Difference between revisions of "Paush month festival (पौष मास के अंतर्गत व्रत व त्यौहार)"

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Revision as of 16:53, 24 December 2021

प्राचीन समय की बात है कि एक दिन देवऋषि नारदजी, भ्रमण करते हुए, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर की सभा में आये। राजा युधिष्ठिर कहने लगे, "महात्मन आप भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों की वार्ता जानने वाले हैं। कृपा करके यह बताइये कि अब पौष मास आने वाला है इस मास में स्नान, दान, व्रत आदि करने से मनुष्य को क्या फल मिलता है? किस-किस देवता की पूजा की जाती है और क्या फल मिलता है? कृपया विस्तारपूर्वक कहिये।" नारदजी कहने लगे-'हे राजा युधिष्ठिर! अब सबसे प्रथम स्नान करने की विधि कहता हूं! इस मास में स्नान करने वाले को चाहिये कि प्रातः समय ब्रह्ममुहूर्त में उठकर शौच, स्नानादि से निवृत होकर नित्य नियम करके षोडशोपचार विधि से भगवान का पूजन करें। स्नान करने वाले को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए असत्य नहीं बोलना चाहिये। अच्छे सदाचारी पुरुषों की संगति करें दुष्टों की संगति ना करें। जो मनुष्य बर्तन का त्याग करके केले के पत्र या कमल के पत्र में भोज करता है वह परम ज्ञान को प्राप्त होकर जीवन-मरण से मुक्त हो जाता है।

शैय्या को छोड़कर जो भूमि पर सोता है उसके लिए मोक्ष का द्वार खुल जाता है, जो मनुष्य पोष मास में हजामत नहीं बनवाता वह अगले जन्म में राजा के घर जन्म लेता है। हे राजन! पौष मास में भगवान विष्णु और शिव खेतों का ही पूजन होता है। जो मनुष्य इस मास में स्नान करके नित्य नियम पश्चात् भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उनकी विधि कहते हैं! सबसे प्रथम पुरुष सूक्त की सोलह ऋषियों में से पहली चर्चा सहल शीर्ष आदि से भगवान का आवाहन करके सोलह मंत्रों से षोडशोपचार विधि से भगवान का पूजन करें और भगवान से प्रार्थना करें कि भगवान, मेरे सब पापों का नाश करिये और मुझ दीन पर कृपा करिये जिससे मैं मोक्ष पद को प्राप्त हो जाऊं।

गणेश चतुर्थी

पौष मास की चतुर्थी को श्री गणेशजी को प्रसन्न करने के लिये गणेश चतुर्थी का व्रत करें, जिसको चौथ का व्रत कहा जाता है। सारा दिन निराहर रह, रात्रि को चन्द्रमा के उदय होने पर चन्द्रमा को अर्घ्य देकर भोजन किया जाता है तथा कथा भी सुनी जाती है। इस व्रत के करने से सब प्रकार के विघ्नों का नाश हो जाता है। और आरोग्यता प्राप्त हो जाती है। धन-धान्य की वृद्धि होती है। जो स्त्रियां इस व्रत को करती हैं, उनका सौभाग्य अटल रहता है तथा अच्छी संतान उत्पन्न होती है।

