Changes

Jump to navigation Jump to search
लेख सम्पादित किया
Line 1: Line 1: −
{{cleanup reorganize Dharmawiki Page}}
+
== प्राक्कथन ==
 +
भारतीय समाज यदि चिरंजीवी बना है तो वह भारत की कुटुंब व्यवस्था के कारण। बहुत दीर्घ कालतक विदेशी शासकों के प्रभाव के उपरांत भी आज यदि भारतीय समाज में कुछ भारतीयता शेष है तो वह परिवार व्यवस्था के कारण ही है । लगभग २००-२२५ वर्षों की विपरीत शिक्षा के उपरांत भी यदि भारतीय समाज में भारतीयता बची है तो वह हमारी कुटुंब व्यवस्था के कारण ही है। लेकिन विपरीत शिक्षा के साथ चल रही इस लडाई में कुटुंब व्यवस्था भी क्षीण हो गई है।
   −
कुटुंब
  −
प्राक्कथन
  −
भारतीय समाज यदि चिरंजीवी बना है तो वह भारत की कुटुंब व्यवस्था के कारण। बहुत दीर्घ कालतक विदेशी शासकों के प्रभाव के उपरांत भी आज यदि भारतीय समाज में कुछ भारतीयता शेष है तो वह परिवार व्यवस्था के कारण ही। लगभग २००-२२५ वर्षों की विपरीत शिक्षा के उपरांत भी यदि भारतीय समाज में भारतीयता बची है तो वह हमारी कुटुंब व्यवस्था के कारण ही है। लेकिन विपरीत शिक्षा के साथ चल रही इस लडाई में कुटुंब व्यवस्था भी क्षीण हो गई है।
   
आज विश्व जिसका अनुकरण करता है वह अमरिका एक बडे प्रमाण में टूटते कुटुंबों का देश है। कुटुंबों को फिर से व्यवस्थित कैसे किया जाए इस की चिंता अमरिका के ही नहीं सभी तथाकथित प्रगत देशों के हितचिंतक विद्वान करने लगे हैं। किन्तु प्रेम, आत्मीयता, कर्तव्य भावना, नि:स्वार्थ भाव से औरों के हित को प्राधान्य देना, औरों के लिये त्याग करने की मानसिकता, इन सब को पुन: लोगों के मन में जगाना सरल बात नहीं है। हमारे यहाँ कुटुंब व्यवस्था अब भी कुछ प्रमाण में टिकी हुई है तो हम उस का मूल्य समझते नहीं हैं।
 
आज विश्व जिसका अनुकरण करता है वह अमरिका एक बडे प्रमाण में टूटते कुटुंबों का देश है। कुटुंबों को फिर से व्यवस्थित कैसे किया जाए इस की चिंता अमरिका के ही नहीं सभी तथाकथित प्रगत देशों के हितचिंतक विद्वान करने लगे हैं। किन्तु प्रेम, आत्मीयता, कर्तव्य भावना, नि:स्वार्थ भाव से औरों के हित को प्राधान्य देना, औरों के लिये त्याग करने की मानसिकता, इन सब को पुन: लोगों के मन में जगाना सरल बात नहीं है। हमारे यहाँ कुटुंब व्यवस्था अब भी कुछ प्रमाण में टिकी हुई है तो हम उस का मूल्य समझते नहीं हैं।
 
वास्तव में सुखी समाधानी भारतीय समाज जीवन का रहस्य ही ‘परिवार भावना’ में है। हमारे सभी सामाजिक संबंधों का आधार कुटुंब भावना ही है। यह कुटुंब भावना केवल रक्त-संबंधोंतक सीमित नहीं हुवा करती थी। इसका विस्तार रक्त-संबंधों से आगे सृष्टि के चराचर तक ले जाना यह कुटुंब व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है। प्रत्यक्ष में सभी सामाजिक संबंधों में भी यह कुटुंब भावना या आत्मीयता व्यवहार में दिखाई दे ऐसे शिक्षा और संस्कार कुटुंबों में भी और विद्यालयों में भी दिये जाते थे। शिष्य गुरू का मानसपुत्र होता है। राजा प्रजा का पिता होता है। प्रजा का अर्थ ही संतान होता है। एक ही व्यवसाय में काम करनेवाले लोग स्पर्धक नहीं होते। व्यवसाय बंधू होते हैं। धरती माता होती है। गाय, तुलसी, गंगा ये माताएँ होतीं हैं। सभा भवन में व्याख्यान सुनने आये हुए लोग 'मेरे प्रिय बहनों और भाईयों' होते हैं। हमारे तो बाजार भी कुटुंब भावना से चलते हैं।
 
