैनी मुहल्ले में , वाराणसी ।

ढूंढी विनायक (काशी खण्डोक्त)

भाद्रपद शुक्ल पक्ष गणेश चतुर्थी दर्शन

प्रथम पूज्य श्री ढूंढी राज़ गणेश

जब काशी में शिव जी द्वारा सभी गणों , देवी , देव , सूर्य , योगिनी , नक्षत्र , भैरव , गौरी को भेजा जा रहा था और सभी राजा दिवोदास के राज्य में खामी नही निकाल पाये और यही रुक गए , उसी क्रम में शिव जी ने अपने पुत्र गणेश को भेजा जो इस कार्य मे सफल होगये और वृद्ध ब्राह्मण बन कर ज्योतिष विद्या के माया प्रपंच से राजा दिवोदास की मति को भ्रमित करदिया और समस्त काशी को अपने वश में कर लिया।

गणेश जी के वश में हो जाने के बाद विष्णु जी ने राजा को काशी से उच्चाटीत (मुक्त) कर के विश्वकर्मा के द्वारा नई काशी का निर्माण करवाया और शिव जी को मंदरांचल से काशी आने का निमंत्रण दिया ।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा

धार्मिक दृष्टि से कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक पौराणिक कथा ये भी है. पुराणों के अनुसार एक बार सभी देवता संकट में घिर गए और उसके निवारण के लिए वे भगवान शिव के पास पहुंचे. उस समय भगवान शिव और माता पार्वती अपने दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश के साथ मौजूद थे. देवताओं की समस्या सुनकर भगवान शिव ने दोनों पुत्र से प्रश्न किया कि देवताओं की समस्याओं का निवारण तुम में से कौन कर सकता है. ऐसे में दोनों ने एक ही स्वर में खुद को इसके योग्य बताया.

दोनों के मुख से एक साथ हां सुनकर भगवान शिव भी असमंजस में पड़ गए कि किसे ये कार्य सौंपा जाए. और इसे सुलाझाने के लिए उन्होंने कहा कि तुम दोनों में से सबसे पहले जो इस पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा कर आएगा, वही देवताओं की मदद करने जाएगा. शिव की बात सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठ कर पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए निकल गए. लेकिन गणेश सोचने लगे कि मोषक पर बैठकर वह कैसे जल्दी पृथ्वी की परिक्रमा कर पाएंगे. बहुत सोच-विचार के बाद उन्हें एक उपाय सूझा. गणेश अपने स्थान से उठे और अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा करके बैठ गए और कार्तिकेय के आने का इंतजार करने लगे.

गणेश को ऐसा करता देख सब अचंभित थे कि आखिर वो ऐसा करके आराम से क्यों बैठ गए हैं. भगवान शिव ने गणेश से परिक्रमा न करने का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक है. उनके इस जवाब से सभी दंग रह गए. गणेश का ऐसा उत्तर पाकर भगवान शिव भी प्रसन्न हो गए और उन्हें देवता की मदद करने का कार्य सौंपा. साथ ही कहा, कि हर चतुर्थी के दिन जो तुम्हारी पूजन और उपासना करेगा उसके सभी कष्टों का निवारण होगा. इस व्रत को करने वाले के जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होगा. कहते हैं कि गणेश चतुर्थी के दिन व्रत कथा पढ़ने और सुनने से सभी कष्टों का नाश होता है, और जीवन भर किसी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता.

पता-काशी विश्वनाथ जाने वाले गेट नंबर 1 पर ही इनका मंदिर है (अन्नपूर्णा मंदिर के पहले)

मंगला गौरी(काशी खण्डोक्त)

भाद्रशुक्ल पक्ष तृतीया दर्शन (हरतालिका तीज वार्षिक यात्रा)

आज के दिन समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी माँ मंगला गौरी के पूजा से मनचाहा जीवन साथी और अपने जीवन साथी के लंबी उम्र के लिए यहां प्राचीन समय से ही (हरतालिका तीज के दिन)माताएं और बहने दर्शन करती आई है ।

मंगला गौरा की स्थापना स्वयं सूर्य देव द्वारा माता पार्वती के रूप में किया गया था , बाद में माता पार्वती के वरदान स्वरूप इनका नाम मंगला गौरी पड़ा निसंतान दंपत्ती भी यहां संतान की मनोकामना से दर्शन पूजन करते है और अपने इक्षित अभिलाषा का वरदान प्राप्त करते है ।

हरतालिका तीज की कथा

एक कथा के अनुसार माँ पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर ही काटे और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा ही ग्रहण कर जीवन व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुःखी थे।

इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वतीजी के विवाह का प्रस्ताव लेकर माँ पार्वती के पिता के पास पहुँचे जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब बेटी पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वे बहुत दु:खी हो गईं और जोर-जोर से विलाप करने लगीं।

फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वे यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं, जबकि उनके पिता उनका विवाह श्री विष्णु से कराना चाहते हैं। तब उनकी सहेली ने उनका हरण कर के कही और ले गयी फिर सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गईं और वहाँ एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। माँ पार्वती के इस तपस्वनी रूप को नवरात्रि के दौरान माता शैलपुत्री के नाम से पूजा जाता है।

आज के दिन अपने सखी द्वारा हरण करने और व्रत रखने के कारण ही आज के दिन का नाम हरतालिका तीज पड़ा।

भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि के हस्त नक्षत्र मे माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया। तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

【इसी कारण काशी में तभी से हर माह के तृतीया तिथि को मंगला गौरी की यात्रा की जाती है】

मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वे अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करतीं हैं। साथ ही यह पर्व दांपत्य जीवन में खुशी बनाए रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है।

पता -पंचगंगा घाट पर स्थित मंगला गौरी प्रसिद्ध मंदिर है ।

अंगारेश्वर (मंगलेश्वर) महादेव (काशी खण्डोक्त)

मंगलवार यात्रा

मंगल देवता जिनको कुज ,अंगारक , भौम और लोहित के नाम से भी जाना जाता है यह युद्ध के देवता और धरती माता के पुत्र है और शिव जी के पसीने से उत्पन्न हुवे है , इनकी चार भुजाएं और शरीर लाल (रक्त)वर्ण का है ।

अंगारेश्वर लिंग की महिमा

पुरा तपस्यतः शम्भोदर्क्षान्या वियोगतः। भाल स्थालात्पपातैकः स्वेदबिन्दु मर्हितले॥

पूर्वकाल में दाक्षायणी (सती) देवी के वियोग से तपस्या करते हुवे शिव जी के भाल स्थल से स्वेदबिन्दु (पसीना) भूमितल पर गिर पड़ा । उसी के द्वारा एक लोहितांग कुमार (मंगलदेव) उतपन्न हुवे और धरती ने माता की तरह स्नेहपूर्वक उस कुमार का लालन पोषण किया ।

बाद में मंगल देव ने शिव पूरी में घोर तप किया , जहाँ पर जगत की हितकारिणी नदी असि और वरुणा नदी उत्तर वाहिनी गंगा में मिली हुई है , उसी काशी के पाँचमुद्र नामक महापीठ में कम्बल और अश्वतर इन दोनों नागों के उत्तर में अंगारक (मंगल) ने अपने नाम से विधि पूर्वक अंगारेश्वर लिंग की स्थापना कर तब तक तपस्या किया जब तक उनके शरीर से अंगारे के समान ज्वाला ना निकली तब भी वह तपस्या करते ही रहे ।

इसी कारण से समग्र लोक में वह अंगारक नाम से प्रसिद्ध हुवे और महादेव ने प्रसन्न होकर उनको कई वरदान और महाग्रह की पदवी दी और युद्ध कला में पारंगत किया फिर युद्ध क्षेत्र का स्वामी नियुक्त किया

मंगलवार की चतुर्थी को गंगा में स्नान कर अंगारेश्वर के दर्शन कर के जो भी जप , तप ,दान , हवन , ब्राह्मण भोज करवाते है वह सब अक्षय होजाता है और और साथ ही श्राद्ध करने से 12 वर्ष तक पितृ संतुष्ट रहते है ।

पूर्वकाल में अंगारक चतुर्थी को ही गणेश जी का जन्म हुआ था इसीलिए यह तिथि पुण्य और समृद्धि देने वाली है , इस तिथि को गणेशजी की पूजा कर दान देने से विघ्नों के द्वारा कभी अभिभूत नही होता ।

जो भी व्यक्ति अंगारेश्वर लिंग की पूजा करता है वह हमेशा पुरुषार्थी , युद्ध मे विजयी , सेना , प्रशासन और भूमि से लाभ लेने वाला , गूढ़ रहस्य का ज्ञाता , अधिक मित्रो वाला साथ ही उसके कुंडली के सभी दोष शांत होकर आजीविका अच्छे से चलती है

पता- चौक सिंधिया घाट पर आत्मविरेश्वर मंदिर प्रांगण में ।

चन्द्रेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त )

सोमवती अमावस्या दर्शन

चंद्रेश्वर लिंग महिमा

पूर्वकाल में प्रजा एवं सृष्टि के विधानेक्षु ब्रम्हा जी के मन से ही चन्द्र देव के पिता अत्रि ऋषि उतप्पन हुवे , अत्रि ऋषि ने पहले दिव्य परिमाण से तीन सहस्त्र वर्ष अनुत्तर नामक सर्वोत्कृष्ट तपस्चर्या की थी ।

उसी समय अत्रि मुनि का उधर्वगत रेत सोमत्व को प्राप्त होकर दिकमण्डल को प्रकाशित हुआ और उनके नेत्रों से दस बार क्षरित हुआ ।

तदन्तर ब्रम्हा के आज्ञानुसार दशो दिग्देवीओ ने मिलकर उसे धारण किया पर वे न रख सकी , जब वह दिशाएं उस गर्भ को धारण न रख सकी तब उनके साथ चंद्र भूतल पर निपतित हुवे।

लोक पिता ब्रम्हा ने चंद्र को भूतल पर गिरा देख कर त्रैलोक्य की हिट साधना के इक्षा से उनको रथ पर चढ़ा लिया।

स तेन रथ मुख्येन सागरान्तां वसुन्धरां। त्रिः सप्तकृत्वो द्रुहिनश्व कारामुं प्रदक्षिणम॥

ब्रम्हा ने उसी चंद्र को रथ पर प्रधान बनाकर इक्कीस बार उसकोसमुद्रान्त पृथ्वी की प्रदक्षिणा करायी , उनका द्रवित जो तेज़ पृथ्वी में गिरा उसी से ये सारी औषधियां उपजी , जिनके द्वारा जगत का धारण होता है ।

स लब्धतेजा भगवान ब्रह्मणा वर्धितः स्वयं। तपस्तेपे महाभाग पद्मानां दशतीदर्शं ॥

अविमुक्तं समासाद्य क्षेत्रं परम् पावनं । संस्थाप्यं लिङ्ग ममृतं चन्द्रेशाख्यं स्वनामतः॥

हे महाभाग , स्वयं ब्रह्मा से वर्धित भगवान चंद्र तेज़ पाने पर परम् पावन अविमुक्त क्षेत्र को प्राप्त होकर और स्वनामनुसार चन्द्रेश्वर नामक अमृत लिंग की स्थापना कर एक सौ पद्म प्रमाण वर्ष पर्यंत तपस्या ही करते रहे और महादेव विश्वेश्वर के प्रसाद से बीज , औषधि , जल , और ब्राह्मणों के राजा हुवे ।

चंद्र ने तपोनुष्ठान ही के समय वहाँ पर एक अमृतोद नामक कूप (चन्द्र कूप) प्रस्तुत किया था , जिसके पान और स्नान से मनुष्य अज्ञान से छुटकारा पा जाता है , स्वयं महादेव ने तपस्या से संतुष्ट होकर जगत संजीवनी नामक उस चंद्र की एक कला को लेकर अपने शिर पर धारण कर लिया ।

चंद्र ने काशी में चन्द्रेश्वर के सन्मुख ही परम दुष्कर तपस्या और राजसूय यज्ञ पूर्ण किया , उसी स्थान पर ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर चन्द्र को यह कहा कि त्रैलोक्य की दक्षिणा के दाता श्री चन्द्र ही हमलोग के राजा है ।

चन्द्र देव उसी स्थान पर ही महादेव के वाम नेत्र स्थान को प्राप्त हुवे । शिव जी ने चन्द्र से कहा कि तुम्हारे तप के फलस्वरूप तुम आज से मेरी दूसरी मूर्ति हो , संसार तुम्हारे उदय से सूखी होगा। तुम्हारी अमृतमय किरण के स्पर्श मात्र से सूर्य के ताप से व्याप्त यह चराचर जगत अपनी संताप की गर्मी को छोड़ देगा ।

इस काशी में तुमने जो बड़ी कठिन तपस्या की है और यह यग्यो का फल पा कर तुमने जो मेरा चन्द्रेश्वर नामक लिंग की स्थापना किया है इसी लिंग में प्रतिमास की पूर्णमासी को त्रिभुवन के ऐश्वर्य सहित मैं दिन और रात्रि में निवास करूंगा , पूर्णिमा के दिन यहां जो भी जप तप हवन दान , ब्राह्मण भोजन , जीर्णोद्धार , संपादन , नृत्य गीत वाद ध्वजारोपण इत्यादि थोड़े मात्रा में भी करेगा वह अनंत फलदायक होगा ।

सोमवती अमावस्या के दिन चन्द्रकूप के जल स्नान करके विधिवत संध्या तर्पण समस्त उदक क्रियाओ को समाप्त कर के श्राद्ध एवं पिंड दान करने से गया में श्राद्ध करने का फल प्राप्त होता है ।

शिव जी कहते है कि जब भी कोई चन्द्रेश्वर के दर्शन को निकलता है तब सभी पित्रगण बहुत हर्ष से नृत्य करते है और कहते है कि वह चन्द्रकूप तीर्थ पर हमलोग का तर्पण करेगा , यदि दुर्भाग्य बस तर्पण न भी करे तोह क्या इस जल को स्पर्श करते ही हमलोग की तृप्ति होजावेगी , यदि वह जल को स्पर्श भी नही करता अगर सिर्फ देख ही ले तोह उसी से हमारा संतोष होजायेगा ।

काशी में सोमवती अमावस्या पर व्रत करने से मेरे ही अनुग्रह के कारण देव ऋण ऋषि ऋण पित्र ऋण से मुक्त होजाता है और चन्द्रेश्वर लिंग की पूजा करने वाला अगर काशी के बाहर

भी मरने पर पापो को छोड़ कर चन्द्रलोक में वास करता है ।

पता - सिद्धेश्वरी गली , संकठा मंदिर मार्ग , चौक वाराणसी ।

ईशानेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त)

सोमवारी चतुर्दशी यात्रा

ईशानेश्वर लिंग महिमा

अल्कयाः पुरो भागे पुरैशाणि महोदया। अस्यां वसन्ति सततं रुद्र भक्तास्त पोधानाः॥(काशी खण्ड)

इस अलकापुरी के आगे के भाग में यह महोदया इशानपुरी है । इसमें शिवभक्त तपोधन लोग निवास करते है ।

जो लोग शिव के स्मरण में लगे रहते है , जो लोग शिव व्रत में दीक्षित है , जिन्होंने अपने समस्त कर्मो को शिवार्पण कर दिया है और नित्य ही शिव पूजन में तत्पर रहते है , वे सब मनुष्य " हमको सर्वभोग यहाँ से प्राप्त होवे" इस कामना से तपस्या करने वाले रुद्ररूप धारी लोग इस रम्य रुद्रपुर में निवास करते है ।

अजै कपादहिबुध्न्यमुख्या ऐकादशापि वै। रुद्राः परिवृढाश्वआत्र त्रिशुलोद्यत पाणय ॥

अज , एकपाद , अहिबुर्ध्न्य प्रभृति हाथ मे त्रिशूल धारण किये हुवे एकादश रुद्र इस स्थान के प्रभु है ।

पुर्यष्टकं च दुष्टेभ्यो देव ध्रुग्भ्यो हय्वन्ति ते ।प्रयक्छन्ति वरानित्यं शिव भक्त जने वराः॥

ये श्रेष्ठजन रुद्रगण उक्त अष्टपुरियो की दुष्टों से और देव द्रोहियो से सदा रक्षा करते है और शिव जनों को वर प्रदान करते है ।

यह रुद्र गण वाराणसी पूरी में प्राप्त होकर , शुभ प्रद ईशानेश्वर नामक महालिंग स्थापित कर तपस्या कर चुके है ।

ये सब के सब भालनेत्र , नीलकंठ , गौर शरीर और वृषभध्वज है । पृथ्वी पर जो असंख्य रुद्रगण है , वे सब समस्त भोगों की समृद्धि को पाकर इसी इशानपुरी में निवास करते है। काशी में ईशानेश्वर का पूजन करने पर यदि देशांतर में भी जो लोग मृत्यु को प्राप्त होते है , तो वे उसी पुण्य के बल पर यहां काशी में पुरोहित होते है ।

जो लोग अष्टमी और चतुर्दशी तिथि पर ईशानेश्वर की पूजा करते है , वे यहां और परलोक में अवश्य रुद्र होते है , ईशानेश्वर के समीप किसी भी चतुर्दशी को रात्रि जागरण और उपवास करने से मनुष्य फिर कभी गर्भ में निवास नही करता ।

पता- शाहपुरी मॉल , बांसफाटक मार्ग , गोदौलिया , वाराणसी ।

गंगा तिरस्त श्री महालक्ष्मी(काशी खण्डोक्त)

भाद्र कृष्ण पक्ष नवमी काशी खण्ड वार्षिक यात्रा

केदार घाट के गली में श्री गौरी केदारेश्वर के मंदिर के थोड़ा पहले ही यह मंदिर स्थापित है । स्कंद पुराण में (काशीखण्ड) वर्णन होने के कारण इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह मंदिर अति प्राचीन है, काशी में बहुत से लोग इस मंदिर से अनजान है यहां माँ लक्ष्मी श्री हरि विष्णु के साथ विराजित है और इनका विग्रह भी उतना ही प्राचीन है जितना इनका इतिहास है (शायद मुग़ल काल मे यह मंदिर तोड़ फोड़ से बच गया हो क्योंकि यह मंदिर घर के अंदर था , ऐसे ही कई मंदिर बच गए थे काशी में , वाराणसी वैभव पुस्तक के अनुसार 1100 ईसवी से ही बाहरी आक्रमणकारी काशी में मंदिर तोड़ते आये है , काशी में ज्यादातर मंदिर विग्रह के रक्षा के लिए अपने स्थान से हटाए गए है या टूटने के कारण नया विग्रह स्थापित किया गया है )

प्राचीन होने के कारण यह विग्रह अत्यंत जागृत है , साथ ही जो नीलकंठ महादेव का लिंग है वह जमीन से थोड़ा नीचे जा कर भूगर्भ में स्थित है , आज 31/8/21 को पंचांग अनुसार माता की वार्षिक यात्रा है आज के दिन यहां दर्शन से अभी मनोरथ पूर्ण और सिद्धि प्राप्त होती है ।

Gps address

Ganga tirast mahalakshmi

पता -केदारघाट पर श्री गौरी केदारेश्वर मंदिर के मेन गेट के थोड़ा पहले यह मंदिर है , लोहे के गेट के अंदर धर्मशाला में ।

कृष्णेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

भाद्र कृष्ण पक्ष (जन्माष्टमी दर्शन)

जब श्री कृष्ण पांडवो के साथ शिव लिंग स्थापना के उद्देश्य से काशी में आये थे और कृष्णेश्वर नामक लिंग की स्थापना किया , इस लिंग के पूजन अर्चना करने से विष्णु लोक की प्राप्ति होती है और जीवन के सभी बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

पांडवो ने माँ संकटा देवी से महाभारत के युद्ध मे विजय का वरदान मांगा था और एक पैर पर खड़े होकर तप किया जिससे माता संकटा ने खुश होकर उनको विजय का वरदान दिया था , कृष्णेश्वर लिंग संकटा मंदिर के पीछे वाली गली में स्थित है। साथ ही जाम्बतीश्वर लिंग भी स्थापित है जाम्बतीश्वर लिंग के बारे में ज्यादा तोह पता नही लग पाता पर स्थानीय लोगो के हिसाब से यह लिंग जाम्बवन्ती या जाम्बवन्त जी द्वारा स्थापित होगा(जाम्बवन्ती श्री कृष्ण की पत्नी और जाम्बवन्त जी की पुत्री थी) जाम्बवन्त जो अभी भी जीवित हैं और अष्ट चिरंजीवी में से एक है ।

जन्माष्टमी के दिन पीले रंग के वस्त्रों ,मिठाई और मालाओं से श्री कृष्ण भगवान की पूजा करने से स्थिर लक्ष्मी और सौभाग्य की प्राप्ति होती है , और जन्माष्टमी के रात(मोहरात्रि) को रात्रि जागरण करके कृष्ण जी की पूजा अवश्य करनी चाहिए ।

सभी मित्रों को श्री कृष्ण जन्माष्टमी (मोहरात्रि) की हार्दिक एवं शुभकामनाये ।

पता - संकटा घाट (सिंधिया घाट के पास) के पीछे वाली गली में ck 7/159

लक्ष्मणेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त)

बलराम जयंती हल षष्टी (वार्षिक यात्रा)

हिन्दी पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हल छठ, हल षष्ठी या बलराम जयंती मनाई जाती है। हल षष्ठी के अवसर पर भगवान ​श्रीकृष्ण के बड़े भ्राता बलराम जी की विधिपूर्वक पूजा की जाती है। बलराम जी का जन्मोत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पूर्व होता है। इस वर्ष हल षष्ठी या बलराम जयंती 28 अगस्त दिन शनिवार को है, जबकि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 30 अगस्त दिन सोमवार को है।

हल षष्ठी का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बलराम जयंती, हल छठ या हल षष्ठी का व्रत संतान की लंबी आयु और सुखमय जीवन के लिए रखा जाता है। यह निर्जला व्रत महिलाएं रखती हैं। हल षष्ठी के दिन व्रत रखते हुए बलराम जी और हल की पूजा की जाती है।

गदा के साथ ही हल भी बलराम जी के अस्त्रों में शामिल है। हल पूजा के कारण ही इसे हल षष्ठी या हल छठ कहा जाता है। बलराम जी की कृपा से संतान की आयु दीर्घ होती है और उसका जीवन सुखमय तथा खुशहाल होता है।

मान्यताओं के अनुसार बलराम जी को भगवान विष्णु के शेषनाग का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण शेषनाग का अवतार ही थे। इसी प्रकार द्वापर में जब भगवान विष्णु धरती पर श्री कृष्ण अवतार में आए तो शेषनाग भी यहां उनके बड़े भाई के रूप में अवतरित हुए। शेषनाग कभी भी भगवान विष्णु के बिना नहीं रहते हैं। इसलिए वह प्रभु के हर अवतार के साथ स्वयं भी आते हैं।

काशी में बलराम जयंती के दिन लक्ष्मणेश्वर शिव लिंग की वार्षिक यात्रा होती है , लक्ष्मण और बलराम दोनों ही शेषनाग के अवतार है , और काशी में लक्ष्मण के द्वारा स्थापित लिंग के दर्शन करने से लक्ष्मण , बलराम और शेषनाग तीनो की ही कृपा प्राप्त हो जाती है।

यहां दर्शन करने से भातृ भक्ति और धैर्य धारण की शक्ति बढ़ती है और साथ में सभी पापो से मुक्ति भी मिलती है।

पता-बंगाली टोला के पास हनुमान घाट पर

संगमेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त)

गङ्गा और वरुणा नदी क सङ्गं मे स्थित यह लिङ्ग की पूजा अर्चना करने से सभी पाप कट जाते है और शास्त्रो में ऐसा वर्णीत है कि यहां रुद्राभिषेक करने से गौदान का फल प्राप्त होता है और इस तीर्थ पर अन्नदान का भी बहुत महात्म्य है ।

सङ्गमेश महालिङ्गं प्रतिष्ठयादि केशवः। दर्शनादघहन्णानं भुक्तिं मुक्तिं दिशेत्सदा॥(काशी खण्ड)

आदिकेशव (भगवान विष्णु) द्वारा प्रतिष्ठापित ( स्थापित ) महाशिवलिंग के दर्शन करने से सभी पापों का नाश होता है और मुक्ति (मोक्ष) मिलती है ।

पता- आदिकेशव मंदिर A 37/41 आदिकेशव घाट वरुणा संगम ।

सिद्धि विनायक वा सिद्धि लक्ष्मी(काशी खण्डोक्त)

संकष्टी चतुर्थी

काशी के श्रेष्ठतम तीर्थ मणिकर्णिका पर स्थित सिद्धि विनायक और सिद्धि लक्ष्मी के मंदिर में भक्तों की फरियाद तुरन्त सुनी जाती है ।

बुधवार_को_होता_है_विशेष_दर्शन जिसमे स्थानीय लोग अपने सामर्थ अनुसार विविध प्रकार से पूजा करते है जिसके फल स्वरूप सिद्धि विनायक उनके समस्त विघ्न हर लेते है ।

शुक्रवार को विशेष दर्शन माता सिद्धि लक्ष्मी का होता है , शास्त्रो के अनुसार यहाँ दर्शन पूजन से सभी प्रकार की सिद्धि और ऐश्वर्य प्राप्त होता है

सिद्दलक्ष्मी जगत्धत्री प्रतीच्याममृतेश्वरात। प्रपितामहलिङ्गष्य पुरतः सिद्धिदाःचिर्ताः॥

प्रसादं सिद्धलक्ष्म्याश्च विलोक्य कमला कृतं। लक्ष्मीविलाससंज्ञं च को न लक्ष्मीं समाप्युनात॥ (काशी खण्ड)

पिता महेश्वर लिंग के आगे ही जगन्माता सिद्धि लक्ष्मी देवी विराजमान है , पूजन करने से वह सब सिद्धियों को देती है ।

सिद्धि लक्ष्मी का कमल के आकार का लक्ष्मी विलास नामक है , उसे देखने ही से किसे लक्ष्मी नही मिलती (अर्थात इस मंदिर को देख लेने मात्र से ही माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है )

पता- मणिकर्णिका घाट पर चकरपुष्कर्णी कुंड के बगल की सीढ़ी से ऊपर जा कर , गौमठ , गढ़वासी टोला चौक वाराणसी।

यहां ऐसी मान्यता है कि गणेश_अथर्वश्रीर्ष का पाठ करने से 1000 गुना ज्यादा फल मिलता है और सिद्धि लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए कनक धारा स्तोत्र पढ़ने का विधान चला आरहा है ।

जागेश्वर महादेव या अग्नि ध्रुवेश्वर लिंग

ईश्वर गंगी पोखरा या अग्नि कुंड ( आदि गंगा)

यह शिव लिंग और कुंड दोनों काशीखंड में वर्णीत है (अर्थात काशी खण्डोक्त है )

भाद्र कृष्ण पक्ष प्रतिपदा आज के दिन यहां की वार्षिक यात्रा होती है , वार्षिक यात्रा के अंतर्गत लिंग दर्शन , पूजन , एवं रुद्राभिषेक का बहुत महात्म्य है । यह जागेश्वर नामक लिंग जो कि स्वयम्भू लिंग हैं । यहां जो कोई भी स्त्री पुरुष अपनी मनोरथ ले कर जाते है सभी पूर्ण होती है ।

इस प्रकार का बड़ा स्वयम्भू लिंग काशी में बहुत दुर्लभ और अन्यत्र कही भी नही है । कुछ लोगो का मानना है कि ऋषि जैगीषव्य द्वारा पूजित होने के कारण इनका नाम जागेश्वर पड़ा है , ऋषि जैगीषव्य वही है जिन्होंने शिव जी के काशी छोड़ के कर चले जाने पर अन्न जल त्याग दिया था और योग तपस्या में लीन होगये थे जिस गुफा में उन्होंने कठोर तप किया वह आज भी इस मंदिर के पीछे स्थित है और जैगीषव्य गुहा नाम से जाना जाता है । अब यह गुफा पाताल पूरी मठ में है ।

Sidhapith Patalpuri Muth dav school ishwar gangi road near jageshwar mandir

जागेश्वर लिंग काशी के प्रधान लिंगो में से एक और काशी एकादश महारुद्र लिंग में सर्वप्रथम है , यहां पूजा अर्चना करने से रुद्र पद की प्राप्ति होती है और यहां के भक्तों को मृत्यु पश्च्यात रुद्र के समान ही समझा जाता है ।

ईश्वर गंगी पोखरा में स्नान कर यहां दर्शन करने से मोक्ष और सिद्धि दोनों प्राप्त होती है ।

पता- आदर्श इंटर मीडिएट स्कूल के पास ईश्वर गंगी रोड वाराणसी ।

आदि महादेव (काशी खण्डोक्त)

श्रावण शुक्ल चतुर्दशी दर्शन वार्षिक यात्रा

महादेव लिंग का महात्म्य

वृन्दार्षि वृन्दनां स्तुवतां प्रथमे युगे। उत्पन्नं यन्महालिङ्गं भूमिं भित्वा सुदुर्भिदाम॥

महादेवेति तैरुक्तं यन्मनोरथ पूर्णात् । वाराणस्यां महादेवस्त दारम्भ्या भवच्च यत् ॥(काशी_खण्ड)

सतयुग में देवता और मुनिवृन्दो की स्तुति करने पर बड़ी दुर्भेद्य भूमि को भेद कर जो महालिंग उत्पन्न हुआ और सभी मुनियों के मनोरथ पूर्ण करने के कारण जिनको महादेव कहा गया है , वह लिंग तब से वाराणसी में महादेव नाम से विख्यात है ।

मुक्ति क्षेत्रं कृतं येन महालिङ्गेन काशिका। अविमुक्ते महादेवं यो दक्ष्यत्यत्र मानवः॥

शंभु लोके गम्तस्य यत्र तत्र मृतस्य हि। अविमुक्ते प्रयत्नेन तत्सन्सेवयं मुमुक्षुभिः॥(काशी खण्ड् )

उसी महालिङ्ग ने काशी को मुक्ति क्षेत्र बनाया । अतएव इस अविमुक्त क्षेत्र में जो मनुष्य महादेव का दर्शन करेगा , वह चाहे कही भी क्यों न मरे पर अंत को शिवलोक में चला जायेगा । इसीलिए मोक्षार्थी लोगो को अविमुक्त क्षेत्र में उसी महालिंग का सेवन बड़े प्रयत्न से करना चाहिए ।

वाराणस्यां महादेवो दृष्टयो यैर्लिन्ग रूप धृक। तेन त्रैलोक्यलिङ्गानि दृष्टानिहः न संशय॥

वाराणस्यां महादेवं समभ्यचर्य सकृन्नर । आभूत संप्लवं याव्च्चिव्लोके वसेन्मुदा॥

जिस किसी ने वाराणसी क्षेत्र में लिंगरूपधारी महादेव का दर्शन किया है , निसंदेह वह त्रैलोक्य भर के समस्त लिंगो का दर्शन यही पर कर चुका है । वह महाप्रलय तक शिवलोक में बड़े हर्ष से वास करता है । जो मनुष्य काशी में एक बार भी महादेव का पूजन कर लिया , उसने विश्व के सभी लिंगो का दर्शन कर लिया है ।

सावन में जनेऊ चढ़ाने की महिमा

पवित्रपर्वनि सदा श्रावणे मासि यत्नतः। लिङ्गे पवित्रमा रोप्य महादेवन गर्भभाक॥

जो कोई श्रावण मास के पवित्र पर्व में (अर्थात शुक्ल चतुर्दशी के दिन) प्रयत्नपूर्वक महादेवलिंग पर पवित्रारोपण करता है (जनेऊ चढ़ता है) वह गर्भ भागी नही होता (दुबारा जन्म नही होता) ।

पता - त्रिलोचन घाट पर त्रिलोचन मंदिर के पीछे आदि महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है ।

श्री वृषभध्वजेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त)

शिव जी का पुनः काशी में आगमन का क्षेत्र

जब काशी क्षेत्र से राजा दिवोदास को हटा दिया गया और शिव जी के आगमन की सूचना गरुण द्वारा विष्णु जी को पता चली तब उन्होंने गरुण को उचित इनाम दे कर दक्ष प्रजापति को अगुआ बना कर अगवानी की और फिर सूर्य , गणपति , योगिनी के सहित यहां शिव जी के आने की प्रतीक्षा किया ।

वृषभध्वज क्षेत्र का नाम

यह वही क्षेत्र है जहां शिव जी अपने विमान से उतरे थे और विमान में बृषभ का ध्वज होने के कारण इस क्षेत्र का नाम वृषभ ध्वज पड़ा और जो शिव लिंग वहां पहले से स्थापित थे उनका नाम श्री वृषभध्वजेश्वर पड़ा ।

शिव जी के विमान से उतरते ही श्री हरि विष्णु भी गरुण से उतर कर उनको प्रणाम किये साथ ही गणेश ने शिव जी के चरणों मे अपना माथा नवाया उसी के बाद शिव जी ने गणेश का मष्तक सूंघा और अपने साथ अपने आसान पर बैठाया ।