धन संक्राति

इस माह में जो मनुष्य नित्य नियम करके नित्य स्नान करके श्री शिवजी का पूजन करते हैं और शिवजी के बीज मंत्र “ॐ नमः शिवाय" का जप करते हैं, वह सब कष्टों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त हो जाते हैं। कथा- प्राचीन समय की बात है कि एक ब्राह्मण का पुत्र जिसका नाम वासुदेव था, बुरी संगति में फंस कर अत्यन्त दुराचारी हो गया और नित्य ही, पाप के कर्म करने लगा। वह वन में जाता और वहां यात्रियों को लूटकर उनकी हत्या कर देता, स्त्रियों का अपहरण करता और उनके साथ बलात्कार कर मंदिरापान करता और मांस आदि खाकर सारी-सारी रात वनों में रहता, प्रात: समय होते ही घर में चला आता और सज्जनों की तरह सब कार्य करता था। संसार के सभी अवगुण, असत्य भाषण, मंदिरापान, चोरी करना, स्त्रियों के साथ बलात्कार करना यह सब पाप उस दुराचारी में हो गये। इन सब पापों के फलस्वरूप उसके कोढ़ निकल आया, उसके शरीर के सब अंग गलने लगे और वह महा दुःखी हो गया। तब घरवालों ने भी उसे बाहर निकाल दिया और जो कुछ धन उसके पास था वह भी सब नाश हो गया। तब वह भिक्षावृत्ति करके अपना निर्वाह करने लगा।

ऐसी दशा में उसने नदी किनारे पर जाकर एक वृक्ष के नीचे अपनी कुटिया बना लो। वहां पर उसे जो कोई भिक्षा में दे जाता उसी से वह अपना उदर पूर्ण करने लगा, इसी प्रकार उसे वहां पर रहते हुए कुछ काल व्यतीत हो गया। वह नित्यपति नदी से जल लाता और कुटी के पास पड़ी हुई एक शिला पर रख देता इस प्रकार कुछ जल उसके हाथ से उस शिला पर गिर जाता। इस प्रकार एक समय पौष का मास आ गया और वह इसी प्रकार कार्य करता रहा, उसी प्रकार पौष मास की पूर्णमासो आई तो उसने उस दिन भी उसी प्रकार जल डाला, परन्तु स्नान करके और जल लाने के कारण शोत से उसके प्राण निकल गये। उसी समय यमराज के उसके सूक्ष्म शरीर को पाश में बांधकर ले जाने लगे कि सहसा आकाश से एक सुन्दर विमान उतरा और उसमें से शिवदूतों ने उतरकर यमदूतों से " आकर कहा-“यह नरक में नहीं जा सकता, इसने पुण्य का एक बहुत बड़ा कार्य किया है ।

यमदूत कहने लगे-"इसने तो सारी आयु पर्यन्त बड़े-बड़े पाप के कार्य किये है, कोई धर्म का कार्य किया ही नहीं, अत: यह नरक में ही जाने योग्य है।" शिव दूत कहने लगे-"इसने पौष मास में शिवजी पर जल चढ़ाया है। यह शिला जो तुम देख रहे हो, शिवलिंग है, जो कि बहुत दिनों से यहां पर विराजमान है. इस भेद को कोई नहीं जानता था उसी कारण इसकी पूजा नहीं होती थी, इस ब्राह्मण ने पौष मास में इस पर जल चढ़ाने से चाहे वह अज्ञानवश ही हो, इसको यमपुरो जाने से रोक दिया, अब यह शिवलोक को प्राप्त होगा।"

सुफला एकादशी व्रत

यह व्रत पौष कृष्ण पक्ष एकादशी को रखा जाता है। इस दिन भगवान अच्युत को पूजा का विशेष विधान है। इस व्रत को धारण करने वाले को चाहिये कि प्रातः स्नान करके भगवान की आरटी करें और भोग लगायें। ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन अथवा दान देना चाहिये। रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यन्त फलदायी होता है, इस व्रत को करने से सम्पूर्ण कार्यों में अवश्य ही सफलता मिलती है, अतएव इसका नाम सुफला एकादशी है ।