वास्तव में सुखी समाधानी भारतीय समाज जीवन का रहस्य ही ‘परिवार भावना’ में है। हमारे सभी सामाजिक संबंधों का आधार कुटुंब भावना ही है। यह कुटुंब भावना केवल रक्त-संबंधोंतक सीमित नहीं हुवा करती थी। इसका विस्तार रक्त-संबंधों से आगे सृष्टि के चराचर तक ले जाना यह कुटुंब व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है। प्रत्यक्ष में सभी सामाजिक संबंधों में भी यह कुटुंब भावना या आत्मीयता व्यवहार में दिखाई दे ऐसे शिक्षा और संस्कार कुटुंबों में भी और विद्यालयों में भी दिये जाते थे। शिष्य गुरू का मानसपुत्र होता है। राजा प्रजा का पिता होता है। प्रजा का अर्थ ही संतान होता है। एक ही व्यवसाय में काम करनेवाले लोग स्पर्धक नहीं होते। व्यवसाय बंधू होते हैं। धरती माता होती है। गाय, तुलसी, गंगा ये माताएँ होतीं हैं। सभा भवन में व्याख्यान सुनने आये हुए लोग 'मेरे प्रिय बहनों और भाईयों' होते हैं। हमारे तो बाजार भी कुटुंब भावना से चलते हैं।
Line 51: Line 49:  
१.२६ अपराधीकरण में कमी के कारण सुरक्षा, न्याय, शिक्षा व्यवस्थाओं का दबाव कम होता है।  
 
१.२६ अपराधीकरण में कमी के कारण सुरक्षा, न्याय, शिक्षा व्यवस्थाओं का दबाव कम होता है।  
 
१.२७ एकात्म कुटुम्बों के एकत्र आने से एकात्म ग्राम बनता है। ऐसे ग्राम ही वसुधैव कुटुंबकम् की नींव होते हैं।
 
१.२७ एकात्म कुटुम्बों के एकत्र आने से एकात्म ग्राम बनता है। ऐसे ग्राम ही वसुधैव कुटुंबकम् की नींव होते हैं।
१.२८ शारिरिक दृष्टि से दुर्बल होने के कारण समाज में बढते अपराधीकरण की सब से अधिक हानी स्त्री को ही होती है। इस  
+
१.२८ शारिरिक दृष्टि से दुर्बल होने के कारण समाज में बढते अपराधीकरण की सब से अधिक हानी स्त्री को ही होती है। इस दृष्टि से स्त्रियों की सुरक्षा की अधिक आश्वस्ति संयुक्त कुटुंब व्यवस्था में मिलती है।
    दृष्टि से स्त्रियों की सुरक्षा की अधिक आश्वस्ति संयुक्त कुटुंब व्यवस्था में मिलती है।  
+
 
 
१.२९ समाज में कुछ काम ऐसे होते हैं जिन का कोई मूल्य नहीं ऑंका जा सकता। ऐसे काम करनेवाले लोगों की भी समाज में नितांत आवश्यकता होती है। जैसे ज्ञानी, शोधकर्ता, शिक्षक, वैज्ञानिक, कलाकार, समाजसेवक/पंच/सरपंच, सुरक्षा रक्षक, पहलवान, वैद्य आदि। आवश्यकतानुसार इन लोगों के चरितार्थ की जिम्मेदारी भी संयुक्त कुटुंब सहज ही निभा सकते हैं।       
 
१.२९ समाज में कुछ काम ऐसे होते हैं जिन का कोई मूल्य नहीं ऑंका जा सकता। ऐसे काम करनेवाले लोगों की भी समाज में नितांत आवश्यकता होती है। जैसे ज्ञानी, शोधकर्ता, शिक्षक, वैज्ञानिक, कलाकार, समाजसेवक/पंच/सरपंच, सुरक्षा रक्षक, पहलवान, वैद्य आदि। आवश्यकतानुसार इन लोगों के चरितार्थ की जिम्मेदारी भी संयुक्त कुटुंब सहज ही निभा सकते हैं।       
१.३० छोटे छोटे कुटुम्बों के कारण बाजार से हर वस्तू प्लॅस्टिक की थैली में लाई जाती है। इससे विशाल मात्रा में प्लॅस्टिक  
+
१.३० छोटे छोटे कुटुम्बों के कारण बाजार से हर वस्तू प्लॅस्टिक की थैली में लाई जाती है। इससे विशाल मात्रा में प्लॅस्टिक का कचरा निर्माण होता है। संयुक्त कुटुंब में ऐसा नहीं होता।  
      का कचरा निर्माण होता है। संयुक्त कुटुंब में ऐसा नहीं होता।
+
 