योगिनियां ने भी क्षमा भरे के स्वर में मंगल गीत को गुनगुनाया और प्रणाम किया उसके बाद शिव ने अपने आसन के बगल में विष्णु को बैठाया फिर दूसरी तरफ ब्रह्मा को स्थान दिया तदन्तर सभी गण को बैठाया और सबसे काशी के सम्बंध में बात किया , सबने अपने कार्यो को सुनाया और अपना कार्य पूर्ण न कर पाने पर महादेव से क्षमा मांग जिसे शिव ने सहर्ष माफ किया और उनकी कोई भी गलती नही है यह मानकर काशी की महिमा और वृषभध्वज तीर्थ की महिमा को सुनाया ।

उसी समय गोलोक से सुनंदा , सुमना , सुरति , सुशीला और कपिला नाम की पांच गायें वहां पहुँची जब महादेव की स्नेहमयी दृष्टि उन सर्वपापनाशिनी गायों के थन पर पड़ी जिससे निरंतर दूध की धारा बहने लगी और एक बड़ा भारी पोखरा ( हृद) बन गया , जिसका नाम महादेव ने कपिला हृद रखा और उन्ही के आदेश से समस्त स्वर्ग वासी देवताओं ने उसमे स्नान किया ।

उसी समय उस तीर्थ के भीतर से दिव्य पितृ लोग प्रकट हुवे उनको देखते ही देवताओं ने बड़े हर्ष से जलांजलि दी , प्रसन्न होकर पित्रो ने शिव की स्तुति किया और अपने लिए और अपने जीवित पुत्रो के लिए वरदान मांगा ।

शिव ने कहा-

शृणु विष्णु महाबाहो शृणु त्वं च पितामह। ऐतस्मिन कापिले तीर्थे कपिलेय् पयोभृते॥

ये पिन्न्दाणि वर्पिष्यन्ति श्रध्या श्राध्नानतः। तेषां पित्रणां संतृप्ति भर्विष्यते ममाज्ञा॥ (काशी खण्ड)

हे महाबाहो , विष्णु , है पितामह , ब्राह्मण सब लोग श्रवण करो जो लोग कपिलाओ के दूध से भरे हुवे इस कपिलातीर्थ मे श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध और विधान से पिंडदान करेंगे , मेरी आज्ञा के अनुसार उनके पितृ लोगो की पूर्ण तृप्ति हो जावेगी ।

सोमवार से युक्त अमावस्या तिथि में यहां पर श्राद्ध करने से अक्षय फल प्राप्त होता है ।

कुरुक्षेत्रे नैमिषे च गङ्गा सागर सङ्गमे। ग्रहणे श्रध्तो यतस्यात्त तीर्थे वार्षभ्ध्वजे ॥

सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र , नैमिशारण्य , और गंगा सागर के संगम में श्राद्ध करने से जो फल मिलता है वही फल इस वृषभध्वजतीर्थ मे भी वही पुण्य प्राप्त होता है।

मधुस्रवेति प्रथमेषा पुष्कर्णि स्मृता । कृतकृत्या ततो ज्ञेया ततोसोः क्षीरनीरधिः॥

वृषभध्वजतीर्थं च तीर्थं पैतामहं ततः। ततो गदाधराख्यं च पित्र तिर्थ् ततः परम् ॥

ततः कपिलधारं वै सुधाखनिरियं पुनः। तत् शिव गयाख्यं च ज्ञेयं तिर्थमिदं शुभं॥

पहले यह पोखरा मधुश्रवा था , फिर कृतकृत्या हुआ , तब क्रम से क्षीरनिधि , वृषभध्वज तीर्थ , पैतामहतीर्थ , गदाधर तीर्थ , पित्र तीर्थ , कपिलधारा , सुधाखनी और शिव गया तीर्थ हुआ है , हे पितृ गण इस तीर्थ के इन दशो नामो को श्राद्ध और तर्पण के बिना भी उच्चारण करने से आप लोगो की पूरी तृप्ति हो जाएगी ।

शिव जी के वाक्य अनुसार यह तीर्थ सतयुग में दुग्धमय , त्रेता में मधुमय द्वापर में घृतमय और कलयुग में जलमय होगा ,

हे पितामह गण काशी के समस्त लोगो ने पहले यही पर वृषभ के चिन्ह से युक्त मेरी ध्वजा को देखा है , इसीलिए मैं इस स्थान पर वृषभध्वजेश्वर नाम से सदा निवास करूंगा ।।

उस समय के मंगल गीतों की ध्वनि से चारो दिशाओं से समस्त धरती वासी लोग सम्मोहित होकर काशी के तरफ यात्रा करने लगे जिसमे

तैतीस कोटि(प्रकार) देवतागण , बीस सहस्त्र कोटि गणलोग , नव करोड़ चामुंडा , एक करोड़ भैरवी , आठ करोड़ महाबली मयूरवाहनारूढ़ षणमुख , अनुचर वर्ग , साथी , कुमार गण थे ,

सात करोड़ चमकीले कुठार वाले बड़े वेग से चलने वाले तोंद वाले विघ्नविदारक गजमुख गण , छियाशी सहस्त्र ब्रह्मवादी मुनिगण , उतने ही गृहस्थ ऋषिलोग , तीन करोड़ पातालवासी नागगण , दो करोड़ परम् शैव दैत्य और दानवगण आठ लाख गंधर्वगण , पचास लाख यक्ष और राक्षसगण दो लाख दश हजार विद्याधर , साठ हजार दिव्य अप्सराएं , आठ लाख गोमाताओ का गण और साठ सहस्त्र गरुण , सात समुद्र , अस्सी सहस्त्र नदिया , आठ सहस्त्र पर्वत गण तीन सौ वनस्पति और आठो दिक्पाल जहाँ पर भगवान शिव विराजमान थे कपिला हृद के पास आ पहुँचे , तदुपरांत त्रिलोचन शिव माता गिरिजा के साथ काशी पहुँच कर अपनी नजरो को वहां के नजारे से तृप्त करने लगे ।

पता - सलारपुर में कपिलधारा नाम से प्रसिद्ध है ।

त्रिलोचन महादेव (काशी खण्डोक्त)

त्रिलोचन महादेव (विरजा क्षेत्र जाजपुर ओडिशा)

विर्जाख्यं हि तत्त्पीठम तत्र लिङ्गं त्रिविष्ट्म। तत्पीठ दर्शना देव विरजा जायते नरः ॥

काशी में त्रिलोचन महादेव विरजा पीठ के नाम से प्रसिद्ध है और वहा पर जो लिङ्ग है त्रिविष्टप कहलाता है । उस पीठ के दर्शन ही से मनुष्य रजोगुण से रहित होजाता है ।

शिव जी के आह्वाहन पर विरजा क्षेत्र से त्रिलोचन महादेव काशी में चल कर आये थे और यही स्वयम्भू रूप से स्थापित होगये ।

विरजा क्षेत्र जो जाजपुर ओडिशा में है वहां पर जौंनलीबांध के तट पर त्रिलोचन महादेव का मंदिर है जो कि विरजा माता मंदिर से कुछ ही दूर है , यहां का त्रिलोचन लिंग पूरे विश्व के प्राचीन लिंगो में से एक है और हंसारेखा नामक छोटी नदी इनके मंदिर के पीछे बहती है ।

काशी में त्रिलोचन लिंग का महात्म्य

तिस्रस्तु संगतस्तत्र स्रोतस्विन्यो घटोद्भ्व । तिस्रः कल्मषहा रिण्यो दक्षिणे हि त्रिलोचनात ॥

स्रोतो मूर्तिधराः साक्षालिन्न्गः स्नपनहेतवे। सरस्वत्यथ कालिन्दी नर्मदा चातिशर्मदा॥

तिस्रोपि हि त्रिशन्ध्य्म ताः सरितः कुम्भ पाणयः। स्नपयन्ति महाधाम लिङ्गं त्रिविष्टपं महत् ॥

हे घटोद्भव , त्रिलोचन के दक्षिण की ओर तीन नदिया मिली हुई है और वे तीनों पापहारिणी है । केवल उसी लिंग को स्नान कराने के लिए सरस्वती , यमुना , नर्मदा ये तीनो ही साक्षात स्रोत की नदी रूप (मूर्ति रूप) धारण किये है । ये तीनो ही नदियां हाथ मे घड़ा(कुम्भ) लेकर महातेजस्वी उस #त्रिविष्टप_महालिंग को त्रिकाल(दिन में तीन बार) स्नान करती है ।

स्नात्वा पिल्पिला तीर्थे त्रिविष्टप समीपतः । दृष्ट्वा त्रिलोचन लिङ्गं किं भूयः परिशोचति ॥

त्रिविष्टपस्य लिङ्गष्य स्मरणादप मानवः। त्रिवष्टप् पति भुर्यान्त्र कार्या विचारणा ॥ (काशीखण्ड)

त्रिविष्टप के समीप ही पिलपिला तीर्थ में स्नान और त्रिलोचन लिंग का दर्शन करलेने पर फिर किस बात का शोच रह जाता है (कहा तक कहे) यदि मनुष्य त्रिविष्टप लिंग का स्मरण भी कर सके , तोह वह त्रिविष्टप (स्वर्ग) का अधिपति होजाता है- इसमें कुछ भी विचार की जरूरत नही है (यही सत्य है) त्रिविष्टप के दर्शन करने वाले निसंदेह ब्रह्मपद को प्राप्त हो जाते है ।

वासुकीश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

नाग पंचमी यात्रा(श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि)

तत्र वासुकिकुण्डे च स्नानदानादिकाः क्रियाः। वसुकिश्वरसंग्यन्च लिङ्ग मचर्य समन्तत॥

सर्पभीतिहराः पुंसां वासुकिशप्रभावतः। यःस्नातो नाग्पञ्चम्यां कुण्डे वासुकी सङ्गयते ॥

न तस्य विषयंसर्गो भवेत् सर्प समुद्भव। कर्तव्या नाग्पन्च्म्या यात्रा वर्षासु तत्र वै ॥

नागाः प्रसन्ना जायते कुले तस्यापि सर्वदा॥ (काशी खण्ड)

वासुकी कुंड में स्नान दानादि क्रिया करने के बाद में वासुकीश्वर की पूजा करे तोह मनुष्य को वासुकीश्वर के प्रभाव से सर्प के काटने का भय नही रहता। सर्प काटने के भय को यह नाश करते है । वासुकी कुंड में नागपंचमी के दिन स्नान करने से सर्प का विष का प्रभाव एक वर्ष तक नही होता(सर्प नही काटते ,सर्प से रक्षा होती है) वर्षा ऋतु में वहां की यात्रा करनी चाहिए । इससे समस्त नाग कुल उसके कुल पर प्रसन्न होजाते है ।

सिंधिया घाट पर स्थित इस मंदिर में पहले वासुकी कुंड भी था, जो अब अस्तित्व में नही रह गया है , इसीलिए यहाँ सिंधिया घाट में स्नान कर यहां दर्शन करते है (सिंधिया घाट में स्नान से वासुकी कुंड स्नान का ही फल मिलता है )

यह प्राचीन शिव लिंग श्रेष्ठतम नाग वासुकी के द्वारा स्थापित है , यहां पूजा पाठ और दान का विशेष फल मिलता है और यहां ऐसी मान्यता है कि यहां के भक्तों को सर्प (नाग , साँप) कोई हानि नही पहुचाते ।

नाग पंचमी के दिन यहां वासुकी कुंड पर स्नान के पश्च्यात शिव रुद्राभिषेक करने से काल सर्प दोष से राहत मिलती है ।

(समय के साथ अब वासुकी कुंड अस्तित्व में नही रह गया पर ऐसा मानना है कि वासुकी नदी गंगा में जा कर सिंधिया घाट पर मिलती है )

स्कन्द पुराण के अनुसार वासुकी नदी , कठिन तप के दौरान वासुकी नाग के पसीने से निकली थी ।

वासुकी नागराज जिसकी उत्पत्ति प्रजापति कश्यप के औरस और कद्रु के गर्भ से हुई थी।

इनकी पत्नी शतशीर्षा थी। नागधन्वातीर्थ में देवताओं ने इसे नागराज के पद पर अभिषिक्त किया था। शिव का परम भक्त होने के कारण यह उनके शरीर पर निवास था। जब उसे ज्ञात हुआ कि नागकुल का नाश होनेवाला है और उसकी रक्षा इसके भगिनीपुत्र द्वारा ही होगी तब इसने अपनी बहन जरत्कारु को ब्याह दी। जरत्कारु के पुत्र आस्तीक ने जनमेजय के नागयज्ञ के समय सर्पों की रक्षा की, नहीं तो सर्पवंश उसी समय नष्ट हो गया होता। समुद्रमंथन के समय वासुकी ने पर्वत का बाँधने के लिए रस्सी का काम किया था। त्रिपुरदाह के समय वासुकी नाग शिव जी के धनुष की डोर बने थे ।

पता- सिंधिया घाट पर आत्मविरेश्वर मंदिर के पास जहाँ से सीढ़ी नीचे घाट पर उतरी है ।

बुद्धेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

काश्यां बुद्धेश्वरसमर्चनलब्धबुद्धिः। संसारसिन्धु मधिगम्य नरो ह्य्गाधाम॥

मज्जेन्न सज्जनविलोलचनचन्द्र कान्ति । कान्ताननस्त्व धीवसेच्च बुधेत्र लोके ॥ (काशी खण्ड)

बुधवार को बुद्धेश्वर के नाम से जो प्रसिद्ध है , उनका दर्शन करने वाला व्यक्ति अगाध क्षीर सागर में गिर कर गोता नही खाता बल्कि साधुजनों के नेत्रों में चंद्रमा के तुल्य कांतिमय सूंदर बदन होकर अंत मे बुद्धलोक में निवास करता है ।

ब्रह्मांड पुराण में ये कहा गया है कि बुद्धेश्वर के दर्शन पूजन से सभी कार्य सफल होते है और नवग्रह शांत होते है ।

बुद्धग्रह व्यापार और बुद्धि का प्रतीक है इनकी सेवा करते रहने से विद्यार्थी को विद्या और व्यापारी के रोजगार में वृद्धि होती है और कुंडली मे बुद्ध ग्रह शुभ फल देते है ।

पता- सिंधिया घाट पर आत्मविरेश्वर मंदिर में ।

श्री महाकालेश्वर महादेव (काशीखण्डोक्त)

श्री महाकालेश्वर महादेव उज्जैन अवंतिकाखण्ड

काशी में शिव जी के आह्वाहन पर महाकाल लिंग उज्जैन(अवंतिकाखण्ड) से चल कर काशी में स्वयम्भू रूप से स्थापित हुवे और उज्जैन स्थित महाकालेश्वर लिंग के प्रतिनिधि के रूप में यहां काशी में सबको दर्शन दे रहे है , शास्त्रो में ऐसी वर्णन है कि काशी में यहां महाकाल के दर्शन करने से उतना ही पुण्य मिलता है जितना उज्जैन के महाकाल के दर्शन से मिलता है, यह काशी स्थित द्वादस 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है ।

पता-मैदागिन, दारा नगर पर मृत्युंजय मंदिर में ।

उज्जैन को उज्जयिनी और अवंतिका के नाम से भी जाना जाता है, जो क्षिप्रानदी के तट पर बसा हुआ है और साथ ही कुम्भ मेले का आयोजन करने वाले चार शहरो में से भी एक है।

उज्जैन का पवित्र शहर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का घर और भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

महाकाल महाकाल महाकालेति कीर्तनात। शतधा मच्यते पापैनार्त्र कार्या विचारणा॥ (काशीखण्ड)

महाकालेश्वर का तीन बार नाम लेने से व्यक्ति सै#कड़ो पापो से मुक्त हो जाता है , इस पर विचार करने का प्रश्न ही नही उठता।

दर्शनाद्देवदेवस्य ब्रह्महत्या प्रणश्यति । प्राणानुत्सृज्य तत्रैव मोक्षं प्राप्नोति मानवः॥ (ब्रह्म संहिता )

देवों के देव महादेव श्री काशी विश्वनाथ जीके दर्शन करने से ब्रह्म हत्या आदि पापों का नाश होता है तथा काशी में प्राण त्याग कर मोक्ष प्राप्त होता है ।

चतुःषष्ठेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त)

चौंसठ योगिनियों के द्वारा ये स्थापित लिंग काशी के प्राचीन लिंगो में से एक है ।प्राचीन काल में चौसठ योगिनी यात्रा में सर्वप्रथम यही से संकल्प ले कर यात्रा होती थी ।

जब शिव जी सभी देवी देवताओं को राजा दिवोदास के राज्य में कमी निकालने के लिए काशी में बारी बारी भेज रहे थे पर सभी इस कार्य में असक्षम होकर काशी में ही निवास करने लगे और स्वामी(शिव) के आज्ञा का पालन न कर पाने के प्रायश्चित में सभी जन शिव लिंग की स्थापना कर के यही रुक गए

उसी अंतराल में चौसठ योगिनियां भी काशी में शिव जी के आज्ञा के अनुसार आई और दिवोदास के राज्य में खामी नही निकाल पाई (जिससे शिव जी फिर से काशी में अधिग्रहण कर पाते) और शिव जी के आज्ञा को पूरा न कर पाने के प्रायश्चित में शिव लिंग स्थापित किया और काशी में ही सभी विग्रह रूप में स्थापित होगयी ।

यह लिंग जमीन से कुछ फ़ीट अंदर है इससे यह प्रमाणित होता है कि यह लिंग अति प्राचीन है और मंदिर के बगल में ही चौसठ योगिनी का मंदिर भी है जिसकी वार्षिक यात्रा हर साल होली की रात्रि में होती है ।

पता- 21/9 चौसट्टी घाट , राणा महल , वाराणसी

नर्मदेश्वर महादेव(काशी खण्डोक्त)

श्रावण कृष्ण पक्ष दशमी दर्शन

काशी दिव्य दर्शन पुस्तक के अनुसार आज यहां के दर्शन करने से सभी पाप और कष्ट दूर होजाते है ।

पता - d 21/9 राणा महल चौसट्टी देवी मंदिर के बगल वाली गली में ।

श्री काल भैरव (काशी खण्डोक्त)

शनिवार अष्टमी दर्श (कालाष्टमी)

अष्टम्यां च चतुर्दश्याम रवि भूमिजवासरे । यात्रां च भैरवी कृत्वा कृते पापेः प्रमुच्यते॥ कालराज न यः काश्या प्रतिभू ताष्टामी कुजं ॥

काल भैरव जी का और सभी भैरवो का दर्शन करने का विशेष दिन मंगलवार रविवार अष्टमी चतुर्दशी है । श्रद्धा भक्ति से दर्शन करने से पाप ताप भूत प्रेत डाकनी सनी का भय नहीं होता और शारीरिक मानसिक चिंता दूर होती है । अनेक प्रकार के रोग शांत होते हैं और मनोकामना की पूर्ति होती है । वस्त्र भोजन रहने की व्यवस्था काल भैरव जी की कृपा से स्वतः प्राप्त होती है अंत में भैरव विश्वनाथ जी से प्रार्थना करके मुक्ति दिला देते हैं उन मनुष्यों का पुनर्जन्म नहीं होता है ।

शास्त्रो में ऐसी मान्यता है कि जो भी काल भैरव की आठ प्रदक्षिणा (फेरी) लगाएगा उसके सारे पाप कट जाएंगे और 6 महीने नित्य पूजा अर्चना करने से सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है ।

ऐसी मान्यता है कि जो काशी वासी अगर काशी से बाहर जाता है तोह काल भैरव के दर्शन (आज्ञा ले) कर के जाता है । और आने पर भी हाजरी लगता है(जिससे काल भैरव उसकी रक्षा करते है) शिव जी द्वारा काशी के कोतवाल पद पर इनको नियुक्त किया गया है और प्राचीन काल से ही राजा , महाराज , नेता , मंत्री , नर्तक , बड़े साहूकार , मार्तंड और तत्काल समय मे नेता , विधायक , सांसद , प्रधान और मुख्य मंत्री , अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी यहां माथा टेकने जरूर आते है ।

पता k 32 / 22 काल भैरव , भैरव नाथ ।

दण्डपाणी भैरव (काशी खण्डोक्त)

प्राचीन काल में पूर्णभद्र नामक एक धर्मात्मा यक्ष गंधमादन पर्वत पर रहते थे। निसंतान होने के कारण वह अपने पुत्र प्राप्ति के लिए हमेशा चिंतित रहते थे उसके चिंतित रहने के कारण उसकी पत्नी कनककुंडला ने उनसे शिवजी की आराधना करने की बात कही और यह भी कहा जब शिलाद मुनि ने जिन की कृपा से मरण हीन नंदेश्वर नामक पुत्र को प्राप्त किया उन शिव की आराधना क्यों नही करते । अपने स्त्री का वचन सुनकर यक्षराज ने गीत वाद्य आदि से ओम्कारेश्वर(कोयला बाजार स्थित,काशी) का पूजन कर पुत्र की अभिलाषा पूर्ण की और शिव जी के कृपा के कारण पूर्णभद्र ने हरिकेश नामक पुत्र को प्राप्त किया जो आगे चलकर काशी में दंडपाणी भैरव नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जब हरिकेश 8 वर्ष का था तभी से खेल खेल में बालू में शिवलिंग बनाकर दूर्वा से उनका पूजा करता था और अपने मित्रों को शिव नाम से ही पुकारता था और अपना सारा समय शिवपूजन में ही लगाया करता था। हरिकेश की यह दशा देखकर उसके पिता ने उसे गृह कार्य में लगाने की अनेक चेष्टा की पर उस पर कुछ भी असर नहीं हुआ , अंत में हरिकेश घर से निकल गया और कुछ दूर जाकर उसे भ्रम हो गया और वह मन ही मन कहने लगा हे शंकर कहां जाऊं कहां रहने से मेरा कल्याण होगा उसने अपने मन में विचारों की जिनका कहीं ठिकाना नहीं है उनका आधार काशीपुरी है जो दिन-रात विपत्तियों से दबे हैं उनका काशीपुरी ही आधार है इस प्रकार निश्चय करके वह काशीपुरी को गया । आनंदवन में जाकर ओम नमः शिवाय का जप करने लगा काफी समय के बाद शंकर जी पार्वती जी को अपना आनंदवन दिखाने के लिए काशी लाए और बोला जैसे तुम मुझको बहुत प्रिय हो वैसे ही आनंदवन भी मुझे परम प्रिय है हे देवी मेरे अनुग्रह से इस आनंद वन में मरे हुए जनों को जन्म मरण का बंधन नहीं होता अर्थात वह फिर से संसार में जन्म नहीं लेता और पुण्य आत्माओं के पाप के कर्म बीज विश्वनाथ जी की प्रज्वलित अग्नि में जल जाते हैं और फिर गर्भाशय में नहीं आते हैं ऐसे ही बात करते करते भगवान शिव और माता पार्वती उस स्थान पर पहुंच गए जहां पर हरिकेश यक्ष ने समाधि लगाए बैठे थे ।

उनको देखकर पार्वती जी ने कहा हे ईश्वर यह आपका तपस्वी भक्त है इसको उचित वर देखकर उसका मनोरथ पूर्ण कीजिए इसका चित्त केवल आप में ही लगा है और इसका जीवन भी आपके ही अधीन है इतना सुनकर महादेव जी उस हरिकेश के समक्ष गए और हरिकेश को हाथों से स्पर्श किया । (कठिन तप के कारण हरिकेश कमजोर और दुर्बल होगये थे)

दया सिंधु का स्पर्श पाकर हरिकेश यक्ष ने आंखें खोल कर अपने सम्मुख प्रत्यक्ष अपने अभीष्ट देव को देखा और गदगद स्वर से यक्ष ने कहा कि हे शंभू हे पार्वती पते हे शंकर आपकी जय हो आपके कर कमलों का स्पर्श पाकर मेरा यह शरीर अमृत स्वरूप हो गया इस प्रकार प्रिय वचन सुनकर आशुतोष भगवान बोले हे यक्ष तुम इसी क्षण मेरे वरदान से मेरे क्षेत्र के दंडनायक हो जाओ आज से तुम दुष्टों के दंड नायक और पुण्य वालों के सहायक बनो और दंडपाणी नाम से विख्यात होकर सभी गणों का नियंत्रण करो । मनुष्यो में सम्भ्रम और विभ्रम ये दोनों गण तुम्हारे साथ रहेंगे। तुम काशीवासी जनों के अन्नदाता, प्राणदाता , ज्ञान दाता होओ और मेरे मुख से निकले तारक मंत्र के उपदेश से मोक्ष दाता होकर नियमित रूप से काशी में निवास करो भगवान की कृपा से वही हरिकेश यक्ष काशी में दण्डपाणि के रूप में स्थित हो गए और भक्तों के कल्याण में लग गए । ज्ञानवापी में स्नान कर दण्डपाणि के दर्शन से सभी मनोकामना पूर्ण होती है ।

https://maps.app.goo.gl/U8Z22PBVDx9RfV1GA

मोक्षद्वारेश्वर लिंग (काशी खण्डोक्त)

ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष पंचमी को इनका दर्शन होता है। लाहौरी टोला स्थित इस मंदिर में आज दर्शन पूजन का विशेष महत्व है । दैनिक दर्शन करने वाले लोगों को मोक्ष प्राप्त करना बहुत मामूली बात है यहां , पर अब यह मंदिर विलुप्त होगया है ।

वृषेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

आगादिह महादेवो वृषेशो वृषभध्वजात् । बाणेश्वरस्य लिङ्गष्य समीपे वृषदः सदा ।।(काशीखण्ड्)

धर्मप्रद लिंग वृषेश्वर , जो कि वृषभध्वज तीर्थ से यहाँ आकर बाणेश्वर महादेव के समीप में सदैव शोभायान रहते है ।

काशी में वृषेश्वर लिंग का स्थापना महादेव के परम भक्त नंदी द्वारा किया गया है।

काशीखण्ड पुराण के हिसाब से वृषेश्वर लिंग वृषभध्वज तीर्थ से काशी में नन्दी जी के आग्रह पर आये थे । वृषेश्वर के दर्शन पूजन से वृषभध्वजेश्वर महादेव के दर्शन का फल मिलता है।

(वृषभध्वजेश्वर लिंग काशी से कुछ दूर सलारपुर - कपिलधारा पर स्थित है)

काशी में वृषेश्वर लिंग का प्रादुर्भाव नंदी के द्वारा हुआ है ।

वृषेश्वर लिंग चतुर्दश लिंगो में से एक है जिसकी दर्शन यात्रा करने से मुक्ति अवश्य ही मिलती है ।

आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी तिथि को इनकी यात्रा का प्रावधान है।

वृषेश्वर लिंग का स्थान उत्तर दिग्देव यात्रा के 201 शिव लिंगो में भी है , इस यात्रा को करने से समस्त जन्मों के पाप कट कर मोक्ष मिल जाता है ।

प्राचीन समय मे यहां वृषेश नामक कूप(कुँवा) भी था जिसका पता अब नही लगता पर मंदिर प्रांगण में एक कूप है जिसको वृषेश कूप से जोड़ कर देखा जा सकता है । यहां श्राद्ध तर्पण करने का भी बहुत फल मिलता है ।

पता- k 58/78 गुरु गोरखनाथ का टीला , मैदागिन , वाराणसी।

इस मंदिर से थोड़ा पहले बाणेश्वर महादेव का भी मन्दिर है।

अत्युग्रह नरसिंह (काशी खण्डोक्त)

अतिउग्र नरसिंह यह नरसिंह भगवान का रूप काशी में बहुत ही उग्र रूप से निवास करते है । काशी और काशीवासियो की सदैव रक्षा करते रहते है ।

इस तीर्थ के बारे में भगवान माधव विष्णु ने अग्निबिन्दु ऋषि से कहा था कि :--

अतिउग्र नरसिंहोःहं कल्शेश्वर पश्चिमे। अत्युग्रमपि पापोघं हरामि श्रध्यार्चितः।।

कल्शेश्वर शिव लिङ्ग के पश्चिम भाग में मैं अत्युग्रह नरसिंह के नाम से राहत हूं । श्रद्धा से उनका पूजन करने पर बड़ी उग्र पापराशि (जो अक्षय कर्मो के बाद भी इंसान को दुख देती है और पीछा नही छोड़ती) को भी दूर कर देता हूं ।

पता -ck 8/21 गौमठ (संकठा जी मन्दिर मार्ग के पास) , चौक , वाराणसी

श्री ब्रह्मनालेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

नाभितीर्थ नाभितीर्थेश्वर

काशी में चौक के ब्रह्मनाल मोहल्ले से मणिकर्णिका मार्ग पर जाने वाले मार्ग पर यह स्वयंभू शिवलिंग है , प्राचीन समय पर यहां इसी लिंग के आस पास कही ब्रह्मनाल तीर्थ (कुंड) भी था जो अब लुप्त होगया है । काशीखण्ड में ऐसा वर्णन है कि ब्रह्माल तीर्थ में स्नान करने से करोड़ो जन्म के पाप नष्ट होजाते है । स्वर्गीय पण्डित केदारनाथ व्यास जी के पुस्तक के अनुसार इनको अविमुक्तेश्वर नाम से भी बताया गया है ।

यह मंदिर विश्व्नाथ कॉरिडोर की जद में आने से अभी तक तोह बचा हुआ है , आगे इस स्वयंभू शिव लिंग का क्या होगा इसका कोई अनुमान नही है यह बचेंगे या उखाड़ दिए जाएंगे ।

काशी में ब्रह्मनाल मोहल्ला इनके ही नाम पर पड़ा हुआ है पर समय का फेर कह लीजिए या बदकिस्मती उस मोहल्ले के कुछ ही लोग इस प्राचीन शिव लिंग के बारे में जानते है और उनकी तरफ से यहां साफ सफाई और पूजा की कोई व्यवस्था नही दी जाती ।

यदि हम दिखावे से दूर होकर अपने आस पास के मंदिरों का ध्यान साफ सफाई रखते है तोह यह बहुत सौभाग्य प्रद है।क्योंकि भगवान शिव काशी के सभी लिंगो में एक स्वरूप वास करते है ।

श्री काशी विश्वनाथ महिमा

न विश्वानाथस्य समं हि लिङ्गं न तिर्थमन्यमणिकर्निकातः। तपोवन कुत्रचिदस्ति नान्यच्छुभं ममाःनन्दवनेन तुल्यं ।।

विश्वेशे परमान्नं यो दद्याद्दपर्णं चारुचामरं । त्रयलोकयं तर्पितम् तेन सदेवपृतमानवं ।।

यस्तु विश्वेश्वरं दृष्ट्वा ह्यन्यत्राःपि विपद्यते। तस्य जन्मान्तरे मोक्षो भवत्येव न संशयः।। (काशीखण्ड्)

विश्वनाथ के समान लिंग और मणिकर्णिका के तुल्य तीर्थ और मेरे शुभमय आनंदवन(काशी) के सदृश तपोवन दूसरा कही भी नही है।

जो कोई विश्वनाथ लिंग के ऊपर घृत और शक्कर के सहित उत्तम पकवान चढ़ता है , वह देवता , पितर , और मनुष्य के सहित त्रयलोक्य भर को तृप्त करदेता है (त्रयलोक्य भर के तीर्थ तृप्त होजाते है)।

जो कोई विश्वनाथ जी की दर्शन करने के उपरांत कही अन्यस्थान में भी जा कर मरता है तोह , विश्वनाथ जी की कृपा से अगले जन्म में निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त होता है ।

~ इसीलिए तोह कहते है कि ~

विश्व्नाथ सम लिंग नहीं , नगर न काशी समान । मणिकर्णिका सो तीर्थ नहीं , जग में कतहूँ महान ।।

मानुष तन वह धन्य है , विश्वनाथ को जो देख । जन्म लिए कर विश्व मे , एक यही फल लेख ।।

जैगीषव्येश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

भूत भैरव मुहल्ला (करनघन्टा नखास मार्ग ) वाराणसी

अत्र जयेष्ठेश्वरक्षेत्रे त्वल्लिङ्गं सर्वसिद्धिदं । नाशयेदघसंघानि दृष्टं स्पृष्टं समर्चितम् ।।

अस्मिन् ज्येष्ठेश्वरक्षेत्रे संभोज्य शिवयोगिनः। कोटिभोज्यफलं सम्यगेकैकपरिसंख्यया।।

करिष्याम्यत्र सान्निध्यमस्मिलिन्ङ्गे । योगसिद्धिप्रदानाय साध्केभ्यः सदैव हि ।।

इस ज्येष्ठेश्वर क्षेत्र में यह लिंग सभी सिद्धियो का दाता है , इसके दर्शन और स्पर्श और पूजन से सभी पाप नष्ट होजाते है । इस ज्येष्ठेश्वर क्षेत्र में एक एक शिव योगियो को भोजन कराने से करोड़ करोड़ जन को भोजन कराने का पूर्ण फल प्राप्त होता है। मैं साधक लोगो को सिद्धि दान करने के लिए सदैव इस लिंग में बना रहूंगा ।

