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== वर्तमान न्यायतंत्र की विकृतियाँ और धार्मिक (धार्मिक) न्यायदृष्टि के सूत्र ==
 
== वर्तमान न्यायतंत्र की विकृतियाँ और धार्मिक (धार्मिक) न्यायदृष्टि के सूत्र ==
न्यायतंत्र का उद्देश्य है प्रस्तुत परिस्थितियों का विचार करते हुए सत्य को खोजना। सत्य की प्रतिष्ठापना करना। इस दृष्टि से पाश्चात्य न्यायदृष्टि के अनुसार सत्य की व्याख्या बनती है "प्रस्तुत जानकारी, साक्षी और प्रमाणों के आधारपर विश्लेषण, संश्लेषण, तर्क अनुमान के आधारपर जो सिद्ध होगा वही सत्य है।" अर्थात् वास्तविक सत्य नहीं कानूनी सत्य। पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र यह कहता है की न्यायदेवता अंधी होती है। यह कथन भी अत्यंत विचित्र है। वास्तव में तो न्यायदेवता सूक्ष्म से सूक्ष्म बात जान सके ऐसी होनी चाहिये। किन्तु पाश्चात्य न्यायतंत्र के अनुसार न्यायाधीश ने प्रस्थापित कानून के आधार पर, प्रस्तुत की गई जानकारी, साक्ष और प्रमाणों को छोडकर अन्य किसी भी बात का विचार नहीं करना है। लेकिन ऐसा करने से न्यायाधीश सत्य को पूरी तरह कैसे जान सकता है? यहाँ पाश्चात्य जीवनदृष्टि का टुकड़ों में जानने का सूत्र लागू होता है। जितने टुकडों की जानकारी मिलेगी उन के आधारपर सत्य का निर्धारण करना। यदि पूरे की जानकारी नहीं होगी तो पूरा सत्य कैसे सामने आएगा? लेकिन पूरे सत्य की चिंता पाश्चात्य न्यायतंत्र को नहीं है। सत्य की धार्मिक (धार्मिक) व्याख्या महाभारत में दी गई है। यह व्याख्या धार्मिक (धार्मिक) जीवनदृष्टि के“ सर्वे भवन्तु सुखिन:" इस सूत्र के अनुसार ही है। व्याख्या है{{Citation needed}}:<blockquote>यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम। </blockquote><blockquote>भावार्थ : जो बात चराचर के हित में है, वही सत्य है। सत्य की यह सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है। </blockquote><blockquote>सच्चिदानन्द याने सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा का एक प्रमुख लक्षण “सत्” भी है। सत् याने जो अटल है। जो अपरिवर्तनीय है। चिरन्तन है। इसलिए सत्य की खोज वास्तव में परमात्मा की खोज ही होती है।</blockquote>न्याय दर्शन के पहले आन्हिक के पहले ही सूत्र में कहा है<ref>न्याय दर्शन , प्रथम सूत्र</ref>: <blockquote>प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्तावयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभासच्छल जाति निग्रहस्था-नानांतत्वज्ञानान्नि:श्रेयसाधिगम: ।।१।।</blockquote><blockquote>अर्थ : प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थानानाम् आदि सोलह के माध्यम से संसार के पदार्थों के तत्वज्ञान के द्वारा नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति होती है।</blockquote>प्रस्तावना में हमने देखा है कि इस न्यायतंत्र का ५० प्रतिशत वकील नामक वर्ग यह असत्य की विजय के लिये अपनी शक्ति लगाता है । अर्थात् अनैतिक धंधा करता है । उसे दुराचार करना ही पडता है।  