व्रत कथा-

चम्पावती नगरी में महिष्मति नामक राजा राज्य करता था। उस महिष्मति राजा के चार पुत्र थे। उनमें सबसे बड़ा पुत्र महापापी था। पराई स्त्रियों से रमण करता, सदैव वैश्याओं के संग रहता था। इस प्रकार उस दुष्ट ने पिता का सब धन नष्ट कर दिया। वह नित्य ही बुरे कर्मों में लगा रहता तथा ब्राह्मण, वैष्णव और देवताओं की निंदा किया करता था। तब राजा महिष्मति ने अपने लुम्पक नामक पुत्र को ऐसा कुकुर्मी देखकर राज्य से निकाल दिया। राजा के भय से उसका सभी भाई-बन्धुओं ने परित्याग कर दिया। तब वह लुम्पक अपने मन में विचार करने लगा-भाई-बन्धुओं ने तो मुझको त्याग दिया अब मेरा क्या कर्त्तव्य है। इस प्रकार उसने सोचकर उस नगरी को त्याग देने का निश्चय किया। इस प्रकार दिन में वन में रहकर रात्रि में नगर में आकर चोरी करूंगा। ऐसा विचार कर वह लुम्पक सदैव के लिये नगरी को त्यागकर वन में चला गया। वह पापात्मा नित्य ही वनचरों की हत्या करता और रात में चोरी करता। नगर के लोग कभी उसको पकड़ भी लेते तो राजा का पुत्र होने के कारण उसको छोड़ देते।

इस प्रकार वह पथभ्रष्ट होकर नित्य ही मांसभक्षण कर केवल फलों को खाया करता, परन्तु उस दुष्ट का आश्रम भगवान को अत्यन्त प्रिय था क्योंकि वहां पर एक बहुत पुराना पीपल का वृक्ष था, उस महावन में यह वृक्ष देवता के समान हो गया था। उसी स्थान में वह पापबुद्धि लुम्पक कुछ काल तक रहता रहा और पाप के कर्म करता रहा। एक समय इस प्रकार उसको वहां पर पौष कृष्ण एकादशी का दिन आ गया। वह वस्त्र न होने के कारण पीपल के समीप आकर इतना दु:खी हुआ कि वह मूर्छित हो गया और सारी रात शीत के मारे वह ठिठुर गया और मृतक के समान हो गया, सूर्य के उदय होने तक उसमें कुछ भी चैतन्यता नहीं आई। तब एकादशी के दिन दोपहर के समय कुछ चेतना आने पर वह उठकर धीरे-धीरे चलता हुआ कुछ चलने पर शक्ति न होने के कारण गिर गया विलाप करता हुआ कहने लगा-"ना जाने कब क्या होगा?" शक्ति ना रहने के कारण वह अब जीव हत्या भी नहीं कर सकता था। सारी रात भूख और प्यास से व्याकुल हो जागता रहा इस प्रकार अकस्मात् ही उससे एकादशी का व्रत हो गया और पीड़ा के मारे ना सोने से सारी रात जागरण भी हो गया और उसके पुण्य का अंकुर उदयहो गया।

सूर्य के उदय होने पर एक दिव्य अश्व लुम्पक के आगे आकर खड़ा हो गया और उसी समय आकाशवाणी हुई-“हे राजपुत्र! भगवान वासुदेव की कृपा तथा सुफला एकादशी के व्रत के प्रभाव से तुम्हारा राज्य निष्कंटक हो गया, अब तुम अपने माता-पिता के पास जाओ। निष्कंटक राज्य भोगो।" ऐसी आकाशवाणी सुनकर उसने तथास्तु कहा तो वह दिव्य देहधारी हो गया। तब उसने आभूषणों से युक्त होकर घर जाकर पिता को नमस्कार किया। तब उसके पिता ने उसका राज्याभिषेक किया और उसने बहुत वर्षों तक निष्कंटक राज्य किया। इसके पश्चात् वृद्धावस्था होने पर भगवान विष्णु की भक्ति में परायण होकर अपनी स्त्री सहित वन को चला गया और अपनी आत्मा को पवित्र करके भगवान के बैकुण्ठ लोक को चला गया। सुफला एकादशी का माहात्म्य अश्वमेघ यज्ञ से भी बहुत बढ़कर है।

पुत्रदा एकादशी

यह व्रत पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। इस व्रत को करने से सन्तान की प्राप्ति होती है।