प्राचीन समय की बात है-

जब शिव जी दिवोदास के याचना के अनुसार , ब्रह्मा जी के कहने पर काशी छोड़कर मंदरांचल चले गए थे , तभी से जैगीषव्य नामक महामुनि काशी के प्रसिद्ध तीर्थ गंभीर गुहा में अन्न जल त्याग कर शिवलिंग स्थापित करके तपोलीन होगये थे । मुनि की प्रतिज्ञा थी कि भवानी नाथ के पुनः काशी में दर्शन होने पर ही वे अन्न जल ग्रहण करेंगे ।

शिव जी को यह बात काशी छोड़ते ही पता चल गई थी , इसीलिए तोह शिव जी का काशी में पुनः वापस लौट आने की प्रबल इक्षा थी जिसको उन्होंने अभी विधि से पूर्ण कर ही लिया।

काशी पुनः लौट कर शिव जी ने सर्व प्रथम नंदीश्वर को जैगीषव्य मुनि के पास जाने का आदेश दिया और कहा कि --

हे नंदिन ! यहां पर एक मनोहर गुहा है , उसमें तुम घुस जाओ ,उसके भीतर मेरा एक भक्त जैगीषव्य नाम से तपोरत है कठोर तपस्यारत होने के कारण उनका शरीर हाड़ (हड्डी) के तरह होगया है ।

अतः तुम अमृत समान पोषक इस लीला कमल (दुर्लभ फूल) को लेलो , जिसके स्पर्श कराने मात्र से उनका शरीर फिर से युवावस्था जैसा होगया और नंदी ने उनको उठा कर शिव जी के चरणों के आगे प्रस्तुत करदिया ।

अपने इष्ट और माता को सामने देख कर मुनि ने भूमि में दंडवत करते हुवे अनगिनत तरीके से शिव स्तुति करने लगे । तब चंद्रभूषण ने उस मुनि की ऐसे स्तुति को सुनने से प्रसन्नचित होकर जैगीषव्य मुनि से अनुकूल वर मांगने को कहा

जिसमे उनका पहला वर था कि , यदि आप प्रसन्न है तोह मुझे कभी अपने चरण कमल से दूर मत होने दीजिए और दूसरा वर भी बिना विचार दे दीजिए जिसमे मेरे द्वारा स्थापित लिंग में आप सर्वदा वास् करें ।

शिव जी ने तथास्तु बोल कर एक वर अपने पास से और दे और कहा कि आज में मैं तुमको निर्माण साधक योगशास्त्र दान करता हूं , तुम आज से समस्त योगियों के मध्य मव योगाचार्य होंगे , मेरे प्रेम प्रसाद से तुम योगशास्त्र के सम्पूर्ण गुढ़ तत्वों को यथार्थ रीति से ऐसा समझ सकोगे जिसके अंत मे निर्वाण को प्राप्त होजाओगे जैसे नंदी , भृंगी , और सोमनन्दी हैं वैसे तुम भी जरा मरण से रहित मेरे परम भक्त होजावोगे ।

यह जो तुमने तप किया है वह सभी तपो में बड़ा कठिन है , तुमने जिस बड़े नियम का अनुष्ठान किया , उसके समक्ष कोई भी नियम अथवा यम नही पहुँच सकते । अतएव तुम मेरे चरणों के समीप में सदैव वास् करोगे और वही पर निःसंदेह तुमको अंत मे निर्वाणपद प्राप्त होगा ।

काशी में परमदुर्लभ इस जैगीषव्येश्वर नामक लिंग के तीन वर्ष तक सेवा करने से निश्चित ही योग प्राप्त हो जाता है ।

कंदुकेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

भूत भैरव मुहल्ला , (करनघन्टा नखास मार्ग) वाराणसी।

मृडानी तस्य लिङ्गस्य पूजां कुर्यात्सदैव हि । तत्रैव देव्याः सान्निध्यं पार्वत्या भक्तसिद्धिदम् ।। (काशीखण्ड)

पार्वती देवी प्रतिदिन इस लिंग की पूजा करती है और वहां पर वर्तमान रहकर भक्त लोगों को सिद्धि प्रदान करती है ।

कंदुकेश्वर लिंग कंदुक (गेंद) से प्रकट हुआ है ।

एक समय की बात है काशी के ज्येष्ठेश्वर लिंग के पास में महेश्वर (शिव) विहार कर रहे थे और माता भगवती (भवानी) गेंद से(कंदुक से) खेल रहीं थी ।

उसी समय पर ब्रह्मा के वरदान से त्रिलोक भर के पुरुषों को तृण के समान समझने वाले , अपने भुजबल से दर्पित , आकाशचारी , विदल और उतपल नमक दो दैत्य अपने मृत्यु के निकट आजाने पर माता जगदंबा देवी को देखते ही मोहित होकर उनको हर ले जाने की इक्षा करते हुवे शाम्बरी माया को धारण कर तुरन्त ही गगनमण्डल से शिव पार्षद का रूप बना कर नीचे धरती पर उतर कर माँ जगदंबा के पास आगये।

तभी सर्वज्ञ भगवान ने उनदोनो को उनकी आँखों के चुलबुलाहट से ही पहचान कर जगदंबा देवी को इशारे मात्रा से सचेत कर के मुस्कुरा पड़े ।

बस फिर क्या था , सर्वज्ञ शिव की अर्धांगिनी ने भगवान शिव की नेत्रचेष्टा को समझ कर तुरन्त ही उसी गेंद (कंदुक)से एक साथ ही उन दोनों दैत्यों को मार दिया ।

जगदंबा के क्रीड़ा कंदुक(गेंद) की चोट से घायल होते ही वे दोनों दैत्य चक्कर खा खाकर , डाली से पके फल के समान(हास्यास्पद तरीके से) तुरन्त ही गिर पड़े ।

इसके बाद वह गेंद (कंदुक) उन पापी दैत्यों को मार कर वही पर लिंगरूप में परिणित हो गया ,तब से सभी दुष्टों का निवारण करने वाला यह लिंग कंदुकेश्वर नाम से प्रसिद्ध होगया।

जो कोई कंदुकेश्वर की इस उत्पत्ति को सुनेगा और प्रसन्न मन से उनका पूजन करेगा , उसे पुनः किसी दुख का भय नही रहेगा ।

कन्दुकेश्वरभक्तानां मानवानां निरेनसाम् । योगक्षेमं सदा कुर्याद् भवानि भयनाशिनी ।।(काशीखण्ड)

समस्त भयनशिनी स्वयं भवानी ही कंदुकेश्वर के निष्पाप भक्तलोगों का सैदेव योगक्षेम करती रहती है ।

जिन लोगो ने कंदुकेश्वर नामक महालिंग की पूजा ही नही की , तोह भला शिव और पार्वती जी उन सबके अभीष्ट फल कैसे दे सकते हैं ।

कंदुकेश्वर का नाम सुनते ही पापपुंज ऐसे शीघ्र क्षय होने लगते है , जैसे सूर्य के उदय होने से अंधकार दूर हो जाता है ।

काल भैरव (काशी खण्डोक्त)

वार्षिक रुद्राक्ष सृंगार महोत्सव (चतुर्दशी दर्शन)

काशी में मैदागिन से विशेश्वरगन्ज मार्ग पर अति प्रसिद्ध मंदिर

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां रविभुमिजवासरे | यात्रां च भैरवी कृत्वा कृतेः पापै प्रमुच्यते ||

यत्किञ्चिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धितः | तत्सर्व विलयं याति कालभैरवं दर्शनात् ||

अनेकजन्मनियुतैयर्त्कृतं जन्तुभिस्त्वघं | तत्सर्व विलयत्याशु कालभैरव दर्शनात् ||(काशीखण्ड)

रवि और मंगलवार तथा अष्टमी एवं चतुर्दशी तिथि को कालभैरव की यात्रा करने से समस्त पापों से छुट जाता है ।

कालभैरव के दर्शन करने से जो कुछ भी अशुभ कर्म मानव बुद्धि से किया गया हो , वह अब भस्म हो जाता है ।

कालभैरव के दर्शन करने से लोगो के अनेक जन्म का संचित पाप अतिशीघ्र ही विलीन हो जाता है ।

तीर्थे कलोदके स्नात्वा कृत्वा तर्पण मत्वरः | विलोक्य कालराजं च निरया दुद्धरेत् पीतृन् || (काशीखण्ड)

कालोदक तीर्थ में (जो कि काल भैरव के मंदिर में ही है) स्थिरता पूर्वक स्नान तर्पण करके फिर कालराज(कालभैरव) का दर्शन करने से मनुष्य अपने पितरों का नरक से उद्धार कर देता है ।

कपर्दीश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

पिशाच मोचन विमल कुंड विमलोदक महातीर्थ (अगहन शुक्ल चतुर्दशी यात्रा)

लोटा भंटा मेला( मार्गशीर्ष)

ब्रह्महत्यादयः पापाः विनश्यन्त्यस्य् पूजनात | पिशाच मोचने कुण्डे स्नातः स्यात्प्रश मोर्यतेः || (पद्मपुराण)

कपर्दीश्वर के पूजन से ब्रह्म हत्या का पाप दूर होता है ,यदि वह पिशाचमोचन कुंड में स्नान करके दर्शन करता है तोह उस व्यक्ति के पितृगण मुक्त होजाते है ।

कपर्दी नामक गणपः शम्भोरत्यन्त वल्लभः | पित्रिशादुत्तरे भागे लिङ्गं संस्थापय शाम्भवं ||

कुण्ड चखान तस्याग्रे विमलोदकसंज्ञकम् | यस्य तोयस्य सम्स्पर्शाद्विमलो जायते नरः |। (काशीखण्ड)

महादेव का बड़ा प्यारा गणों में प्रधान एक गण कपर्दी नामक है , जिसने पितृश्वर के उत्तर भाग में कपर्दीश्वर शिव लिंग की स्थापना की थी , साथ ही उन्होंने विमलोदक कुंड भी खोद दिया था । इस कुंड के जल का स्पर्श करने से मनुष्य की मलिनता छूट जाती है ।

पिशाचमोचने तीर्थे संभोज्य शिवयोगिनम् | कोटि भोज्यफ़लम् सम्यगेकैकपरिसंख्यया || (काशीखण्ड)

इस पिशाच मोचन तीर्थ पर एक एक शिवयोगी के भोजन कराने से करोड़ करोड़ सन्यासी खिलाने के फल पूर्ण रीति से प्राप्त होता है ।

अघ शुक्लचतुर्दश्यां मार्गे मासि तपोनिधे | अत्र स्नानादिक कार्य पिशाच्य परिमोचनं ||

इमां सांवत्सरी यात्रां ये करिष्यन्ति ते नराः | तीर्थःप्रतिग्रहात्पपान्निःसरिष्यन्ति ते नराः || (काशीखण्ड)

आज अगहन मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दसी है , आज के दिन यहां पर स्नानदिक करने से पिशाच्योनि का मोचन होजाता है।

जो लोग आज की दिन अगहन शुक्ल चतुर्दसी के दिन प्रतिवर्ष यहां की यात्रा करेंगे , वे सब तीर्थ में दान लेने के पाप से हमेशा के लिए मुक्त होजाएंगे ।

पिशाच मोचन पर स्नान तथा कपर्दीश्वर के पूजन एवं वहां अन्न दान करदेने से मनुष्य सर्वत्र निर्भय रहता है ।

अगहन शुक्ल चतुर्दशी के दिन कपर्दीश्वर के समीप पिशाच मोचन में स्नान करलेने से व्यक्ति जहां कही भी मारे पिशाच नही होना पड़ता।

कथा

त्रेता युग के समय एक वाल्मीकि नामक परम् शिव भक्त हुवा करते थे जो कि कपर्दीश्वर लिंग के पूजा और विमलोदक कुंड में नित्य स्नान , ध्यान करते थे । एक दिन उनको एक बहुत भयंकर राक्षस(पिशाच) दिखा जो कि बहुत ज्यादा भयावह था उस डरावने पिशाच को देख कर बड़ी धीरता से उस बूढ़े तपस्वी ने पूछा कि तुम कोन हो ? कहाँ से आये हो ? निर्भय हो कर बताओ क्योंकि जो तपस्वी शिव सहस्त्रनाम को जपते है तथा विभूति लगाते है उनको किसी से डर नही मैं निर्भीक हु तुम भी निर्भीक होकर कहो ।

फिर पिशाच ने अपना वृतांत सुनाया

गोदावरी नदी के तीर के तीर्थ पर मैं दान लेने वाला ब्राह्मण था , जो लोग तीर्थ में दान तोह ले लेते है पर तिथि पड़ने पर स्वयं कुछ दान नही करते उन्ही लोगो को पिशाच योनि भोगनी पड़ती है यही मेरे पिशाच होने का कारण है ।

बहुत पहले मैंने एक दुर्बुद्धि लड़के के शरीर मे निवास बनाया था पर वह ब्राह्मण कुमार किसी बनिया के साथ लोभवश काशी में आगया जिससे मैं काशी की सीमा पर ही उसके शरीर से निकल कर गिर पड़ा क्योंकि काशी में किसी पिशाच के लिए कोई जगह नही है , मैं और उसके सभी पाप काशी के सीमा पर ही रुक कर उसका इंतज़ार करने लगे ।

कुछ समय पश्चात एक सन्याशी के मुख से शिव नाम सुन कर कुछ मेरे पाप कम होगये जिससे मैं काशी में प्रवेश कर गया और अंतरगृही के सीमा पर मुझे रुकना पड़ गया और सन्यासी अंदर चला गया । पिशाच की स्थिति देख कर वाल्मीकि नामक बूढ़े तपस्वी को बहुत दया आई और पिशाच के पापों को अपने तपस्या से दूर करने का संकल्प लिया और पिशाच को विमलोदक कुंड में नहाने को कहा जिससे उसका पाप तत्काल नष्ट होजाये ।

और कहा कि इस तीर्थ में स्नान और कपर्दीश्वर के दर्शन से तेरी पिशाच योनि तत्काल क्षीण होकर नष्ट होजाएगी । तपस्वी की बात सुन कर पिशाच ने कहा कि जल के अधिष्ठाता देवतालोग हमेशा जल की रक्षा करते है , जिससे मुझे न जल पीने को मिलता है ना ही छूने को , नहाने की बात ही क्या है मेरे लिए नामुमकिन सा है इतना सुन कर उस तपस्वी ने पिशाच के माथे पर विभूति लगाने को दिया उसी क्षण पिशाच ने विभूति को अपने माथे पर मल कर विमलोदक कुंड में उतर गया जहाँ विभूति के प्रभाव से किसी भी जल के रक्षक ने आपत्ति नही की , जल में स्नान और पान करने से तुरन्त ही उसकी पिशाच योनि छूट गयी और वह दिव्यदेह को प्राप्त करते हुवे दिव्य विमान पर चढ़ पावन मार्ग की ओर चल पड़ा और उच्च स्वर में उस तपस्वी को प्रणाम कर और आभार प्रकट करने के साथ यह बोला कि आज से इस तीर्थ का नाम पिशाच मोचन पड़ेगा और इसमें स्नान करने से लोगो की पिशाच योनि छूट जाएगी ।

और जो लोग इस कुंड में स्नान करके संध्या और तर्पण के साथ पितरों को पिंडदान करेंगे तोह अगर उनके बाप दादा अगर पिशाच योनि में भी पड़े रहेंगे वह तुरन्त छूट जाएंगे ।

पता- A 13/39 pishach mochan kund

चौदश अगहन शुक्ल की , लोटा भंटा नाम।

पिशाचमोचन तीर्थ पै , मेला लगतालाम ।

हस्तिपालेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

काशी के अति प्रसिद्ध मृत्युंजय(दारानगर) मन्दिर परिसर में हस्तिपालेश्वर महादेव का लिंग स्थापित है ।

हस्तिपालेश्वरं लिङ्गं तस्य दक्षिणो मुने | तस्य पुजनतो याति पुण्यं वै हस्तिदानजं ॥(काशी खण्ड)

मृत्युञ्जय मन्दिर के दक्षिण में हस्तिपालेश्वर लिंग है । इनके पूजन से हस्तिदान (हाथी दान)का पुण्यलाभ होता है ।

इनके दर्शन से हाथी के दर्शन का भी पुण्यलाभ प्राप्त होता है ।

अग्नि पुराण के अनुसार दस महादान बताए गए है जिसमे

हाथी का दान भी बताया गया है ।

सोना , घोड़ा , तिल , हाथी , दासी , रथ , भूमि , घर , कन्या , गाय ।

भीष्म केशव (काशी खण्डोक्त)

काशी में दारानगर में स्थित प्रसिद्ध मृत्युंजय महादेव मंदिर परिसर में स्थित यह श्री हरि विष्णु जी अपने भक्तों के सभी मनोकामनाओं के पूर्ति के साथ उनके सभी अड़चनों और गंभीर विषयो को तत्काल में दूर कर देते है ।

विष्णु उवाचः

भीष्मकेशवानामाःहं वृद्धकालेशपश्चिमे । उपसर्गान हरे भीष्मान सेवितो भक्तियुक्तिं॥ (काशी खण्ड)

श्री विष्णु ने कहा

वृद्धकाल के पश्चिम में मैं भीष्म केशव नाम से रहता हूं और भक्तिपूर्वक सेवा करने वाले का सभी उपद्रव(विपदा) को क्षण में दूर करदेता हूं ।

प्राचीन काल मे यहां काफी लोग इनका नित्य दर्शन करने दूर दूर से आते रहते थे , पर आज कल लोग इनकी महिमा को भूलते जा रहें है (जिसमे हमारा ही नुकसान है)।

इस श्री विग्रह में विष्णु जी चक्र , गदा , शंख , पद्म भी लिए हुवे है , जिससे वह हमेशा अपने भक्तों का भला करते रहते है ।

सुदर्शन_चक्र भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र है। यह दूरदर्शिता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। सर्वहित शुभ मार्ग पर चलते हुए दृढ़ संकल्पित जीव अपने लक्ष्य को भेदने में सदा विजयी होता है। चक्र शिक्षा देता है कि जीव को दूरदर्शी व दृढ़ संकल्प वाला होना चाहिए।

गदा न्याय प्रणाली को दर्शाता है

गदा ईश्वर की अनंत शक्ति, बल का प्रतीक है। कर्मों के अनुसार ईश्वर जीव को दंड प्रदान करते हैं। यह ईश्वरीय न्याय प्रणाली को दर्शाता है।

शंख ध्वनि का प्रतीक है

भगवान विष्णु द्वारा धारण किया गया शंख नाद (ध्वनि) का प्रतीक है। अध्यात्म में शंख ध्वनि ओम ध्वनि के समान ही मानी गई है। यह नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करके सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह ध्वनि शिक्षा देती है कि ऐसा ही नाद हमारी देह में स्थित है। वह है आत्म नाद, जिसे आत्मा की आवाज कहते हैं। जो हर अच्छे-बुरे कर्म से पहले हमारे भीतर गूंजायमान होता है।

पद्म मोह से मुक्त होने का शिक्षा देता है

पद्म (कमल पुष्प) सत्यता, एकाग्रता और अनासक्ति का प्रतीक है। जिस प्रकार कमल पुष्प कीचड़ में रहकर भी स्वयं को निर्लेप रखता है, ठीक वैसे ही जीव को संसार रूपी माया रूप कीचड़ में रहते हुए स्वयं को निर्लेप रखना चाहिए अर्थात संसार में रहें, लेकिन संसार को अपने भीतर न आने दें। कमल मोह से मुक्त होने व ईश्वरीय चेतना से जुड़ने की शिक्षा देता है। कीचड़ कमल के अस्तित्व की मात्र जरूरत है, जिस तरह संसारिक पदार्थ मनुष्य की जरूरत मात्र हैं।

स्वामी कार्तिकेय (काशी खण्डोक्त)

षडानन षष्टि (स्कन्द षष्टि)

मार्गशीर्ष के षष्टि के दिन बामन पुराण में लिखा है कि आज के दिन कार्तिकेय जी के दर्शन पूजन करने से छः प्रकार के दोष नष्ट हो जाते है और मोक्ष प्राप्त होता है ।

स्कन्दतीर्थं तत्राप्लुत्य नरोतमः । दृष्ट्वा षडाननः चैवजम्ह्यात् षातकौशिकी तनुम ॥

तारकेश्वरपुर्वेन दृष्ट्वा देवं षडाननं। वसेत् षडानने लोके कुमारं वपरुद्वहन॥ (काशीखण्ड)

स्कन्द तीर्थ नामक इस उत्तम तीर्थ (कुंड)पर जहाँ उत्तम जन स्नान करने के पश्च्यात षडानन के दर्शन करने छह कोषों ( त्वचा , मास , रुधिर , नस , हड्डी और मज़्ज़ा)से परिपूर्ण शरीर फिर नही धारण करना पड़ता ।

तारकेश्वर के पूर्व स्वामी कार्तिकेय का दर्शन करने से , कुमार सा शरीर पा कर व्यक्ति को स्कंदलोक में वास मिलता है ।

पता- अब इनका मंदिर मणिकर्णिका घाट पर तारकेश्वर मंदिर के नीचे सीढ़ी पर छोटे से मढ़ी में है जिसमे यह मयूर पर बैठे है ।

कुछ मत के अनुसार कार्तिक तीर्थ(कुंड) जो जैतपुरा पर वागेश्वरी देवी मंदिर के पास था पर अब वह भी लुप्त हो चुका है ।

महाबल नरसिंह (काशी खण्डोक्त)

श्री बिन्दु माधव उवाचः

महाबलनृसिन्होःहमोंकारात्पूर्वतो मुने ।दूतान महाबलान्याम्यान्न पश्येत्तु तदर्चकः॥

श्री बिंदु माधव ने अग्निबिन्दु ऋषि से कहा-

~हे मुने ! ओंकारेश्वर के पूर्वभाग में मैं ही महाबल नृसिंग के नाम से वास करता हूँ । मेरी पूजा करने वाला नर कभी यमराज के महाबली दूतों को नही देख पाता~

काशी में अग्निबिन्दु ऋषि के पूछने पर श्री हरि विष्णु (बिंदु माधव) ने उनसे अपने कई रूपो और स्थानों का वर्णन किया था जिसमे की महाबल नर्सिंग का भी उल्लेख किया ।

क्योंकि शिव ही विष्णु है और विष्णु ही शिव है , यह काशी नगरी में पहले श्री हरि विष्णु जी वास करते थे । बाद में काशी शिव जी की नगरी हुई ।

महाबल नृसिंग काशी में अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करते है और उनको मुक्ति का दान देते है ।

अधिकतर लोग जो काशी के यात्राओं में रुचि रखते है वह यहां हर एकादशी और हर साल नृसिंग जयंती पर यहां दर्शन जरूर करते है ।

पता- त्रिलोचन घाट पर कामेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में , मछोदरी , वाराणसी ।

श्री खखोलकादित्य(विनितादित्य) (काशी खण्डोक्त)

अत्यंत प्राचीन समय की बात है दक्षप्रजापति की दो पुत्रियां जिनका नाम कद्रू और विनता था , इन दोनों का विवाह मरीचि ऋषि के पुत्र कश्यप मुनि से हुआ ।

विवाह पश्चात कद्रू सर्पो की माता बनी यह सर्पिणी , कुटिला , स्वार्थीन तथा चल कपटी थी और दूसरे तरफ विनता पक्षिणी थी और स्वभाव से अत्यंत विनीत , सरल , निश्चल और अपनी बहन कद्रू की छल और प्रपंच से हमेशा से ही अनजान रहीं ।

एक दिन जब दोनों बहनें खेल खेल में पणबंध किया (शर्त लगाया) जिसमे हारने वाली को दासी का भार संभालना पड़ेगा , इस बात पर दोनों की स्वीकृति हुई ।

कद्रू की चाल विनता के समझ से परे था । शर्त इस बात पर लगी थी कि उच्चःश्रवा (सूर्य के अश्व)किस रंग के है , विनता ने स्वेत (सफेद) बोला वही कद्रु ने चितकबरा बोला (बाद में कद्रू ने अपने सर्प पुत्रो को सूर्य के अश्व को चितकबरा करने का आज्ञा दीया , आज्ञा से मुकरने पर उसने अपने पुत्रों को श्राप दे डाला कि वह सभी सर्प सदैव सर्पो का भोजन बनते रहेंगे और तुम्हारी स्त्रियां बच्चा देते मान उनका भक्षण करती रहेंगी श्राप के डर से सर्पो ने कद्रू का यह काम करदिया)

जब विनता कद्रू को अपने पीठ पर बैठा कर सूर्य के समीप ले जाने लगी उसी समय सूर्य की गर्मी से कद्रू ने अपनी हार मान ली और आगे जाने से मना करने लगी पर निश्चल विनता ने उसकी हार को स्वीकार नही किया और आगे ही बढ़ती रही , इतने में कद्रू सूर्य का ताप सहन नही कर पाई और ख खोल्क बोल कर विनता के कंधे पर ही मूर्छित होगयी ।

अपनी बहन को मूर्छित देख कर विनता सूर्य की खखोलक नाम से ही आराधना करने लगी फलस्वरूप सूर्य ने अपना ताप कम कर दिया और अंत मे सूर्य के अश्व के पास पहुचने पर विनता को कद्रू की क्रूरता का पता चला और चितकबरे घोड़े को देख कर विनता ने हार मान दासित्व का भार ले लिया ।

कुछ वर्षों तक दासित्व का भार लेते लेते विनता थक गई और अपने पुत्र गरुण के पास बैठ कर सारा वृतांत सुनाया जिससे गरुण ने दासित्व से छुटकारे की कीमत कद्रू से पूछने के लिए अपनी माँ को भेज दिया , कद्रू और उसके सर्प पुत्रो ने कीमत में अमृत की मांग की

गरुण ने भी अपने पुरुषार्थ के द्वारा अमृत ला कर अपने माँ को दासित्व से छुड़ा लिया और सर्पो को अमृत पान से वंचित करते हुवे अमृत देवताओं को वापस करदिया ।

ततपश्चात विनता ने गरुण से काशी चलने को कहा जहाँ विनता ने खखोलक आदित्य की स्थापना कर वर्षो तक कठिन तप किया ।

कठिन तप के फल स्वरूप खखोलक रूप में सूर्य देव प्रकट हो कर विनता को अनेको वरदान दिए और पापनाशक शिव ज्ञान दिया और विनितादित्य नाम से प्रसिद्ध होकर वही निवास करने लगे।

काश्यां पैशमगिले तीर्थे खखोल्कस्य विलोकनात। नरशिन्च्न्तित माप्नोति निरोगो जायते क्षणात॥

नरः श्रुत्वैतदाख्यान खखोलदित्य संभवं । दर्शनेन खखोलदित्य सर्व पापेः प्रमुच्येत ॥(काशीखण्ड)

काशी के पिलपिला तीर्थ में ( त्रिलोचन घाट पर) खखोलक आदित्य के दर्शन करने से ही मनुष्य समस्त पापों से छूट जाता है और अपने अभीष्ट फल को पा कर तुरन्त निरोग होजाता है।

जो कोई भी इस खखोलक आदित्य की कथा का श्रवण और दर्शन करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ।

पता- त्रिलोचन घाट के पास , कामेश्वर मंदिर के प्रांगण में , मछोदरी , वाराणासी ।

श्री निवासेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

दर्शनेन निवासेशः काशीवासफ़लप्रदः |(काशीखण्ड)

निवासेश्वर लिंग के दर्शन करने से काशी वास् का फल सहजता से प्राप्त हो जाता है ।

यहां ऐसी मान्यता है कि जो कोई भी पर्यटक काशी वास् की इक्षा रखते है वह यहां अगर निवासेश्वर महादेव से काशी में निवास करने का भक्ति पूर्वक निवेदन करते है तोह महादेव तुरन्त ही उनकी विनती को पूर्ण कर देते है ,

और उनको शिव जी की कृपा से काशी में स्थायी निवास मिलता है , इसमें तनिक भी संदेह नही करना चाहिए ।

पता- भूत भैरव मुहल्ला , करनघन्टा चौक, वाराणसी।.

श्री आदि केशव (काशी खण्डोक्त)

मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी से पूर्णिमा (दर्शन यात्रा)

बिन्दु माधव उवाच

आदौ पदोदके तीर्थे त्यम कथ्यमानं मयाःधुना। अग्निबिन्दो महाप्राग्य भक्तानां मुक्तिदायकम ||

अविमुक्तेमृते क्षेत्रे येःचर्ययन्त्यादिकेशवं । तेःमृत्वं भजन्त्येव सर्व दुखः विवर्जिताः ||

सङ्गमेश महालिङ्गं प्रतिष्ठाप्यादिकेशवः। दर्शनादघहं नृणा भुक्तिं मुक्तिं दिशेत्सदा ||

बिन्दु माधव ने कहा

हे महा पण्डित अग्निबिन्दु प्रथम तोह मुझे भक्त लोगो के मुक्ति दाता आदि केशव रूप को पादोदक तिर्थ् पर समझना चाहिए ।

जो लोग अमृतस्वरूप अविमुक्त क्षेत्र में मेरे आदि केशव रूप का पूजन करते है , वे सब दुखो से रहित होकर अंत मे अमृत पद को प्राप्त होते हैं ।

आदिकेशव दर्शन से ही पापनाशक संगमेश्वर नामक महालिंग की स्थापना कर मनुष्यो को सदैव भोग और मोक्ष का दान करते रहते है ।

केशवादित्य

भगवान केशव को संगमेश्वर लिंग की पूजा (शिवाराधना) करते देखकर सूर्यनारायण(आदित्य) ने उनसे पूछा कि आप जगदात्मा विशम्भर होकर भी किसकी अर्चना करते है ।

इसपर श्री हरि विष्णु ने उनको सदाशिव की महत्ता का उपदेश दिया और तभी से सूर्यनारायण शिव भक्त हुवे जिस स्थान पर सूर्यनारायण को यह ज्ञानोपदेश केशव भगवान से मिला , वही पर केशवादित्य की स्थापना हुई । केशवादित्य कि आराधना से ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

माघ शुक्ल सप्तमी(रथसप्तमी) को यदि रविवार पड़ जाए तोह इनके दर्शन पूजन का विशेष महात्म्य है ।

वरुणासंगमेश्वर

संगमेश्वरमालोक्यं तत्प्राच्यां जायतेःनघः

संगमेश्वर लिङ्ग के दर्शन से निष्पप्ता होती है (अर्थात किये गये सभी पाप कट जाते है)|

स्वेतदीपेश्वर

पादोदक तिर्थ् (यानि आदिकेशव घाट ) को श्वेत दीप तिर्थ् भी कहते है वही पर यह लिङ्ग स्थापित है

नक्षत्रेश्वर

काशीखण्ड् के कथा अनुसार जब 27 नक्षत्रियो द्वारा शिव लिंग स्थापना करके उग्र तपस्या के पश्चात जब शिव जी प्रकट होकर वर मांगने को कहते है तभी सभी नक्षत्रियो ने शिव समान की पराक्रमी और दिव्य गुणों वाला वर की इक्षा जाहिर की जिसके फल स्वरूप शिव जी ने उनको चंद्रमा से विवाह करने को कहा तभी से इस लिंग को नक्षत्रेश्वर नाम से जाना जाता है ।

कालमाधव (काशी खण्डोक्त)

मार्गशीर्ष एकादशी (दर्शन यात्रा)

कालमाधवनामाःहं काल भैरव संनिधौ । कलिः कालो न कलयेन्मदभक्तिमिति निश्चितं ||

मार्गशीर्षस्य शुक्लायामेकादश्यामुयोषितः ।तत्र जागरणं कृत्वा यमं नालोकयेत् क्वचित् ||

काल भैरव जी के दक्षिण के पास में कालमाधव विराजमान हैं।

उनके दर्शन से कलियुग में भक्तों को काल का भय नही रहता ।

एकादशी को व्रत रहकर उपवास करके जो जागरण करता है , उसको यमराज नही देखते अथवा नरक में नही जाना पड़ता ।

मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी तिथि के दिन कालमाधव विष्णु जी का वार्षिक दर्शन पूजन यात्रा प्रयत्न पूर्वक करनी चाहिए । कालमाधव कि दर्शन करने वाले नर नारियों को विष्णु भगवान और राम कृष्ण की अनन्य भक्ति प्राप्त होती है ।

पता- k 38/39 चौखम्बा सब्जी सट्टी , संतानेश्वर के मंदिर में पापभक्षेश्वर के पास , मोहल्ला कालभैरव , वाराणसी ।

व्याघ्रेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

प्राचीन समय मे दंडखात तीर्थ पर (जो कि अब भूत भैरव मोहल्ला नाम से जाना जाता है) अनेक ब्राह्मण लोग निष्काम होकर तपोरत थे । उस समय 'प्रह्लाद' का मामा 'दुन्दुभिनिह्नार्द'

नामक दैत्य देवतागण पर विजय का उपाय सोचने लगा ।

उसने विचार किया कि पृथ्वी को ब्राह्मण रहित करने से यज्ञादि समाप्त होजाएंगे । क्योंकि देवताओं का भोजन यज्ञ ही है बिना यज्ञ के वह निर्बल होजाएंगे तब उनको जितना अतिसरल होजावेगा ।

