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कु पापम् श्यति नाशयति इति कुश: जो पापों का शमन करने वाला हो उसे कुश कहते हैं । अध्यात्म और कर्मकांड शास्त्र में प्रमुख रूप से काम आने वाली वनस्पतियों में कुशा का प्रमुख स्थान है।  इसको कुश ,दर्भ अथवा दाब भी कहते हैं। जिस प्रकार अमृतपान के कारण केतु को अमरत्व का वर मिला है, उसी प्रकार कुशा भी अमृत तत्त्व से युक्त है। यह पौधा पृथ्वी लोक का पौधा न होकर अंतरिक्ष से उत्पन्न माना गया है।
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कु पापम् श्यति नाशयति इति कुश: जो पापों का शमन करने वाला हो उसे कुश कहते हैं । अध्यात्म और कर्मकांड शास्त्र में प्रमुख रूप से काम आने वाली वनस्पतियों में कुशा का प्रमुख स्थान है।  इसको कुश ,दर्भ अथवा दाब भी कहते हैं। जिस प्रकार अमृतपान के कारण केतु को अमरत्व का वर मिला है, उसी प्रकार कुशा भी अमृत तत्त्व से युक्त है। यह पौधा पृथ्वी लोक का पौधा न होकर अंतरिक्ष से उत्पन्न माना गया है।
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== यज्ञादिमें कुश धारणकी आवश्यकता ==
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== प्रस्तावना ==
<blockquote>स्नाने होमे जपे दाने स्वाध्याये पितृकर्मणि । करौ सदर्भी कुर्वीत तथा सन्ध्याभिवादने । (प्रयोगपारिजात )</blockquote>'स्नानमें, हवन, जपमें, दान, स्वाध्यायमें, पितृकर्ममें, सन्ध्योपासनमें और अभिवादनमें दोनों हाथों में कुश धारण करने चाहिये। कुशेन रहिता कुशादिके बिना कोई भी कर्म पूर्ण नहीं होता <blockquote>कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया । उदकेन विना पूजा विना दर्भेण या क्रिया ॥ श्राज्येन च विना होमः फलं दास्यन्ति नैव ते।( यज्ञ-मीमांसा)</blockquote>'कुशके बिना जो पूजा होती है, वह निष्फल कही गई है । जलके बिना जो पूजा है, कुशके बिना जो यज्ञादि क्रिया है और घृतके बिना जो होम है, वह कदापि फलप्रद नहीं होता।'<blockquote></blockquote>'कुशके बिना किया हुआ स्नान, जलके बिना किया हुआ दान
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कुशमें त्रिदेवका निवास -
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संख्याके बिना किया हुआ जप-यह सभी निष्फल होता है।'
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कुशमूले स्थितो ब्रह्मा कुशमध्ये जनार्दनः । कुशाग्रे शङ्करो देवः त्रयो देवाः कुशे स्थिताः॥(य.मी <ref name=":2">Pt. Shriveniram Sharma Gauda (2018) ''Yajna Mimamsa.'' Varanasi: Chaukhamba Vidyabhavan (Page 372)</ref> )
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विना दर्भेण यत्कर्म विना सूत्रेण वा पुनः ।
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'''अनु -''' कुशके मूल में ब्रह्मा, कुशके मध्य में जनार्दन (विष्णु) और कुशके अग्रभागमें भगवान् शङ्कर-ये तीनों देवता कुश में निवास करते हैं।<ref name=":2" />
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राक्षसं तद्भवेत्सर्वन्नामुत्रेह फलप्रदम्||( कूर्मपुराण, उत्तरार्ध १८।५० )
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कुशके अभाव में दूर्वा ग्राह्य है 'कुशस्थाने च दूर्वाः स्युर्मङ्गलस्याभिवृद्धये।'(हेमाद्रौ)
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'कुश और यज्ञोपवीतके बिना किया हुआ समस्त कर्म राक्षस
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'''अनु -'''माङ्गलिक कार्योंकी अभिवृद्धिके लिये कुशके स्थानमें दूर्वा ग्राह्य है।
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कहलाता है और वह इहलोकमें फलप्रद नहीं होता
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इसके सिरे नुकीले होते हैं उखाडते समय सावधानी रखनी पडती है कि जड सहित उखडे और हाथ भी न कटे। कुशल शब्द इसीलिए बना । मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तराभिमुख होकर कुशा उखाडी जाती है ।
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== प्रस्तावना ==
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== कुशा का प्रयोग ==
कुशमें त्रिदेवका निवास-
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भारत में हिन्दू लोग इसे
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* देव-पूजा
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* तर्पण - श्राद्ध आदि
