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=== देवशयनी एकादशी ===
 
=== देवशयनी एकादशी ===
सूतजी कहते हैं-आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी देवशयनी एकादशी कहलाती है। और उस एकादशी से चतुर्मास का संकल्प कर प्रथम भगवान विष्णुजी को श्वेत वस्त्र पहना और श्वेत वर्ण की शय्या पर भगवान विष्णु को शयन करायें। इसके बाद वेदपाठी ब्राह्मणों से दूध, दही, घृत, शहद और शर्करा से पंचामृत स्नान करायें फिर गधादि सब चीजों से भगवान की पूजा करें और प्रार्थना करें कि "हे देवेश! हे उनार्दन! हे [[LakshmiDevi Temple(Anathiyamma), Anathi, Hassan, Karnataka, India|लक्ष्मी]]कांत! आपको शमन करा रहा हूं। आपके सन्मुख होकर मैं चतुर्मास व्रत का नियम ग्रहण करता हूं। आप मेरे समस्त मनोरथ पूर्ण कीजिये।" "व्रत करने से जो फल मिलता है अब वह तुमसे मैं कहता हूं- चतुर्मास का व्रत आरम्भ करके उसे किसी भी प्रकार खण्डित न करें। जो अनुष्य पूर्ण वर्ष इस व्रत को करते हैं, उसका तेज सूर्य के समान हो जाता है।" “जो मनुष्य चर्तुमास में भगवान विष्णु की षोडशोपचार विधि से पूजा करते महाप्रलय तक बैकुण्ठ का वास करते हैं।" "जो नित्यप्रति भगवान के मन्दिर में आकर सफाई करते हैं या जल छिड़कते
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सूतजी कहते हैं-आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी देवशयनी एकादशी कहलाती है। और उस एकादशी से चतुर्मास का संकल्प कर प्रथम भगवान विष्णुजी को श्वेत वस्त्र पहना और श्वेत वर्ण की शय्या पर भगवान विष्णु को शयन करायें। इसके बाद वेदपाठी ब्राह्मणों से दूध, दही, घृत, शहद और शर्करा से पंचामृत स्नान करायें फिर गधादि सब चीजों से भगवान की पूजा करें और प्रार्थना करें कि "हे देवेश! हे उनार्दन! हे [[LakshmiDevi Temple(Anathiyamma), Anathi, Hassan, Karnataka, India|लक्ष्मी]]कांत! आपको शमन करा रहा हूं। आपके सन्मुख होकर मैं चतुर्मास व्रत का नियम ग्रहण करता हूं। आप मेरे समस्त मनोरथ पूर्ण कीजिये।" "व्रत करने से जो फल मिलता है अब वह तुमसे मैं कहता हूं- चतुर्मास का व्रत आरम्भ करके उसे किसी भी प्रकार खण्डित न करें। जो अनुष्य पूर्ण वर्ष इस व्रत को करते हैं, उसका तेज सूर्य के समान हो जाता है।" “जो मनुष्य चर्तुमास में भगवान विष्णु की षोडशोपचार विधि से पूजा करते महाप्रलय तक बैकुण्ठ का वास करते हैं।" "जो नित्यप्रति भगवान के मन्दिर में आकर सफाई करते हैं या जल छिड़कते हैं। गोबर से लोपते हैं। रंग से चित्र बनाते हैं, वे सात जन्म तक धर्मपरायण रहते हैं और अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं। "जो भगवान के निमित्त सुवर्ण कलश ब्राह्मण को देते हैं, वह इन्द्रलोक में जाकर अक्षय सुख का भोग करते हैं।" "जो तुलसी से भगवान की पूजा करते हैं और सुवर्ण की तुलसी ब्राह्मणों को दान देते हैं, वे स्वर्णविमान में बैठकर वैष्णव गति को प्राप्त होते हैं।" धूप दान करते हैं अथवा दीपक जलाते हैं या प्रदक्षिणा करते हैं, नमस्कार करते हैं तथा घुटनों के बल बैठकर दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करते हैं, जो संध्या के समय देवता के स्थान में दीपक या तेल का दान करते हैं, वे मनुष्य विष्णु का चरणामृत पान करते हैं।" "जो भगवान विष्णु के मन्दिर में जाकर एक सौ आठ बार गायत्री मंत्र तीनों काल जपते हैं, वे मनुष्य पापों से लिप्त नहीं होते।" "गायत्री का जाप और ध्यान करने से या उद्यापन शास्त्र की पुस्तकें दान करने से विद्या का लाभ होता है।
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"जो मनुष्य चतुर्मास में, प्रतिदिन तिल का हवन करता है, सुवर्ण का दान करता है वह सब पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।" "जो भगवान शिव पर नित्य प्रति पुर्वा चढ़ाता है और व्रत के अंत में सुवर्ण को पुर्वा दान देता है, उसके बहुत बड़ी आयु वाली सन्तान उत्पन्न होती है।" "जो अट्ठाइस तोले के पात्र दान देता है, वो संसारमुक्त हो जाता है तथा माता के गर्भ से जन्म नहीं लेता।" “इस प्रकार आलस्यरहित होकर चतुर्मास का व्रत धारण करना चाहिए। व्रत के अन्त में अच्छा बजने वाला घण्टा दान देना चाहिए। इसके दान करने वाला सारे पापों से छूट जाता है।" "भगवान विष्णु के शयन के समय जो मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार तिल सहित सुवर्ण और वस्त्र का दान करता है, वह अन्त समय में शिवलोक को जाता "जो चतुर्मास में प्रतिदिन, उत्तम वस्त्र में लपेटकर, दूध का घड़ा दक्षिणा सहित दान करता है और व्
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