इसी सोच विचार के क्रम में निर्णय किया कि काशी में ज्येष्ठेश्वर लिंग के चारो ओर के ब्राह्मण का सर्वप्रथम भक्षण करना चाहिए अतः वह उस लिंग के पास के जंगल मे व्याघ्र (बाघ) के रूप में रहता था और जो ब्राह्मण कुशा , समिधा आदि के लिए जंगल मे जाते उनको यह दैत्य दबोच कर खा जाता था ।

एक बार एक शिवभक्त , जो मन्त्ररूप अंगन्यास से कवचित होकर शिवरात्रि के दिन शिव के दर्शन में दृढ़चित्त होकर अपने द्वारा स्थापित लिंग के दर्शन करने चल पड़ा दुंदुभी दैत्य जैसे ही व्याघ्र के रूप में उसको दबोचने लपका , त्यों ही भगवान उसी पूजित शिवलिंग से प्रकट होगये । साक्षात शिव को देख कर वह दैत्य अपना व्याघ्र का रूप अति विशाल करता गया तब तुरन्त ही शिव जी ने उसको अपनी कांख में पीस कर उसके सर में मुक्के से प्रहार किया मुक्का पड़ते ही वह बहुत ही डरावने स्वर में चिंघाड़ने लगा जिसका आवाज़ पूरी पृथ्वी और आकाश तक फैल गई ।

चीत्कार सुनने से बाकी के ब्राह्मणगण वहां तुरन्त पहुँच कर शिव जी का दर्शन पाते है और शिव जी का अनेक प्रकार स्तुति करते हुवे उनका अभिवादन कर उनसे यही व्याघ्रेश्वर नाम से निवास करने का निवेदन करते है ।

फलस्वरूप शिव जी भी उनको अनेको वरदान के साथ इस स्थान की सदैव रक्षा करते रहेंगे ऐसा वरदान दिया साथ ही कहा कि

शिव उवाचः

यो मामनेन रुपेन द्रक्ष्यन्ति श्रद्धयाःत्र वै । तस्योपसर्गसंघातं घातयिष्याम्यसंशयं॥

ऐतलिङ्गं समभ्यच्र्य यो याति पथि मानवः। चौरव्याघ्रादिसंभूतं भयं तस्य कुतो भवेत् ||

मच्चरित्रमिदं श्रुत्वा स्मृत्वा लिङ्गमिदं हृदि। संग्रामे प्रविशन्मतर्यो जयमाप्नोति नान्यथा ||

ईत्युक्त्वा देवदेवेशस्तस्मिलिन्ङ्गे लयं ययौ। सविस्मयास्ततो विप्राः प्रातयार्ता यथागतम् ||(काशी खण्ड)

शिव जी ने कहा-

जो कोई यहाँ पर श्रद्धापूर्वक इसी रूप का(व्याघ्रेश्वर) दर्शन करेगा निसंदेह मैं उसके सभी उपद्रव को नष्ट कर दूंगा ।

जो मनुष्य इस लिंग का पूजन करके यात्रा करेगा उसे मार्ग में चोर अथवा बाघ इत्यादि से कभी डर नही रहेगा ।

जो मनुष्य इस कथा चरित्र को सुन कर और हृदय में मेरे इस लिंग को सुमिरण कर रण संग्राम में प्रवेश करेगा , उसे विजय प्राप्त होगी , इसमें तनिक भी संदेह नही करना चाहिए ।

ऐसा कहने के बाद शिव जी उसी लिंग में लीन होगये और ब्राह्मण लोग शिव सुमिरन करते करते प्रातःकाल होने पर अपने अपने स्थान चले गए ।

जो लोग व्याघ्रेश्वर के भक्त है , उनसे यमराज के दूत (यमदूत)भी उन भक्तों की जय करते हुवे भी उनसे डरते रहते है ।

पता- भूत भैरव मोहल्ला , ज्येष्ठेश्वर मंदिर, वंदे काशी देवी(सप्तसागर) के निकट , बुलानाला , चौक , वाराणसी

पापभक्षेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

मनुष्य की बुद्धि से किये गए सभी पाप श्री काल भैरव जी के दर्शन से नष्ट हो जाते हैं । प्राणियों के द्वारा करोड़ो करोड़ो जन्मों में किये गए पाप भी कालभैरव जी के दर्शन से नष्ट हो जाते है । भैरव पीठ पर बैठ कर जो अपने इष्टदेव के मंत्र का जप करता है उसको कालभैरव की कृपा से छः महीने में सिद्धि होजाती है । कालभैरव का भक्त सैकड़ो पाप कर के भी #पापभक्षक भैरव के पास पहुँचने के कारण किसी से डरता नही है । कलयुग में काशी वासियों के पाप और काल को कालभैरव निगल जाते है । इसीलिए कालभैरव जी का नाम #पापभक्षक प्रसिद्ध हुआ है ।

पता - कालभैरव से चौखम्बा सब्जी सट्टी मार्ग , वाराणसी ।

कालभैरव(भैरवनाथ) (काशी खण्डोक्त)

कालभैरव जयंती (कालाष्टमी दर्शनयात्रा)

मार्गशीर्ष सिताष्टम्यां कालभैरव सन्निधो । नरो मार्गासिताष्टम्यां वार्षिकं विघ्नमूत्सृजेत् ॥

अष्टम्यान्च चतुर्दरश्यां रविभूमिजवासरे । यात्रस्च भैरवीं कृत्वा कृतैः पापै प्रमुच्ते ॥

कालभैरव भक्तानां सदा काशीनिवासिनां। विघ्नं यः कुरुतेमूढः स दुर्गतिमवाप्रुयात् ॥

तीर्थे कलोदक स्नात्वा कृत्वा तर्पनमत्त्वरः । विलोक्यं कालराजं च निरयादुध्दरेतपित्घन ||

कृत्वा च विविधा पूजां महासंभारविस्तरैः | उपोष्य जागरंकुर्वन्महापापापैः प्रमुच्यते || नरो न पापैलिर्प्येत मनोवाक्कायसंभवैः ||

मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को श्री कालभैरव जी के पास वर्ष भर में किये हुवे पापों को छोड़े अर्थात भैरव जी के दर्शन करने मात्र से वर्ष भर में किये हुवे पाप नष्ट होजाते है ।

रविवार और मंगलवार को तथा अष्टमी और चतुर्दशी को श्री बटुकभैरव एवं कालभैरव जी के दर्शन यात्रा करके सभी पापों से मुक्त होना चाहिए ।

सदा काशी में रहने वाले और भैरव के भक्तों को जो कष्ट देता है वह दुर्गति को पता है ।

जो कालोदक तीर्थ में(कालभैरव मंदिर में जो कुँवा है) स्नान करके जो अपने पितृगण का तर्पण करता है वह खुद को और अपने पितृगण को नरक से उद्धार करदेता है ।

बहुत तरह के पूजा सामग्री से विविध प्रकार के पूजा कर के जो व्यक्ति रात्रि में जागरण करता है , वह पापों से मुक्त होजाता है।

जो नर नारी भैरव की आठ परिक्रमा करते है उनके सभी पाप तत्काल में नष्ट हो जाते है । उस भक्त को कायिक , वाचिक , तथा मानशिक कोई भी पाप पुनः नही लगता ।

बृहस्पतिश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

गुरुपुष्य नक्षत्र (गुरुवार दर्शन)

देव गुरु बृहस्तपति द्वारा स्थापित लिंग

शिव उवाचः

गुरुपुष्यसमायोगे लिङ्गमेतत्सम्चर्य च | यत्करिष्यन्ति मनुजास्तत्सिम्धिधियास्ति ||

अस्य सन्दर्शनादेव प्रतिभा प्रतिलभ्य्ते। (काशी खण्ड)

शिव जी के कथन अनुसार

जो लोग भी पुष्यनक्षत्र युक्त बृहस्तपतिवार (गुरुवार) को इस लिंग का पूजन करेंगे उनको सिद्धि प्राप्त होगी और पूजन कर के जो कुछ भी करेंगे , वह सब कार्य सिद्धि प्रदायक होगी ।इस लिंग के दर्शन से ही प्रतिभा प्राप्त होजाती है ।

स्कन्दपुराण के काशी खण्ड के अनुसार यहाँ देवगुरु बृहस्पति ने काशी में बृहस्पतिश्वर नामक शिव लिंग स्थापित करके 6000 साल तक उग्र तपस्या की थी तत्पश्चात शिव जी प्रसन्न होकर उनको दर्शन दिए थे

इस शुभ योग में पीपल के पेड़ की पूजा और देवगुरु बृहस्तपति की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

ज्योतिष शास्त्र के सभी 27 नक्षत्रों में पुष्य नक्षत्र को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, यद्यपि अभिजीत मुहूर्त को नारायण के 'चक्रसुदर्शन' के समान शक्तिशाली बताया गया है फिर भी पुष्य नक्षत्र और इस दिन बनने वाले शुभ मुहूर्त का प्रभाव अन्य मुहूर्तो की तुलना में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह नक्षत्र सभी अरिष्टों का नाशक और सर्वदिग्गामी है। विवाह को छोड़कर अन्य कोई भी कार्य आरंभ करना हो तो पुष्य नक्षत्र और इनमें श्रेष्ठ मुहूर्तों को ध्यान में रखकर किया जा सकता है। पुष्य नक्षत्र का सर्वाधिक महत्व बृहस्पतिवार और रविवार को होता है बृहस्पतिवार को गुरुपुष्य, और रविवार को रविपुष्य योग बनता है, जो मुहूर्त ज्योतिष के श्रेष्ठतम मुहूर्तों में से एक है। इस नक्षत्र को तिष्य कहा गया है जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ एवं मंगलकारी।

पुष्य नक्षत्र में गुरु का जन्म

बृहस्पति देव और प्रभु श्री राम इसी नक्षत्र में पैदा हुए थे ।तैत्रीय ब्राह्मण में कहा गया है कि, बृहस्पतिं प्रथमं जायमानः तिष्यं नक्षत्रं अभिसं बभूव। नारदपुराण के अनुसार इस नक्षत्र में जन्मा जातक महान कर्म करने वाला, बलवान, कृपालु, धार्मिक, धनी, विविध कलाओं का ज्ञाता, दयालु और सत्यवादी होता है। आरंभ काल से ही इस नक्षत्र में किये गये सभी कर्म शुभ फलदाई कहे गये हैं

पुष्य नक्षत्र का नाम मंत्र: ॐ पुष्याय नम:।

नक्षत्र देवता के नाम का मंत्र: ॐ बृहस्पतये नम:।

मंगल विनायक(काशी खण्डोक्त)

मंगलवार की चतुर्थी (अंगारक चतुर्थी यात्रा)

ऐश्यामैशीं पुरीं पायात समङ्गलविनायकः |(काशी खण्ड)

काशी के ईशान कोण पर मंगल विनायक इस पूरी की रक्षा करते है और अपने भक्तों के विघ्नों को हरते है ।

मंगल की कामना से यहां दर्शनार्थी प्राचीन समय से ही आते रहे है , गंगा घाट के ऊपर स्थित मंगल विनायक भी अपने भक्तों का खूब मंगल करते ही रहते है ।

कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन छप्पन विनायक यात्रा करने का विधान हजारों साल पहले से चला आरहा है । सोने पे सुहागा तब होता है जब आज के तिथि में मंगल वार भी पड़ जाए तोह इस तिथि को मंगल विनायक की यात्रा महायात्रा हो जाती है ।

जीवन के सभी क्षेत्र में मंगल की कामना करने वाले लोगों को यहां अवश्य दर्शन करना चाहिए और मंगल विनायक का मंगल आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए ।

पता- मंगला गौरी मंदिर , बाला घाट , वाराणसी ।

प्राचीन समय से ही मंगलविनायक के स्थान के विषय मे विवाद है ,पर इस विवाद का निर्णय स्वयं हो जाता है कि मंगल तीर्थ के ऊपर मंगलागौरी तथा मांगलोदक कूप कहे गए है अतः मंगल विनायक का स्थान यही था ।

मित्र विनायक (काशी खण्डोक्त)

यमतीर्थादुदीच्यां च पूज्यो मित्र विनायकान् | कुर्वन्ति रक्षां क्षेत्रस्य॥ (काशी खण्ड)

यमतीर्थ के उत्तर की ओर मित्र विनायक भी अति पूजनीय है और काशी क्षेत्र की रक्षा करते है (रक्षक विनायक है)।

जो प्राणी मित्र विनायक की यात्रा करते रहते है , वे दुख और विघ्नों से छूटते रहते है । इनके दर्शन पूजन से सर्वसम्पत्ति की प्राप्ति और मनोकामना की सिद्धि होती है और जीवन के अन्तकाल तक ज्ञान बना रहता है । इनके दर्शन का बड़ा ही महात्म्य है ।

मित्र विनायक काशी वासियो को सदैव मित्रवत ही देखते है और प्राचीन काल से ही काशी के लोग भी इन्हें मित्र मान कर अपने सारे दुखो को बताते है जिसको सुनने के बाद श्री मित्र विनायक एक मित्र के तरह ही अपने भक्तों के सभी कष्टों को तत्काल में दूर कर देते है ।

काशी में सिंधिया घाट जिसका शास्त्रोक्त परिमाण मणिकर्णिका घाट क्षेत्र के अंतर्गत ही आता है इस पूरे क्षेत्र के रक्षक श्री मित्र विनायक ही है जो सदा भक्तों की भी रक्षा करते ही रहते है ।

पता- सिंधिया घाट , आत्मविरेश्वर मंदिर में ck 7/158 . चौक वाराणसी ।

बिंदु माधव एवं काशी विश्वनाथ

कार्तिक पूर्णिमा दर्शन (देव दीपावली)

काशी में पूर्णिमा के स्नान में मुख्यत: गंगा स्नान का विधान है। पुराणों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए। पुराणों में वर्णन मिलता है कि इस दिन को भगवान विष्णु नें मतस्य अवतार लिया था।

पंचनद तीर्थ(पंचगंगा घाट) में ही दीपावली का बहुत महात्म्य है क्योंकि पूरे कार्तिक मास में देवतागण इसी घाट पर स्नान करते है । आज का ही दिन है जिसमे सम्पूर्ण देवी देवता और तीर्थो का काशी में आगमन होता है , इसीलिए काशी में घाटों को सजाया जाता है ।

दूसरे मतानुसार

देव दीपावली की पृष्ठभूमि पौराणिक कथाओं से भरी हुई है। इस कथा के अनुसार भगवान शंकर ने देवताओं की प्रार्थना पर सभी को उत्पीडि़त करने वाले राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया और त्रिपुरारी कहलाये, जिसके उल्लास में देवताओं ने दीपावली मनाई, जिसे आगे चलकर देव दीपावली के रूप में मान्यता मिली।

आज के दिन खुद शिव जी भी काशी आकर पंचगंगा घाट पर स्नान करते है ।

कार्तिक मास के अधिष्ठाता श्री हरि विष्णु ही है इसीलिए आज के दिन इनका विशेष रूप से दर्शन पूजन करना चाहिए साथ ही काशी विश्वनाथ के दर्शन कर इस द्वितीर्थी यात्रा को सम्पूर्ण करना चाहिए ।

कार्तिक पूर्णिमा देवताओ का विजय दिवस है , आज के दिन दीप दान करने से वह सभी प्रकार के मनोवांक्षित फल तत्काल ही दे देते है ।

हरिशचंद्रेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

हरिश्चन्द्र विनायक (काशी खण्डोक्त)

सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र जी द्वारा स्थापित लिंग

हरिश्चन्द्रे महातीर्थे तर्पयेयुः पितामहान् | शतंसमाः सुतृप्ताः स्युः प्रयच्छन्ति च् वाञ्छितं ||

हरिश्चन्द्रे महातीर्थे स्नात्वा श्रद्धान्वितो नरः | हरिश्चन्द्रेश्वरं नत्वा न सत्यात्परिहीयते ||

हरिश्चन्द्र तीर्थ में अपने पितरो का तर्पण करने से सभी(पूर्व पुरुष) पितृ सौ वर्ष के लिए तृप्त होकर मनवांक्षित फल देते है।

मनुष्य श्रद्धा पूर्वक हरिश्चंद्र महातीर्थ में स्नान कर #हरिशचंद्रेश्वर लिंग को प्रणाम करने से वह कभी सत्य से भ्रष्ट नही होता ।

यह मंदिर मणिकर्णिका के पुराणोक्त सिमान्तर्गत आता है ,अतः यह मणिकर्णिका घाट के ही सीमा के अंतर्गत है वर्तमान में यह मंदिर संकटा घाट क्षेत्र में आ गया है । यह सत्यवादी महाराजा हरिश्चंद्र जी के द्वारा स्थापित लिंग है , और हरिश्चंद्र जी का कार्य क्षेत्र मणिकर्णिका घाट ही था ,सोनारपुरा में जो हरीश चंद्र घाट है वह उनके नाम पर रखा गया है । मणिकर्णिका क्षेत्र ही उनकी तपोभूमि थी

राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य के मार्ग पर चलने के लिये अपनी पत्नी और पुत्र के साथ खुद को बेच दिया था। कहा जाता है-

राजा हरिश्चंद्र की पत्नी का नाम तारा था और पुत्र का नाम रोहिताश था और बाद में रोहिताश्व गढ़ के राजा हुवे और आगे चल कर इनके ही वंशज #रस्तोगी कहलाये । इन्होंने अपने दानी स्वभाव के कारण महर्षि विश्वामित्र जी को अपने सम्पूर्ण राज्य को दान कर दिया था, लेकिन दान के बाद की दक्षिणा के लिये साठ भर सोने में खुद तीनो प्राणी बिके थे और अपनी मर्यादा को निभाया था, सर्प के काटने से जब इनके पुत्र की मृत्यु हो गयी तो पत्नी तारा अपने पुत्र को मणिकर्णिका घाट (शमशान) में अन्तिम क्रिया के लिये ले गयी। वहाँ पर राजा खुद एक डोम के यहाँ नौकरी कर रहे थे और शमशान का कर लेकर उस डोम को देते थे। उन्होने रानी को भी कर के लिये आदेश दिया, तभी रानी तारा ने अपनी साडी को फाड़कर कर चुकाना चाहा, उसी समय आकाशवाणी हुयी और राजा की ली जाने वाली दान वाली परीक्षा तथा कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की जीत बतायी गयीं। इन सब कष्टों और परीक्षाओं के पीछे शनिदेव का प्रकोप माना जाता है और इनके पुत्र रोहिताश्व को जिंदा कर पुनः सब राजपाट लौटा दिया गया था ।

इसीलिए कहा जाता है कि

चन्द्र टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार, पै दृढ श्री हरिश्चन्द्र का टरै न सत्य विचार

पता -- Ck7/ 66 संकठा घाट , चौक , वाराणसी ( संकटा मंदिर के पीछे के तरफ)

वही हरिश्चन्द्र विनायक जो काशी में चतुर्थ विनायक के अंतर्गत आते है इनके भी दर्शन से सत्य बोलने शक्ति मिलती है ,

और यहां मोदक ब्राह्मण को दान देने से मनवांक्षित फल तत्काल ही गणेश जी की कृपा से मिल जाता है ।

बिंदु माधव (काशी खण्डोक्त)

अत्र पञ्चनदे तीर्थे स्नाति विश्वेश्वरः स्वयं | ऊर्जे सदैव सगणः सस्कन्दः सपरिच्छदः ||

ब्रह्म सवेदः समखो ब्राह्मण्याद्याश्च् मातरः | सप्ताब्धयः ससरितः स्नान्त्युर्जे धुत्पापके ||

सचेतना हि यावन्तस्त्रैलोक्ये देहधारिणः | तावन्तः स्नातुमायान्ती कार्तिके धुत्पापके || (काशीखण्ड)

इस पंचनद तीर्थ में स्वयं भगवान विश्वेश्वर भी गणराज , स्कंद और परिजनों के सहित सदैव कार्तिक मास में स्नान करते है ।

चारो वेद और समस्त प्रकार के यज्ञ के साथ साक्षात ब्रम्हा एवं ब्रम्हाणी , मातृगण , समस्त नदी और समुद्रगण कार्तिक भर इस धुतपापक तीर्थ ( पंचगंगा) में स्नान करते है ।

त्रैलोक्य भर में जितने भी सचेतन देहधारी है , वे सब के सब कार्तिक मास में इस धुतपापक तीर्थ में स्नान करने के लिए आते है ।

पृथ्वी पर सबसे पवित्र काशी नगरी (आनंदवन) है , उसमें भी पंचनद तीर्थ और भी पवित्र है , और वहां पर मेरा दर्शन तो अत्यंत ही पवित्र है ।

पता- पंचगंगा घाट , बिंदु माधव मंदिर ।।

1.जो मनुष्य कार्तिक मास में बिल्व पत्र से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे ‍मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

2. कार्तिक मास में जो मनुष्य तुलसी से भगवान का पूजन करते हैं, उनके 10,000 जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

3. जो मनुष्य अगस्त्य के पुष्प से भगवान विष्‍णु का पूजन करते हैं, उनके आगे इंद्र भी हाथ जोड़ते है। तपस्या करने से जो फल प्राप्त होता है वह अगस्त्य के फूलों के सृंगार करने से सुलभता से प्राप्त होजाता है ।

4. कार्तिक मास में तुलसी दर्शन करने, स्पर्श करने, कथा कहने, नमस्कार करने, स्तुति करने, तुलसी रोपण, जल से सींचने और प्रतिदिन पूजन-सेवा आदि करने से हजार करोड़ युगपर्यंत विष्णुलोक में निवास करते हैं।

5. जो मनुष्य तुलसी का पौधा लगाते हैं, उनके कुटुम्ब से उत्पन्न होने वाले प्रलयकाल तक विष्णुलोक में निवास करते हैं।

6. जो मनुष्य कार्तिक मास में तुलसी का रोपण करता है और रोपी गई तुलसी जितनी जड़ों का विस्तार करती है उतने ही हजार युगपर्यंत तुलसी रोपण करने वाले सुकृत का विस्तार होता है।

7. जिस किसी मनुष्य द्वारा रोपी गई तुलसी से जितनी शाखा, प्रशाखा, बीज और फल पृथ्वी में बढ़ते हैं, उसके उतने ही कुल जो बीत गए हैं और होंगे, वे 2,000 कल्प तक विष्णुलोक में निवास करते हैं।

8. जो मनुष्य कदम्ब के पुष्पों से श्रीहरि का पूजन करते हैं, वे कभी भ‍ी यमराज को नहीं देखते।

9. जो भक्त गुलाब के पुष्पों से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उन्हें मुक्ति मिलती है।

10. जो मनुष्य सफेद या लाल कनेर के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं, उन पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

11. जो मनुष्य भगवान विष्णु पर आम की मंजरी चढ़ाते हैं, वे करोड़ों गायों के दान का फल पाते हैं।

12. जो मनुष्य दूब के अंकुरों से भगवान की पूजा करते हैं, वे 100 गुना पूजा का फल ग्रहण करते हैं।

13. जो मनुष्य विष्णु भगवान को चंपा के फूलों से पूजते हैं, वे फिर संसार में नहीं आते।

14. पीले रक्त वर्ण के कमल पुष्पों से भगवान का पूजन करने वाले को श्वेत द्वीप में स्थान मिलता है।

15. जो भक्त विष्णुजी को केतकी के पुष्प चढ़ाते हैं, उनके करोड़ों जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।

16. जो मनुष्य शमी के पत्र से भगवान की पूजा करते हैं, उनको महाघोर यमराज के मार्ग का भय नहीं रहता।

17. जो मनुष्य वकुल और अशोक के फूलों से भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, वे सूर्य-चंद्रमा रहने तक किसी प्रकार का शोक नहीं पाते।

मुचुकुंदेश्वर महादेव(बड़ादेव) (काशी खण्डोक्त)

इस लिंग के दर्शन पूजन करने से सभी पापों का नाश , काशी वास् का फल , लम्बी उम्र और सेहत की प्राप्ति होती है ।

मुचुकुन्द द्वापर युग के इक्ष्वाकु (सूर्यवंश) कुल के राजा थे, जिस कुल में श्री राम, राजा दिलीप, राजा हरिश्चन्द्र, रघु, इत्यादि महारथी हुए। उनके भाई अम्बरीष उनके समान ही शूरवीर थे।

मुचुकुन्द श्री राम के पूर्वज थे। असुरो के खिलाफ देवों की सहायता करने के फल स्वरूप वे अत्यन्त थक गए थे इसलिए उन्हें चिरनिद्रा का वरदान दिया गया था। देवों के कार्यों में सहायता के लिए इंद्रदेव ने उन्हें मुक्ति के सिवाय कोई भी वर मांगने को कहा। उन्होंने बिन-अवरोध निद्रा मांगी, और यह भी अन्तर्गत किया गया कि उनकी निद्रा भंग करने वाला तुरंत भस्म हो जाएगा।

कालयवन संहार

कालयवन, जो यवन महारथी थे, उनका संहार मुचुकुन्द की दृष्टि के प्रकोप से हुआ। दैविक आशीर्वाद के कारण, कालयवन को पराजित करना असंभव था। उसे पता चला कि सिर्फ श्री कृष्ण ही उनको पराजित कर सकते हैं। इस कारण कालयवन ने द्वारिका पर आक्रमण कर दिया। कालयवन के आशीर्वाद की वजह से उसे पराजित करना कठिन था। श्री कृष्ण ने युक्ति लगाकर रण छोड़ दिया। इस कारण उन्हें रणछोड़दास का नाम मिला। श्री कृष्ण मुचुकुन्द की गुफा में घुस गए, उन पर अपने वस्त्र डाल दिये। इस कारण कालयवन को लगा की श्री कृष्ण वहां आकर सो गए हैं। अँधेरे में बिना देखे मुचुकुन्द को ललकार कर जगाया, और इसका परिणाम यह हुआ कि कालयवन भस्म हो गया।

श्री कृष्ण ने मुचुकुन्द को आशीष दिए, और मुक्ति की ओर मार्ग दर्शन कराए जिसमे उन्होंने काशीवास् के साथ साथ काशी में शिव लिंग की स्थापना भी की।

जब मुचुकुन्द गुफा से बाहर निकले तो उन्होंने देखा की लोग और अन्य प्राणी छोटे छोटे हो गए हैं। क्योंकि वह श्री राम के पूर्वज थे (त्रेता युग) और तब से निद्रावस्था में थे, द्वापर युग तक सृष्टि में काफी परिवर्तन हुआ था ऐसा ज्ञात कर सकते हैं।

पता- गोदौलिया में बड़ादेव नाम से प्रसिद्ध , वाराणसी ।

दक्षेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

लिङ्गं दक्षेश्वराःह्वं च ततः कुपादुदग्दिशि | अपराधसहस्त्रं तु नश्येत्तस्य समर्चनात् ||

वृद्धकाल कूप से उत्तर की ओर दक्षेश्वर लिंग है, जिसके समर्चन(विधिवत पूजा करने)से सहस्त्रों ही पाप खुद ही विनिष्ट हो जाते है ।

दक्षेश्वर लिङ्ग माता सति के पिता दक्ष प्रजापति द्वारा स्थापित है।

दक्ष प्रजापति को अन्य प्रजापतियों के समान ब्रह्माजी ने अपने मानस पुत्र के रूप में उत्पन्न किया था। दक्ष प्रजापति का विवाह मनु स्वायम्भुव मनु की तृतीय कन्या प्रसूति के साथ हुआ था। दक्ष राजाओं के देवता थे। शिव पुराण के अनुसार सती आत्मदाह के बाद दक्ष को जब बकरे का सिर प्राप्त होता है तब बाद में वह प्रायश्चित करने के लिए अपनी पत्नी प्रसूति के साथ काशी में मृत्युंजय लिंग के पास महामृत्युंजय का मंत्र जपते हुए दक्षेश्वर लिंग की स्थापना करते है जिससे शिव जी प्रसन्न होकर दक्षेश्वर लिंग के पूजा करने वालो के समस्त गलतियों को क्षमा करते रहेंगे ऐसा वरदान दिया ( तभी से माना जाता है की दक्ष प्रजापति अपना निवास काशी में ही बनाये हुवे है और नित्य दक्षेश्वर लिंग की पूजा करते है)

जब माता पार्वती का विवाह शिवजी से संपन्न होता है तब उनकी बारात कैलाश जाती है उस समय माता पार्वती भगवान शिव से आग्रह करती है कि काशी चलिए फिर वह दोनों काशी जाते हैं पार्वती वहां पर अपने पिछले जन्म के माता-पिता दक्ष प्रजापति और प्रसूति को मिलती है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती है अपने पिछले जन्म के ऋण मुक्ति के लिए वह महादेव से प्रार्थना करती हैं कि मेरे माता-पिता को क्षमा कर दीजिए पार्वती की बात मानकर शिवजी प्रजापति दक्ष को उनका पूर्वमनुष्य मुख दे देते हैं ।

पता- मृत्युंजय मंदिर प्रांगण में वृद्धकाल कूप के पीछे के तरफ,

दारानगर , वाराणसी ।

बिंदु माधव (काशी खण्डोक्त)

श्री हरि विष्णु का अग्निबिन्दु ऋषि से संवाद-

प्रतिक्षपं कार्तिकिके कुर्वन ज्योत्स्नां प्रदीपजाम् । ममाग्रे भक्ति संयुक्तो गर्भध्वान्तं न संविशेत् ||

आज्यवर्तिकमुर्जे यो दीपं मेःग्रे प्रभोधयेत् । बुद्धिभ्रंशं न चाप्नोति महामृत्युभये सति ||(काशीखण्ड)

~ कार्तिक मास की प्रत्येक रात्रि में मेरे आगे भक्तिपूर्वक दीप जलाने से व्यक्ति को गर्भ के अंधकार में नही पड़ना पड़ता (अर्थात मुक्ति मिल जाती है)

जो कोई कार्तिक महीने में घी की बत्ती का दिया मेरे आगे जला देता है , महामृत्यु के भय होने पर भी उसकी बुद्धि में कुछ भ्रम नही पड़ता (अर्थात अंत समय मे भी उसकी मति नही खराब होती)

धनवंतरेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

श्री धन्वंतरि जी प्राचीन विग्रह-

माता अन्नपूर्णा आदि अन्नपूर्णा विश्वभुजा गौरी

धनवंतरेश्वर महादेव जो श्री धन्वंतरि जी द्वारा पूजित और स्थापित है।

आज के दिन यहां दर्शन करने से आरोग्य लाभ मिलता है ।

कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी

मंगलवार को धनतेरस का त्योहार देशभर में बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा है. इस दिन मां लक्ष्मी, कुबेर देव और भगवान धनवंतरी की पूजा का विधान है. धनतेरस हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन मनाई जाती है. धनतेरस को धनत्रयोदशी और धनवंतरी जयंती के नाम से भी जाना जाता है. कहते हैं कि इस दिन सुमद्र मंथन के दौरान भगवान धनवंतरी और मां लक्ष्मी प्रकट हुए थे, इसलिए आज के दिन इनकी पूजा की जाती है. कहते हैं कि जो भक्त विधि-विधान के साथ इनकी पूजा-अर्चना करते हैं उन्हें सालभर धन की कमी नहीं होती और मां लक्ष्मी की कृपा उनके परिवार पर बनी रहती है.