व्रत कथा-

पूर्व काल की बात है भगवती नाम वाली एक नगरी थी और उसमें सुकेतु नाम वाला राजा राज्य करता था। उस राजा को सब प्रकार के सुख प्राप्त थे परन्तु वह राजा सन्तानहीन था। उसने सन्तान हेतु बहुत से यज्ञ, दान और तप किए, परन्तु उसके सन्तान नहीं हुई। इस प्रकार राजा बहुत चिन्तित रहा करता था। वह अपनी स्त्री के सहित बहुत ही दुःखी रहता था। एक समय राजा घोड़े पर चढ़कर शिकार खेलने के लिये गया। राजा के पुरोहित तथा दूसरे लोगों को इसका कुछ पता नहीं था। तब राजा ने घूमते-घूमते एक बड़े भारी वन में प्रवेश किया। इसमें राजा को दोपहर हो गई और वह भूख और प्यास से अति दुःखित हो गया। इधर-उधर भटकते राजा ने एक सुन्दर सरोवर देखा। सरोवर के पास राजा को बहुत से कांतिमान महात्माओं के दर्शन हुए, राजा ने उनकी पृथक्व न्दना की। उसी समय मना की दाहिनी भुजा और दूसरे अंग फड़कने लगे और राजा ने भी इनको शुभ सूचना समझा। राजा ने तपस्वियों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। ऋषि कहने लगे-“हे राजन! तुम्हारी क्या इच्छा है, सो कहिये।" राजा बोला-“हे तपस्वियों, आप कौन हैं तथा आपके क्या नाम हैं? कृपा कर मुझे

बताइये।"

ऋषि बोले-"हे राजन! हम विश्वदेवा हैं, और यहां पर स्नान करते हैं। राजन, आज से पांचवें दिन माघ लग जायेगा और आज पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसका नाम पुत्रदा एकादशी है। यह पुत्र की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को पुत्र देने वाली है। राजा कहने लगे-"महाराज, मुझको पुत्र के उत्पन्न होने में बड़ा सन्देह है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे पुत्र दीजिये।" मुनि बोले-"राजन! आज के ही दिन अतिविख्यात पुत्रदा एकादशी है, तुम की प्राप्ति होगी।" इसका व्रत करो। हमारे आशीर्वाद तथा भगवान के प्रसाद से तुमको अवश्य ही पुत्र इस प्रकार मुनिश्वर के वचनों को सुनकर राजा बोला-"हे भगवन! मैं धन्य हूं जो आपके दर्शन हुए। मैं आपको आज्ञानुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत अवश्य करूँगा |

राजा ने मुनियों के कहे अनुसार व्रत किया और व्रत का पालन करके राजा ने बारम्बार मुनिश्वर को प्रणाम किया और फिर राजा अपने घर वापिस आ गया। उसी दिन रानी को गर्भ की स्थिति हो गई और समय पर बड़ा तेजस्वी और पुण्य कर्म करने वाला पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पिता को सन्तुष्ट और प्रजा के पालन में सदैव तैयार रहता था। जो मनुष्य पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं, वे पुत्र का सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं।

प्रदोष व्रत

पौष मास की कृष्ण पक्ष अथवा शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत करना चाहिये। विधि दोनों की एक ही है। व्रती मनुष्य प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर शौच स्नानादि से निवृत होकर अपना नित्य नियम करने के पश्चात् भगवान शिव का षोडशोपचार विधि से पूजन करें और फिर तीसरे पहर भोजन करें। भोजन में सात्विक पदार्थ हो या तामसी हो, रात्रि को जागरण-कीर्तन करें, दूसरे दिन अर्थात् चतुर्दर्शी को व्रत का पालन कर प्रदोष के दिन जो कोई इस व्रत को करत है तथा भगवान शिव की पूजा करता है। उसके सब मनवांछित कार्य सिद्ध हो जाते हैं और अन्त में शिवलोक को प्राप्त हो जाता है।