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कुशा से बनी पवित्री (अंगूठी) पहनकर पूजा /तर्पण के  समय पहनी जाती है जिस भाग्यवान् की सोने की अंगूठी पहनी हो उसको जरूरत नहीं है। कुशा प्रत्येक दिन नई उखाडनी पडती है लेकिन अमावाश्या की तोडी कुशा पूरे महीने काम दे सकती है और भादों की अमावश्या के दिन की तोडी कुशा पूरे साल काम आती है। इसलिए लोग इसे तोड के रख लते हैं।
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कुशमूले स्थितो ब्रह्मा कुशमध्ये जनार्दनः ।
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केतु शांति विधानों में कुशा की मुद्रिका और कुशा की आहूतियां विशेष रूप से दी जाती हैं। रात्रि में जल में भिगो कर रखी कुशा के जल का प्रयोग कलश स्थापना में सभी पूजा में देवताओं के अभिषेक, प्राण प्रतिष्ठा, प्रायश्चित कर्म, दशविध स्नान आदि में किया जाता है।
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कुशाग्रे शङ्करो देवः त्रयो देवाः कुशे स्थिताः॥(यज्ञ-मीमांसा)
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केतु को अध्यात्म और मोक्ष का कारक माना गया है। देव पूजा में प्रयुक्त कुशा का पुन: उपयोग किया जा सकता है, परन्तु पितृ एवं प्रेत कर्म में प्रयुक्त कुशा अपवित्र हो जाती है। देव पूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत, ग्रहशांति पूजन कार्यो में रुद्र कलश एवं वरुण कलश में जल भर कर सर्वप्रथम कुशा डालते हैं।
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'कुशके मूल में ब्रह्मा, कुशके मध्य में जनार्दन (विष्णु) और
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कलश में कुशा डालने का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कलश में भरा हुआ जल लंबे समय तक जीवाणु से मुक्त रहता है। पूजा समय में यजमान अनामिका अंगुली में कुशा की नागमुद्रिका बना कर पहनते हैं। 
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कुशके अग्रभागमें भगवान् शङ्कर-ये तीनों देवता कुश में निवास
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== यज्ञादिमें कुश धारणकी आवश्यकता ==
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<blockquote>स्नाने होमे जपे दाने स्वाध्याये पितृकर्मणि । करौ सदर्भी कुर्वीत तथा सन्ध्याभिवादने । (प्रयोगपारिजात )</blockquote>'स्नानमें, हवन, जपमें, दान, स्वाध्यायमें, पितृकर्ममें, सन्ध्योपासनमें और अभिवादनमें दोनों हाथों में कुश धारण करने चाहिये। कुशेन रहिता कुशादिके बिना कोई भी कर्म पूर्ण नहीं होता <blockquote>कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया । उदकेन विना पूजा विना दर्भेण या क्रिया ॥ श्राज्येन च विना होमः फलं दास्यन्ति नैव ते।( यज्ञ-मीमांसा)</blockquote>'कुशके बिना जो पूजा होती है, वह निष्फल कही गई है । जलके बिना जो पूजा है, कुशके बिना जो यज्ञादि क्रिया है और घृतके बिना जो होम है, वह कदापि फलप्रद नहीं होता।'<blockquote></blockquote>'कुशके बिना किया हुआ स्नान, जलके बिना किया हुआ दान
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करते हैं।'
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संख्याके बिना किया हुआ जप-यह सभी निष्फल होता है।'
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कुशके अभाव में दूर्वा ग्राह्य है 'कुशस्थाने च दूर्वाः स्युर्मङ्गलस्याभिवृद्धये।'
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विना दर्भेण यत्कर्म विना सूत्रेण वा पुनः ।
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( हेमाद्रौ)
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राक्षसं तद्भवेत्सर्वन्नामुत्रेह फलप्रदम्||( कूर्मपुराण, उत्तरार्ध १८।५० )
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'माङ्गलिक कार्योंकी अभिवृद्धिके लिये कुशके स्थानमें दूर्वा ग्राह्य है।
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'कुश और यज्ञोपवीतके बिना किया हुआ समस्त कर्म राक्षस
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इसके सिरे नुकीले होते हैं उखाडते समय सावधानी रखनी पडती है कि जड सहित उखडे और हाथ भी न कटे। कुशल शब्द इसीलिए बना । मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्तराभिमुख होकर कुशा उखाडी जाती है ।
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कहलाता है और वह इहलोकमें फलप्रद नहीं होता
 