धनतेरस के दिन भगवान गणेश, कुबेर जी और मां लक्ष्मी की पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है ।

माहात्म्य

धन्वन्तरि जी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनिया के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।

धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है; जिसके सम्भव न हो पाने पर लोग चांदी के बने बर्तन खरीदते हैं। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी, गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं। हालाकि यह सब लोकवेद है, जिसका हमारे पवित्र ग्रंथो में कहीं भी वर्णन नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 के श्लोक 23 और 24 में इसे शाश्त्र विरुध्द साधना कहा गया है।

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है। इस प्रथा के पीछे एक लोककथा है। कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था। दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े। दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया।

विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे। जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा। परन्तु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा। यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे, उसी समय उनमें से एक ने यम देवता से विनती की- हे यमराज! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाए। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यम देवता बोले, हे दूत! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है, इससे मुक्ति का एक आसान तरीका मैं तुम्हें बताता हूं, सो सुनो। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

आज के दिन काशी में माता अन्नपूर्णा के दर्शन करने से व्यक्ति धन धान्य से परिपूर्ण रहता है और माँ अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है ।

पता-

धन्वंतरि जी का विग्रह , सुडिया नीचीबाग, चौक पर है।

धनवन्तरेश्वर लिंग , मृत्युंजय , मंदिर , दारा नगर पर है।

अन्नपूर्णा मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर के पास ।

आदि अन्नपूर्णा , मीरघाट , विशालाक्षी देवी के पास धर्मकुप के सामने

श्री बिंदु माधव (काशी खण्डोक्त)

बड़े बड़े पापियो के एकत्रित पाप पंचगंगा तीर्थ में कार्तिक मास में एक बार गोता लगाने से यही छूट जाते है ।

पूर्वकाल में भृगुवंशी वेदशीरा नामक मुनि थे । शुचि नाम की प्रधान अप्सरा से उनको धूतपापा नाम की कन्या उत्त्पन्न हुई जिसका लालन पोषण मृगी (हिरणी) के दूध से हुआ , यह कन्या अत्यंत ही बुद्धिमान होने के कारण उपयुक्त वर पाने के लिए मुनि से उपाय पूछा ।

मुनि के आज्ञानुसार धूतपापा ने काशी में आकर धुतपापेश्वर नामक शिव लिंग की स्थापना कर के घोर तप किया , जिसके फल स्वरूप विश्व्नाथ ने उनको अनेको वरदान दिए और संसार मे पवित्रतं वस्तु से भी पवित्र होने का वरदान दिया और धूतपापा के शरीर के रोम रोम में तीर्थो का निवास होगा ऐसा उपयुक्त वर देकर वेदशीरा मुनि के आश्रम भेज दिया ।

कुछ समय पश्च्यात धर्मराज़ (यमराज) ने धूतपापा से गंधर्व विवाह करने का प्रस्ताव रखा जिसपर धूतपापा ने बारम्बार अपने पिता वेदशीरा से बात करने को कहा , पर कामातुर धर्म अपनी ही बात रटता रहा जिसमे अंत मे धूतपापा ने जल का आधार नद होने का श्राप दे दिया और धर्म ने धूतपापा को पाषाण (पत्थर) होने का ।

बाद में वेदशीरा मुनि ने अपने तपोबल से अपनी पुत्री धूतपापा को चंद्रकांत शिला बना दिया और यह भी कहा कि तुम्हारे द्वारा वर्णित गुणों से सम्पन्न वही धर्म ही तुम्हारे अनुरूप भर्ता है और कहा कि धर्म ने भी तुम्हारी तरह कठोर तप कर के शिव से अनेक तरह के वरदान को प्राप्त किया है ।

बाद में चंद्रकांत शिला से बह कर निकलने वाली धूतपापा नदी "धर्मनद" से संगत होकर सर्वपापनाशक हुई (धूतपापा और धर्मनद का संगम गंगा के उद्गम से भी पहले का है)।

जब काशी में गंगा नही थी तब धर्मनद तीर्थ पर गभस्तिमान(सूर्यदेव) ने उग्र तप किया । उनके पसीने से किरणा नदी बह निकली और धूतपापा नदी में मिल गयी बाद में भगीरथ राजा द्वारा गंगा के साथ सरस्वती और यमुना आकर किरणा और धूतपापा से मिलकर पंचनद तीर्थ बनी ।

यहां कार्तिक मास में स्नान के अनगिनत पुण्य है

कृते धर्मनदं नाम त्रेतायां धूतपापकम् । द्वापरे बिन्दु तीर्थे च कलौ पञ्चनदं स्मृतम॥(काशी_खण्ड)

यह तीर्थ सतयुग में धर्मनद , त्रेता में धुतपापक , द्वापर में बिंदूतीर्थ और कलियुग में पंचनद(पंचगंगा) नाम से कहा गया है।

न धूतपापा सदृश्यं तीर्थे क्वापि महीतले। यदेकस्नानतो नश्येदधम जन्मत्रयर्जित् ।। (काशी_खण्ड)

धूतपापा के समान कोई भी तीर्थ भूतल पर कही भी नही है , जो केवल एक ही बार स्नान करने से तीन जन्म के संचित पापों को विनष्ट कर डालता हो।

बिंदु माधव (काशी खण्डोक्त)

कार्तिक मास महात्म्य

ऐकादशीं समासाद्द प्रबोधकरणीं मम | बिन्दुतीर्थ कृतस्नानो रात्रौ जागरणान्वितः ||

दीपान् प्रबोध्यबहुशो ममालाङ्गकृत्य शक्तितः | तौर्य त्रिकविनोदेन पुराणश्रवणा दिभिः ||

तत्रान्नदानं बहुशः कृत्वा मत्प्रीतये नरः | महापातकयुक्तोःपि न विशेत्प्रमदोदरम ||

~प्रबोधिनी एकादशी के दिन बिंदूतीर्थ (पंचगंगाघाट,वाराणसी) में स्नान कर रात्रि जागरण करता हुआ व्यक्ति , बहुत से दियो को जला कर और यथा शक्ति मुझे अलंकृत कर , नाच , गाने , भजन , गायन विनोद के सहित तथा पुराण इत्यादि के श्रवण से बड़ा भारी महोत्सव करे (जब तक तिथि पूर्ण न होजाये) यदि वहां पर मेरे प्रीति के लिए बहुत सा अन्नदान अथवा जरूरतमंदो के लिए भंडार करें , तोह वह मनुष्य महापापी होने पर भी फिर किसी स्त्री के गर्भ में प्रवेश नही करता (मतलब मोक्ष को प्राप्त होता है) |

बिंदु माधव मंदिर काशी में पंचगंगा घाट पर स्थित काशी के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है ।

श्री_हरि_विष्णु_का_अग्नि_बिंदु_ऋषि_से_संवाद

बिंदु तीर्थ (पंचगंगा घाट, काशी) में स्नान करके जो कोई यहां पर बिंदु माधव नाम से मेरी पूजा करता है , वही निर्वाण को प्राप्त होता है , हे मुने ! सतयुग में मैं अभी आदिमाधव के नाम से पूज्य हूँ , त्रेता में मुझे सर्व सिद्धि दायक अनंत माधव नाम से समझना चाहिए , द्वापर में पर्मार्थकर्ता मैं ही श्रीदमाधव संज्ञक हूँ और कलियुग में कलिमलध्वंशी बिंदुमाधव नाम से मुझे जानना चाहिए ।

कलियुग में मनुष्य पापी होने के कारण मुझे नही समझ सकते।

मेरी ही माया से मोहित जो लोग भेदभाव में ततपर होकर मेरी भक्ति करते है और विश्वेश्वर शिव से द्वेष करते है , वे सब मेरे ही शत्रु है और वे अंत मे पिशाचपद के भागी होते है , फिर पिशाच योनि पाने पर कालभैरव की आज्ञा से तीस हजार वर्ष तक दुख सागर में रहकर अंत मे फिर से भोलेनाथ के ही कहने पर मैं उन्हें मोक्ष देता हूं ।

शिव द्रोही ममदास कहावे । सो नर सपनेहु मोहीं न पावे ।

शंकर विमुख भक्ति चह मोरी । सो नर मूढ़ मंदमति थोरी ।।

शंकर प्रिय मम द्रोही , शिव द्रोही ममदास

ते नर करहीं कल्प भर , घोर नरक महं वास

बिंदु माधव (काशी खण्डोक्त)

श्री बिंदु माधव की कथा

जब अपने मायाजाल से राजा दिवोदास का उच्चाटन करने के पश्चात पदोदक तीर्थ पर आदिकेशव रूप से श्री हरि विष्णु प्रतिष्ठित होगये । वहां से चल कर काशी में विचरण करते करते काशी की महिमा का सुखपूर्वक चिंतन करते हुवे श्री हरि विष्णु पंचनद तीर्थ (पंचगंगा) पर पहुँच गए और पंचनद को देख कर वह काशी की महिमा और विशिष्टता से परमानंदित हुवे ।

वही पर उन्हींने एक दुर्बल देह ऋषि को देखा , वह तपस्या रत ऋषि भी श्री हरि विष्णु के समीप पहुँचकर उनके रूप और महिमा को देखकर परम् प्रसन्न हुवे और स्तुति करने लगे ,

ऋषि ने कहा आप ही स्तोता , स्तुति , और स्तवनीय सब कुछ है । अतः आप मेरी भव तृष्णा को दूर करें

श्री हरि विष्णु ने स्तुति और तपस्या से प्रसन्न होकर ऋषि से वर याचना की बात कही -- ऋषि ने वर याचना करते हुवे पहला वर मांगा - मुमुक्षुजन हितार्थ 'पंचनद' पर आप स्थाई निवास करें और दूसरी वर याचना की -- श्री हरि विष्णु की चरण कमल में अविचल भक्ति बनी रहे । श्री विष्णु ने लोकोपकारार्थ दोनों वर को तथास्तु कहते हुवे यह भी कहा कि मैं भी खुद यहां पंचनद पर निवास करना चाहता था , पर ऋषि की याचना पर अवश्य ही पंचनद तीर्थ पर बिंदु माधव के रूप में रहूंगा ।

श्री हरि विष्णु - श्री माधव ने काशीवास् का भी बड़ा महात्म्य बताते हुवे कहा --

स एव विद्वान जगति स एव विजितेन्द्रियः। तावत्स्थास्याम्यहं चात्र यावत्काशी मुने त्तिवः ||

प्रलयेःपि न् नाशोस्याः शिवशूलाग्रसुस्थितेः। इत्याकर्ण गिरं विष्णोरगिन बिन्दुमर्हामुनिः ||

संसार मे वही पंडित है , वही जितेंद्रिय है , वही धन्य पुण्यवान है जो काशी को पाकर फिर न छोड़े ।

हे मुने ! जबतक काशी है , तब तक मैं यहां बना रहूंगा और शिव के त्रिशूल पर स्थित होने से इस काशी का प्रलयकाल में भी विनाश नही होता ।

बिंदु माधव मंदिर , पंचगंगा घाट , वाराणसी (काशी) .

धर्मेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

माता पार्वती ने शंकर से पूछा हे शम्भो , आनंद कानन में कौन सा ऐसा शिव लिंग है , जो समस्त पापो का नाशक तथा स्मरण , दर्शनादि , असीम कल्याण का दाता है ?

शिव जी ने कहा-

आनंद कानन (काशी) में धर्मेश्वर लिंग का स्थान धर्म पीठ नाम से प्रसिद्ध है । इसका दर्शन सर्व पापमोचक है । सूर्य पुत्र( यम)

ने यही तुम्हारे सन्मुख (विश्वभुजा गौरी रूप जो माता पार्वती और आदि अन्नपूर्णा है) घोर तपस्या की थी ।

उन्होंने केवल मेरे दर्शन के लिए ही यह उग्र समाधि लगा कर चारो युगों तक चार चौकड़ी तक तपस्या करते रहे । मैं उनकी तपस्या से कांचन शाख नामक महावट वृक्ष के नीचे जहाँ वह तपस्या रत थे मैं वहां गया और देखा कि सूर्य कांत नामक माटी का महालिंग स्थापित करके तपः स्थित थे , मैन यमराज को स्पर्श किया और वर मांगने को कहा फिर भानु नंदन यम निष्कपट भाव से मेरी नाना प्रकार से स्तुति करने लगे और भूतल पर लेटकर साष्टांग दण्डवत करने लगे और ॐ नमः शिवाय मंत्र से हजारों बार प्रणाम करते ही रहे।

वर मांगने के इक्षा न होने पर भी मैन खुद उनको वरदान दिया कि ' आज से तुम्हारा नाम धर्मराज होगा , तुम धर्म के शास्ता , धर्माधिकारी , समस्तकर्मसाक्षी होंगे । तुम्हारे थोड़े से ही पूजन से सबको बड़ा लाभ होगा ।

धर्म पीठ स्थान कल्याणपद एवं महकल्याण को देने वाला है ,

धर्मेश्वर सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है , धर्मेश्वर का एक बार भी पत्र पुष्प दूर्वा और जल से जो पूजन कर लेगा तोह देवगण उसकी मंदार की मालाओं से पूजा करेंगे ।

यहां गंगा स्नान और इस पीठ पर दान की भी बड़ी महिमा है।

धर्मकुप में स्नान कर (जो शिव जी द्वारा खोदा गया है)कार्तिक शुक्ल अष्टमी व्रत , उत्साहपूर्वक जागरण का भी अपार महिमा है और यम की स्तुति भी महनीय है ।

बाद में शिव जी ने फिर से वर मांगने को कहा तब भी यमराज आनंद के सरोवर में डूबकर बेसुध (निस्तब्ध) ही हो गए ।

पता- विश्व भुजा गौरी के पास मीरघाट वाराणसी ।

पंचक्रोशेश्वर महादेव

आज के ही दिन शिव जी माता पार्वती और अपने गण (वीरभद्र , भैरव , यक्षों आदि) के साथ पंचक्रोशी यात्रा की थी।

इसीलिए आज के दिन काशी में पंचक्रोशी यात्रा करने का विधान प्राचीन समय से ही आरहा है पंचक्रोशी यात्रा करने से

यात्रियो के पाप नष्ट होते है , विघ्न और कष्ट दूर होते है और अंत मे मोक्ष प्राप्त होता है ।

काशी के राजा श्री स्वर्गीय विभूति नारायण सिंह जी के माता द्वारा पंचक्रोशी मंदिर का निर्माण कराया गया था , यहां ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने से और पांच फेरी लगाने से पंचक्रोशी यात्रा का फल मिलता है ।

पंचक्रोश यात्रा मार्ग में जितने भी मंदिर पड़ते है , वह सभी इस मंदिर में पड़ते है जो लोग शरीर से असक्षम है वह विशेष रूप से यहां दर्शन कर के लाभ प्राप्त कर सकते है

Ck5/32 गोला गली , चौक , वाराणसी ।

पंचगंगेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

काशी के पंचगंगा घाट पर तैलंग स्वामी मंदिर के दीवार से सटा हुआ यह शिव लिंग जमीन से 20 ft नीचे है , स्थानीय लोगो के हिसाब से कुछ लोग इसे स्वयम्भू शिव लिंग मानते है तोह कुछ लोग का मानना है कि पंचगंगा तीर्थ द्वारा स्थापित किया गया है , और कुछ का कहना है कि यहां दर्शन करने से पंचगंगा स्नान का फल मिलता है ।

काशी खण्ड पुराण के अनुसार यह लिंग अति शुभप्रद है , यहां दर्शन पूजन करने से जीवन मे शुभता आने लगती है ।

बिंदु_माधव_आरती_दर्शन

यैर्न पन्चनदे स्नातं कार्तिके पापहारिणी | तेःद्यापि गर्भेतिष्ठ्ति पुनस्ते गर्भवासिनः ||

कीर्णाधुतपापे च तस्मिन् धर्मनदे शुभे | स्त्रवन्त्यौपापसंहन्त्रयो वाराणस्यां शुभ द्रवे ||

किरणा धूतपापा च पुण्यतोया सरस्वती | गङ्गा च यमुना चैव पन्चनद्दौत्र् प्रकीर्तिता || (काशी खण्ड)

जिन लोगो ने कार्तिक मास में पापहारी पंचनद तीर्थ में स्नान नही किया है , वे आज भी गर्भ में है और आगे भी गर्भ में वास करेंगे । वाराणसी में शुभ द्रव गंगा जी मे पवित्र दो धर्मनद किरणा , धूतपापा गिरती है जो सभी पापों का संहार करती हैं । किरणा , धूत पापा , पवित्र जल वाली सरस्वती , गंगा , और यमुना ये पांच है ।

पूरे कार्तिक मास बीतने तक गंगा जी या पंचगंगा तीर्थ में स्नान करके व्रत दान यज्ञ तथा तपस्या आदि साधना करनी चाहिए , क्योंकि जन्म से आज तक जो समय बीत गया है वह पुनः नही आएगा और तत्काल समय का लाभ जरूर लेना चाहिए ।

पूरे कार्तिक मास में पंचगंगा घाट पर स्नान कर बिंदु माधव के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और घाट पर आकाश दीप जलाने से पित्रो को मोक्ष मिलता है

कार्तिक मास स्नान

नित्य बिंदु माधव दर्शन

पन्चनद नाम तीर्थं त्रय्लोक्यविश्रुतं | तत्राप्लुतो न गृह्णीयाद्देहंना पाञ्चभौतिकम् ||

आस्मिन् पन्चनदीनां च सम्भेदेघौघभेदिनि | स्नानमात्रात्प्रयात्येव भित्वा ब्रह्माण्डमण्डपं ||(काशीखण्ड)

पंचनद पंचगंगा तीर्थ तीनो लोको में विख्यात है , वहाँ स्नान करने से पंच भौतिक शरीर प्राप्त नही होता अर्थात पुनः जन्म नही लेना पड़ता । पंच गंगा में स्नान करते ही मनुष्य ब्रह्मांड का भेदन करके प्रयाण करता है और ब्रह्मलोक को जाता है ।

प्रयागमाघमासेतु सम्यक् स्नातस्य यत्फ़लम् | तत्फ़लम स्याद्दिनैकेन काश्यां पञ्चनदे ||

स्नात्वा पन्चनदे तीर्थे कृत्वा च पित्रतर्पणं | बिन्दुमाधवंभ्यचर्य न म्योजन्मभाग्भवेत् || (काशीखण्ड)

प्रयागराज में माघ में अच्छी तरह एक मास तक स्नान करके जो फल प्राप्त होता है वह फल केवल एक बार पंचगंगा में स्नान करने से प्राप्त होता है । पंचगंगा में स्नान करके देव , ऋषि , पितर तर्पण कर बिंदु माधव का दर्शन करने से पुनर्जन्म नही होता है ।

पंच गंगा घाट , बिंदु माधव मंदिर , वाराणसी

वाल्मीकेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

अश्विन शुक्ल पक्ष (पूर्णिमा दर्शन यात्रा)

महर्षि वाल्मीकि द्वारा स्थापित इस लिंग के दर्शन से अदभुद ज्ञान की प्राप्ति होती है और शास्त्रो में रुचि बढ़ती है ।

त्रिलोचन घाट पर त्रिलोचन महादेव मंदिर के प्रांगण में स्थित इस लिंग का आज विशेष रूप से दर्शन पूजन करना चाहिए

महर्षि वाल्मीकि का वास्तविक नाम रत्नाकर था। पुराणों में वर्णित कथा के मुताबिक ये ऋषि प्रचेता के पुत्र थे। प्रचेता के पिता का नाम ब्रह्मा था। कहते हैं कि रत्नाकर जब छोटे थे तब एक भील ने उन्हें चुराकर अपने साथ ले गया और उनका पालन-पोषण करने लगा। भीलनी समाज जो कि डाकू समय की श्रेणी में आता है, उसमें पलने के कारण इनका आचरण भी डाकू जैसा ही हो गया। रत्नाकर अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए राहगीरों को लूटने लगे। इसी क्रम में एक दिन नारद जी उस रास्ते से गुजर रहे थे जहां रत्नाकर लूटपाट करता था।

नारद जी को देखकर रत्नाकर ने उन्हें पकड़कर उनसे लूटपाट की और उन्हें बंधक बना लिया। नारद जी ने रत्नाकर से पूछा-“तुम ऐसा काम क्यों करते हो?” इस पर रत्नाकर ने जबाव दिया कि वह अपने परिवार के लिए ऐसा करता है। फिर नारद जी ने पूछा-“जिस परिवार के लिए तुम पाप कर रहे हो क्या वह तुम्हारे पापों को भोगेगा”? इस पर रत्नाकर जोशीले आवाज में बोला-“हां! हां! क्यों नहीं!” फिर नारद मुनि ने कहा- “एक बार अपने परिवार से पूछकर आओ, अगर हां कह दे तो मैं तुम्हें अपना सारा धन दे दूंगा।” जब रत्नाकर परिवार से पूछने गया तो किसी ने हां नहीं कहा।

इस बात को सुनकर रत्नाकर को बहुत आघात पहुंचा और वह उसी दिन से ले लिया कि वह डाकू का काम नहीं करेगा। कहते हैं कि सालों तपस्या करने के बाद रत्नाकर को ज्ञान की प्राप्ति हुई। जिसके बाद वह रत्नाकर वाल्मीकि के नाम से जाना जाने लगा और रामायण नामक महाकाव्य संस्कृत भाषा में रच डाली।

काशी में वाल्मीकेश्वर नाम से चार लिंग स्थापित है।

1. भेलूपुर में नीलकंठ महादेव के बगल में बड़ा लिंग b20/15

(मंदिर बंद रहता है)

2. मलदहिया में वाल्मीकि टीला पर c21/14

3. पिसाच मोचन कुंड के ऊपर c 21/39

4. त्रिलोचन लिंग के बगल में बड़ा लिंग , त्रिलोचन घाट a 2/ 80 , वाराणसी ।

कंबलाश्वतरेश्वर महादेव राहु रूपात्मक शिव लिंग एवं अश्वतरेश्वर महादेव केतु रूपात्मक शिव लिंग (काशी खण्डोक्त)

कंबलाश्वतरेश्वर जिनको बहुत से लोग राह्वीश्वर और अश्वतरेश्वर को केतविश्वर के रूप में भी जानते है । स्थानीय लोगों के मत अनुसार यह दोनों लिंग त्रेतायुग कालीन है , इनके दर्शन से राहु और केतु ग्रह की शांति और इनसे सम्बंधित अनुकूल फल मिलने लगते है ।

काशी में नवग्रह लिंग यात्रा में (यात्रा के जानकर लोग) राहु केतु के रुप में इन्ही का दर्शन कर के लाभ ग्रहण करते आये है।

पता - ck8/13 गोमठ काका राम की गली,गढ़वासी टोला, चौक, वाराणसी।

ताम्र वराह (काशी खण्डोक्त)

एकादशी विष्णु दर्शन

ताम्र वराह जो श्री हरि विष्णु जी के ही रूप है , इनका प्रादुर्भाव ताम्र द्वीप से काशी में हुआ है , (कोई विद्वान श्रीलंका को ताम्र द्वीप मानते है तोह कोई बर्मा को ताम्रद्वीप मानते है)

जो भी लोग यहां नित्य दर्शन पूजन करते रहते है , उनकी हर मनोकामना पूर्ण होने लगती है और जैसे वराह अवतार ने डूबी हुई पृथ्वी को समुद्र तल से बाहर निकाला था वैसे ही यह ताम्र वराह अपने भक्तों को हर मुसीबत से बचाते है ।

पता - ck 33 / 57 नील कंठ मोहल्ला , चौक वाराणसी ।

नीलकंठ महादेव (काशी खण्डोक्त)

नीलकंठ महादेव (कालंजर मध्यप्रदेश)

अश्विन मास विजय दशमी यात्रा एवं एकादशी यात्रा

नीलकंठ पक्षी महिमा

मान्यता यह है कि भगवान श्रीराम ने सुबह नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने के बाद युद्धभूमि में रावण का वध किया था। इस कारण नीलकंठ को पूज्य पक्षी माना जाता है और आज भी लोग दशहरे के दिन सुबह-सुबह नीलकंठ पंछी के दर्शन कर यह त्योहार मनाते हैं। विजयादशमी के इस दिन पर क्षत्रिय शस्त्र पूजा करते हैं, तो ब्राह्मण शमी वृक्ष की पूजा करते हैं।

मान्यता यह भी है कि नीलकंठ पक्षी को देखने से भगवान शिव के दर्शन हो जाते हैं और दिन शुभ होता है। नीलकंठ पक्षी को भगवान शिव का स्वरूप मानने का कारण भी है। भगवान शिव का कंठ नीला है, क्योंकि उन्होंने समुद्र से निकला हलाहल विष पान कर उसे अपने कंठ में धारण किया था। इसी तरह नीलकंठ पक्षी का भी कंठ नीला है। इसी कारण तो इसे यह नाम मिला है।

नीलकंठ से जुड़ी कई कहावतें भी हैं, जैसे-नीलकंठ का दर्शन होय। मनवांछित फल पाए सोय। या नीलकंठ तुम नीले रहियो, हम पर कृपा बनाए रहियो।

काशी में नीलकंठ

नीलकंठेश्वरं लिङ्गं काश्यां यै परि पूजितं। नीलकठास्त ऐव स्युस्त ऐव शशिभूषणा॥

जो लोग काशी धाम में नीलकंठेश्वर लिंग की पूजा करते हैं , वे स्वयं नीलकंठ और चंद्रभूषण हो जाते है ।

कालंजर में नीलकंठ

किले में नीलकंठ महादेव मंदिर है। जहां समुद्र मंथन से निकले विष के रहस्य छिपे हुए हैं। कहा जाता है कि महादेव ने विषपान के बाद यहीं तपस्या कर विष के प्रभाव को खत्म कर काल की गति को मात दी थी। पांच फीट ऊंचा शिवलिंग विश्व का अनूठा और इकलौता है जिसमें विष पसीना बनकर रिसता रहता है।

भक्त शरीर में लगाते हैं पसीना

कालिंजर में अद्भुत शिवलिंग और इससे निकलने वाले पसीने का राज बेहद गहरा है। मान्यता है कि शिव ने समुद्र मंथन में जो विष पिया था उसका प्रभाव यहां दिखाई देता है और उसी प्रभाव की आस्था में सभी नतमस्तक हैं।

बड़े दुख की बात है कि काशी खण्डोक्त लिंग नीलकंठ महादेव जो नीलकंठ मोहल्ला चौक पर था उसका , कॉरिडोर निर्माण के कारण मंदिर तोड़ दिया गया और तत्काल में दर्शन बंद कर दिया यह मंदिर जमीन से 40 फ़ीट नीचे के गहराई पर स्थित था ।

पता -भेलूपुर रेवड़ी तालाब

दूसरे नीलकंठ गौरीकेदारेश्वर मंदिर के पहले केदार घाट पर

पृथ्वीश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

विश्व के पहले राजा और राम जी के पूर्वज राजा पृथु द्वारा स्थापित लिंग ।

ऐसा माना जाता है कि इन्होने ही सबसे पहले खेती की शुरुआत की थी , इसी कारण धरती को पृथ्वी कहा जाने लगा ।

महाराज पृथु ने ही पृथ्वी को समतल किया जिससे वह उपज के योग्य हो पायी। महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वी पर पुर-ग्रामादि का विभाजन नहीं था; लोग अपनी सुविधा के अनुसार बेखटके जहाँ-तहाँ बस जाते थे।

महाराज पृथु अत्यन्त लोकहितकारी थे। उन्होंने विष्णु जी के दर्शन प्राप्त करने के लिए 99 अश्वमेध यज्ञ किये थे। सौवें यज्ञ के समय इन्द्र ने अनेक वेश धारण कर अनेक बार घोड़ा चुराया, परन्तु महाराज पृथु के पुत्र इन्द्र को भगाकर घोड़ा ले आते थे। इन्द्र के बारंबार कुकृत्य से महाराज पृथु अत्यन्त क्रोधित होकर उन्हें मार ही डालना चाहते थे कि यज्ञ के ऋत्विजों ने उनकी यज्ञ-दीक्षा के कारण उन्हें रोका तथा मन्त्र-बल से इन्द्र को अग्नि में हवन कर देने की बात कही, परन्तु ब्रह्मा जी के समझाने से पृथु मान गये और यज्ञ को रोक दिया। भगवान विष्णु ने उनकी भक्ति और मानवतावादी सोच के कारण उनको उसी क्षण दर्शन दिया और अनेकों वरदान भी दिए ।

काशी में जब माता पार्वती और भगवान भोलेनाथ ने जब पंचक्रोशी यात्रा शुरू की थी तो बाबा पृथ्वीश्वर महादेव का दर्शन कर उन्हें अपना बड़ा भाई माना था।

यहां पृथ्वीश्वर महादेव में ऐसी मान्यता है कि जो भी नित्य भक्ति भाव से यहां दर्शन करेगा तोह वह जल्द ही ऐश्वर्यवान और भूमिवान होजाता है ।

Prithvishwar Mahadev Mandir , maqbulalam road , pandeypur , khajuri marg , varanasi

https://maps.app.goo.gl/18A3CqG5nuckmsQR8

गोकर्णेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

काशी में गोकर्णेश्वर लिंग को शिव जी के कान का हिस्सा माना जाता है ।

काशी में गोकर्णेश्वर लिंग , कर्नाटक में गोकर्ण शहर और रावण से संबंधित महाबलेश्वर लिंग का प्रतिनिधित्व करता है । महाबलेश्वर लिंग को गोकर्णेश्वर नाम से भी जाना जाता है ।

गोकर्ण_अर्थात_गाय का कान , यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि नदियों के संगम पर बसे इस गाँव का आकार भी गाय के कान जैसा ही प्रतीत होता है। यहाँ अनेक ख़ूबसूरत मंदिर हैं, जो लोगों की आस्था का केन्द्र हैं। यहाँ दो महत्त्वपूर्ण नदियों, 'गंगावली' और 'अघनाशिनी' का संगम भी देखने को मिलता है।

कथा

लंका का राजा रावण जो भगवान शिव का परम भक्त था, उसने एक बार कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया। इस तप से प्रसन्न होकर शिव ने रावण को वर मांगने को कहा। वरदान स्वरूप रावण ने शिव जी से अत्मलिंग की मांग रखी। इस पर भगवान शिव ने उसे वह शिवलिंग दे दिया, परंतु साथ ही एक निर्देश देते हुए कहा की यदि वह इस शिवलिंग को जहाँ भी जमीन मे रखेगा, यह वहीं स्थापित हो जाएगा और फिर वहाँ से इसे कोई डिगा नहीं सकेगा। अत: इसे जमीन पर मत रखना। रावण अत्मलिंग को हाथ में लेकर लंका के लिए निकल पड़ा। इस लिंग की प्राप्ति से वह और भी ज़्यादा ताकतवर एवं अमर हो सकता था। नारद मुनि को इस बात का पता चला तो उन्होंने भगवान गणेश से इस दुविधा को हल करने की मदद मांगी। इस पर भगवान गणेश को एक तरकीब सूझी, जिसके तहत उन्होंने सूर्य को ढँक कर संध्या का भ्रम निर्मित किया।

रावण जो नियमित रूप से सांध्य पूजा किया करता था, इस शिवलिंग के कारण धर्म संकट में पड़ गया। इस बीच गणेश जी ब्राह्मण के वेश में वहाँ प्रकट हुए। रावण ने उस ब्राह्मण स्वरूप गणेश से आग्रह किया कि वह उस अत्मलिंग को कुछ समय के लिए पकड़ ले ताकि वह पूजा कर सके। गणेश भगवान को इसी बात का इंतज़ार था। अत: उन्होंने शिवलिंग को ले लिया, परंतु रावण के समक्ष यह बात रखी कि यदि उसे देर होती है तो वह आवश्यकता पड़ने पर तीन बार ही रावण को पुकारेगा और यदि वह नहीं आया तो फिर उस शिवलिंग को धरती पर रख देगा। रावण ने बात मान ली। अब वह पूजा करने लगा। रावण के पूजा में ध्यान लगाते ही गणेश जी ने उस लिंग को वहीं भूमि पर जो गोकर्ण क्षेत्र था, रख दिया और अंतर्ध्यान हो गए। जब रावण ने पूजा समाप्त की तो उसने शिवलिंग को भूमि रखा पाया। उसने बहुत बल पूर्वक प्रयत्न किये, किंतु अब वह लिंग को जमीन से उठा नहीं पाया तभी उसने इस लिंग को महाबलेश्वर का नाम दिया ।

गोकर्ण शहर को दक्षिण का काशी भी कहा जाता है और काशी में गोकर्णेश्वर का दर्शन करने से महाबलेश्वर के दर्शन का फल मिलता है।

मान्यता अनुसार गोकर्णेश्वर महादेव से अपनी किसी भी व्यथा को बताने से उसका निराकरण जल्द ही होजाता है ।

काशी में गोकर्णेश्वर का पता - d 50 /33 कोदई की चौकी दैलु की गली

ज्ञानवापी तीर्थ (काशी खण्डोक्त)

सर्वेभ्यस्तितिर्थमुख्येभ्यः प्रत्यक्ष ज्ञानदा मुने | सर्वज्ञानमयी चैषा सर्व लिङ्ग मयि शुभा ||

साक्षाछिवमयि मूर्ति ज्ञार्नकृज्ज्ञान वापिका | (काशीखण्ड)

यह ज्ञानवापी सम्पूर्ण तीर्थो में मुख्य , प्रत्यक्ष ज्ञान देने वाली और सम्पूर्ण ज्ञानरूप पवित्र सम्पूर्ण लिंगमयी साक्षात शिव मूर्ति को धारण करने वाली , ज्ञान कराने वाली ज्ञानवापी नाम से प्रसिद्ध है ।

दुर्लभं तु कलो देवैस्तजलम हय्म्रितो पमम् | तरणं सर्वजन्तुनां पानात्पापस्य नाशनं || (शिवपुराण )

सभी प्राणियो को मुक्ति देने वाला तथा अमृत के सदृश्य उस वापि का जल कलियुग मे देवताओ को भी दुर्लभ है | उसके जल को पिने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट जाते है

देवस्य दक्षिणे भागे वापि तिष्ठति शोभना | तस्यास्तथोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते || (लिङ्गपुराण)

अविमुक्तेश्वर लिङ्ग के दक्षिण दिशा मे एक सुन्देर वापि है, जिसके जल पिने से मनुष्य का पुनर्जन्म नही होता |

यैस्तु तत्र जलं पीतं कृतास्ते हि मानवाः | तेषां तु तारकं ज्ञानमुत्पत्स्यति न संशयः || (तिर्थचिन्तामणि)

जो मनुष्य ज्ञान वापि का जल पिते है, उनके सभी मनोरथ सिद्ध् हो जाते है, इसमे लेश मात्र भी संशय नही है |

उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काल लोपजं | क्षणेन तदपा कृत्य ज्ञानवान जायते नरः || (स्कन्दपुराण)

कर्म करने के लिये विहित काल के लोप होने के कारण उत्पन्न पाप, ज्ञान वापि मे संध्या करने से एक क्षण मे हि दुर होजाते है और मनुष्य ज्ञान वान हो जाता है |