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न्यायतंत्र का उद्देश्य है प्रस्तुत परिस्थितियों का विचार करते हुए सत्य को खोजना। सत्य की प्रतिष्ठापना करना। इस दृष्टि से पाश्चात्य न्यायदृष्टि के अनुसार सत्य की व्याख्या बनती है "प्रस्तुत जानकारी, साक्षी और प्रमाणों के आधारपर विश्लेषण, संश्लेषण, तर्क अनुमान के आधारपर जो सिद्ध होगा वही सत्य है।" अर्थात् वास्तविक सत्य नहीं कानूनी सत्य। पाश्चात्य न्यायतंत्र का एक सूत्र यह कहता है की न्यायदेवता अंधी होती है। यह कथन भी अत्यंत विचित्र है। वास्तव में तो न्यायदेवता सूक्ष्म से सूक्ष्म बात जान सके ऐसी होनी चाहिये। किन्तु पाश्चात्य न्यायतंत्र के अनुसार न्यायाधीश ने प्रस्थापित कानून के आधार पर, प्रस्तुत की गई जानकारी, साक्ष और प्रमाणों को छोडकर अन्य किसी भी बात का विचार नहीं करना है। लेकिन ऐसा करने से न्यायाधीश सत्य को पूरी तरह कैसे जान सकता है? यहाँ पाश्चात्य जीवनदृष्टि का टुकड़ों में जानने का सूत्र लागू होता है। जितने टुकडों की जानकारी मिलेगी उन के आधारपर सत्य का निर्धारण करना। यदि पूरे की जानकारी नहीं होगी तो पूरा सत्य कैसे सामने आएगा? लेकिन पूरे सत्य की चिंता पाश्चात्य न्यायतंत्र को नहीं है। सत्य की धार्मिक (धार्मिक) व्याख्या महाभारत में दी गई है। यह व्याख्या धार्मिक (धार्मिक) जीवनदृष्टि के“ सर्वे भवन्तु सुखिन:" इस सूत्र के अनुसार ही है। व्याख्या है{{Citation needed}}:<blockquote>यद् भूत हितं अत्यंत एतत् सत्यं मतं मम। </blockquote><blockquote>भावार्थ : जो बात चराचर के हित में है, वही सत्य है। सत्य की यह सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है। </blockquote><blockquote>सच्चिदानन्द याने सत्-चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा का एक प्रमुख लक्षण “सत्” भी है। सत् याने जो अटल है। जो अपरिवर्तनीय है। चिरन्तन है। अतः सत्य की खोज वास्तव में परमात्मा की खोज ही होती है।</blockquote>न्याय दर्शन के पहले आन्हिक के पहले ही सूत्र में कहा है<ref>न्याय दर्शन , प्रथम सूत्र</ref>: <blockquote>प्रमाण प्रमेय संशय प्रयोजन दृष्टान्त सिद्धान्तावयव तर्क निर्णय वाद जल्प वितण्डा हेत्वाभासच्छल जाति निग्रहस्था-नानांतत्वज्ञानान्नि:श्रेयसाधिगम: ।।१।।</blockquote><blockquote>अर्थ : प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थानानाम् आदि सोलह के माध्यम से संसार के पदार्थों के तत्वज्ञान के द्वारा नि:श्रेयस की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति होती है।</blockquote>प्रस्तावना में हमने देखा है कि इस न्यायतंत्र का ५० प्रतिशत वकील नामक वर्ग यह असत्य की विजय के लिये अपनी शक्ति लगाता है । अर्थात् अनैतिक धंधा करता है । उसे दुराचार करना ही पडता है।  
    
धार्मिक व्यवस्था धर्म का सूत्र यह कहता है कि जिस व्यवस्था में किसी को सदाचार से जीना संभव नहीं हो, वह व्यवस्था त्याज्य है । व्यवस्था धर्म का यह सूत्र न्यायव्यवस्था को भी पूर्ण रूप से लागू है।   
 
धार्मिक व्यवस्था धर्म का सूत्र यह कहता है कि जिस व्यवस्था में किसी को सदाचार से जीना संभव नहीं हो, वह व्यवस्था त्याज्य है । व्यवस्था धर्म का यह सूत्र न्यायव्यवस्था को भी पूर्ण रूप से लागू है।   

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