१.३१ संयुक्त कुटुंबों में ही कौटुंबिक उद्योग फलते फूलते हैं। कौटुंबिक उद्योगों से निम्न लाभ होते हैं।
+
१.३१ संयुक्त कुटुंबों में ही कौटुंबिक उद्योग फलते फूलते हैं। कौटुंबिक उद्योगों से निम्न लाभ होते हैं।  
१.३१.१ प्रत्येक व्यक्ति के लिये रोजगार की आश्वस्ति
+
 
 +
१.३१.१ प्रत्येक व्यक्ति के लिये रोजगार की आश्वस्ति
 +
 
 
१.३१.२ स्थानिक प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग  
 
१.३१.२ स्थानिक प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग  
 
१.३१.३ पारिवारिक उद्योग में सभी मालिक होते हैं। इसलिये समाज भी मालिकों की मानसिकता का बनता है।
 
१.३१.३ पारिवारिक उद्योग में सभी मालिक होते हैं। इसलिये समाज भी मालिकों की मानसिकता का बनता है।
Line 72: Line 72:  
१.३१.१४ पारिवारिक उद्योगों को समाज अपने हित में समायोजित और नियंत्रित करता है। जब कि वर्तमान विशालकाय  
 
१.३१.१४ पारिवारिक उद्योगों को समाज अपने हित में समायोजित और नियंत्रित करता है। जब कि वर्तमान विशालकाय  
 
उद्योग समाज के सामान्य जन की पसंद को, आवश्यकताओं को अपने हित के लिये प्रभावित करते हैं। झूठे अनैतिक, आक्रमक विज्ञापनों के माध्यम से वर्तमान के बडे उद्योग विभक्त कुटुंबों का शोषण करते हैं।
 
उद्योग समाज के सामान्य जन की पसंद को, आवश्यकताओं को अपने हित के लिये प्रभावित करते हैं। झूठे अनैतिक, आक्रमक विज्ञापनों के माध्यम से वर्तमान के बडे उद्योग विभक्त कुटुंबों का शोषण करते हैं।
१.३२ बच्चा जब पैदा होता है उसे केवल अधिकार होते हैं। कोई कर्तव्य नहीं होते। लेकिन जब वह परिवार का मुखिया हो जाता है तो उसके केवल कर्तव्य रह जाते हैं। कोई अधिकार नहीं रहते। सामान्यत: मनुष्य स्वार्थी होता है। उसे अधिकारों की रक्षा की समझ तो जन्म से ही होती है। इस केवल अपने अधिकारों की समझ के स्थानपर अपने कर्तव्य और अन्यों  
+
१.३२ बच्चा जब पैदा होता है उसे केवल अधिकार होते हैं। कोई कर्तव्य नहीं होते। लेकिन जब वह परिवार का मुखिया हो जाता है तो उसके केवल कर्तव्य रह जाते हैं। कोई अधिकार नहीं रहते। सामान्यत: मनुष्य स्वार्थी होता है। उसे अधिकारों की रक्षा की समझ तो जन्म से ही होती है। इस केवल अपने अधिकारों की समझ के स्थानपर अपने कर्तव्य और अन्यों के अधिकार की समझ निर्माण करने से समाज सुसंस्कृत और सुखी बनता है।  
    के अधिकार की समझ निर्माण करने से समाज सुसंस्कृत और सुखी बनता है।
+
 
१.३३ संयुक्त कुटुंबवाले समाज में न्ययिक मामले बहुत कम हो जाते हैं। लगभग सभी कौटुंबिक समस्याओं का हल संयुक्त  
+
१.३३ संयुक्त कुटुंबवाले समाज में न्ययिक मामले बहुत कम हो जाते हैं। लगभग सभी कौटुंबिक समस्याओं का हल संयुक्त  
 
     कुटुंब अपनी परिवार पंचायत में निकाल लेते हैं। फॅमिली व्यवस्था में तो सीधे न्यायालय के ही द्वार खटखटाने पडते  हैं।
 
     कुटुंब अपनी परिवार पंचायत में निकाल लेते हैं। फॅमिली व्यवस्था में तो सीधे न्यायालय के ही द्वार खटखटाने पडते  हैं।
 
१.३४ कौटुंबिक उद्योगोंवाले समाज में विविधता के साथ आर्थिक समानता होती है। अर्थ का अभाव या प्रभाव नहीं होता।
 
१.३४ कौटुंबिक उद्योगोंवाले समाज में विविधता के साथ आर्थिक समानता होती है। अर्थ का अभाव या प्रभाव नहीं होता।
890

edits

Navigation menu