ज्ञानोदतीर्थंसंस्पर्शादश्चमेधफलं लभेत् | स्पर्शनाचमनाभ्यां च राजसुयाश्मेधयोः || (पद्मपुराण)

ज्ञानवापी तीर्थ के दर्शन से अश्वमेध यज्ञ फल की प्राप्ति होती है , और उसके स्पर्श और आचमन से राजसूय अश्वमेध फल की प्राप्ति होती है ।

पता- काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी

सिद्धेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

सिद्धकुण्डे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा सिद्धेश्वरं महत् | सर्वासामेव सिद्धीनां पारं मच्यछति मानवः ||(काशी खण्ड)

सिद्धकुण्ड(चन्द्रकूप) में स्नान करके तथा सिद्धेश्वर भगवान का दर्शन करके व्यक्ति सभी सिद्धियो में पारंगत होता है अर्थात सभी सिद्धियां पा जाता है ।

सिद्धेश्वर एक स्वयम्भू लिंग है जो सिद्धेश्वरी देवी मंदिर के प्रांगण में है , इनके ठीक बगल में चंद्रमा द्वारा स्थापित चन्द्रेश्वर लिंग भी विराजमान है , जो व्यक्ति यहां सिद्धेश्वर लिंग का रुद्राभिषेक करता है तोह उसके सभी प्रकार के कार्य पूर्ण होने लगते है । सिद्धि पा जाने का मतलब कार्य करने में पारंगत (master) होना ही है व्यक्ति हमेशा अपने कार्य क्षेत्र में सबसे आगे रहता है ।

चन्द्रकूप में स्नान और जल का पान करने से हमारे पितृगण भी संतुष्ट होते है , इसलिए यह स्थान सर्वदा पूजनीय है ।

पता - ck7/124 सिद्धेश्वरी गली , सिद्धेश्वरी मंदिर , संकटा मंदिर मार्ग , चौक , वाराणसी ।

नित्यं विश्वेश विश्वेश विश्वनाथेति यो जपेत् | त्रिसन्ध्यं तंसुकृतिनं जपाम्य्ह्म पिध्रुवं || (पद्म पुराण)

जो नित्य विश्वेश्वर विश्वेश्वर , हे विश्वनाथ विश्वनाथ ऐसा जपता है , विश्वनाथ जी कहते है कि तीनों संध्यायो में मैं भी उसे जपता हु अर्थात मै उनको इस संसार से तार देता हूं ।

गच्क्षता तिष्ठता वापि स्वपता जग्रताथवा |

काशीत्येष महामन्त्रो येन जप्तः स निर्गम ||

जो प्राणी चलते , स्थिर रहते , सोते और जागते हुवे हर समय ' ' काशी ' इस दो अक्षरों के महामंत्र को जपते रहते है , वे इस कराल संसार मे निर्भय रहते है (अर्थात इस भयानक संसार से मुक्त हो जाते है) ।

योजनानां शतस्थोपी विमुक्तम संस्मरेद्यदि |

बहुपातक पुर्णोःपि पदं गच्छत्यनामयम ||

काशी विश्वनाथ से एक सौ योजन (1200 किलोमीटर दूर) पर स्थित रहने पर भी जो काशी नगरी का स्मरण करता है । वह पापी होते हुवे भी सभी पापो से मुक्त हो जाता है ।

शिव शिव , काशी काशी , गंगा गंगा

महेश्वर यात्रा

महेश्वर (काशी खण्ड स्वयम्भू लिंग )

पिता महेश्वर (काशी खण्ड स्वयम्भू लिंग )
परपिता महेश्वर (काशी खण्ड स्वयम्भू लिंग)

महेश्वर या उमा महेश्वर यह स्वयंभू लिंग मणिकर्णिका घाट की सीढ़ी पर मढ़ी के नीचे इनका स्थान है यह काशी विश्वनाथ के आह्वान पर काशी आये थे । यह साक्षात ही शिव रूप है और इनके पूजा से शिव जी और माता पार्वती तुरन्त प्रसन्न हो जाते है। महेश्वर लिंग काशी के विशाल शिव लिंगो में आते है ।

Maheshwar mahadev (kashi khand)

https://maps.app.goo.gl/8U1zMrPy6Zmsh4WUA

पिता महेश्वर शिव जी का( पिता रूपात्मक लिंग ) यह स्वयंभू लिंग भी मणिकर्णिका के (काशी खण्ड में लिखित )परिक्षेत्र में ही पड़ता । यह भी काशी विश्वनाथ के आह्वान पर गया क्षेत्र से काशी में आये यहां ऐसा मानना है कि यहां शास्त्रोक्त पूजा अर्चना करने से हमारे 20 पित्रो को मुक्ति मिल जाती है , प्राचीन समय मे यह मंदिर सिद्धेश्वरी देवी मंदिर (चन्द्रेश्वर + चन्द्रकूप ) से जुड़ा हुआ था(पर अब दोनों मंदिर के मार्ग अलग होगये है ) चन्द्रकूप में सोमवती अमावस्या के दिन यहां श्राद्ध तर्पण से पित्रो को मुक्ति मिलती है ।

पित्र पक्ष में भी यहां पूजा से पित्र प्रसन्न होते है और शिवरात्रि में भी विशेष पूजा होती है यहां । बहुत तेजोमय जागृत लिंग होने के कारण यहां 40 ft ऊपर से ही दर्शन होता है और सावन के सोमवार और शिवरात्रि को ही नीचे जा कर दर्शन मिलता है ।

pita maheshwar (#kashikhandokt)

https://maps.app.goo.gl/xnSgNsc3KYnnsdYX9

परपिता महेश्वर शिव जी का परपिता ( दादा )रूपात्मक यह स्वयंभू लिंग मणिकर्णिका के परिक्षेत्र में पड़ता है और पिता महेश्वर मंदिर के गली में ठीक पहले इनका (लिंग) स्थान शीतला माता के मंदिर परिसर में है ।

यह भी काशी विश्वनाथ के आह्वान (बुलाने ) पर यह काशी आये ।

Shital_mata_mandir

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यह तीनों लिंग काशी के मणिकर्णिका क्षेत्र में है और क्रूर निर्दयी मुग़लो के आतंक से बचे हुवे है। काशी में ज्यादातर शिव लिंग और प्राचीन मंदिर मुग़लो द्वारा तोड़ दी गयी थी जिसमे ज्यादातर लिंगो और मंदिरों की पुनःस्थापना हुई है ।

बद्रीनाथ जी (काशी खण्डोक्त)

काशी खण्डोक्त चारधाम यात्रा (पौष शुक्ल पूर्णिमा दर्शन)

काशी में बद्रीनारायण घाट पर ही बद्रीनारायण का मंदिर है , घाट के समक्ष गंगा में नर-नारायण तीर्थ की स्थिति मानी गई है। स्कन्दपुराण में ऐसी मान्यता है कि नर.नारायण तीर्थ में स्नान के पश्चात बद्रीनारायण के दर्शन-पूजन से उत्तराखंड स्थित बद्रीनाथ जी के दर्शन के समान पुण्य प्राप्त होता है।

बद्रीनारायण मंदिर के अतिरिक्त घाट पर नागेश्वर शिव मंदिर भी स्थापित है। पौष माह में घाट पर स्नान करने का विशेष महात्म्य है और पौष मास की पूर्णिमा में यहां दर्शन का विधान प्राचीन समय से ही चला आरहा है (यह यात्रा काशीखण्डोक्त यात्रा है) ।

काशी में चार धाम भी है , जहां दर्शन करने से उस धाम का पूर्ण फल प्राप्त होता है ।

बद्रीनारायण -- 1/72 बद्रीनारायण घाट

जगन्नाथ -- रामघाट b1/151

सेतुबंधरामेश्वरम -- मान मन्दिर घाट d 16/2

द्वारकानाथ -- संकुल धारा b 22/ 195

श्री गौरी केदारेश्वर (काशी खण्डोक्त)

काशी के केदारखण्ड के प्रधान लिंग

मकर संक्रांति प्राकट्य दिवस

गौरी केदारेश्वर महात्म्य :

पार्वती जी के केदारेश्वर लिंग की महात्म्य की कथा पूछने पर शिव जी कहते है कि ---

जो कोई भी पुरुष दृढ़ चित्त होकर केदारेश्वर की यात्रा करने की इक्षा करता है , उसके जन्म भर के पाप उसी क्षण में नष्ट हो जाते है ।

और जो कोई जो कोई काशी के केदार की यात्रा के लिए घर से निकल पड़ता है , उसके दो जन्म के अर्जित पाप भी शरीर से निकल जाते है ।

एवं जो कोई आधा मार्ग साध लेता है , उसके तीन जन्म के पाप देहरुप से बाहर निकल कर भाग जाते है , यदि कोई घर भी रहकर संध्या समय तीन बार केदार का नाम लेता है तोह उसे केदार की यात्रा का फल निश्चय ही मिलता है ।

केदारनाथ के शिवालय का शिखर देख और वहां जल पीकर सभी जो अपने सात जन्मों के पाप से छूट जाते है और हरपाप कुंड (गौरी कुंड, केदारघाट वाराणसी में स्थित) में स्नान और केदारेश्वर के पूजन करले तोह करोड़ो जन्म के पाप खत्म होजाते है और अंत मे मुक्ति प्राप्त होती है ।

हरपाप कुंड (गौरी कुंड) पर श्राध्द करने से सात पितरो का उद्धार हो शिव लोक में निवास पाता है ।

प्राचीन_कथा जिसको शिव जी ने माता पार्वती की सुनाया था :-

एक ब्राह्मण का लड़का पिता के यज्ञोपवीत कर देने पर ब्रह्मचर्य का व्रत धारण कर उज्जैनी से काशी में आया , वह काशी आकर बहुत प्रसन्न हुआ और अपने आचार्य से उसने परमोत्तम पाशुपत व्रत को ग्रहण किया ।

उस शिष्य का नाम वशिष्ठ था । देखते ही देखते वह समस्त शिव भक्तों में प्रधान होगया और नियमानुसार हरपाप कुंड में स्नान करता था साथ ही नित्य ही भस्म से स्नान कर शिव लिंग और गुरु की पूजा करता था।

एक बार जब वह 12 वर्ष का था तोह अपने गुरु के साथ केदारेश्वर की यात्रा के लिए हिमालय पर्वत पर गया । जहां जाने से आमजन मानस को कुछ भी पश्चाताप नही करना पड़ता था । हिमालय पर पहुँच कर वशिष्ठ के आचार्य तपस्वी हिरण्यगर्भ की मृत्यु होगयी फिर कुछ ही देर में सभी के देखते देखते ही शिव जी के पार्षद लोग उनको दिव्य विमान पर चढ़ा कर कैलाश पर ले गए (क्योंकि , केदारेश्वर के उद्देश्य से जो कोई भी यात्रा करता है , वह यदि आधे मार्ग में आकर यदि मर जाये तोह बहुत दिन तक कैलाश में वास करता है)

इस घटना को देखकर वह तपस्वी वशिष्ठ निश्चित रूप से केदार को ही लिंगो में सबसे बड़ा समझने लगा । इसके पश्चात वह केदारेश्वर की यात्रा करके फिर काशी में लौट आया और इसी नियम को धारण करके रिती रिवाज से उसका पालन करने लगा और प्रतिवर्ष चैत्र की पूर्णिमा को जब तक में जीता रहूंगा काशी में रहने पर भी केदारेश्वर का दर्शन किया करूंगा ।

इसी प्रकार वशिष्ठ की केदारनाथ की एकसठ 61 यात्रा बड़े हर्ष से हुई , बालो के सफेद होजाने और शरीर के वृद्ध होजाने के कारण दूसरे तपस्वी भी उसे केदारनाथ की यात्रा के लिए मना करने लगे पर वशिष्ठ का उत्साह जरा भी कम नही हुआ उसने सोचा कि मार्ग में ही मैं मर जाऊंगा तोह मेरी भी गति मेरे गुरु के तरह हो जावेगी ।

इस प्रकार से सोच रखने वाले महान तपस्वी से मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और उसके स्वप्न में उस वशिष्ठ से वर मांगने को बोला पर वशिष्ठ ने यह बोल बोल दिया कि स्वप्न तोह झूठा होता है ।

फिर मैंने बोला कि अपवित्र लोगो का स्वप्न झूठा होता है पर तुम्हारे जैसे जितेंद्रिय का स्वप्न सर्वाथा सच्चा होता है । उसी क्षण वशिष्ठ ने आपने साथ के तपस्वियों पर आशीर्वाद देने को कहा , उस परोपकारी वशिष्ठ की इस बात को सुन कर तथास्तु बोल कर उसके पुण्य को दुगना बढा दिया और उसी पुण्य के बल पर उससे फिर वरदान मांगने को कहा , फिर वशिष्ठ ने मुझे हिमालय से आकर काशी में वास करने के लिए वर मांगा , तत्काल ही मैंने हिमालय के केदारेश्वर लिंग के 16 कलाओं से मात्र 1 कला वहां छोड़ कर 15 कलाओं से काशी में गौरी केदारेश्वर के नाम से हरपाप कुंड के पास वास करने लगा ।

वशिष्ठ के साथ के सभी तपस्वी भी हरपाप कुंड में स्नान करके सिद्धि को प्राप्त हो गए , तभी से मैं अविमुक्त क्षेत्र में विशेष करके कलियुग के समय इसी लिंग में साधक लोग के सिद्धि के लिए सदैव वास् करने लगा ।

हिमालय में केदारेश्वर के दर्शन से सात गुना फल काशी में केदारेश्वर के दर्शन से मिलता है ।

जैसे हिमाचल में गौरी कुंड है वैसे ही काशी में हरपाप कुंड , हंस तीर्थ और मधुश्रवा भी काशी में है ।

यह हरपाप तोह पहले सात जन्मों के ही पाप हरता था पर गंगा के आ जाने से करोड़ो जन्मों का पाप हरने लगा ।

यहां पर पूर्वकाल में दो कौवे लड़ते हुवे आकाश से गिर पड़े थे तोह देखते ही देखते वह हंस बन गए तभी से तोह यह तीर्थ हंस तीर्थ हुआ इसी तीर्थ में गौरी के स्नान करने से यह गौरी कुंड कहलाने लगा ।

केदारघाट की गंगा मधुश्रवा कहलाती है क्योंकि वह यहां महाअन्धकार को हरती है और अनेक जन्मों के पापों को हरती है ।

हरपाप के पास यहां पर मानस नामक सरोवर ने पूर्वकाल में बड़ी कठोर तपस्या की थी इसीलिए यह मानस तीर्थ कहलाने लगा ।

नोट - हरपाप कुंड और मानस तीर्थ अब समय के हिसाब से लुप्त होगये है और गौरी कुंड में भी प्रायः जल नही रहता , अब

गंगा स्नान कर के केदारेश्वर के दर्शन का विधान हो गया है ।

केदार तीर्थ में स्नान कर यदि कोई भी पिंडदान करेगा तोह उसके 100 पित्र मुक्त होजाएंगे ।

यदि भौमवती अमावश्या के दिन कोई श्राद्ध करें तोह गया श्राध्द करने की कोई जरूरत नही पड़ेगी ।

यदि कोई केदारेश्वर की दर्शन यात्रा करना चाहता है तोह उसको बुद्धि जरूर देनी चाहिए कि केदारेश्वर के स्पर्श से तुम कृतकृत्य हो जावोगे ।

यदि कोई चैत्र मास की कृष्ण चतुर्दशी को व्रत रहकर प्रातः काक तीन घुट जल वही पर पी लेवे तोह उसके हृदय में केदारेश्वर लिंग का वास होजाता है ।

जो कोई धन , वस्त्र और अन्न इत्यादि के द्वारा केदारेश्वर के भक्त की भी पूजा करता है तोह वह अपने जन्म भर के पापों से छूटकर मेरे स्थान को प्राप्त होता है ।

छह महीने तक जो कोई प्रतिदिन त्रिकाल केदारनाथ को प्रणाम करता है , उसे यमराज सदैव नमस्कार करते है ।

कलयुग में केदारनाथ जी महिमा जो समझ गया वह सर्वज्ञ है ।

जो कोई एक बार भी केदारेश्वर के दर्शन करता है वह मेरा अनुचर बन जाता है ।

और जो केदारेश्वर की कथा को सुनता है वह निष्पाप होकर शिवलोक में निवास प्राप्त करता है ।

यह कथा स्कन्दपुराण के काशी खण्ड के अध्याय 77 से ली गयी है ।

पता- काशी में केदार घाट पर गौरी केदारेश्वर नाम से प्रसिद्ध मंदिर ।

कामेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

(शनि प्रदोष यात्रा )

एक समय महातपस्वी दुर्वासा ऋषि जब शिव लिंग स्थापना के उद्देश्य से काशी आये और यहां की सुंदरता देख कहने लगे कि यह काशी पूरी तोह पशु पक्षियों के भी आनंद को बढ़ाने वाली है और यह विश्वनाथपूरी मेरे चित्त को जिस प्रकार आकृष्ट कर रही है वैसा आकर्षण न पूरे भूमण्डल , आकाश , पाताल और ना ही स्वर्ग में है । इस प्रकार काशी के प्रशंसा कर के दुर्वासा ऋषि शिव लिंग स्थापना और शिव पूजा के लिए कुंड तैयार करके शांत चित्त से विशेष कठोर तपस्या में लीन होगये , परन्तु जब तपस्या का कोई फल नही दिखा तोह वह क्रोधित होकर कहने लगे कि मुझे और मेरे कठोर तप को धिक्कार और सभी को अपने माया जाल से ठगने वाली काशी को धिक्कार है ।

ऐसा कहते हुवे दुर्वासा ऋषि काशी में किसी को भी मुक्ति न मिले ऐसा श्राप देने को उठ खड़े हुवे तभी एक प्रहसीतेश्वर नामक शिवलिंग दुर्वासा ऋषि के श्राप से काशी को बचाने के लिए प्रकट हुआ और शिव जी ने दुर्वासा ऋषि के तप से प्रसन्न हो कर वर मांगने को कहा - - इतना सुन कर श्राप देने को तैयार मुद्रा में खड़े दुर्वासा ऋषि लज्जित हो गए और कहा कि जो भी व्यक्ति काशी के नाम को जपता है वही बड़ा तपस्वी है और सभी यज्ञों का फल उसी को मिलता है और गर्भवास से भी मुक्ति मिलती है ।

ऐसा कह कर शिव की स्तुति के बाद दुर्वासा ऋषि ने शिव जी से कहा कि यहां प्रकट हुआ शिव लिंग कामद नाम से और जो मेरे द्वारा बनाया हुआ कुंड काम कुंड नाम से जाना चाहिए ।

शिव जी ने तथास्तु बोल कर दुर्वासा ऋषि द्वारा स्थापित लिंग कामेश्वर की संज्ञा दी कर और सभी कामनाओं के पूर्ति करने का वरदान दिया

जो भी व्यक्ति शनि प्रदोष के दिन काम कुंडमें स्नान कर कामेश्वर महादेव के दर्शन करेगा उसकी हर मनोकामना पूर्ण होगी और कभी काम जनित दोष से यम यातना नही प्राप्त करेगा और सभी पाप से वंचित होजायेगा ऐसा कह कर उसी लिंग में समाहित होगये ।

पता -मछोदरी मार्ग पर प्रसिद्ध मंदिर

पवनेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

(वायु देव द्वारा स्थापित)

पुरा कश्यपदायादः पुतात्मेति च विश्रुतः। धुर्जटे राजधान्यां स चचार विपुलं तपः।।

वाराणस्यां माहाभागो वर्षाणांयुतं शतं । स्थापयित्वा महालिङ्गं पावनं पवनेश्वरम् ।।

यस्य दर्शनमात्रेन पूतात्मा जायते नरः । पापकञ्चुकमूत्सृज्य स वसेत् पावने पुरे ।। (काशीखण्ड)

पूर्वकाल में कश्यप ऋषि के पुत्र जो कि पूतात्मा नाम से प्रसिद्द थे , उन महाभाग ने शिव की राजधानी वाराणसी पूरी में अत्यंत पावन लिंग स्थापित कर के दस लाख वर्ष कर कठिन तपस्या किया जिससे उस पवन लिंग का नाम पवनेश्वर हुआ ।

इस शिव लिंग के केवल दर्शन से ही मनुष्य पूतात्मा हो जाता है और अंत मे पाप कुंचक को छोड़कर पवनपुर में निवास करता है ।

पूतात्मा (पवनदेव) के कठिन तप से प्रसन्न होकर शिव जी उन्ही के द्वारा स्थापित लिंग से ज्योति रूप में प्रकट होकर पवन को (वायु देव) को बिना कुछ मांगे ही अनेको वरदान दिए जिसमे उन्होंने

अपनी अष्ट मूर्ति के अंतर्गत वायव्यकोण का दिगपाल का पद दिया(पुराणानुसार दसों दिशाओं के पालन करने वाले देवताओं में से एक) । और साथ ही सर्वत्र गामी , सर्वत्र तत्वों के ज्ञाता एवं सब किसी के आयुष्यरूप होने का वरदान दिया।

और कहा कि

तव लिङ्गमिदं दिव्यं ये द्रक्ष्यन्तिह मानवाः।सर्व भोगसमृधास्ते त्वल्लोक सुखभागिनः॥(काशीखण्ड)

जो लोग तुम्हारे द्वारा स्थापित इस दिव्य लिंग का दर्शन करेंगे , वे सब यहां समस्त भोगों से परिपूर्ण होकर अंत मे तुम्हारे लोक के सुखभागी होंगे ।

और साथ ही जो मनुष्य , जन्मभर में एक बार भी पवनेश्वर लिंग का सुगंधित जल से स्नान एवं सुगंधित चंदन पुष्पादि के द्वारा यथोक्त विधि से पूजन कर लेता है , वह मेरे लोक में ससम्मान सहित निवास करता है । ज्येष्ठेश्वर के पश्चिम भाग में और वायुकुण्ड के उत्तर दिशा में पवनेश्वर लिंग की आराधना करने से तत्काल ही पवित्र होजाता है । इतना कह कर शिव जी इसी पवनेश्वर लिंग में समाहित होगये ।

पहले यहां पवन देव (वायुदेव) द्वारा बनाया गया वायु कुंड भी था जो अब लुप्त हो चुका है । यह लिंग अत्यंत ही प्राचीन और जमीन के 20 " फ़ीट नीचे है ।

वायव्य दिशा : उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा का स्थान है। इस दिशा के देव वायुदेव हैं और इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है।

पता - भूत भैरव गली , करनघन्टा , वाराणासी ।

कुबेरेश्वर महादेव या धनदेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

(पौष मास की यात्रा)

प्राचीन समय की बात है जब ब्रह्मा के मानस पुत्र विश्रवा उत्पन्न हुवे और विश्रवा के पुत्र वैश्रवण (कुबेर)हुवे जिनका निवास स्थान अलकापुरी था ।

पिछले जन्म के फल के कारण कुबेर का मन काशी में शिव लिंग की स्थापना कर कठिन तप करने का हुआ ।

उन्होंने 10 लाख वर्षो तक कठिन तप किया ऐसा तप अब तक सिर्फ शिव द्वारा ही किया गया था ।

तप से प्रसन्न होकर शिव जी ने कुबेर को अपना मित्र मन साथ ही सभी निधियो का स्वामी , धन के देवता और गुह्यको(अर्ध देवता , धन दौलत के रक्षक) का अधीश्वर(मालिक) , धन के दाता , राजाओं के राजा और पुण्यजनों के अधिपति होने का वरदान दिया । जिससे इनका नाम धनद पड़ा ।

वही जब माता पार्वती पर कुबेर की बायीं नजर पड़ी तोह माता का सौभाग्य देख कर अचंभित हो गए , जिससे उनकी बायीं आँख फुट गयी और माता ने उनको एकलिंग नाम से प्रसिद्ध होने का वरदान दिया और कुबेर नाम की उपाधि भी दी और कहा कि :-

त्वयेदं स्थापितं लिङ्गं तव नाम्ना भविष्यति । सिद्धिदं साधकानां च सर्व पापहरं परम् ।।

न धनेन वियुज्येत न सख्या न च बान्धवैः । कुबेरेश्वरलिङ्गस्य कुर्याद्यो दर्शनं नरः ।।

विश्वेशाद्दक्षीणे भागे कुबेरेशं समर्चयेत । नरो लिप्येत नो पापैर्न दरिद्र्येन नोःसुखैः ।। (काशीखण्ड)

तुम्हारा स्थापित यह लिंग शिव साधको के लिए परम सिद्धिप्रद और पापहर एवं तुम्हारे नाम से विदित होगा ।

जो कोई मनुष्य कुबरेश्वर लिंग का दर्शन करेगा , उसे धन की कमी कभी नही होगी , न मित्र से वियोग होगा न ही स्वजनों से दूरी होगी ।

जो मनुष्य विश्व्नाथ के दक्षिण भाग में ( वर्तमान में अन्नपूर्णा मन्दिर परिषर में ) स्थित इस कुबरेश्वर लिंग का दर्शन पूजन करेगा वह कभी पाप , दरिद्रता और दुख से परेशान नही होगा।

प्राचीन काल मे यहां धनद कुंड भी था जो अब लुप्त हो चुका है , धनद कुंड में स्नान और उस कुंड के जल से धनदेश्वर महादेव का जलाभिषेक करने से बड़ा लाभ मिलता था ।

काशीखण्ड पुराण के अनुसार इस यात्रा को गुह्यक (जो की कुबेर के अनुचर है , अर्ध देवयोनि में आते है और गुह्यक कुबेर के अथाह संपत्ति के रक्षक होते है) करते है और धनवान होकर कुबेर के धन की रक्षा करते है ।

यह कुबरेश्वर महादेव का लिंग अन्नपूर्णा मन्दिर परिषर में है , और एक दूसरा कुबरेश्वर का बड़ा लिंग जो विश्वनाथ मंदिर के पास जमीन में था उसको विश्वनाथ कॉरिडोर के तहत तोड़ दिया गया है ।

वृषेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

आगादिह महादेवो वृषेशो वृषभध्वजात् । बाणेश्वरस्य लिङ्गष्य समीपे वृषदः सदा ।। (काशीखण्ड)

धर्मप्रद लिंग वृषेश्वर , जो कि वृषभध्वज तीर्थ से यहाँ आकर बाणेश्वर महादेव के समीप में सदैव शोभायान रहते है ।

काशी में वृषेश्वर लिंग का स्थापना महादेव के परम भक्त नंदी द्वारा किया गया है।

काशीखण्ड पुराण के हिसाब से वृषेश्वर लिंग वृषभध्वज तीर्थ से काशी में नन्दी जी के आग्रह पर आये थे । वृषेश्वर के दर्शन पूजन से वृषभध्वजेश्वर महादेव के दर्शन का फल मिलता है।

(वृषभध्वजेश्वर लिंग काशी से कुछ दूर सलारपुर - कपिलधारा पर स्थित है)

काशी में वृषेश्वर लिंग का प्रादुर्भाव नंदी के द्वारा हुआ है ।

वृषेश्वर लिंग चतुर्दश लिंगो में से एक है जिसकी दर्शन यात्रा करने से मुक्ति अवश्य ही मिलती है ।

आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी तिथि को इनकी यात्रा का प्रावधान है।

वृषेश्वर लिंग का स्थान उत्तर दिग्देव यात्रा के 201 शिव लिंगो में भी है , इस यात्रा को करने से समस्त जन्मों के पाप कट कर मोक्ष मिल जाता है ।

प्राचीन समय मे यहां वृषेश नामक कूप(कुँवा) भी था जिसका पता अब नही लगता पर मंदिर प्रांगण में एक कूप है जिसको वृषेश कूप से जोड़ कर देखा जा सकता है । यहां श्राद्ध तर्पण करने का भी बहुत फल मिलता है ।

पता- k 58/78 गुरु गोरखनाथ का टीला , मैदागिन , वाराणसी।

इस मंदिर से थोड़ा पहले बाणेश्वर महादेव का भी मन्दिर है।

अत्युग्रह नरसिंह (काशी खण्डोक्त)

अतिउग्र नरसिंह यह नरसिंह भगवान का रूप काशी में बहुत ही उग्र रूप से निवास करते है । काशी और काशीवासियो की सदैव रक्षा करते रहते है ।

इस तीर्थ के बारे में भगवान माधव विष्णु ने अग्निबिन्दु ऋषि से कहा था कि :--

अतिउग्र नरसिंहोःहं कल्शेश्वर पश्चिमे। अत्युग्रमपि पापोघं हरामि श्रध्यार्चितः।।(काशीखण्ड)

कल्शेश्वर शिव लिङ्ग के पश्चिम भाग में मैं अत्युग्रह नरसिंह के नाम से राहत हूं । श्रद्धा से उनका पूजन करने पर बड़ी उग्र पापराशि (जो अक्षय कर्मो के बाद भी इंसान को दुख देती है और पीछा नही छोड़ती) को भी दूर कर देता हूं ।

पता -ck 8/21 गौमठ (संकठा जी मन्दिर मार्ग के पास) , चौक , वाराणसी

Kirateshwer mahadev किरातेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

किरातेश्वर महादेव अर्जुन द्वारा स्थापित सिक्किम

काशी में किरातेश्वर स्वयम्भूलिंग है जो कि शिव जी के आह्वाहन पर , सिक्किम की धरती (किरात देश) से काशी में आये है , यहां ऐसी मान्यता है कि जो भी यहां दर्शन करेगा उसको सिक्किम में महाभारत काल मे अर्जुन द्वारा स्थापित किरातेश्वर लिंग के दर्शन का फल मिलेगा ।

सिक्किम_में_किरातेश्वर लिंग महान धनुर्धारी कुंती पुत्र अर्जुन द्वारा स्थापित है । इंद्र और श्री कृष्ण कहने पर यहां अर्जुन ने पाशुपतास्त्र पाने के इक्षा से एक शिव लिंग की स्थापना की और कठोर तप किया जिसके फल स्वरूप शिव जी प्रसन्न होकर किरात के भेष में प्रकट हुवे और अर्जुन ने शिव की स्तुति कर उनको प्रसन्न किया और पाशुपताश्त्र प्राप्त किया ।

वही लिंग जो अर्जुन द्वारा स्थापित किया गया था उसको किरातेश्वर महादेव नाम से जाना गया ।

पता-काशी में इनका स्थान ck52/15 , राजा दरवाज़ा , चौक नारायण एग्रीकल्चरल इंडस्ट्रीज में है ।

ढूंढी विनायक (काशी खण्डोक्त)

प्रथम पूज्य श्री ढूंढी राज़ गणेश

जब काशी में शिव जी द्वारा सभी गणों , देवी , देव , सूर्य , योगिनी , नक्षत्र , भैरव , गौरी को भेजा जा रहा था और सभी राजा दिवोदास के राज्य में खामी नही निकाल पाये और यही रुक गए , उसी क्रम में शिव जी ने अपने पुत्र गणेश को भेजा जो इस कार्य मे सफल होगये और वृद्ध ब्राह्मण बन कर ज्योतिष विद्या के माया प्रपंच से राजा दिवोदास की मति को भ्रमित करदिया और समस्त काशी को अपने वश में कर लिया।

गणेश जी के वश में हो जाने के बाद विष्णु जी ने राजा को काशी से उच्चाटीत (मुक्त) कर के विश्वकर्मा के द्वारा नई काशी का निर्माण करवाया और शिव जी को मंदरांचल से काशी आने का निमंत्रण दिया ।

ढुंढिराज की महिमा

शिव जी ने काशी आकर सर्वप्रथम कहा कि-

यदहं प्राप्तवन्स्मि पुरीं वाराणसी शुभाम् | मयाप्य्ति वदुस्प्राप्यं स् प्रसादोष्य वै शिशोः ||

मुझे अपने लिए परम दुर्लभ बनी इस शुभा वाराणसी पुरी में जो मैं आ सका हूं यह सब इसी बालक(ढुंढिराज) का प्रसाद है

यदुस्प्रसाध्यं हि पितुरपि त्रिजगति तले | तत्सुनुना सुसाध्यं स्यादत्र दृष्तान्तता मयि ||

त्रलोक्य मण्डल में जो पिता का भी दुसाध्य है( पिता जिस कार्य को पूरा नहीं कर सकता) पुत्र से वही शुसाध्य हो जाता है इसका उदाहरण मैं स्वयं ही हूं ।

अन्वेषणे ढुढिरयं प्रथितोस्ति धातुः सर्वार्थः ढुढिततया तव ढुढिनाम | काशी प्रवेशमपि को लभतेत्र देहि तोषं विना तव विनायक ढुढिराज ||

ढूंढी नाम तोह ढूंढने के ही अर्थ में प्रसिद्ध है और समस्त अर्थों (वस्तुओं) को ढूंढने ही के कारण तुम्हारा नाम ढूंढी हुआ है । इस लोक में तुम्हारे संतोष(आज्ञा) के बिना काशी में कोई प्रवेश नही पा सकता ।