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== कुशा का प्रयोग ==
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<nowiki>#</nowiki>भारत में हिन्दू लोग इसे पूजा /श्राद्ध के काम में लाते हैं। श्राद्ध तर्पण विना कुशा के सम्भव नहीं हैं ।
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कुशा से बनी अंगूठी पहनकर पूजा /तर्पण के  समय पहनी जाती है जिस भाग्यवान् की सोने की अंगूठी पहनी हो उसको जरूरत नहीं है। कुशा प्रत्येक दिन नई उखाडनी पडती है लेकिन अमावाश्या की तोडी कुशा पूरे महीने काम दे सकती है और भादों की अमावश्या के दिन की तोडी कुशा पूरे साल काम आती है। इसलिए लोग इसे तोड के रख लते हैं।
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केतु शांति विधानों में कुशा की मुद्रिका और कुशा की आहूतियां विशेष रूप से दी जाती हैं। रात्रि में जल में भिगो कर रखी कुशा के जल का प्रयोग कलश स्थापना में सभी पूजा में देवताओं के अभिषेक, प्राण प्रतिष्ठा, प्रायश्चित कर्म, दशविध स्नान आदि में किया जाता है।
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केतु को अध्यात्म और मोक्ष का कारक माना गया है। देव पूजा में प्रयुक्त कुशा का पुन: उपयोग किया जा सकता है, परन्तु पितृ एवं प्रेत कर्म में प्रयुक्त कुशा अपवित्र हो जाती है। देव पूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत, ग्रहशांति पूजन कार्यो में रुद्र कलश एवं वरुण कलश में जल भर कर सर्वप्रथम कुशा डालते हैं।
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कलश में कुशा डालने का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कलश में भरा हुआ जल लंबे समय तक जीवाणु से मुक्त रहता है। पूजा समय में यजमान अनामिका अंगुली में कुशा की नागमुद्रिका बना कर पहनते हैं।
      
== कुशा आसन का महत्त्व : ==
 
== कुशा आसन का महत्त्व : ==
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इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का महत्व है। शास्त्रोक्त विधि के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष में चलने वाला पन्द्रह दिनों के पितृ पक्ष का शुभारम्भ भादों मास की अमावस्या से ही हो जाती है!
 
इसलिए इस दिन पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, दान-पुण्य का महत्व है। शास्त्रोक्त विधि के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष में चलने वाला पन्द्रह दिनों के पितृ पक्ष का शुभारम्भ भादों मास की अमावस्या से ही हो जाती है!
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== References ==

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