ढूंढे प्रणम्य पुरतस्त्व पाद पद्मं यो मां नमस्यति पुमा निह काशी वाशी । तत्तकर्णमूल मधिग्म्य पुरा दिशामि तत् किञ्चिदत्र न पुनःगर्भःवतास्ति येन॥

हे ढुंढिराज जो काशीवासी प्रथम ही तुम्हारे चरणारविन्द में प्रणाम कर फिर मुझे नमस्कार करता है मैं उसके कान के पास पहुँचकर अंत समय मे कुछ ऐसा उपदेश देता हूं जिससे उसको दुबारा इस संसार मे जन्म नही लेना पड़ता

प्रथमं ढुढि रजोसि मं दक्षिणो मनाक आढुंढय सर्वभक्तेभयः सर्वाथार्न संप्रयच्सि । अङ्गारवासरवतिःमिह यैचतुर्थी संप्राप्य मोदक भरै प्रमोद वदभि॥

पूजा व्यधायि विविधा तव गन्ध माल्यै स्तानत्र पुत्र विदधामी गणान गणेशा॥

प्रथम तो मेरे दक्षिण ओर् समीप ही मे तुम ढुंढिराज रूप से विराजमान हो , जो समस्त भक्तों को ढूंढ ढूंढ कर उनके सब कार्यो (अभिलाषा) को पूर्ण कर देते हो ।

हे सुपुत्र गणेश जो लोग मंगलवार की चतुर्थी को सुगंध युक्त लड्डुओं से तुम्हारी विधिवत पूजा करते है, उनको मैं अपना पार्षद बनाता हूँ ।

इति

यह कथा काशी खण्ड पुस्तक से ली गयी है ।

काशी विश्वनाथ जाने वाले गेट नंबर 1 पर ही इनका मंदिर है (अन्नपूर्णा मंदिर के पहले)

हो सकता है कि विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण के तहत इनको इनके स्थान से हटा दिया जाए ।

काशी के जनता का आस्था इनसे विशेष रूप से जुड़ा हुआ है इसीलिए किसी अन्यायपूर्ण कार्य करने से पहले मंदिर परिषद को सोच समझ के कार्य करना चाहिए

बृहस्पतिश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

बृहस्पतिवार काशी यात्रा

महाभारत के आदि पर्व के अनुसार देवताओं के गुरु वह पुरोहित बृहस्पति है , जो अंगिरा ऋषि के पुत्र है , इनकी माता का नाम सुरुपा है।

अंगिरा ऋषि के सुरुपा देवी से तीन पुत्र हुवे जिसमें सबसे ज्ञानी पुत्र बृहस्पति दूसरे उतथ्य और तीसरे अथर्व ऋषि हुवे। अथर्व ऋषि ने ही शिव जी की कृपा से अथर्ववेद की रचना की थी ।

बृहस्पति एक तपस्वी ऋषि थे। इन्हें 'तीक्ष्णशृंग' भी कहा गया है। धनुष बाण और सोने का परशु इनके हथियार थे और ताम्र रंग के घोड़े इनके रथ में जोते जाते थे। बृहस्पति को अत्यंत पराक्रमी बताया जाता है। इन्द्र को पराजित कर इन्होंने उनसे गायों को छुड़ाया था। युद्ध में अजय होने के कारण योद्धा लोग इनकी प्रार्थना करते थे। ये अत्यंत परोपकारी थे जो शुद्धाचारणवाले व्यक्ति को संकटों से छुड़ाते थे। इन्हें गृहपुरोहित भी कहा गया है, इनके बिना यज्ञयाग सफल नहीं होते।

देव गुरु बृहस्पति जो सभ्य , सूंदर , अति ज्ञानी और नेतृत्व करने के क्षमता से परिपूर्ण है , जब यह शिव लिंग की स्थापन करने के उद्देश्य से काशी आये तोह अपने द्वारा स्थापित शिव लिंग के सामने कठोर तपस्या में लीन होगये जिसमे उनकी तपस्या लगातार कई सहस्त्र वर्षो तक चली ।

फलस्वरूप जब बृहस्पति ने शिव जी को अपने सामने पाया तोह वह तरह तरह से शिव जी की स्तुति की जिसमे शिव जी स्तुति से प्रसन्न होकर उनको वाचस्पति होने का आशीर्वाद दिया और इसी नाम से संबोधन किया जिसका मतलब वाक(बोलने)में निपुडता होती है ।

साथ ही शिव जी ने उन्हें वरदान स्वरूप देवो के गुरु होने का आशीर्वाद दिया साथ ही ग्रहत्व का भार भी प्रदान किया जिसमें आगे चल कर बृहस्पति को ग्रह के रूप में पूजा जाने लगा ।

जो लोग यहां बृहस्पति लिंग की पूजा करते है उनको दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है और वह अध्यापक होने के लक्षणों से परिपूर्ण होने लगते है ।

इस जगत में जितने में अध्यापक है वह सभी बृहस्पति ग्रह के शुभ लक्षणों के कारण ही है ।

शिव जी के वरदान स्वरूप जो भी यहां लगातार 6 मास तक पूजा करेगा उसके जन्म जन्मांतर के पाप छूट जाएंगे और वह मोक्ष को प्राप्त करेगा ।

पता- चौक पर सिंधिया घाट , आत्मविरेश्वर मंदिर के सामने

बुद्धेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

बुधवार दर्शन दैनिक काशी यात्रा (बुध ग्रह द्वारा स्थापित वह पूजित लिंग)

जब काशी में सभी देव, नक्षत्र, गंधर्व , किन्नर , योगिनी , यक्ष सभी इस पुन्यात्मक धरती पर शिव लिंग स्थापन के उद्देश्य से काशी आरहे थे उसी में सभी ग्रह भी आये जिसमे ग्रहों में राजकुमार की श्रेणी में आने वाले बुद्ध ग्रह भी बुद्धेश्वर नामक शिव लिंग की स्थापना की ।

बुद्ध ग्रह बौद्धिक छमता का प्रतीक है और व्यापार का कारक ग्रह है , इनके ही कृपा से मनुष्य अपने बौद्धिक छमता का इस्तमाल कर पता है , क्योंकि यह चंद्र देव के पुत्र है इसीलिए सौम्य और शीघ्र प्रसन्न होते है । यह शिव लिंग सिन्धिया घाट पर मौजूद आत्म वीरेश्वर महादेव के परिशर में स्थित है ।

यहां नित्य दर्शन से कुंडली मे स्थित बुद्ध ग्रह शुभ फल देने लगते है, व्यापार और रोजगार में वृद्धि होती है ।

पता-सिंधिया घाट पर आत्मविरेश्वर मंदिर

मंगलेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

अंगारक संकटहरा चतुर्थी दर्शन(श्रावण मास कृष्ण पक्ष चतुर्थी)

मंगला गौरी (गौरी दर्शन)पंचगंगा घाट पर।

मंगल विनायक (गणेश दर्शन) पंचगंगा घाट पर।

मंगलेश्वर महादेव (अंगारक लिंग दर्शन) सिंधिया घाट पर।

(अंगारक मंगलवार या मंगल ग्रह का दूसरा नाम है)

मंगलवार को पड़ने वाली चतुर्थी जिसको अंगारक संकटहरा चतुर्थी बोलते है। आज के दिन चतुर्थी पड़ने के कारण गौरी और गणेश पूजा का रिवाज काशी में प्राचीन समय से ही चला आरहा है।चतुर्थी तिथि अगर मंगलवार को पड़ती है तोह काशी में मंगलेश्वर (अंगारेश्वर)महादेव के भी दर्शन का विधान है और यह काशी खण्डोक्त यात्रा है ।

आज के दिन व्रत और गणेश पूजा से संतान की रक्षा होती है। गौरी पूजा से शीघ्र विवाह और मनचाहा वर प्राप्त होता है और मंगलेश्वर लिंग के दर्शन से कुंडली से समस्त क्रूर ग्रहों की शांति हो जाती है और मंगल ग्रह अच्छा फल देने लगते है।यह योग साल में बहुत कम पड़ता है इसीलिए आज के दिन पूरे भारत वर्ष में गौरी , गणेश पूजा और काशी में गौरी गणेश के साथ साथ मंगलेश्वर लिंग की भी पूजा होती है ।

सावन मास में मंगलवार के दिन मंगलेश्वर लिंग पर जलाभिषेक करने से अभिलाषित मनोकामना की पूर्ति होती है और भाग्य की वृद्धि होती है ।

पता-मंगलेश्वर महादेव सिंधिया घाट पर आत्मविरेश्वर मंदिर प्रांगण में मंगल ग्रह द्वारा स्थापित है ।

सारंग नाथ महादेव (काशी खण्डोक्त)

श्रावण मास नित्य दर्शन

सावन में यदि एक बार सारंगनाथ के दर्शन हो जाएं तो काशी विश्वनाथ के दर्शन के बराबर पुण्य का भागी होता है। मनुष्य इस मंदिर में एक साथ मौजूद है दो शिवलिंग एक छोटा तो एक बड़ा

जब दक्ष प्रजापति अपनी पुत्री सती का विवाह किये तो उस समय उनके भाई सारंग ऋषि उपस्थित नहीं थे। वो तपस्या के लिए कहीं गये हुए थे। तपस्या के बाद जब सारंग ऋषि वहां पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनके पिता ने उनकी बहन का विवाह कैलाश पर रहने वाले एक औघड़ से कर दिया है।

बहन की शादी एक औघड़ से होने की बात सुनकर सारंग ऋषि बहुत परेशान हुए। वो सोचने लगे की मेरी बहन का विवाह एक भस्म पोतने वाले से हो गयी है। उन्होंने पता किया कि विलुप्त नगरी काशी में उनकी बहन सती और उनके पति विचरण कर रहे हैं। जिसपर वो बहत ज्यादा धन लेकर अपनी बहन से मिलने पहुंचे। रस्ते में जहां आज मंदिर है वहीं थकान की वजह से उन्हें नींद आ गयी। उन्होंने नींद में आये स्वप्न में देखा की उन्होंने काशी नगरी को स्वरण नगरी के रूप में देखा। जिसपर उन्हें बहुत ग्लानी हुई की उन्होंने क्या या सोचा था और क्या निकला। जिसके बाद उन्होंने प्रण लिया की अब यहीं वो बाबा विश्वनाथ की तपस्या करेंगे उसके बाद ही वो अपनी बहन सती से मिलेंगे।

इसी स्थान पर उन्होंने बाबा विश्वनाथ की तपस्या की। तपस्या करते-करते उनके पूरे शरीर से लावे की तरह गोंद निकलने लगी। जिसके बाद उन्होंने तपस्या जारी रखी अंत में उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भोले शंकर ने सती के साथ उन्हें दर्शन दिए। बाबा विश्वनाथ से जब सारंग ऋषि से इस जगह से चलने को कहा तो उन्होंने कहा कि अब हम यहां से नहीं जाना चाहते यह जगह संसार में सबसे अच्छी जगह हैं जिसपर भगवान शंकर ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि भविष्य काल में तुम सारंगनाथ के नाम से जाने जाओगे और कलयुग में तुम्हे गोंद चढ़ाने का रिवाज रहेगा और जो चर्म रोगी सच्चे मन से तुम्हे गोंद चढ़ाएगा तो उसे चरम रोग से मुक्ति मिल जाएगी।

सारंग ऋषि का नाम उसी दिन से सारंगनाथ पड़ा और अपने साले की भक्ति देख प्रसन्न हुए बाबा विश्वनाथ भी यहां सोमनाथ के रूप में विराजमान हुए। इस मंदिर में जीजा साले की पूजा एक साथ होती है । इसलिए इस मंदिर को जीजा साले का भी मंदिर कहा जाता है। कहा जाता है कि सावन में बाबा विश्वनाथ यहां निवास करते हैं और जो भी व्यक्ति सावन में काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन नहीं कर पाता वह एक दिन भी यदि सारंगनाथ का दर्शन करेगा उसे काशी विश्वनाथ मंदिर में जलाभिषेक के बराबर पुण्य मिलेगा।

इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मंदिर को भगवान शिव की ससुराल भी कहतें हैं। दर्शन करने आते श्रद्धालुओं ने कहा कि भगवान् भोलेनाथ आपने साले सारंग ऋषि के साथ यहां विराजमान हैं। वो सारंगनाथ और बाबा सोमनाथ के रूप में यहां है। इन दोनों की साथ में पूजा होती है इसलिए ये बाबा की ससुराल है जहां वो अपने साले के साथ सदियों से हैं।

मंदिर के पास में ही सारंग तालाब भी है जिसको सारंग ऋषि में बनवाया था यहां अब स्नान कर के दर्शन की बहुत मान्यता है।

जो लोग स्नान नही कर सकते वो मार्जन( जल से हाथ , पैर , मुह धोना) कर के दर्शन कर ले तोह दर्शन का सम्पूर्ण फल मिलता है ।

वाराणसी में सारनाथ क्षेत्र का नाम सारंग नाथ महादेव के नाम पर ही पड़ा है ।

पता - सारनाथ में प्रसिद्ध मंदिर (सारंग नाथ)

व्यासेश्वर महादेव

बड़े व्यासेश्वर व्यास द्वारा स्थापित

गुरु पूर्णिमा दर्शन वार्षिक यात्रा

विष्णु जी के परम भक्त व्यास जी जब नैमिशारण्य से शिव जी की महिमा को जानने के लिए अपने दस हजार शिष्यों के साथ काशी आये और काशी विश्वनाथ लिंग के सामने विष्णु जी की प्रशंसा में लीन होगये जिसमे उन्होंने हाथ उठा कर यह कहा कि समस्त लोको के एकमात्र पूजनीय देव विष्णु ही है , यह सुन कर मुख्यद्वार पर स्थापित नंदी ने क्रोधित स्वर में उन्हें श्राप दिया कि सम्पूर्ण जगत के परमेश्वर का अवज्ञा करने वाले महर्षि व्यास का हाथ वही स्थिर हो जाये और वाणी मूक होजाये ।

इतने में सर्वज्ञानी विष्णु जी वहां प्रकट हुवे और और शिव जी को ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ बताया और उन्हें शिव जी का अनुशरण करने का आदेश दिया और क्षमा मांगने पर उनका हाथ और मुह पूर्वव्रत हुआ , और वह काशी में ही शिव लिंग स्थापना करके अपने दस हजार शिष्यों के साथ शिव पूजा में लग गए (काशी में उनके द्वारा स्थापित लिंग व्यासेश्वर नाम से जाना जाता है और करनघंटा पोखरा पर है)।

ऐसे ही नित्यकर्म चलता रहा पर एक दिन व्यास जी के शिष्यों को काशी में कही से भी भिक्षाटन में कुछ भी प्राप्त नही हुआ और बाकी के दिनों तक भी यही हाल था । व्यास जी बहुत चिंतित हुवे और क्रोधित होकर ऊँचे स्वर में समस्त काशी के लोगो को तीन पीढ़ी तक विद्या और मुक्ति से वंचित होजाने का श्राप दे दिया ।

जब माता अन्नपूर्णा और शिव जी को यह बात पता चली तोह वह अत्यंत क्रोधित हुवे पर ब्राह्मण को सम्मान के साथ ही सज़ा देने के हिसाब से माता अन्नपूर्णा उनके सामने एक गृहणी के रूप में प्रकट हुई और भोजन दान देने की बात कही इसमें व्यास जी ने यह बोल कर राज़ी हुवे की वह बिना अपने शिष्यों को भोजन कराएं भोजन ग्रहण नही करते ।

इसमें अन्नपूर्णा जी ने बोला कि मेरे भी पति का व्रत है कि बिना किसी को भोजन कराएं अन्नग्रहण नही करते , फिर माता उनको और उनके शिष्यों को विधिवत भोजन और वस्त्र भेट कर उनकी क्षुधा पूर्ति और सम्मान दिया ।

इसपर प्रसन्न व्यास जी ने जब गृहणी (माता अन्नपूर्णा) को आशीर्वाद दिया तब माता ने बोला कि ऋषिवर आप तोह सर्वज्ञ हैं कृपा यह बताइये की तीर्थ यात्रियों का धर्म क्या है ?

तोह महर्षि व्यास जी ने बोला कि तीर्थ यात्री को शांत चित्त और निर्मल हृदय का होना चाहिए और और संयमित होना उनका परम् धर्म है , इसी में माता ने कहा कि महर्षि आप बताइए क्या अपने इस धर्म का अनुसरण किया है ?

इतना सुन कर महर्षि निरुत्तर खड़े रहे तभी गृहणी के पति (शिव) ने बोला कि आप ने जो इस नगर वाशियो को श्राप दिया है क्या यह आपका धर्म है ? साथ ही अपने जो कृत्य किया है यह तीर्थयात्री का धर्म नही है और ऐसे लोगो को काशी में निवास का कोई स्थान नही है यह बोल कर शिव जी ने उनको काशी से कही अन्यत्र चले जाने को कहा।

पर अपने कृत्य पर प्रायश्चित करके व्यास जी ने सिर्फ अष्टमी तिथि को काशी में प्रवेश की अनुमति मांगी जिसको शिव जी ने सहजता से स्वीकार किया ।

फिर व्यास जी काशी छोड़ गंगा के उस पार पर अपना ठिकाना बनाया और शिव जी से प्रभावित होकर यहां पर भी एक शिव लिंग स्थापित किया जिसका नाम व्यासेश्वर ही हुआ यह भी लिंग बहुत पुराना है और काशी खण्डोक्त है ।

आज आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को यहां के भी दर्शन का बहुत महात्म्य है , ऐसा कहा जाता है कि व्यास जी यही निवास बनाये हुवे है और इसी शिव लिंग की पूजा करते है ।

यहां एक टीला भी है जिसमे से व्यास जी काशी को निहारते थे और काशी नाम का जाप किया करते थे ।

पता - व्यास नगर (व्यास काशी)रामनगर (साहूपुरी)

वेदव्यासेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

गुरु पूर्णिमा(आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि वार्षिक दर्शन)

पाराशर्यस्तदारभ्य शंभु भक्ति परोःभवत | लिङ्गं व्यासेश्वरः स्थाप्य घण्टा कर्ण हृदाग्रतः ||

विभूति भूषणो नित्यं नित्य रुद्राक्ष भूषणं | रुद्रसूक्तपरो नित्यम् लिङ्गार्चकोः भवत् ||

स् कृत्वा क्षेत्र संन्यासं त्यजेन्नाद्यापिकाशिकां | तत्वं क्षेत्रस्य विज्ञाय निर्वाण पददायिन || (शिव_पुराण)

वेदव्यास जी ने काशी में रहकर तपस्या किया । तब ही से पराशर पुत्र व्यास जी भगवान शंभू की भक्ति करने वाले हुए। वहां पर घंटाकर्ण सरोवर के पास व्यास ईश्वर शिवलिंग की स्थापना की । तब से सदा विभूति धारण और रुद्राक्ष माला धारण तथा रूद्र अभिषेक का और शिवलिंग का चिंतन करने में तत्पर हुए । वे क्षेत्र सन्यास लेकर आज भी काशी का परित्याग नहीं करते , क्योंकि काशी मुक्तिदायिका का भूमि है

घण्टाकर्णहृद स्नात्वादृष्ट्वा व्यासेश्वरनरः | यत्रकुत्र मृतो वापि वाराणस्यां मृतोस्भ्वत् ||

काश्यां व्यासेश्वरं लिङ्गम् पूजयित्वा नरोत्तमः | न ज्ञानाद भ्रश्यतेक्वापि पात कैर्नाभिभूयते ||

व्यासेश्वर रस्य्ये भक्तानतेषाम् कलि कालतः | न पापतो भयं क्वापि न च क्षेत्रोप् सर्गतः ||

व्यासेश्वरः प्रयत्नेन दृष्टव्यः काशी वासिभिः | (लिंग पुराण)

घण्टाकर्ण सरोवर में स्नान करके और वेदव्यासेश्वर लिंग के दर्शन करके जो व्यक्ति जहाँ कही भी मरता है उसकी मृत्यु वाराणसी में ही मानी जाती है । व्यक्ति काशी में वेद व्यासेश्वर शिवलिंग की अर्चना करके श्रेय ज्ञान से भ्रष्ट नही होता है न तोह कभी पापों से प्रताड़ित होता है । जो व्यासेश्वर के भक्त हैं कलिका, पाप तथा क्षेत्र जन्य उपसर्ग से भय नहीं होता । क्षेत्र के पापों से भयभीत तथा घंटाकर्ण सरोवर में स्नान करने वाले व्यक्तियों को व्यासेश्वर का दर्शन करना चाहिए ।

आषाढ़ शुक्ल गुरु पूर्णिमा तिथि के दिन कर्णघंटा में वेदव्यासेश्वर दर्शन पूजन , वार्षिक यात्रा , पूजन कर के (अगर हो सके तोह काम से अवकाश ले कर दर्शन करें ) कर्ण घण्टा तीर्थ कुंड में स्नान या मार्जन कर कुंड के अंदर चार शंकर जी के मंदिर है इनको महोदरेश्वर , जैमिनीश्वर , कर्णघंटेश्वर , और वेदव्यासेश्वर है। वेदव्यासेश्वर मंदिर के पास आषाढ़ पुर्णिमा के दिन यज्ञ , कीर्तन , और प्रवचन होते है ।

घण्टाकर्णे महातीर्थे श्राद्धं कृत्वा विधानतः | अपि दुर्गतिमापन्नानुद्धः रेत्सप्त पुर्वजान || (काशीखण्ड)

इस घण्टकर्ण तीर्थ पर विधिपूर्वक श्राद्ध करने वाला अपने सात पूर्वज पुरषो का दुर्गति में पड़े रहने पर भी उद्धार कर सकता है।

पता -60/67 कर्णघण्टा पोखरा , कर्ण घण्टा मोहल्ला ,चौक , वाराणसी।

आशाढेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

आषाढ़ मास शुक्ल चतुर्दशी वार्षिक यात्रा

चतुर्दशी तिथि के दिन काशी में शिव लिंग का दर्शन का बहुत ही महात्म्य है खासकर किसी काशी खण्डोक्त लिंग के दर्शन हो तोह अति सौभाग्यप्रद होजाता है । शिव जी के अति प्रिय गण आषाढ़ जिनको शिव जी ने अपने पुत्र के संज्ञा से नवाजा था आज इन्ही की वार्षिक यात्रा है और यह लिंग आषाढ़ गण के द्वारा ही स्थापित है ।

यहां आषाढ़ मास में दर्शन करने से आषाढ़ मास में हुवे सभी पापो का विमोचन होजाता है ऐसी यहां मान्यता है और नित्य दर्शन करने से जीवन के समस्त पापो का विमोचन होजाता है। इनके ठीक बगल वाला लिंग दुर्वाशा ऋषि द्वारा स्थापित है और यह लिंग दूर्वाशेश्वर के नाम से जाना जाता है ।

पता- k 63/53 नाखास रोड , काशी पूरा , लोहटिया ,वाराणसी।

गभस्तीश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी वार्षिक दर्शन

प्राचीन काल मे गभस्ती (सूर्य देव) शिव लिंग स्थापन करने उद्देश्य से काशी के प्रसिद्ध पंचनद तीर्थ(पंचगंगा) पर अवतरित हुवे और यही पर एक विशाल शिव लिंग स्थापना के साथ मंगला गौरी की भी मूर्ति स्थापित करके कठिन तपस्या में लीन होगये ।कठिन तप के फल स्वरूप उनके शरीर से उत्तपन्न हुवे बहुत तेज़ प्रकाश और गर्मी को सहन करना काशी में रहने वाले लोगो और पशु पक्षियो के लिए दूभर(मुश्किल)होगया ।

जब यह बात शिव और माता पार्वती को पता चली तब वह इसका कारण जानने के लिए तुरन्त गभस्ती (सूर्य देव) के सामने उपस्थित होगये और सूर्य देव को छुवा जिससे उनकी शरीर का ताप और रोशनी धीरे धीरे कम होते गई ।

(बहुत तेज़ प्रकाश को संस्कृत में मयूख बोला जाता है, जिससे इनका नाम मयुखादित्य भी पड़ गया और इसी नाम से इनकी मूर्ति भी स्थापित होगयी) जब सूर्य देव ने शिव और माता पार्वती को देखा तोह बहुत तरीके से शिव और माता पार्वती की स्तुति करने लगे जिसके फल स्वरूप शिव जी और माता पार्वती ने उनको कई वरदान दिए जिसमे उनको रवि की संज्ञा भी दी गयी और ग्रहत्व का भार भी प्रदान किया गया।अंत मे शिव जी यह कहते हुवे अंतर्ध्यान होगये कि आज से इस शिव लिंग का नाम गभस्तीश्वर होगा और जो व्यक्ति या महात्मा यहां #पंचनद_तीर्थ (पंचगंगा) पर स्नान कर गभस्तीश्वर का दर्शन पूजन करेगा उसको सभी पापो से मुक्ति मिलेगी और अंत मे मोक्ष की प्राप्ति होगी ।

साथ ही मंगला गौरी के दर्शन करने से हमेशा दर्शनार्थियों का मंगल ही होता है और विवाह बाधा भी दूर होती है और मंगल ग्रह से मिल रहे परेशानियों से भी मुक्ति मिलती है । जिनके कुंडली मे सूर्य से संबंधित परेशानियां होरही हो या सूर्य कमजोर , निर्बल , अस्त या किसी ग्रह द्वारा क्रूर दृष्टि से दृष्ट हो तो यहां गभस्तीश्वर और मयूखादित्य के पूजन अर्चन करने से उनकी सारे परेशानियां दूर हो जाएंगी । इसी दौरान कठिन तपस्या के कारण सूर्य के पसीने से किरणा नदी उतपन्न हुई जो जा कर गंगा जी मे मिल गयी थी ।

वैसे तोह यहां नित्य दर्शन का प्रावधान है पर अगर रोज़ नही जा सकते तोह काशी वाशियो को प्रत्येक रविवार, रवि पुष्य नक्षत्र , मकरसंक्रांति ये सब दिन जरूर दर्शन करना चाहिए ।

पता- पंचगंगा घाट के पास k 24/34 प्रसिद्ध मंगला गौरी मंदिर प्रांगण में

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नर्मदेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

आषाढ़ शुक्ल द्वादशी दर्शन (वर्षिक यात्रा)

माता नर्मदा द्वारा स्थापित लिंग

प्राचीन काल मे जब ऋषियो में नदियो की चर्चा हो रही तोह उसमे सर्वप्रथम गंगा यमुना सरस्वती और नर्मदा नदी को क्रमबद्ध स्थान मिला। जिसमें कि गंगा ऋग्वेद को यमुना यजुर्वेद को सरस्वती अथर्ववेद को नर्मदा सामवेद को प्रदर्शित करती है या इनकी प्रतीकात्मक है ।

नर्मदा नदी को आखरी स्थान में गिनती होने के कारण उन्होंने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की जिसके फलस्वरूप ब्रह्मा जी उनको वरदान मांगने को कहा , जिसमे नर्मदा जी ने माँ गंगा के बराबर(समकक्ष) और पुण्यदायक हो जाने की बात कही पर ब्रम्हा जी यह कर के अंतर्ध्यान होगये कि कोई भी देवता शिव के समान नही होसकता ,, दूसरा कोई भी मानव विष्णु समान नही हो सकता और कोई भी नदी गंगा समान नही हो सकती ।

इस बात से असंतुष्ट माता नर्मदा काशी में आकर नर्मदर्श्वेर नामक शिव लिंग स्थापित किया और बगल में ही नर्मदा कूप(कुँवा) भी स्थापित करके उसी कुवे के जल से नर्मदेश्वर लिंग की पूजा और कठिन तपस्या किया , जिससे प्रसन्न हो शिव जी जब उनसे मनचाहा वर मांगने को कहा तभी भी उन्होंने ने वर में यही मांगा की वह गंगा नदी के समान पुण्यदायक हो जाये और उतना ही उनको भी सम्मान मिले ।

तभी उनकी तपस्या से अति प्रसन्न शिव ने पहला वरदान दिया कि नर्मदा नदी में जितने भी पत्थर रहेंगे वह साक्षात शिवलिंग ही माने जाएंगे । और दूसरे वरदान में ये कहा कि जो गंगा में एक बार स्नान करता है उसके सारे पाप मिट जाते। यमुना में सात दिन स्नान करने से व्यक्ति के पाप मिट जाते है। सरस्वती में तीन दिन स्नान करने से सारे पाप मिट जाते है और कहा कि आज से सिर्फ नर्मदा नदी को देख लेने मात्र से ही व्यक्ति के सारे पाप मिट जाएंगे और अंत मे अंतर्ध्यान होने से पहले शिव जी ने यह भी वरदान दिया कि नर्मदेश्वर लिंग के पूजन करने वालो के सभी पाप मिट जाएंगे और अंत मे मोक्ष प्राप्त होगा ।

स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में ऐसा वर्णन है कि जो भी कन्या इस नर्मदा नदी की महिमा को सुनती है तोह उसके सारे पाप कट जाएंगे ।

पता - मछोदरी पर त्रिलोचन मंदिर के पीछे पीपल के पेड़ के नीचे वाले घर में वाराणसी ।

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गंगेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

जब स्कन्द (कार्तिकेय) जी अगस्त्य ऋषि को काशी के महिमा बता रहे थे उसी में एक अध्याय गंगेश्वर लिंग का भी था जिसमे उन्होंने बताया कि जब माता गंगा अपने पूरे जल प्रवाह के साथ काशी के तरफ बढ़ी आरही थी , तभी उनके मन मे काशी में शिव लिंग स्थापन करने की इक्षा हुई। जिसमे उन्होंने काशी विश्वनाथ के पूर्व में एक उत्तम लिंग की स्थापना की जिसको आगे चल कर गंगेश्वर नाम से जाना गया जो लोग गंगा दशहरा के दिन यहां दर्शन पूजन करते है उनके जन्मों के पाप मिट जाते है ।

काशी खण्ड अध्याय 91 के अनुसार यहां दर्शन करने से गंगा स्नान का फल मिलता है और यहां के भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण होती है और अंत मे स्वर्ग प्राप्त होता है ।

पता- ck 13/78 चौक से मिसिर जी के मैदान से पशुपतेश्वर महादेव से आगे संकठा गली मार्ग पर

तिलपर्णेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

निरन्तर जब शिव गणों का काशी आगमन होते जा रहा था , और सभी गण राजा दिवोदास के राज्य की खामी ढूंढने में असमर्थ होते जा रहे थे उसी अंतराल में से एक #तिलपर्ण नामक शिव गण भी काशी आये और काशी की मनमोहकता और सौंदर्य देख कर काशी में ही शिव लिंग स्थापित कर काशी में ही वास करने लगे। इस शिव लिंग के दर्शन पूजन से सभी पाप नष्ट होजाते है और काशीखण्ड अध्याय 53 के वर्णन के अनुसार यहाँ गंगा जल और बेल पत्र चढ़ाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जल चढ़ाने की महिमा के अनुसार इस लिंग को जलेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है ।

पता- दुर्गाकुंड , दुर्गा देवी मंदिर में ।

कुक्कुटेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

परम् शिवभक्त(शिवगण) कुक्कुट द्वारा स्थापित लिंग

जब काशी में राजा दिवोदास के राज्य की खामी को निकालने के लिए शिव जी अपने गणों को भेज रहे थे , पर सभी शिवगण अपने कार्य मे असमर्थ होते जा रहे थे और काशी में ही अपने नाम से शिव लिंग स्थापित कर के यही पर निवास करने लगे ।

इसी प्रकार से श्री कुक्कुट का भी काशी आगमन हुआ और वह भी दिवोदास के राज्य में खामी नही निकाल पाए और काशी में ही अपने नाम से शिव लिंग स्थापित कर के रुक गए ।

काशी से पहले श्री कुक्कुट का निवास मंदरांचल पर्वत पर था , पर काशी की सुंदरता देख कर यह काशी में ही रुक गए ।

काशीखण्ड अध्याय 53 में ऐसा वर्णीत है कि यहां नित्यदर्शन पूजन से मोक्ष की प्राप्ती होती है और माता के गर्भ से मुक्ति मिलती है ।

पता- दुर्गाकुंड में दुर्गा देवी मंदिर परिसर में ।

रुक्मांगदेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

आषाढ़ शुक्ल पक्ष पंचमी वार्षिक यात्रा

यह शिव लिंग राजा रुक्मांगद द्वारा स्थापित है , राजा रुक्मांगद प्राचीन काल के अत्यंत प्रतापी राजा और महान विष्णु भक्त हुआ करते थे। रुक्मांगद राजा के राज्य में सभी प्रजागण को एकादशी व्रत करना अनिवार्य था , जो प्रजा उस दिन व्रत का पालन नही करती थी उसको दण्डित करने का भी प्रावधान राजा द्वारा बनाया गया था ।

एकादशी व्रत के महिमा के प्रतिरूप में सारी जनता मृत्यु पश्च्यात विष्णु लोक में जाने लगी और नर्क बिल्कुल खाली सा होगया यमदूतों और चित्रगुप्त के पास कोई काम नही बचा था। इसी बात को लेकर यमराज़ ब्रम्हा के पास गए राजा रुक्मांगद की महिमा सुन कर ब्रम्हा अत्यंत प्रसन्न हुवे साथ ही राजा की परीक्षा लेनी चाही । काफी समय के अंतराल जब राजा ने प्रेमवस मोहिनी नाम की अति सुंदर कन्या को विवाह के लिय इस बात पर राजी कर लिया कि वह जीवन मे एक बार मोहिनी को जरूर मुह मंगा वर देंगे ।

ब्रह्मा द्वारा भेजी मोहिनी अचानक से राजा का इम्तिहान लेने के लिए राजा को एकादशी व्रत न रखने के लिए बोला जिसमे राजा रुक्मांगद ने उनसे निवेदन कर के दूसरा वर मांगने को कहा पर मोहिनी उसी बात पर अडिग थी , तभी राजा का पुत्र धर्मांगद और पहली रानी संध्यावली ने भी मोहिनी से विनती की वह राजा को छोड़ कर न जाये , पर इन दोनों की बातों को सुन मोहिनी ने अपने दूसरे वर में राजा के पुत्र धर्मांगद का कटा हुआ सर मंगा (यह पूरा वाक्या सभी देवता गन और भगवान विष्णु देख रहे थे) इतना सुनते ही धर्मांगद खुशी ख़ुशी अपना सर कटवाने को तैयार होगया । (राजा भी अपने वचन को निभाने के लिए अपने पुत्र का सर काटना उचित समझा पर अपना एकादशी का व्रत नही तोड़ा) राजा ने जैसे ही धर्मांगद पर तलवार चलानी चाही वैसे ही वहां श्री हरि विष्णु उसकी तलवार को रोक लिए और देखते ही देखते राजा सहित उसका परिवार विष्णु जी मे समाहित होगया और वैकुंठ में चला गया साथ ही मोहिनी को राजा के पुरोहित ने संकल्प ले कर अपने श्राप से भस्म कर दिया ।

यह शिव लिंग अत्यंत प्रतापी राजा रुक्मांगद द्वारा स्थापित होने के कारण जो भी यहां दर्शन पूजन करता है , वह विष्णु जी का भी प्रिय होजाता है और अंत मे वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है ।

पता- चौकी घाट , मकान नम्बर b 14/ 1 पीपल के पेड़ वाले हनुमान मंदिर में

ओम्कारेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

एक ओंकारमालोक्य समस्ते क्षोणी मण्डले | लिङ्ग जातानि सर्वाणि दृष्टा निस्युनरसंशयः || (काशी खण्ड)

एक ओम्कारेश्वर लिंग का दर्शन कर लेने से समस्त पृथ्वीमण्डल में जितने भी लिंग है , सबका दर्शन कर लिया , इसमें संशय नही है ।

तत्र जागरण कृत्वा चतुरदर्शामुपोषितः | प्राप्नुवन्ति परं ज्ञानं यत्र कुत्रापि वै मृता ||

चतुर्दशी तिथि में उपवास रहकर ओम्कारेश्वर में जागरण करने से प्राणी कही पर भी मरने पर परम् ज्ञान प्राप्त करता है।

ओम्कारेश्वर महादेव ( ॐकार लिंग) । जैसा कि शास्त्रों में वर्णित है , काशी तीन भाग में विभाजित है , ॐकार खंड , विश्वेश्वर खंड और केदार खंड , यह ओम्कारेश्वर लिंग ॐकार खंड का प्रतिनिधि करते है। यहां खुद सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने सालो साल तप किया जिसके फल स्वरुप यहाँ तीन स्वयंभू लिंग प्रकट हुवे इन तीन शिव लिंग के शक्ति से ही ब्रह्मा जी को सृष्टि रचने की शक्ति मिली । अकार , ॐ कार और मकार यह तीन शिव लिंग है ।

काशी खंड 73 में ऐसा वर्णित है कि जो व्यक्ति अष्टमी तिथि और चतुर्दशी को मछोदरी तीर्थ में स्नान कर के यहाँ के दर्शन करता है वह जीवन के बंधन से मुक्त हो जाता है। काशी के तीनों खंडो में से सबसे प्रथम खंड यही है।

पता - पठानी टोला A33/23 ,मछोदरी में यह लिंग विराजमान है । ब्रह्मा जी ने शिव जी से यहां सदैव निवास करने का निवेदन किया था जिसके फल स्वरुप शिव जी यहाँ निवास करते है।

पशुपतेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

इस स्वयम्भू लिंग का दर्शन करने से पशु योनि से मुक्ति मिलती है ( किये गए बुरे कर्म जिनके फल स्वरूप इंसान को पशु योनि मिलती है )

चैत्र मास शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को और रंगभरी एकादशी के दिन यहां विधिवत सृंगार होता है और महादेव सभी भक्तों की मुराद पूरी करते है ।

जो लोग यहां नित्य दर्शन करते है उनको सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है और व्यक्ति हर बन्धन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है, वैसे तोह यहां दिन में कभी भी दर्शन कर सकते है पर दर्शन का मुख्य समय शाम(संध्या) का है क्योंकि काशी खण्ड पुस्तक के अनुसार शाम के समय पशुपतेश्वेर लिंग में शिव जी खुद वास् करते है ।

पता-ck13/66 पशुपतेश्वर गली , (मिशीर जी का मैदान) चौक , वाराण

शतकालेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

शतकालेश्वर महादेव में दर्शन पूजन करने वाले व्यक्ति को सौ वर्ष की आयु मिलती है , शत का मतलब सौ होता है ।

प्राचीन काल से ही शतायु होने का आशीर्वाद सन्तो महात्माओं और ऋषि मुनिओ से मिलता आया है , पर यहां शत कालेश्वर लिंग का दर्शन पूजन करते रहने से सौ वर्ष की आयु बहुत सहज तरीके से ही मिल जाती है(काशी खंड पुस्तक अनुसार) स्थानीय निवासी यहां नित्य दर्शन करते है , और उनका मानना है कि यहां दर्शन से उनको स्वास्थ हमेशा ठीक रहता है।

जमीन से थोड़ा नीचे और काफी छोटा मंदिर होने के कारण यहां मंदिर में अंदर जाने का रास्ता नही है , बाहर से ही दर्शन होता है यहां ।

पता - चौक में ठठेरी बाजार , गली में , राम भंडार के आगे ,पीतल शिवाला नाम से प्रसिद्ध है ।

संकटा देवी (काशी खंडोक्त)

सिंधिया घाट के पास, “संकट विमुक्ति दायिनी देवी” देवी संकटा का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। इसके परिसर में शेर की एक विशाल प्रतिमा है। इसके अलावा यहां 9 ग्रहों के नौ मंदिर हैं।

इस मंदिर में हर संकट से मिलती है मुक्ति, पांडवों ने एक पैर पर खड़े होकर की थी मां की उपासना कौरवों को युद्ध किया था पराजित,

भगवान शिव ने जब की थी अराधना तो दूर हुई थी उनकी व्याकुलता

वाराणसी. काशी को यू ही मोक्ष की नगरी नहीं कहा जाता है। यहां पर ऐसे-ऐसे सिद्धपीठ है, जहां पर दर्शन करने से भक्तों के सारे दु:ख खत्म हो जाते हैं। काशी की धार्मिक मान्यता है कि यहां के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर खुद भगवान शिव भक्तों को तारण मंत्र देकर जन्मों के बंधन से मुक्त करते हैं। यही से कुछ दूरी पर मां संकटा का मंदिर है, जहां पर दर्शन करने से जीवन में आने वाले सभी कष्ट खत्म हो जाते हैं।

गंगा घाट किनारे स्थित मां संकटा का मंदिर सिद्धपीठ है। यहां पर माता की जितनी अलौकिक मूर्ति स्थापित है उतनी ही अद्भृत मंदिर की कहानी भी है। धार्मिक मान्यता है कि जब मां सती ने आत्मदाह किया था तो भगवान शिव बहुत व्याकुल हो गये थे। भगवान शिव ने खुद मा संकटा की पूजा की थी इसके बाद भगवान शिव की व्याकुलता खत्म हो गयी थी और मां पार्वती का साथ मिला था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पांडवों जब अज्ञातवास में थे तो उस समय वह आनंद वन (काशी को पहले आनंद वन भी कहते थे) आये थे और मां संकटा की भव्य प्रतिमा स्थापित कर बिना अन्न-जल ग्रहण किये ही एक पैर पर खड़े होकर पांचों भाईयों ने पूजा की थी। इसके बाद मां संकटा प्रकट हुई और आशीर्वाद दिया कि गो माता की सेवा करने पर उन्हें लक्ष्मी व वैभव की प्राप्ति होगी। पांडवों के सारे संकट दूर हो जायेंगे।

इसके बाद महाभारत के युद्ध में पांडवों ने कौरवों को पराजित किया था। मंदिर में दर्शन करने के बाद भक्त गो माता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते हैं। मां संकटा के सेवादार अतुल शर्मा ने कहा कि इस सिद्धपीठ में जो भी भक्त सच्चे मन से मां को याद करते हुए उनकी पूजा करता है उसके सारे संकट दूर हो जाते हैं।

नारियल व चुनरी के प्रसाद से खुश हो जाती है मां संकटा

मां संकटा को नारियल व चुनरी का प्रसाद चढ़ाया जाता है जिससे मां खुश हो जाती है। यहां पर चढ़ाये हुए नारियल का स्वाद भी बेहद अलग होता है। प्रसाद ग्रहण करते ही समझ मैं आ जाता है कि किसी सिद्धपीठ का दर्शन किया है।

भक्तों की ही नहीं देवाताओं का भी संकट दूर करती है मां

मंा संकटा के मंदिर में इतनी ऊर्जा है कि वह देवताओं के साथ भक्तों का भी संकट दूर करती है इसलिए पार्वती की रुप माने जाने वाली माता को मां संकटा कहा जाता है। शुक्रवार को यहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दराज से भक्त आते हैं और जीवन में आने वाला संकट दूर हो जाता है।

पता- संकटा घाट (सिंधिया घाट के पास) प्रसिद्ध मंदिर

कलयुगेश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

स्कन्द पुराण में इस लिंग के बारे के बताया गया है कि कलयुग में इस लिंग का दर्शन करना अति अनिवार्य है , जो इस लिंग का कलिकाल(कलयुग) में दर्शन करेगा उसके सभी कार्य सिद्ध होंगे और उसको कलयुग के पापों से छुटकारा भी मिलेगा(जिन लोगो पर कलयुग हावी होजाता है वह पाप के मार्ग पर बढ़ते रहते है )

काशी में इनका दर्शन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना लोग कालभैरव ,माँ अन्नपूर्णा , का समझते है ।इनके दर्शन से ही काशी का सम्पूर्ण फल है ।

पता -- Siddheshwari devi n chadreshwer n chandrakoop(kashikhandokt)

https://maps.app.goo.gl/Qus89YdedTy3JLKo6

एकादशीश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

आज एकादशी

प्रत्येक एकादशी को दर्शन करने से यहां बैकुंठ की प्राप्ति होती है , और वरलक्ष्मी की कृपा भी मिलती है ।

एकादशी व्रत करने वालो को यहां दर्शन अवश्य करना चाहिए।

लांगलीश्वर महादेव (काशी खण्डोक्त)

ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि यात्रा

त्रिलोकी नाथ शिव जब बारी बारी काशी में अपने गणों को राजा दिवोदास के राज्य की खामियां निकालने के लिये भेज रहे थे , तभी जितने गण यहां आते थे तोह वापस लौटने के बाजए वह काशी में ही अपने नाम से शिव लिंग स्थापित कर के शिव आराधना में लीन होजाते थे ।

ऐसा माना जाता है कि शिवगण आज भी काशी में ही निवास कर काशी की रक्षा करते है ।

ऐसे ही क्रमबद्ध तरीके से गणों का आना आरंभ रहा , जिसमे शिव जी के प्रिय गण श्री लांगली भी काशी आये और यही शिव लिंग स्थापित कर के आराधना में लीन होगये , लांगली के नाम से ही लांगलीश्वर नाम पड़ा ।

यहाँ दर्शन पूजन से शिव जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है क्योंकि लांगली शिव जी के अति प्रिय गण है ।

पता- ck28/4 खोवा गली , चौक (खोवा गली में यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है)

स्वर्गद्वारेश्वर (काशी खण्डोक्त)

ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष षष्टी आज के दिन मणिकर्णिका में स्नान कर इस मंदिर में दर्शन करने से मृत्यु के पश्च्यात स्वर्ग में स्थान मिलता है ऐसा काशी खंड पुस्तक में वर्णन है। यहां दर्शन करने से सारे कष्ट और पाप भी मिट जाते हैं।

विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण में अब यह काशी खण्डोक्त मंदिर विलुप्त होगया है ।

Ck10/16 मणिकर्णिका घाट के पास ही यह मंदिर था ।

काशी खण्ड में स्वर्गद्वारी का उल्लेख बहुत विस्तृत तरीके से किया गया है और यह काशी का अभिन्न अंग माना जाता था ।

समय के साथ साथ इस मंदिर का अस्तित्व खत्म हो जायेगा ऐसा कल्पना भी नही किया गया ।

स्वर्गद्वारेश्वेर का यह फोटो सालों पहले मैंने लिया था ।

swargdwareshwer #varanasi

दण्डपाणी भैरव (काशी खण्डोक्त)

प्राचीन काल में पूर्णभद्र नामक एक धर्मात्मा यक्ष गंधमादन पर्वत पर रहते थे ,

निसंतान होने के कारण वह अपने पुत्र प्राप्ति के लिए हमेशा चिंतित रहते थे उसके चिंतित रहने के कारण उसकी पत्नी कनककुंडला ने उनसे शिवजी की आराधना करने की बात कही और यह भी कहा जब शिलाद मुनि ने जिन की कृपा से मरण हीन नंदेश्वर नामक पुत्र को प्राप्त किया उन शिव की आराधना क्यों नही करते ।

अपने स्त्री का वचन सुनकर यक्षराज ने गीत वाद्य आदि से #ओम्कारेश्वर(कोयला बाजार स्थित,काशी)

का पूजन कर पुत्र की अभिलाषा पूर्ण की और शिव जी के कृपा के कारण पूर्णभद्र ने हरिकेश नामक पुत्र को प्राप्त किया जो आगे चलकर काशी में दंडपाणी भैरव नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जब हरिकेश 8 वर्ष का था तभी से खेल खेल में बालू में शिवलिंग बनाकर दूर्वा से उनका पूजा करता था और अपने मित्रों को शिव नाम से ही पुकारता था और अपना सारा समय शिवपूजन में ही लगाया करता था।

हरिकेश की यह दशा देखकर उसके पिता ने उसे गृह कार्य में लगाने की अनेक चेष्टा की पर उस पर कुछ भी असर नहीं हुआ , अंत में हरिकेश घर से निकल गया और कुछ दूर जाकर उसे भ्रम हो गया और वह मन ही मन कहने लगा हे शंकर कहां जाऊं कहां रहने से मेरा कल्याण होगा उसने अपने मन में विचारों की जिनका कहीं ठिकाना नहीं है उनका आधार काशीपुरी है जो दिन-रात विपत्तियों से दबे हैं उनका काशीपुरी ही आधार है इस प्रकार निश्चय करके वह काशीपुरी को गया ।

आनंदवन में जाकर ओम नमः शिवाय का जप करने लगा

काफी समय के बाद शंकर जी पार्वती जी को अपना आनंदवन दिखाने के लिए काशी लाए और बोला जैसे तुम मुझको बहुत प्रिय हो वैसे ही आनंदवन भी मुझे परम प्रिय है हे देवी मेरे अनुग्रह से इस आनंद वन में मरे हुए जनों को जन्म मरण का बंधन नहीं होता अर्थात वह फिर से संसार में जन्म नहीं लेता और पुण्य आत्माओं के पाप के कर्म बीज विश्वनाथ जी की प्रज्वलित अग्नि में जल जाते हैं और फिर गर्भाशय में नहीं आते हैं ऐसे ही बात करते करते भगवान शिव और माता पार्वती उस स्थान पर पहुंच गए जहां पर हरिकेश यक्ष ने समाधि लगाए बैठे थे ।

उनको देखकर पार्वती जी ने कहा हे ईश्वर यह आपका तपस्वी भक्त है इसको उचित वर देखकर उसका मनोरथ पूर्ण कीजिए इसका चित्त केवल आप में ही लगा है और इसका जीवन भी आपके ही अधीन है इतना सुनकर महादेव जी उस हरिकेश के समक्ष गए और हरिकेश को हाथों से स्पर्श किया । (कठिन तप के कारण हरिकेश कमजोर और दुर्बल होगये थे)

दया सिंधु का स्पर्श पाकर हरिकेश यक्ष ने आंखें खोल कर अपने सम्मुख प्रत्यक्ष अपने अभीष्ट देव को देखा और गदगद स्वर से यक्ष ने कहा कि हे शंभू हे पार्वती पते हे शंकर आपकी जय हो आपके कर कमलों का स्पर्श पाकर मेरा यह शरीर अमृत स्वरूप हो गया इस प्रकार प्रिय वचन सुनकर आशुतोष भगवान बोले हे यक्ष तुम इसी क्षण मेरे वरदान से मेरे क्षेत्र के दंडनायक हो जाओ आज से तुम दुष्टों के दंड नायक और पुण्य वालों के सहायक बनो और दंडपाणी नाम से विख्यात होकर सभी गणों का नियंत्रण करो ।

मनुष्यो में सम्भ्रम और उदभ्रम ये दोनों गण तुम्हारे साथ रहेंगे।

तुम काशीवासी जनों के अन्नदाता । प्राणदाता , ज्ञान दाता होओ और मेरे मुख से निकले तारक मंत्र के उपदेश से मोक्ष दाता होकर नियमित रूप से काशी में निवास करो भगवान की कृपा से वही हरिकेश यक्ष काशी में दण्डपाणि के रूप में स्थित हो गए और भक्तों के कल्याण में लग गए ।

#ज्ञानवापी में स्नान कर दण्डपाणि के दर्शन से सभी मनोकामना पूर्ण होती है ।

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#dandpani #harikesh #yaksh #banaras #varanas

मोक्षद्वारेश्वर लिंग (काशी खण्डोक्त)

ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष पंचमी को इनका दर्शन होता है, लाहौरी टोला स्थित इस मंदिर में आज दर्शन पूजन का विशेष महत्व है । दैनिक दर्शन करने वाले लोगों को मोक्ष प्राप्त करना बहुत मामूली बात है यहां , पर अब यह मंदिर विलुप्त होगया है ।

अस्सी संगमेश्वर (काशी खण्डोक्त)

काशी में अस्सी घाट पर असी नदी और गंगा जी का संगम स्थान है और घाट पर ऊपर सीढ़ी चढ़ कर संगमेश्वर महादेव का मंदिर है , ऐसी मान्यता है कि अस्सी घाट पर स्नान कर यहां दर्शन करना अति सौभाग्य दायक माना गया है ।

काशी खण्ड पुस्तक में ऐसा वर्णन है कि अस्सी घाट पर स्नान करने से हरिद्वार में स्नान करने का फल मिलता है ।

Assi ghat. #sangmeshwer #haridwar #varanasi

बाबा जागेश्वरनाथ (काशी खण्ड) स्वयंभू शिवलिंग

पुस्तक में जितने भी स्वयंभू शिव लिंगो का वर्णन किया गया है , उसमे बाबा जागेश्वर नाथ का नाम चंद्रप्रभा के रूप में वर्णीत है।

इनकी खोज लगभग 821 वर्ष पहले हुई ,

किवदंतियों के जब अनुसार हाथीवान =(हाथी का मालिक हाथी के साथ) चारा काटने के लिए नदी के किनारे आया। वर्तमान में जहां शिवलिग है वहां विशाल वटवृक्ष था। उसी वृक्ष पर चढ़कर हाथीवान चारा(पेड़ की पत्तियां आदि) काटने लगा। इसी बीच कुल्हाड़ी ऊपर से गिर गयी और नीचे गोलाकार पत्थर कट गया जिससे रक्त की धार चलने लगी। यह देख हाथी का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। और चिघाड़ करते हुए जंगलों में भाग गया।

यह बात जंगल में आग की तरह फैल गयी। आसपास बस्ती न होने के बावजूद कुछ दूर बसे गांव के लोग झाड़ी साफ कर पूजा पाठ करना शुरू कर दिये। धीरे-धीरे उक्त पत्थर शिवलिग का आकार लेकर विशालकाय होता गया।

प्राचीन मान्यता है कि यह क्षेत्र ऋषि याज्ञवलकव्य की तपोभूमि थी , ऋषि के कठीन तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयंभू होकर प्रकट हुवे और उनको ढेरो वरदान दिए जिससे उनकी ख्याति तीनो लोक में फैल गई ।

याज्ञवल्क्य को वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियों तथा उपदेष्टा आचार्यों में सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। ये महान् अध्यात्मवेत्ता, योगी, ज्ञानी, धर्मात्मा तथा श्री राम की कथा के मुख्य प्रवक्ता थे। भगवान सूर्य की प्रत्यक्ष कृपा इन्हें प्राप्त थी। पुराणों में इन्हें ब्रह्मा जी का अवतार बताया गया है। श्रीमद्भागवत[1] में आया है कि ये देवरात के पुत्र थे। महर्षि याज्ञवल्क्य के द्वारा वैदिक मन्त्रों को प्राप्त करने की रोचक कथा पुराणों में प्राप्त होती है। तदनुसार याज्ञवल्क्य वेदाचार्य महर्षि वैशम्पायन के शिष्य हुए थे। इन्हीं से उन्हें मन्त्र शक्ति तथा वेद आदि का ज्ञान प्राप्त हुआ था।

ब्रह्मा के अवतार

ऐसी मान्यता है कि याज्ञवल्क्य ब्रह्मा जी के अवतार थे। यज्ञ में पत्नी सावित्री की जगह गायत्री को स्थान देने पर सावित्री ने क्रोधवश इन्हें श्राप दे दिया। इस शाप के कारण ही वे कालान्तर में याज्ञवल्क्य के रूप में चारण ऋषि के यहाँ उत्पन्न हुए। वैशम्पायन जी से यजुर्वेद संहिता एवं ऋगवेद संहिता वाष्कल मुनि से पढ़ी। वैशम्पायन के रुष्ट हो जाने पर यजुः श्रुतियों को वमन कर दिया, तब सुरम्य मन्त्रों को अन्य ऋषियों ने तीतर बनकर ग्रहण कर लिया। तत्पश्चात् सूर्यनारायण भगवान से वेदाध्ययन किया।

इनके वेद ज्ञान हो जाने पर लोग बड़े उत्कृष्ट प्रश्न करते थे, तब सूर्य ने कहा, "जो तुमसे अतिप्रश्न तथा वाद-विवाद करेगा, उसका सिर फट जायेगा। यह जानते हुवे भी शाकल्य ऋषि ने उपहास किया तो तुरंग उनका सिर फट गया।

Baba_Jageshwar_Nath_Temple_Hetimpur_Chakia

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varanasi #swayambhu #kashi #chandraprabha

वृद्धकालेश्वर (काशी खण्डोक्त)

वृद्धकालेश्वेर नाम लिङ्गं मेतन्म हीपतेः | जानीस्नादमिसंसिद्धिनिमित्तं किन्तु वैभवान् ||

दर्शनात्स्प शैर्नात्त्स्य् पुजाना चक्ष्वणातन्नतेः | वृद्धकालेश्वेर लिङ्गे सेविते न दरिद्रता ||

नोपसर्गा न रोगा न पापं नाघजं फ़लम ॥ (काशी खण्ड)

यह वृद्धकालेश्वर नाम का लिंग जो अनादि और सिद्ध है । इस वृद्धकालेश्वर के दर्शन , स्पर्श , पूजन एवं नाम श्रवण तथा नमस्कार से व्यक्ति मनोवांछित फल को पा लेता है , और दरिद्रता दूर होती है । वृद्धकालेश्वर के दर्शन सेवन से न तो दंड मिलता है ना उपसर्ग आदि रोग , ना पाप , न पाप जन्य फल ही प्रभावी होता है ।

उज्जैनपति महात्म्य के अनुसार

मृत्युंजय मंदिर में एक वर्ष तक कालोदक कूप में स्नान कर वृद्धकालेश्वर के दर्शन करने से सभी प्रकार के मनोकामना सिद्ध होजाती है , और मुँहमाँगा वरदान मिलता है ।

पता - मृत्युंजय मंदिर परिसर में ।

#Mrityunjay_Mahadev #vriddhkaal_ling #kashi

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श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन

यत्र साक्षान्महादेवो देहान्ते क्षय मीश्वरः | व्याचष्टे तारकं ब्रह्म , तथैव ह्यविमुक्तकम् || (कूर्म पुराण)

काशी में साक्षात शंकर जी जीव को मरण समय मे तारक ब्रह्म मन्त्र का उपदेश देते है । इस प्रकार की मोक्षदायनी यह काशीपुरी अविमुक्त नाम से प्रसिद्ध है ।

भूत भैरव (काशी खण्डोक्त)

आज अष्टमी तिथि के दिन काशी में भैरव यात्रा का प्रचलन काफी प्राचीन समय से चला आरहा है ।

ज्येष्ठ मास में अष्टमी तिथि में भिषण भैरव (भूत भैरव) के दर्शन करने से कुंडली के समस्त क्रूर ग्रह शांत हो जाते है ।

पता- करनघन्टा मोह्हले के पास , भूत भैरव गली में(नखास) ।

सिद्धि विनायक (काशी खण्डोक्त)

काशी के श्रेष्ठतम तीर्थ मणिकर्णिका पर स्थित सिद्धि विनायक के मंदिर में भक्तों की फरियाद तुरन्त सुनी जाती है ।

स्कंद पुराण में ऐसा वर्णीत है कि यहां के भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है,

बुधवार को होता है विशेष दर्शन जिसमे स्थानीय लोग अपने सामर्थ अनुसार विविध प्रकार से पूजा करते है जिसके फल स्वरूप सिद्धि विनायक उनके समस्त विघ्न हर लेते है ।

पता- मणिकर्णिका घाट पर चकरपुष्कर्णी कुंड के बगल की सीढ़ी से ऊपर जा कर , गौमठ , गढ़वासी टोला चौक वाराणसी।

यहां ऐसी मान्यता है कि गणेश #अथर्वशीर्ष का पाठ करने से 1 हजार गुना ज्यादा फल मिलता है ।

दशाश्वमेधेश्वर शूलटंकेश्वर (काशी खण्डोक्त)

ज्येष्ठ मास शुक्लपक्ष यात्रा

ज्येष्ठे मासि सितेपक्षे पक्षं रुद्रेसरे नमः | कुर्वन वार्षिकी यात्रा न विघ्ने रभिभुयते || (काशी खण्डे स्कन्द पुराण )

ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में रुद्र सरोवर तीर्थ दशाश्वमेध घाट में शूलटंकेश्वर के सामने गंगा जी मे है , स्नान करके दशाश्वमेधेश्वर और शूलटंकेश्वर के दर्शन कर वार्षिक यात्रा करने वाला व्यक्ति विघ्नों से आक्रांत नही होता अथवा वह व्यक्ति निर्विघ्न काशीवास करता है ।

ज्येष्ठे शुक्ल द्वितीयायां स्नात्वा रुद्र्सरोवरे | जन्मद्वयकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यन्ति || (काशी खण्डे स्कन्द पुराणे)

ज्येष्ठ मास के शुक्ल द्वितीया तिथि को रुद्र सरोवर में स्नान करने वाला व्यक्ति दो जन्मों तक पापों से मुक्त हो जाता है ।

पता- दशाश्वमेधेश्वर शिव लिंग शीतला मंदिर में और शूलटंकेश्वर लिंग दशाश्वमेध घाट (सीढी के पास) पर ही है ।

#shooltankeshwer

#dashaswamedheshwer

#Varshikyatra

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स्कन्दपुराण शिवरहस्य

जले स्थलो अन्तरिक्षे वा कुत्रापि वा मृता: | तारकं ज्ञान मासाद्य कैवल्यपद भागिनः ||

काशी क्षेत्र में पृथ्वी , जल , आकाश आदि किसी जगह भी यदि मृत्यु हो तोह वह प्राणी भगवान के तारक मंत्रोपदेश द्वारा मोक्ष पद का भागी होता है ।

आज ऐसा समय आगया जिसमे लोग काशी खण्डोक्त मंदिरों को कब्जा समझ रहे है , यह कब्ज़ा नही की गई है, हजारों , लाखो साल पहले से इन मंदिरों का अस्तित्व है ।

काशी खण्डोक्त होना आम बात नही है, स्कंदपुराण के काशी खण्ड में उसका जिक्र होना आवश्यक है ।

काशीखंड स्कंद महापुराण का एक खंड जिसमें काशी का परिचय, माहात्म्य तथा उसके आधिदैविक स्वरूप का विशद वर्णन है। काशी को आनंदवन एंव वाराणसी नाम से भी जाना जाता है। इसकी महिमा का आख्यान स्वयं भगवान विश्वनाथ ने एक बार भगवती पार्वती जी से किया था, जिसे उनके पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) ने अपनी माँ की गोद में बैठे-बैठे सुना था।

उसी महिमा का वर्णन कार्तिकेय ने कालांतर में अगस्त्य ऋषि से किया और वही कथा स्कंदपुराण के अंतर्गत काशीखंड में वर्णित है।

काशीखंड में १०० अध्याय तथा ११,००० से ऊपर श्लोक हैं। इसके माध्यम से काशी के तत्कालीन भूगोल, पुरातन मंदिरों के निर्माण की कथाएँ, मंदिरों में स्थित देवी-देवताओं के परिचय, नगरी के इतिहास और उसकी परंपराओं को भली-भाँति समझा जा सकता है।

ज्ञानवापी(कुँवा) और ईशानेश्वर (काशी खण्डोक्त)

ईशानकोण के दिगपाल जिनका नाम ईशान (ईश) था , उन्होंने काशी वास् के दौरान अपने त्रिशूल से इस ज्ञानवापी का निर्माण किया था ।

इसी ज्ञानवापी के जल से नित्य वह शिव जी का जलाभिषेक किया करते थे , जिसके फलस्वरूप इस कुंड के जल पानी अत्यंत ही निर्मल और आत्मिक ज्ञान को बढ़ाने वाला होगया था ।

इस ज्ञानवापी के ज्ञान की महिमा काशी खण्ड के अध्याय 33 में दी हुई है , जिसमे एक कलावती नाम की काशी की राजकुमारी जिसको उसकी पिछले जन्म की यादाश्त बस ज्ञानवापी कुंड पर हाथ रखते ही आगयी थी ।

ज्ञानवापी का पानी पीना काफी पुण्यदायक और ज्ञानवर्धक माना गया है , यहां नित्य स्नान से मुक्ति और श्राद्ध करने से पित्रो को मुक्ति मिलती है (अब स्नान और श्राद्ध की सुविधा नही है यहां) ।

#ज्ञानवापी काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में ही स्थित है

ईशानेश्वर लिंग (काशी खण्डोक्त)

दिगपाल ईशान (ईश) के द्वारा स्थापित यह शिव लिंग भी मुक्ति का कारक है , ज्ञानवापी से कुछ ही दूरी पर स्थित यह शिव लिंग भी मुक्ति देने में सक्षम है , यहां ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति चतुर्थी के दिन व्रत राह कर रात्रि जागरण करता है तोह उसके जीवन मे सभी खुशियां और अंत मे मोक्ष प्राप्त करता है

मंदिर के स्थान पर मॉल बन जाने से प्राचीन लिंग के जगह नया लिंग स्थापित किया गया है , लोग इसी का दर्शन पूजन करते है अब ।

पता = बांसफाटक ढाल पर शाहपुरी मॉल में स्थित है ।

महाबल नरसिंह (काशी खण्डोक्त)

श्री बिन्दु माधव उवाचः

महाबलनृसिन्होःहमोंकारात्पूर्वतो मुने | दूतान महाबलान्याम्यान्न पश्येत्तु तदर्चकः ||

श्री बिंदु माधव ने अग्निबिन्दु ऋषि से कहा-

हे मुने ! ओंकारेश्वर के पूर्वभाग में मैं ही महाबल नृसिंग के नाम से वास करता हूँ । मेरी पूजा करने वाला नर कभी यमराज के महाबली दूतों को नही देख पाता।

काशी में अग्निबिन्दु ऋषि के पूछने पर श्री हरि विष्णु (बिंदु माधव) ने उनसे अपने कई रूपो और स्थानों का वर्णन किया था जिसमे की महाबल नर्सिंग का भी उल्लेख किया ।

क्योंकि शिव ही विष्णु है और विष्णु ही शिव है , यह काशी नगरी में पहले श्री हरि विष्णु जी वास करते थे । बाद में काशी शिव जी की नगरी हुई ।

महाबल नृसिंग काशी में अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करते है और उनको मुक्ति का दान देते है ।

अधिकतर लोग जो काशी के यात्राओं में रुचि रखते है वह यहां हर एकादशी और हर साल नृसिंग जयंती पर यहां दर्शन जरूर करते है ।

पता- त्रिलोचन घाट पर कामेश्वर महादेव मंदिर प्रांगण में , मछोदरी , वाराणसी